ईरान के साथ लड़ते-लड़ते अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईसाइयों के सबसे बड़े मजहबी रहनुमा से उलझ गए हैं और ऐसा उलझे हैं कि अमेरिका में उनका समर्थक वर्ग भी परेशान है कि क्या करें? अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस में भी उनकी पार्टी के लिए यह घाटे का सौदा साबित होने जा रहा है।
दरअसल ट्रंप कैथोलिक ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मुगुरु पोप लियो 14वें से भिड़ गए हैं। जब से पोप ने युद्ध को लेकर बयान दिया है तभी से ट्रंप खुलेआम पोप की आलोचना कर रहे हैं तो कभी एआई फोटो डालकर खुद को ईसा मसीह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।
फिर बाद में फोटो हटाकर कहते हैं कि मैं तो खुद को एक डॉक्टर के रूप में देख रहा था। दुनिया के ताकतवर मुल्क के ताकतवर लीडर के इस बयान और ईसाइयों की सर्वोच्च धर्मसत्ता से उलझना ट्रंप के लिए बैकफायर कर सकता है। पोप लियो ने ट्रंप सरकार की कई नीतियों की आलोचना की है। शुरुआत में प्रवासियों पर सख्ती, वेनेजुएला में जबरदस्ती दखल और अब ईरान जंग के खिलाफ खुलकर उन्होंने आवाज उठाई। ऐसे में गुस्साए ट्रंप ने कहा कि पोप लियो को मई 2025 में मेरी वजह से ही पोप के पद पर चुना गया। दरअसल पोप ने ट्रंप की उस बात का विरोध किया था जिसमें उन्होंने ईरान को दी थी कि वह ईरान की सभ्यता को ही खत्म कर देंगे। इसके लिए उन्होंने डेडलाइन भी जारी कर दी थी। पोप ने कहा था कि किसी भी देश और जनता को खत्म करने की देना गलत है और ईश्वर के नाम पर जंग को सही ठहराना बिल्कुल गलत है। ट्रंप और पोप लियो के बीच बढ़ती इस तल्खी के बीच ईरान भी कूद गया। ईरान के प्रेसिडेंट मसूद पजेशियान ने कहा कि मैं ईरान की जनता की तरफ से महामहिम पोप के इस अपमान की निंदा करता हूं।
यीशु जो शांति और भाईचारे का संदेश देने वाले पैगंबर हैं। उनकी तौहीन किसी भी आजाद ख्याल इंसान को मंजूर नहीं। गौरतलब है कि ईरान में भी बड़े पैमाने पर ईसाई धर्म को मानने वाले रहते हैं और ईरान की राजधानी तेहरान में एक मेट्रो स्टेशन में तो मदर मैरी और जीसस की प्रतिमा भी लगी है। हालांकि ट्रंप के बयानों का पोप लियो ने बहुत शांत तरीके से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें ट्रंप का कोई डर नहीं है और वह शांति का संदेश देते रहेंगे। तो दुनिया की सबसे ताकतवर अमेरिकी सेना के नेता ट्रंप और 1.4 अरब कैथोलिक लोगों के प्रमुख पोप लियो के बीच यह बड़ा टकराव अभी रुकता हुआ नहीं दिख रहा है।
ट्रंप ने पोप से माफी मांगने से इंकार कर दिया है और कह दिया है कि पोप गलत है। अमेरिका की राजनीति पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस पूरे विवाद से ट्रंप अपने धार्मिक समर्थकों को नाराज कर सकते हैं। खासकर नवंबर के अहम मिड टर्म चुनाव में ट्रंप लंबे समय से चुनाव में अमेरिका के ईसाई लोगों का समर्थन लेते रहे हैं। उन्होंने अपने विचारों से उन्हें अपनी तरफ किया है। इन लोगों ने 2016 और 2024 के चुनाव में ट्रंप का समर्थन किया था। लेकिन अब इन्हीं लोगों के नाराज होने का डर है। अमेरिका के कैथोलिक बिशप्स के प्रमुख आर्चबिशप पॉल कोखले ने कहा, “मुझे दुख है कि राष्ट्रपति ने पोप के बारे में ऐसे बुरे शब्द लिखे। अगर ट्रंप का समर्थन कम हुआ तो रिपब्लिकन पार्टी को डर है कि वह नवंबर के चुनाव में कांग्रेस का नियंत्रण खो सकते हैं। मीडिया रिपोर्ट बताती है कि साल 2024 के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप को जीत दिलाने में एवेंजिकल ईसाइयों का बड़ा योगदान था।
ट्रंप के कुल वोटरों में से 34% ऐसे ईसाई थे। जबकि कमला हैरिस के वोटरों में सिर्फ 8% ही ऐसे ईसाई थे। ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष में पोप लियो ने एक ऐसा बयान दिया जिससे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खफा हो गए। डॉन्ड ट्रंप की ईरान युद्ध नीति को पोप लियो ने अमानवीय और अन्यायपूर्ण करार देते हुए सीधे तौर पर चुनौती दे दी।
