ये कहानी है एक ऐसे शख्स की जिसने करीब 30 साल पहले एक 13 साल के बच्चे को अगवा किया और फिर उसका कत्ल। करीब तीन दशकों तक पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के बाद आखिरकार वो पकड़ा गया। लेकिन इन सालों में उसने कई काम किए।
कभी कपड़े बेचे तो कभी कुछ। हाल के दिनों में वह कैमरे के सामने आकर धर्म पर ज्ञान बांझने लगा था। लेकिन कानून से छुपा हुआ था। उस शख्स को यूबर सलीम वास्तविक के तौर पर लोग जानते हैं। कुछ महीने पहले गाजियाबाद में उस पर जानलेवा हमला हुआ था। गले पर तेज धार वाली से चोट किया गया था।
अब बताते हैं कि वो किस मामले में पकड़ा गया है। साल 1995 13 साल का संदीप बंसल स्कूल से जा रहा था। मतलब कि वो स्कूल जा रहा था। रास्ते से ही उसे उठा लिया गया। फिरौती मांगी गई ₹00 लेकिन पैसा मिलने से पहले ही बच्चे की हत्या कर दी गई। बाद में मुस्तफाबाद के नाले से बच्चे की लाश मिली। जांच आगे बढ़ी तो शक पहुंचा सलीम तक। उस वक्त वो स्कूल में मार्शल आर्ट ट्रेनर था। पूछताछ हुई और सलीम ने गुनाह कुबूल कर लिया।
उसने अपने साथी अनिल का भी नाम बताया। लालच में दोनों ने मिलकर यह वारदात की थी। साल 1997 में दोनों को उम्र कैद की सजा मिली। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। साल 2000 में सलीम को अंतरिम जमानत मिली और वो फरार हो गया। 2011 में हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी लेकिन तब तक सलीम गायब था।
पहचान बदली, ठिकाने बदले यहां तक कि खुद को मरा हुआ दिखा दिया और करीब तीन दशक तक पुलिस की आंखों में धूल झोंकता रहा। सलीम को 1997 में उम्र कैद की सजा सुनाई गई लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। साल 2000 में दिल्ली हाईकोर्ट ने अंतरिम जमानत मिलने के बाद सलीम फरार हो गया और फिर कभी वापस लौटा ही नहीं। पिछले कई सालों में वो हरियाणा और उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में छिपता रहा और आखिरकार गाजियाबाद के लोनी में जा बसा। लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर इतने साल तक यह खेल कैसे चलता रहा? कैसे वो इतने सालों तक बचता रहा?
और कैसे पुलिस ने उसे पकड़ा। इन सब को समझने के लिए हमने आज तक के सुनिए उन्होंने क्या बताया। जो भी प्रोक्लेन अपेंडर होते हैं, फरार कैदी होते हैं, उनके लिए दिल्ली पुलिस की में एक बकायदा अलग से सेल बनाया गया है। इतना ही नहीं अलग-अलग जो डिस्ट्रिक्ट की पुलिस होती है, उनके पास भी जो स्पेशल स्टाफ होता है, वो ऐसे फरार आरोपियों की तलाश के लिए उनके पास एक सेल होता है जो ऐसे आरोपियों की तलाश में जुटे रहते हैं।
अब जहां तक बात की है तो बकायदा जो उनकी एक टीम होती है, वह फरार मुजरिमों की लिस्ट बनाते हैं। जिन्हें जिनके ऊपर इनाम घोषित है। जिन्हें कोर्ट ने डिक्लेअ किया है और उनको तलाशा जाता है। अब इस पूरे मामले में अगर आप देखेंगे तो सलीम वास्तविक ने बड़े ही शातिराना तरीके से वो गायब हो जाता है। अपना नाम बदलता है। लेकिन उसके बाद फिर वो जब सोशल मीडिया पर उसकी पकड़ मजबूत होती है।
सोशल मीडिया पर धीरे-धीरे जब उसकी पहचान बनने लगती है तो उसके ऊपरकि वो एक्ट मुस्लिम खुद को कहता था और कुछ लोग उससे इसकी वजह से जो अलग-अलग वीडियोस बनाता था उससे बेहद नाराज भी रहते थे और दो लोगों ने उसके ऊपर हमला किया। अब उस हमलावरों को तो यूपी पुलिस ने मार गिराया।
लेकिन इस हमले के साथ जो सलीम वास्तिक का पूरा जो बैकग्राउंड है वो खंगाला जाना शुरू करने लगे। क्योंकि जब आप किसी केस में विक्टिम हो या एक्यूज़्ड हो, पुलिस आपका पूरा डिटेल बनाती है और कहीं ना कहीं जब यूपी पुलिस ने इस पूरे मामले में जब पूरा डिटेल बनाना शुरू किया तो इसके इंफॉर्मेशन को दिल्ली पुलिस से शेयर किया गया। क्योंकि जब बैकग्राउंड में पुलिस गई तो बैकग्राउंड में नाम में परिवर्तन दिखा। स्थान कई जगह ऐसे थे जो छिपाया गया क्योंकि पुलिस पुत्री आप कहां रहते थे? पहले क्या काम करते थे?
