दिल्ली के नए एलजी तरणजीत सिंह संधू को अमेरिका के वाइट हाउस से बधाई मिली है उनकी तारीफ हुई है और तारीफ किसने की है स्क्रीन पर आप तस्वीर देख रहे हैं खुद प्रेसिडेंट ट्रंप ने प्रेसिडेंट ट्रंप ने ट्रुशोषण पर लिखा कि तरणजीत संधू को दिल्ली का नया उपराज्यपाल बनने पर बहुत-बहुत बधाई। वह एक बेहतरीन राजनायक रहे हैं और उन्होंने भारत अमेरिका के रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए बहुत काम किया है। मैं दिल्ली की तरक्की और दुनिया भर से अच्छे संबंध बनाने के लिए उन्हें शुभकामनाएं देता हूं।
ऐसा प्रेसिडेंट ट्रंप ने तरणजीत सिंह संधू के लिए लिखा है सोशल पर। ट्रंप और संधू की बॉन्डिंग क्या है? तरजीत संधू का बैकग्राउंड क्या है? और पॉलिटिक्स में उनकी एंट्री कहां हुई? इसकी भी कहानी है। साल 2024 लोकसभा चुनाव में पंजाब के अमृतसर की सीट पर बीजेपी ने तरणजीत सिंह संधू के नाम का ऐलान किया।
नया चेहरा फ्रेश चेहरा। चुनाव प्रचार में उन्होंने एक मन से कहा था कि पीएम नरेंद्र मोदी ने उन्हें पॉलिटिक्स में आने के लिए प्रेरित किया है। संधू के मुताबिक उन्हें सुझाव दिया गया था कि अब पॉलिटिक्स में उतरना चाहिए और वह तैयार भी हो गए। संधू ने कहा कि वह अभी तय नहीं कर पाए हैं कि उनका यह फैसला सही है या नहीं। फिर आ गया चुनाव का रिजल्ट और संधू चुनाव हार गए। कांग्रेस के गुरजीत सिंह औजला ने उन्हें हरा दिया। वैसे यह पहली बार नहीं है कि औजला ने किसी डिप्लोमेट को हराया।
इससे पहले हरदीप सिंह पुरी भी यहां से लड़े थे चुनाव और उन्हें भी औजला ने हरा दिया था इस सीट पर से। अब इस हार के 2 साल बाद संधू को बहुत बड़ी जिम्मेदारी मिली है। उन्हें राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने दिल्ली का उपराज्यपाल नियुक्त किया है। संधू भारतीय विदेश सेवा आईएफएस के 1988 बैच के रिटायर्ड अफसर हैं और अब दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर विनय कुमार सक्सेना की जगह लेंगे। इंडियन एक्सप्रेस ने एक सोर्स के हवाले से बताया कि इस पद के लिए संधू को काफी सोच समझकर चुना गया है। वह बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी काफी करीबी हैं। दिल्ली के उपराज्यपाल का जो पद होता है, वह दूसरे प्रदेशों के राज्यपालों से थोड़ा अलग है।
यहां के उपराज्यपाल को बाकी राज्यपालों से ज्यादा एक्टिव रोल में होना होता है। इस पद पर बैठे शख्स को सिर्फ मौजूद ही नहीं रहना है बल्कि कई तरह के इंपॉर्टेंट लोगों से सीधे तौर पर कांटेक्ट करना पड़ता है। जैसे इसमें अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टीज के वीआईपी नेता, विदेश से आने वाले हाई प्रोफाइल मेहमान, डिप्लोमेट्स और भारत में इन्वेस्टमेंट तलाशने वाले इंटरनेशनल इन्वेस्टर्स शामिल हैं। ऐसे में दिल्ली के उपराज्यपाल के लिए व्यवहारिक अनुभव, कूटनीति की समझ और बड़े पद पर लोगों के साथ काम करने का एक्सपीरियंस होना बहुत जरूरी माना जाता है। बताया गया कि पीएम मोदी राजधानी दिल्ली को वैश्विक राजधानी के तौर पर डेवलप करना चाहते हैं। मोदी सरकार के इस खास मिशन में संधू की कूटनीतिक भाषा पर गहरी पकड़ और उनका जो ग्लोबल नेटवर्क है वो काफी काम आ सकता है।
ऐसा एक्सपर्ट्स का मानना है। तरजीत सिंह संधू रमेश भंडारी के बाद दिल्ली के दूसरे ऐसे राज्यपाल होंगे जो पहले कई देशों में भारत के राजदूत रह चुके हैं। यह तो हो गई डिप्लोमेटिक करियर की बात। अब पारिवारिक बैकग्राउंड पर आते हैं। तरजीत एक प्रतिष्ठित पढ़े लिखे और स्वतंत्रता सेनानी के परिवार से आते हैं। 23 जनवरी 1963 को जन्मे संधू की शुरुआती पढ़ाई लिखाई पंजाब के सनावर के लॉरेंस स्कूल में हुई। इसके बाद वह दिल्ली के स्टीफेंस कॉलेज में हिस्ट्री पढ़ने आ गए। जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी जेएनयू से उन्होंने इंटरनेशनल रिलेशंस में मास्टर्स की डिग्री हासिल की। संधू जानेमाने एकेडमिशियंस के घराने से आते हैं। उन्हें उनके जो पिता हैं बिशन सिंह समुद्री गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति थे और उनकी मां जगजीत कौर संधू अमृतसर में गवर्नमेंट कॉलेज फॉर वुमेन की प्रिंसिपल थी।
