क्या अमेरिका एक ऐसी में फंस चुका है जिसका अंजाम उसने सपनों में भी खुद नहीं सोचा था। ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के कुछ ही हफ्ते बीते हैं और पेंटागन से आने वाले आंकड़े यानी नंबर्स ने सबको हैरान कर दिया है। यूएस ट्रूप्स को बहुत बड़ी मार पड़ी है। 400 से ज्यादा सैनिक बुरी तरह से घायल हैं और यह खुद कंफर्म किया है पेंटागन ने। जी हां दर्शकों पेंटागन के डाटा ने रिवील किया है कि ईरानियन स्ट्राइक्स ने इतना बड़ा धक्का दिया है।
यूएस को कि 400 से ज्यादा यूएस के सैनिक अब जिंदगी और मौत के बीच लड़ाई लड़ रहे हैं। अब सबसे बड़ी बात यह है दर्शकों, आज सवाल सिर्फ स्ट्रेटजी का नहीं है। सवाल उन सवा50 अमेरिकन सोल्जर्स का है जो ईरान के ड्रोंस और मिसाइल्स का निशाना बने हैं। क्या यह मिलिट्री स्टेलेमेट था या फिर एक स्ट्रेटेजिक डिजास्टर जिसकी कीमत अब डोनल्ड ट्रंप को देनी पड़ेगी।
सबसे पहले हम समझते हैं कि कैसे यह सारी चीजें हुई और कैसे अब आर्मी, नेवी और एयरफोर्स को मिला के पेंटागन के लेटेस्ट आंकड़ों ने सबको हिला दिया है। पेंटागन की लेटेस्ट रिपोर्ट एक भयानक तस्वीर पेश करती है। एपिक फ्यूरी में अब तक 1415 यूएस सर्विस मेंबर्स जख्मी हो चुके हैं और अगर हम इन नंबर्स को ब्रेकडाउन करें तो सबसे ज्यादा मार पड़ी है यूएस की आर्मी पर।
जी हां दर्शकों यूएस की आर्मी से 271 सैनिक पूरी तरह से जख्मी पड़े हैं। नेवी के 63 और एयर फोर्स के 62 भी जख्मी हैं। साथ-साथ 19 लोग मरीन से भी इस लिस्ट में शामिल है। यानी हर तरह की फोर्स पर हमला हुआ है। हर तरह की फोर्स ने इस की कीमत चुकाई है। माना कि इनमें से कई सोल्जर्स ड्यूटी पर लौटने की अभी भी जिद करते हैं और अपने अंदर देशभक्ति की भावना जताते हैं।
लेकिन दर्शकों 450 के आसपास सोल्जर्स का जख्मी होना यूएस की हार तो नहीं दर्शाता कि कैसे उन्होंने सोचा था कि इस कॉन्फ्लिक्ट को एक-दो दिन में खत्म कर देंगे और 28 फरवरी से आज तक भी सिचुएशन उनके कंट्रोल में आई नहीं है। कहा उन्होंने सपना सजाया था कि एक शॉर्ट ड्यूरेशन कॉन्फ्लिक्ट होगी।
लेकिन भैया अब यह फुल स्केल वॉर बन चुकी है जिसमें यूनाइटेड स्टेट्स अब पिछड़ता हुआ नजर आ रहा है। यह सिर्फ नंबर्स नहीं है। यह यूएस फॉरवर्ड बेसिस की वनरेबिलिटीज का भी बड़ा सबूत है। इसके बाद दर्शकों समझते हैं कि किस-किस इंसिडेंट ने कितना नुकसान दिया। कुवैत, सऊदी अरेबिया और इराक में जो हमले हुए उसकी कीमत चुकानी पड़ी है ट्रंप को। इस का सबसे काला दिन था मार्च का वो दिन जब कुवैत के पोर्ट ऑफ शोएबा पर एक सिंगल ईरानियन ने छह यूएस सोल्जर्स की जान ले ली थी। वहां डिफेंसिव सिस्टम्स धरे के धरे रह गए थे और ये सिलसिला रुका नहीं था। सऊदी अरेबिया के भी प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर लगातार गिरी थी।
वहां पर कई सारे पर्सनल जख्मी हुए थे और सोल्जर्स ने दम भी तोड़ दिया था। सिर्फ डायरेक्ट ही नहीं एक्सीडेंट्स भी कॉस्ट बढ़ाते हैं। इराक में एक केसी 135 रिफ्यूलिंग एयरक्राफ्ट क्रैश हुआ जिसमें छह यूएस एयरमैन की मौत हो गई। ईरान ने दिखा दिया कि उनके लो कॉस्ट और अमेरिका के एडवांस डिफेंस लेयर्स को ओवरवेल यानी न्यूट्रलाइज कर सकते हैं। यानी महंगे से कुछ नहीं होता। ईरान के जो अफोर्डेबल और थी उन्होंने ही यूएस सोल्जर्स को घुटने पर ला खड़ा किया।
इसके बाद दर्शकों बात करते हैं हार्डवेयर की। ईरान ने सिर्फ सोल्जर्स को नहीं अमेरिका के प्राइड को भी हिट किया है। अमेरिका के गुरूर को भी तोड़ा है। 17 मिलिट्री साइट्स डैमेज हो चुकी हैं। कुवैत, क़तर, यूएई और बहरान कोई भी बेस महफूज़ नहीं बचा है। अलुदीद और अलदफरा जैसे क्रिटिकल बेसिस पर रेडार्स और इंफ्रास्ट्रक्चर को भारी नुकसान पहुंचा है। और पेंटागन का एस्टीमेट है कि अब तक 800 मिलियन तो सिर्फ रिपेयर्स में खर्च हो गए हैं।
और अगर पूरी वॉर का बिल देखें तो वह 18 बिलियन डॉल को क्रॉस कर चुका है कुछ ही हफ्तों के अंदर। सवाल यह है क्या चाइनीस सेटेलाइट्स और ईरानियन ड्रोंस ने मिलकर यूएस सुपरियरिटी का जो मिथ था उसको तोड़ दिया है और दुनिया के सामने यूएस की शक्ति को एक्सपोज कर दिया है। अमेरिका के अंदर अब गुस्सा बढ़ रहा है। एंटी वॉर सेंटीमेंट पीक पर है।
लॉ मेकर्स और पब्लिक अब ऑपरेशन एपिक फ्यूरी की ट्रांसपेरेंसी पर सवाल उठा रहे हैं और अब ट्रंप अपने ही देश में लोकप्रियता खोता जा रहा है। लोग पूछ रहे हैं क्या पेंटागन कैजुअल्टी फिगर्स छुपा रहा है और जर्नलिस्टिक पॉइंट ऑफ व्यू से देखें तो ये अब सिर्फ बैटल फील्ड तक सीमित नहीं रही है। यह वाशिंगटन कॉरिडोर्स में एक पॉलिटिकल नाइट मेयर बन चुकी है।