अब ये स्कूल में काम करता था जहां पर यह टीचर था। अब वहीं से इसने इस बच्चे को किडनैप किया था। कई मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि फरारी के दौरान सलीम वास्तिक ने अपने भाई के जरिए पूरे गांव में अफवाह फैला दी कि हार्ट अटैक की वजह से उसका इंतकाल हो गया है।
लेकिन दिल्ली पुलिस जब भी उसकी तलाश में पुश्तैनी गांव पहुंचती गांव वाले उनसे यही बताते कि सलीम तो मर चुका है। सलीम कभी अपने गांव नहीं जाता था। इसलिए किसी को कोई शक भी नहीं हुआ। इन दावों में कितनी सच्चाई है सुनिए।
पुलिस क्या करती है कि जो लोकल है वो जब इंफॉर्मेशन जुटाती है तो लोकल यह भी पता लगाने की कोशिश करती है कि भाई आपकी अगर किसी फला शहर में हुई तो आपका अंतिम संस्कार भी होगा। आपके अपने धर्म के रीति-रिवाज के हिसाब से होगा। तो वहां पर कहीं ना कहीं तो कोई ना कोई इंफॉर्मेशन होगी।
किसी रजिस्टर में कुछ तो दर्ज मिलेगा आपके खिलाफ। कुछ तो आपका मिलेगा कि भाई यहां पर आप दफनाए गए यहां यहां पर आपका अंतिम संस्कार हुआ। कुछ तो ऐसा जब कहीं कोई रिकॉर्ड नहीं मिलता है तो इसकी वजह से शक हुई गहराती है। पुलिस बिल्कुल कभी यकीन नहीं करती। जो व्यक्ति 20 साल 25 साल 30 साल से पुलिस की आंख में धूल झोंक रहा हो तो उनकी की अफवाह पर पुलिस कभी यकीन नहीं करती।
पुलिस लगातार इन्वेस्टिगेट करती है और ऐसे मामलों में फाइल तब तक बंद नहीं होती जब तक कि पुलिस को इस बात का प्रमाण ना मिल जाए कि हां सच में इस व्यक्ति की हो गई है। इस जगह पर हुई है। इस वजह से मौत हुई है और यह रहा उसके अंतिम संस्कार का सर्टिफिकेट। यह तो बात हुई सलीम के पकड़े जाने की। अब उस पर भी बात कर लेते हैं जब उस पर हमला हुआ था। 27 फरवरी सलीम अपने ऑफिस में था। तभी बिना नंबर प्लेट की बाइक पर नकाबपश हमलावर पहुंचे। सीधे अंदर घुसे और चाकू से हमला कर दिया।
गला रेतने की कोशिश हुई। सलीम की चीख सुनकर लोग दौड़े। हमलावर उसे अधमरा छोड़कर फरार हो गए। अस्पताल पहुंचाया गया। डॉक्टरों ने बताया कि शरीर पर 14 चाकू के वार थे। करीब एक महीने तक इलाज चला। जांच में सामने आया कि हमलावर दो सगे भाई थे। गुलफाम और जीशान। पुलिस ने बाद में दोनों को एनकाउंटर में मार गिराया। सलीम खुद को नास्तिक बताता है।
सलीम खान ने नाम बदलकर सलीम वास्तविक कर लिया और खुद को एक्स मुस्लिम के तौर पर टीवी डिबेट्स और YouTube पर एक्टिव हो गया। अब उसी सलीम को 31 साल पुराने और केस में दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और तिहाड़ जेल भेज दिया है।