वह सिख धर्म सुधारक तेजा सिंह समुद्री के पोते भी हैं जो शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के संस्थापकों में से एक हैं। आज भी एसजीपीसी की मीटिंग जिस बिल्डिंग में होती है उसका नाम समुद्री के नाम पर है। तेजा सिंह समुद्री आजादी की लड़ाई में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बड़े नेताओं में से एक थे। राजद्रोह के आरोप में अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया था। बाद में जेल में ही 1926 में उनका निधन हो गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेता रहे तेजा सिंह समुद्री की शहादत के 100वें साल पर उनके पोते तरणजीत सिंह को दिल्ली का उपराज्यपाल बनाया गया है।
1988 बैच के आईएफएस अधिकारी तरणजीत सिंह का करियर सोवियत संघ यानी कि 1990 में पोस्टिंग के साथ शुरू हुआ। वो मॉस्को में भारतीय दूतावास में भी सेवाएं दे चुके हैं। बाद में सोवियत संघ के विघटन के बाद संधू को यूक्रेन में भारतीय दूतावास खोलने के लिए भेजा गया था। जब सोवियत संघ का विघटन हुआ तो यूक्रेन बना था। वहां पर फिर भारतीय दूतावास खुला और वहां पर संधू को भेजा गया। कीव में उन्होंने 1991 से लेकर 1994 तक भारतीय दूतावास में राजनीतिक और प्रशासनिक विभागों के प्रमुख के रूप में काम किया। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक दिसंबर 1995 से मार्च 1997 तक संधू भारतीय विदेश मंत्रालय में प्रेस रिलेशन के विशेष अधिकारी बनाए गए। इसके तहत उन्हें भारत में विदेशी मीडिया के रिपोर्टर्स को मैनेज करने की जिम्मेदारी दी गई थी।
बताया जा रहा है कि एलजी बनने के बाद उनका यही एक्सपीरियंस दिल्ली के उपराज्यपाल के तौर पर ग्लोबल डिप्लोमेटिक स्पोक पर्सन यानी इंटरलॉकेटर्स और ग्लोबल इन्वेस्टर्स से कांटेक्ट करने में काम आएगा। उन्होंने भारत में विदेश मंत्रालय के मानव संसाधन विभाग के प्रमुख संयुक्त सचिव के तौर पर भी काम किया है। वाशिंगटन डीसी में भारतीय राजदूत के रूप में कार्यभार संभालने से पहले संधू जनवरी 2017 से जनवरी 2020 तक श्रीलंका में भारत के हाई कमिश्नर थे। इससे पहले भी वह कोलंबो में भारतीय हाई कमीशन में पॉलिटिकल विंग के प्रमुख बने थे। कोरोना काल में संधू ने 2020 से 2024 तक अमेरिका में भारतीय राजदूत के तौर पर काम किया। साल 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब अमेरिका गए थे तब संधू की वहां भारत के राजदूत थे और 2024 में रिटायर होने तक वो इस पद पर बने रहे। वाशिंगटन डीसी में लंबे समय तक काम करने वाले संधू को अमेरिकी मामलों में गहरा जानकार माना जाता है। इतना कि खुद प्रेसिडेंट ट्रंप ने उन्हें बधाई दी है।
साल 2013 से 2017 तक वो वाशिंगटन डीसी में भारतीय मिशन के उप प्रमुख भी रह चुके हैं। साल 1997 से 2000 तक वाशिंगटन में प्रथम सचिव बनकर भी वहां पर गए। साल 1998 में जब भारत ने न्यूक्लियर टेस्ट किया था। उसके बाद अमेरिका ने भारत पर कई तरह के सेंशंस लगाए थे। इस दौरान दोनों देशों के संबंधों को बहाल करने में संधू ने बड़ी भूमिका निभाई थी।
वो उस टीम का हिस्सा थे जिसने अमेरिका के गुस्से का सामना किया और खामोशी से भारत पर लगे सेंशंस को हटवाने में कामयाब रहे और तकरीबन 35 साल के प्रशासनिक करियर के बाद अब संधू दिल्ली की कमान संभालने के लिए तैयार हैं।
