मुकेश खन्ना ने दिया समय रैना को करारा जवाब।

अरे, हु द हेल आर यू टू टेल मी दिस? अरे आप अलाइव नहीं है। आप अभी भी कुत्ते हैं सब। अरे समय ना तेरा समय खराब चालू हो गया बेटा आज से। मेरे को तो किधर दिखना भी मत तू। 90 के दशक का वो दौर जब रविवार की सुबह भारत की सड़कें सुनी हो जाती थी।

मोहल्लों में सन्नाटा होता था। घरों में टीवी की आवाज गूंजती थी। और बच्चे नाश्ता छोड़कर स्क्रीन के सामने बैठ जाते थे। क्योंकि आने वाला था एक ऐसा नाम जिसे उस दौर के बच्चे भगवान की तरह मानते थे। एक ऐसा चेहरा जिसे देखकर बच्चे बुरी आदतें छोड़ देते थे। एक ऐसी आवाज जिसे सुनकर पेरेंट्स भी खुश होते थे। एक ऐसी पर्सनालिटी जो सिर्फ एक एक्टर नहीं बल्कि देश का पहला सुपर हीरो, पहला रोल मॉडल, पहला टीवी आइकॉन था।

नाम था मुकेश खन्ना और पहचान थी शक्तिमान। लेकिन आज आज वही नाम सुनते ही लोगों को सम्मान से पहले विवाद याद आते हैं। जहां कभी संस्कारों की बातें होती थी, आज वहां कड़वे बयान सुनाई देते हैं। जहां कभी लोग प्रेरणा लेते थे, आज मीम्स बनते हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ? कैसे एक सुपर हीरो धीरे-धीरे खुद अपनी इमेज का विलेन बन गया? क्या यह फेम का घमंड था? क्या यह बदलते समय को ना समझ पाने की जिद थी? या फिर यह उस इंसान की कहानी है जो अपने ही बनाए किरदार से बाहर निकल ही नहीं पाया। आज की कहानी सिर्फ एक एक्टर की नहीं है। यह कहानी है एक आइकॉन के टूटने की, एक विरासत के बिखरने की। तो चलिए जानते हैं पर्दे के पीछे का वो सच जो बहुत कम लोग समझ पाए। साल था 1997।

ना स्मार्टफोन था, ना Netflix, ना YouTube, ना Instagram। एंटरटेनमेंट का मतलब था टीवी ऑन करो और डीडी नेशनल देखो और तभी एंट्री हुई एक ऐसे शो की जिसने भारतीय टेलीविजन की दिशा बदल दी। शक्तिमान लाल सूट, सीने पर सूरज जैसा चिन्ह, हवा में घूम कर उड़ना और बुराई का अंत। आज के बच्चों को शायद यह समझना मुश्किल हो, लेकिन उस समय शक्तिमान सिर्फ एक शो नहीं था, बल्कि एक क्रांति था। उस दौर में भारत के पास अपना कोई सुपर हीरो नहीं था। ना मार्वेल था ना डीसी का असर इतना बड़ा था। ना आयरन मैन था ना बैटमैन। भारत के बच्चों के पास सिर्फ एक हीरो था शक्तिमान। और जब यह किरदार स्क्रीन पर आता था तो बच्चों की आंखों में चमक आ जाती थी। रामायण महाभारत के बाद पहली बार कोई ऐसा शो आया जो बच्चों को सुपर हीरो दे रहा था।

मुकेश खन्ना ने इससे पहले महाभारत में भीष्म पितामह का किरदार निभाया था। लोग पहले से उन्हें सम्मान देते थे। लेकिन शक्तिमान ने उन्हें अमर बना दिया। वहीं आपको बता दें कि इस शो का नाम पहले आकाश रखा गया था। लेकिन बाद में इसे बदलकर शक्तिमान कर दिया गया। शो 13 सितंबर 1997 को शुरू हुआ और 27 मार्च 2005 तक चला। पूरे 450 एपिसोड। और इसकी लोकप्रियता इतनी थी कि बच्चों ने शक्तिमान की ड्रेस पहनकर छतों से कूदना शुरू कर दिया था। इस उम्मीद में कि उनका हीरो उन्हें बचा लेगा। यह वह पावर थी जो मुकेश खन्ना के पास थी। लोग उन्हें एक्टर नहीं अपना रक्षक मानते थे। मुकेश खन्ना ने सिर्फ एक्टिंग नहीं की। उन्होंने एक मेंटोर की छवि बनाई। शो के अंत में वह ज्ञान देते थे जिसे पेरेंट्स भी पसंद करते थे। लेकिन यहीं से एक साइकोलॉजिकल खेल शुरू हुआ। मुकेश खन्ना को लगने लगा कि वह सिर्फ एक एक्टर नहीं हैं बल्कि वह वाकई में समाज के रक्षक हैं और यही मसीहा कॉम्प्लेक्स उनके भविष्य के पतन की पहली ईंट थी। लेकिन दोस्तों असली खेल तो अब शुरू होने वाला था क्योंकि शो खत्म होते ही हकीकत का सामना हुआ। साल 2005 के आसपास शक्तिमान का जादू फीका पड़ने लगा। टाइम बदला तकनीक बदली। मार्वल और डीसी के हाई ग्राफिक्स सुपर हीरो भारत आ गए। अब दर्शकों को सिर्फ गोल-गोल घूमने वाला हीरो नहीं बल्कि आयरन मैन जैसा मॉडर्न हीरो चाहिए था। यहीं पर मुकेश खन्ना ने वो गलती की जो बड़े-बड़े लेजेंड्स कर बैठते हैं। उन्होंने अपनी लेगसी को अपग्रेड करने के बजाय उसे लॉक कर दिया।

