जमीन से 30,000 फीट की ऊंचाई, चारों तरफ बादलों का काला घेरा, और अचानक प्लेन के अंदर मचने लगे चीखपुकार। पायलट की आवाज आती है। कंट्रोल सिस्टम में खराबी। यह किसी फिल्म का सीन नहीं बल्कि कल 19 अप्रैल को हैदराबाद से उड़ी फ्लाई 91 की फ्लाइट IC3401 के अंदर का वो खौफनाक मंजर है जहां 70 जिंदगियां पूरे 4 घंटे तक मौत के साथ लुका छिपी खेल रही थी।
हाथ जोड़कर रोती महिलाएं। ओह माय गॉड चिल्लाते लोग और हर बीतते सेकंड के साथ खत्म होता विमान का फ्यूल। आज हम आपको दिखाएंगे उस हॉरर फ्लाइट की वो अनसुनी कहानी जिसे सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी। आखिर उन 240 मिनटों में आसमान में क्या हुआ था? कल फ्लाई 91 की फ्लाइट IC3401 में सवार यात्रियों ने ठीक इसी नरक का सामना किया।
4 घंटे तक वो विमान हवा में किसी पेंडुलम की तरह लटका रहा। क्या हुआ था उन बंद दरवाजों के पीछे और कैसे के मुंह से सुरक्षित बाहर निकले 70 से ज्यादा मुसाफिर। कहानी शुरू होती है 19 अप्रैल दोपहर 3:00 बजे। हैदराबाद का राजीव गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट। फ्लाई 91 का एटीआर टर्बो प्रोप विमान रनवे पर दौड़ता है और बाली के लिए उड़ान भरता है।
यात्रियों को लगा था कि ठीक डेढ़ घंटे बाद यानी शाम 4:30 बजे वह अपने परिवार के बीच होंगे। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जब विमान हुबली के करीब पहुंचा तो लैंडिंग के वक्त पायलट को महसूस हुआ कि कुछ ठीक नहीं है। हुबली में मौसम खराब था। लेकिन रिपोर्ट्स बताती है कि कंट्रोल फेलियर की वजह से विमान रनवे पर उतरने की स्थिति में नहीं था। यहीं से शुरू हुआ वो इंतजार जिसने लोगों की रूह कपा दी। सोशल मीडिया पर वायरल इन वीडियो को देखिए। यह कोई फिल्म का सीन नहीं है। यह असल जिंदगी का खौफ है। एक महिला जिसके हाथ जुड़े हुए हैं। आंखों से आंसू थम नहीं रहे और वो बस भगवान को याद कर रही है। चारों तरफ से आवाजें आ रही है। ओह माय गॉड बचा लो भगवान। विमान के अंदर का तापमान शायद सामान्य था।
लेकिन डर के मारे यात्रियों का खून जम रहा था। लोग एक दूसरे को ढाटस बंधा रहे थे कि रो मत कुछ नहीं होगा। लेकिन जब विमान मुंडगोड़ दावड़गेरे और शिवमगा के ऊपर बार-बार चक्कर काट रहा था तो उम्मीदें दम तोड़ने लगी थी। एक यात्री की आवाज सुनाई देती है कि पायलट ऐसा क्यों कर रहा है? हमें कहीं भी उतार दो बस जमीन पर उतार दो। 3:00 बजे हैदराबाद से टेक ऑफ 4:30 बजे हुबली में लैंडिंग होनी थी। लेकिन 4:30 बजे से लेकर रात 7:00 बजे तक विमान कर्नाटक के अलग-अलग शहरों के ऊपर मंडराता रहा। लेकिन जैसे तैसे 7:30 बजे प्लेन बेंगलुरु में सुरक्षित लैंड हुआ। एक-ए मिनट एक साल जैसा बीत रहा था।
यात्री चिल्ला रहे थे कि हमें बेलगाम ले चलो या बेंगलुरु ले जाओ। पायलट लगातार घोषणा कर रहे थे कि धैर्य रखें। हम स्थिति को संभाल रहे हैं। लेकिन जब आप हवा में 4 घंटे से अटके हो तो धैर्य शब्द अपना अर्थ खो देता है। जमीन पर बैठे परिजनों का बुरा हाल था। एयरलाइन [संगीत] से कोई सटीक जानकारी नहीं मिल रही थी जिससे गुस्सा और डर और बढ़ गया। इस पूरे मामले पर फ्लाई 91 का रुख चौंकाने वाला है। जहां यात्री तकनीकी खराबी और कंट्रोल फील होने की बात कर रहे हैं।
वहीं एयरलाइन ने अपने बयान में कहा कि विमान में कोई तकनीकी खराबी नहीं थी। उनके मुताबिक खराब मौसम की वजह से विमान को होल्ड पर रखा गया और सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए उसे बेंगलुरु डायवर्ट किया गया। अब सवाल यहां उठता है क्या खराब मौसम में किसी विमान को 4 घंटे तक हवा में रखना सुरक्षित है? क्या ईंधन की चिंता नहीं थी और अगर सब कुछ सामान्य था तो यात्रियों के बीच इतनी दहशत क्यों थी? क्या पायलट और एयर ट्रैफिक कंट्रोल के बीच तालमेल में कोई कमी थी?
रात के करीब 7:30 बज रहे थे। बेंगलुरु के कैंपगोडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर इमरजेंसी की तैयारी थी। जैसे ही पहियों ने बेंगलुरु की जमीन को छुआ विमान के अंदर तालियों की गड़गड़ाहट नहीं बल्कि राहत की सिसकियां गूंज थी। लोगों के लिए किसी दूसरे जन्म से कम नहीं था। यात्री सुरक्षित बाहर निकले लेकिन उनके चेहरे पर वह खौफ आज भी साफ देखा जा सकता है। डीजीसीए इस मामले की जांच जरूर करेगा।
लेकिन उन यात्रियों के का क्या? क्या सस्ती टिकटों और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी की होड़ में सुरक्षा के मानकों से समझौता किया जा रहा है या फिर यह सिर्फ कुदरत का कहर था जिसे पायलट की सूझबूझ ने टाल दिया।
इस घटना ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया है कि जब आप आसमान में होते हैं तो आपकी जिंदगी सिर्फ एक मशीन और एक पायलट के हाथों में होती है। अगली बार जब आप फ्लाइट में बैठे तो सेफ्टी इंस्ट्रक्शन को गौर से सुनिएगा क्योंकि खतरा कभी बताकर नहीं आता।
