अब नहीं आऊंगा दोस्त अब नहीं आऊंगा बता देना पेट की आग बुझाने निकले मजदूरों की पीठ पर आज सिस्टम की लाठियां बरस रही है। सूरत के उधना स्टेशन पर मची भगदड़ केवल एक भीड़ का हिस्सा नहीं बल्कि उन टूटते सपनों की वो गूंज है जिन्हें गैस संकट और युद्ध की मार ने सड़क पर ला दिया। जो मजदूर दिनरा मशीनें चलाकर देश की अर्थव्यवस्था को गति दिया करते थे।
आज वही मजदूर अपने घर लौटने के लिए बेबस हैं। लाठियां खा रहे हैं। सरकार के बड़े-बड़े दावों के बीच कड़कड़ाती धूप में जान बचाने के लिए भागते इन मजदूरों की तस्वीरें शर्मनाक है। एलपीजी की कमी से बंद होती फैक्ट्रियां और रेलवे स्टेशन पर बरसते डंडे साफ बताते हैं कि आम आदमी की सुरक्षा और सम्मान सरकारी फाइलों में कहीं खो चुका है। मिडिल ईस्ट में चल रही की तपेश अब सात समंदर पार भारत के औद्योगिक शहरों तक पहुंच गई। सूरत जिसे कि देश की टेक्सटाइल राजधानी कहा जाता है। आज गैस की किल्लत की वजह से कराह रहा है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चल रही तनाव ने एलपीजी की सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित कर दी। अब इसका सीधा असर सूरत की वीविंग इंडस्ट्री पर पड़ा। पिछले एकद महीने से उद्योगों को जरूरत के मुताबिक गैस नहीं मिल पा रही। आंकड़ों की मानें तो करीब 30% मजदूर यानी कि लगभग 3 लाख लोग अब तक शहर छोड़ चुके हैं। सूरत की इंडस्ट्री को रोजाना 15,000 गैस सिलेंडरों की जरूरत होती है।
लेकिन सप्लाई की धीमी रफ्तार ने पहियों को जाम कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि रोजाना का कपड़ा उत्पादन 6.5 करोड़ मीटर से घटकर 4.5 करोड़ मीटर पर पहुंच गया। काम बंद होने और फैक्ट्रियों पर ताले लटकने की वजह से मजदूरों के पास पलायन के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है। रविवार को सूरत के उतना रेलवे स्टेशन पर जो मंजर दिखा उसने हर संवेदनशील इंसान को झकझोर दिया। यूपी और बिहार जाने वाली ट्रेनों में एक आदत सीट पाने के लिए हजारों मजदूर अपनी जान की बाजी लगाते दिखे।
जब उतना हसनपुर ट्रेन के लिए कतारें लगवाई जा रही थी तब भारी भीड़ के कारण अफरातफरी मच गई। पुलिस और आरपीएफ ने स्थिति को संभालने के नाम पर लाठी चार्ज कर दिया। सोशल मीडिया पर कई वीडियोस ऐसे वायरल है जिसमें बेबस यात्री पुलिस की मार से बचने के लिए ऊंची ऊंची लोहे की जालियों को पार कर रही हैं। कूद रही हैं बिना यह सोचे समझे कि यह जालियां यह लोहे की सलाखें आपका जीवन खत्म कर सकती हैं। रेलवे प्रशासन ने हालांकि अपनी ओर से सफाई भी पेश की।
अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने गर्मी की छुट्टियां देखते हुए स्पेशल ट्रेंस चलाई है और रविवार दोपहर तक छह ट्रेनों के जरिए 21,000 से ज्यादा यात्रियों को रवाना किया गया। रेलवे का तर्क यह कि जब यात्रियों ने कतारें तोड़ी तब मजबूरी में बल प्रयोग करना पड़ा। लेकिन बड़ा सवाल यह कि क्या प्रशासन को इस संकट का अंदाजा नहीं था? समर सीजन की भीड़ और ऊपर से गैस संकट के कारण हो रहा पलायन। इन दोनों वजहों ने कुल मिलाकर स्टेशन पर यात्रियों की संख्या को दोगुना तिगुना कर दिया। ऐसे में रेलवे स्टेशन की तमाम व्यवस्थाएं बोनी और नाकाफ़ हो गई।
इसके बाद इस तरह के शर्मनाक वीडियोस चौतरफा फैले। मजदूरों का पलायन केवल एक शहर की समस्या नहीं बल्कि उस गहरे आर्थिक संकट का संकेत है जो कि युद्ध सप्लाई चेन की विफलता से पैदा हो चुका है। आप हम और पूरा देश इसमें आज जूझ रहा है। एक तरफ फैक्ट्रियां बंद हो रही है तो दूसरी तरफ स्टेशनों पर अपने ही देश के नागरिकों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया गया। अगर जल्द ही एलपीजी सप्लाई की स्थिति नहीं सुधरती तो आने वाले दिनों में यह संकट और गहराएगा।
आज सूरत की टेक्सटाइल इंडस्ट्री को ऑक्सीजन की जरूरत है और लाखों मजदूरों को सुरक्षा और सम्मान की जो इस देश की प्रगति की असली बुनियाद है। बिना किसी ठोस योजना के सिर्फ लाठियों के दम पर व्यवस्था बनाए रखने की कोशिशें केवल जनता के घावों पर नमक छिड़कने की एक नाकाम आप कह सकते हैं प्रयत्न सा नजर आता है। उससे अतिरिक्त कुछ भी नहीं।