अमिताभ बच्चन चाहते तो हमेशा एंग्री यंग मैन बनकर रह सकते थे। लेकिन उन्होंने खुद को बदला। उन्होंने ब्लैक, पिकू, पा, क्विज शो और वॉइस ओवर किए। हर दौर में खुद को नया बनाया। शाहरुख ने राज से लेकर पठान तक खुद को बदला। वहीं मुकेश खन्ना के पास भी मौका था। वो मेंटोर रोल कर सकते थे। वेब सीरीज कर सकते थे। नई फिल्मों में दमदार किरदार निभा सकते थे। लेकिन उन्होंने अपनी सबसे बड़ी पहचान को पकड़ कर रखा। मैं ही शक्तिमान हूं। यही सोच उनकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। आपने वो डायलॉग सुना होगा। या तो आप हीरो की तरह मर जाओ या इतना लंबा जियो कि खुद विलेन बन जाओ। मुकेश खन्ना के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। जब उन्होंने देखा कि नई पीढ़ी उन्हें भूल रही है तो उन्होंने क्रिटिसिज्म का रास्ता चुना।

उन्होंने यशराज फिल्म्स जैसे बड़े बैनर से शक्तिमान के राइट्स खरीदने का हाई वैल्यू ऑफर ठुकरा दिया। जब यशराज फिल्म्स ने शक्तिमान के राइट्स के लिए उन्हें कांटेक्ट किया तो उन्होंने इंकार कर दिया। वहीं जब शक्तिमान मूवी की बात आई तो उन्होंने रणवीर सिंह को साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा रणवीर सिर्फ कपड़े उतार कर नाच सकता है। शक्तिमान नहीं बन सकता। रणवीर सिंह ने उनसे 3 घंटे बात की लेकिन मुकेश खन्ना नहीं माने। उनका मानना था कि शक्तिमान की इमेज मैच्योरिटी मांगती है ना कि हद से ज्यादा चंचल स्वभाव। बाद में उन्होंने कहा कि रणवीर अच्छे एक्टर हैं, लेकिन शक्तिमान के लिए नहीं। यह बयान वायरल हो गया। रणवीर जो पूरे देश का दिल जीत चुका था उसे एक झटके में नकार दिया गया। क्यों? क्योंकि मुकेश खन्ना को लगता था कि शक्तिमान सिर्फ उनका है। बाद में खुद उन्होंने शक्तिमान की वापसी की अनाउंसमेंट की। खुद ही सूट पहनकर YouTube पर वीडियो डाला। लेकिन ट्रोलिंग का तूफान आ गया। सोचिए जब आप कुछ नया नहीं बनाते। सिर्फ दूसरों की सफलता में खामी निकालते हैं तो दुनिया आपको गुरु नहीं बल्कि चिड़चिड़ा बुजुर्ग कहने लगती है। यही हुआ मुकेश खन्ना के साथ। जब काम कम होने लगा तो मुकेश खन्ना ने YouTube का रुख किया। शुरुआत में लोगों ने उन्हें बहुत प्यार दिया क्योंकि वह उनकी बचपन की यादों से जुड़े थे। लेकिन धीरे-धीरे उनका टोन बदलने लगा।

वह हर नई चीज को क्रिटिसाइज करने लगे। महिलाओं पर दिए गए उनके बयानों ने उन्हें आउटडेटेड और महिला विरोधी की इमेज में धकेल दिया। उन्होंने कपिल शर्मा शो से लेकर बड़े-बड़े फिल्म मेकर्स तक सबको निशाने पर लिया। वो यह भूल गए कि इंटरनेट पर लोग आपको सुनने के लिए नहीं बल्कि आपकी एक छोटी सी क्लिप काटकर मीम बनाने के लिए बैठे हैं और यही उनके साथ हुआ। आज मुकेश खन्ना का नाम किसी फिल्म या प्रोजेक्ट के लिए नहीं बल्कि उनके विवादित बयानों के लिए ट्रेंड होता है। एक लीजेंड एक मीम बनकर रह गया।

अब बात करते हैं उस सबसे बड़े सबक की जो हमें इस पूरी कहानी और अभिषेक बच्चन के करियर से सीखने को मिलती है। अभिषेक बच्चन पर भी बहुत प्रेशर था। अमिताभ बच्चन का बेटा होना दुनिया का सबसे कठिन काम है। लोगों ने उन्हें ट्रोल किया, उनका मजाक उड़ाया, उनके करियर को खत्म बताया। लेकिन अभिषेक ने क्या किया? उन्होंने कभी मीडिया में आकर किसी को भला बुरा नहीं कहा बल्कि उन्होंने खुद को बदला। लूडो, दसवीं और ब्रीथ जैसी वेब सीरीज से उन्होंने साबित किया कि वह समय के साथ चल सकते हैं। उन्होंने ट्रोलर्स को भी सम्मान के साथ जवाब दिया। जहां मुकेश खन्ना अपने शक्तिमान वाले ईगो को नहीं छोड़ पाए, वहीं अभिषेक बच्चन ने अपने विरासत के बोझ को उतार कर खुद को एक नया रूप दिया।

शक्तिमान की सबसे बड़ी हार यही थी कि वह गंगाधर की सादगी भूल कर सिर्फ शक्तिमान के अहंकार में रह गए। हम आज भी उस शक्तिमान से प्यार करते हैं जिसने हमारा बचपन सवारा। लेकिन उस इंसान को देख दुख होता है जिसने अपनी ही मेहनत से बनाई गई इमेज को खुद ही धुंधला कर दिया। क्या आपको लगता है कि मुकेश खन्ना को एक मौका और मिलना चाहिए या फिर शक्तिमान का दौर अब हमेशा के लिए खत्म हो चुका है? अपनी राय नीचे कमेंट्स में जरूर लिखें।

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