इस तीखे हमले ने न केवल कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी बल्कि राष्ट्रपति ट्रंप को भी एक निजी और राजनीतिक जवाबी हमले के लिए मजबूर कर दिया। ट्रंप ने पलटवार करते हुए दो टोक शब्दों में कहा कि पोप को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप करने के बजाय अपनी आध्यात्मिक जिम्मेदारियों तक सीमित रहना चाहिए। दरअसल यह विवाद तब जब पोप लियो ने ईरान के साथ बढ़ते तनाव को लेकर अपना कड़ा विरोध दर्ज करवाया। पोप ने ट्रंप की नीतियों को अन्यायपूर्ण बताते हुए कहा कि निर्दोषों की जान जोखिम में डालना और कूटनीति के दरवाजे बंद करना किसी भी धर्म या नैतिकता के दायरे में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस से हस्तक्षेप करने की मांग की जिससे राष्ट्रपति ट्रंप खफा हो गए। ट्रंप ने इस आलोचना को अपमानजनक बताते हुए पोपलियो पर सीधा प्रहार किया। उन्होंने कहा पोप लियो अपराध के मामले में कमजोर हैं और विदेश नीति के लिए बहुत बुरे साबित हो रहे हैं। उन्हें एक राजनेता बनने की कोशिश करने के बजाय एक महान पोप बनने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ट्रंप ने आरोप लगाया कि पोप उन वैश्विक शक्तियों का पक्ष ले रहे हैं जो अमेरिका के हितों के खिलाफ है। अपने जवाब को और ज्यादा आक्रामक बनाते हुए ट्रंप ने चर्च की ऐतिहासिक भूमिका पर सवाल उठाए। उन्होंने उस डर का जिक्र किया जो कोविड-19 महामारी के दौरान ईसाई संगठनों और कैथोलिक चर्च में व्याप्त था। ट्रंप ने कहा पोप मेरे प्रशासन द्वारा पैदा किए गए जिस डर की बात करते हैं, वह उस डर के सामने कुछ भी नहीं है जो पादरियों और मंत्रियों ने कोविड के दौरान महसूस किया।
उस समय चर्च की प्रार्थनाएं करने के लिए पादरियों को गिरफ्तार किया जा रहा था। यहां तक कि जब वे बाहर खुले में थे और एक दूसरे से 10 20 फुट की दूरी पर थे तभी उन्हें दंडित किया गया। पोप उस समय कहां थे? यह विवाद केवल शब्दों का युद्ध नहीं है बल्कि यह दुनिया के सबसे बड़े ईसाई संप्रदाय के प्रमुख और दुनिया के सबसे शक्तिशाली लोकतांत्रिक नेता के बीच एक गहरा वैचारिक मतभेद है। जहां पोपियों ने इसे नैतिक धर्म की तरह देखा है तो वहीं ट्रंप इसे चर्च द्वारा उनकी सत्ता को चुनौती देने की कोशिश मान रहे हैं। जानकार मानते हैं कि ट्रंप का यह बयान उनके आधारभूत मतदाताओं यानी कोर वोटर्स को यह याद दिलाने के लिए है कि वे ही धार्मिक स्वतंत्रता के असली रक्षक हैं ना कि वेटिकन। फिलहाल एक ओर जहां पोपलियो ने ट्रंप पर निशाना साधा है तो दूसरी ओर ईरान और अमेरिका का लगातार तेज होने की संभावना जताई जा रही है क्योंकि इस्लामाबाद वार्ता फेल होने के बाद कब दूसरी वार्ता होगी या दूसरी बैठक कब होगी इसके कोई भी संकेत नहीं है। दुनिया की निगाहें फिलहाल रूस यूक्रेन जंग पर टिकी है। लेकिन इस बीच राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन ने एक ऐसा दांव चला है जिसने वाशिंगटन से लेकर तेहरान तक तहलका मचा दिया है। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत नाकाम होने के ठीक बाद पुतिन ने शांति की कमान संभालने की पेशकश की है।
रविवार को रूसी राष्ट्रपति ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पिजिशियान से फोन पर बात की। क्रमियन के मुताबिक पुतिन ने इस बात पर जोर दिया है कि रूस मिडिल ईस्ट में एक पक्की और सही शांति लाने के लिए हर संभव कूटनीतिक मदद देने को तैयार है। पुतिन चाहते हैं कि जंग के बजाय इस विवाद का हल राजनीतिक मेज पर निकले। पुतिन का यह ऑफर बेहद अहम वक्त पर आया है। पिछले कुछ घंटे पहले ही इस्लामाबाद में 1989 के बाद पहली बार अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधि आमने-सामने बैठे थे। लेकिन 21 घंटे की माथापच्ची के बाद भी नतीजा शून्य रहा। अमेरिका का कहना है कि ईरान ने परमाणु हथियार का रास्ता छोड़ने से मना कर दिया।
वहीं ईरान के स्पीकर ने आरोप लगाया कि अमेरिका भरोसा जीतने में नाकाम रहा। इस कड़वाहट के पीछे तीन बड़ी दीवारें हैं। ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम, हॉर्मोन स्टेट पर कंट्रोल और तेहरान की बैलेस्टिक मिसाइल क्षमता। इन मुद्दों पर सहमति ना बनने से दो हफ्तों के नाजुक सीज फायर के टूटने का खतरा अब और बढ़ गया है। दिलचस्प बात यह है कि रूस खुद यूक्रेन के साथ युद्ध में उलझा है। लेकिन पुतिन कूटनीति का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं। इससे पहले जून 2025 में भी उन्होंने इजराइल और ईरान के बीच मध्यस्था की पेशकश की थी।
