Strait of Hormuz के पास यूएई और ओमान नया रास्ता बनाएंगे!

यह जो नक्शा आप देख रहे हैं, यही है स्टेट ऑफ हॉर्मोस। इसी संकरे रास्ते से होकर दुनिया का लगभग पांचवें हिस्सा का कच्चा तेल गुजरता है और अलग-अलग देशों तक पहुंचता है जिसमें भारत भी शामिल है। पिछले कुछ दिनों से मिडिल ईस्ट में जंग और ईरान द्वारा इस रास्ते को ब्लॉक किए जाने से तेल की सप्लाई पूरी तरह से रुक गई है।

दुनिया भर के देशों में तेल और गैस को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। हर कोई बस इसी प्रयास में लगा हुआ है कि ईरान का गुस्सा ठंडा हो जाए और वह यह पतला और संकरा सा रास्ता फिर से खोल दे ताकि तेल टैंकरों की आवाजाही फिर से शुरू हो जाए। लेकिन ईरान मानने को तैयार नहीं है जिसके चलते समस्या जस की तस बनी हुई है।

अब अगर इसी तरह ईरान भी नहीं झुका और अमेरिका भी वार करता रहा तो परेशानी का हल क्या है? आज इस वीडियो में एक ऐसी बात बताऊंगा जिसे सुन आप भी ताली बजाने लगेंगे। जी हां। और वो बात यूएई और ओमान से जुड़ी है। सोशल मीडिया पर कई जानकारों के बीच यह चर्चा चल रही है कि अगर यूएई और ओमान एक कुर्बानी दे दें तो हॉर्मोस की समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी। अब ये कुर्बानी क्या है? इसे समझने के लिए वीडियो में अंत तक बने रहिए। आप स्टेट ऑफ हॉर्मूस की तस्वीर देखिए।

इस तस्वीर को देखने से पता चलता है कि स्ट्रेट ऑफ हार्मूस फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ता है। स्टेट ऑफ हॉर्मूस की पश्चिम दिशा में यूएई है और पूर्वी ओर ओमान है। गौर करें तो स्टेट ऑफ हॉर्मूस का जो नुकीला हिस्सा है उस पर ओमान का मालिकाना हक है। अब अगर एक सामान्य व्यक्ति देखे तो उसे लग सकता है कि दोनों छोरों को काटकर बीच में एक नहर क्यों नहीं बनाई जा सकती है। यह नहर इतना चौड़ा हो कि इससे तेल के टैंकर आसानी से आवाजाही कर सकें जिससे हम नया हॉर्मोस्ट यानी तेल सप्लाई का नया रास्ता हमें मिल जाएगा।

लेकिन यह कहने में आसान है असल में नहीं। अब थोड़ी डिटेल में बात कर लेते हैं। देखिए स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूस जहां सबसे सकरा है वहां उसकी चौड़ाई लगभग 33 कि.मी. है। लेकिन जहाजों के लिए सुरक्षित शिपिंग चैनल दोनों दिशाओं में केवल 3 कि.मी. चौड़ी है क्योंकि पानी उथला है। सरल भाषा में बताऊं तो जहाजों के चलने वाले असली रास्ते के लिए यहां ट्रैफिक सेपरेशन स्कीम लागू है। इसके तहत आने वाले जहाजों को 2 मील चौड़ा रास्ता चाहिए। जबकि जाने वाले जहाजों को भी 2 मील चौड़ा रास्ता चाहिए। और इन दोनों जहाजों के बीच 2 मील का गैप होता है। यानी कुल मिलाकर उपयोगी रास्ता सिर्फ 6 मील यानी 11 कि.मी. का है। बाकी चौड़ाई में बड़े टैंकर नहीं चलते क्योंकि यहां गहराई कम है। इसलिए बड़े जहाजों के भूतल से टकराने का खतरा ज्यादा है। अब भले ही यह ईरान और ओमान के क्षेत्रीय जल में आता है, लेकिन इसे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग माना जाता है। जहां से वैश्विक जहाज रानी को गुजरने की अनुमति है।

संयुक्त अरब अमीरात जहां दुबई स्थित है वो भी इसी मार्ग के पास पड़ता है। अब सवाल यह उठता है कि यूएई और ओमान इस नुकीली जमीन को काटकर नया नहर क्यों नहीं बना लेते? इससे बार-बार ईरान की धमकियों से भी डरने की जरूरत नहीं पड़ेगी। वजह है यहां का भूगोल। देखिए यूएई और ओमान के बीच जो जमीन है वहां ऊंची और कठोर चट्टानों वाली हजारों पर्वत श्रृंखला फैली हुई है। इस इलाके में समुद्र से समुद्र तक नहर बनाने का मतलब होगा सैकड़ों किलोमीटर लंबी खुदाई और पहाड़ों को काटना। विशेषज्ञों का मानना है कि यह इंजीनियरिंग की दृष्टि से बेहद कठिन और खर्चीला प्रोजेक्ट होगा। स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस का जो सबसे नुकीला हिस्सा है उसे मुनसदम पेनिनसुला कहा जाता है। अगर इसे काटकर एक नहर बनाया जाए तो जहाज स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोस को बाईपास कर इधर से गुजर सकते हैं। लेकिन यह इतना आसान नहीं है। मुंसदम पेनसुला की जमीन सामान्य रेतीली जमीन नहीं है। यह हजारों माउंटेन रेंज का हिस्सा है जो टेक्टॉनिक प्लेटों की टक्कर से बनी है। अगर यहां नहर बनानी हो तो सिर्फ जमीन काटना ही नहीं पड़ेगा बल्कि कई जगह ऊंचे पहाड़ों को भी काटना होगा जिसकी ऊंचाई कई 100 मीटर तक है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसमें नहर बनाने के लिए 60 मील तक चट्टानों वाले पर्वतों को काटना पड़ेगा। इंजीनियरों ने इस संभावना पर विचार भी किया। इसकी 200 अरब डॉलर तक खर्चा आई। पैसों के अलावा राजनीति भी है।

ऐसे किसी भी प्रोजेक्ट के सफल होने के लिए ओमान और यूएई को राजनीतिक रूप से भी सहमत होना पड़ेगा। हालांकि यहां एक और विकल्प है। क्यों ना यूएई की ओर से अबू धाबी और ओमान की ओर से सोहार तक नहर बनाया जाए और दो सागरों को जोड़ दिया जाए। इससे जहाज सीधे फारस की खाड़ी से निकलकर अरब सागर में पहुंच सकते हैं और स्ट्रेट ऑफ हार्मूस को बाईपास किया जा सकता है। जानकारी के मुताबिक अबू धाबी और सोहार के बीच सीधी दूरी लगभग 300 से 350 कि.मी. के आसपास पड़ती है। अब अगर जहाजों के लिए नहर बनानी हो तो उसे चौड़ा, गहरा और सुरक्षित बनाना पड़ेगा। मगर इतनी लंबी समुद्री नहर बनाना दुनिया की किसी भी मौजूदा नहर से बहुत बड़ा प्रोजेक्ट होगा। लेकिन यहां भी बाधा हजारों पर्वत श्रृंखला है। इन दोनों शहरों के बीच हजारों पर्वत श्रृंखला खड़ी हैं जो अरब प्रायद्वीप की सबसे कठोर और ऊंची चट्टानी संरचनाओं में से एक है।

कई जगह पहाड़ 1000 से 2000 मीटर तक ऊंचे हैं। इन्हें काटना असंभव तो नहीं है लेकिन इंजीनियरिंग की दृष्टि से बेहद कठिन और महंगा काम है। इसकी लागत असाधारण होगी। इतनी लंबी नहर और पहाड़ी भूभाग को देखते हुए इसकी लागत सैकड़ों अरब डॉलर तक जा सकती है। साथ ही लगातार ब्रेजिंग और रखरखाव भी महंगा होगा। फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच समुद्री धाराएं, ज्वार और जलस्तर अलग हैं। इतने बड़े जलमार्ग को संतुलित रखने के लिए ही कई लॉक सिस्टम या विशाल जल प्रबंधन संरचनाएं बनानी पड़ सकती हैं।

जिससे प्रोजेक्ट और जटिल हो जाएगा। अगर सब कुछ सही ढंग से हो भी गया तो इस प्रोसेस में 10 साल कम से कम लग ही जाएंगे। हालांकि हॉर्मोस ट्रेड का सबसे बड़ा वैकल्पिक इंतजाम सऊदी पूर्व पश्चिम पाइप लाइन है। इसे पेट्रो लाइन भी कहा जाता है। यह पाइप लाइन सऊदी अरब के पूर्वी तेल क्षेत्रों से तेल को सीधे लाल सागर के यनबू बंदरगाह तक पहुंचाती है। इससे तेल को हॉर्मोन स्ट्रेट से गुजरे बिना जहाजों में लोड किया जा सकता है।

लेकिन इस पाइपलाइन की क्षमता इतनी नहीं है कि पूरी खाड़ी क्षेत्र की तेल सप्लाई को संभाला जा सके। संयुक्त अरब अमीरात ने भी हॉर्मोस पर निर्भरता कम करने के लिए अबू धाबी क्रूड ऑयल पाइपलाइन बनाई है। यह पाइपलाइन तेल को सीधे फज़रा बंदरगाह तक पहुंचाती है। फज़रा ओमान की खाड़ी में स्थित है। इसलिए यहां से तेल भेजने के लिए जहाजों को हॉर्मू से गुजरने की जरूरत नहीं पड़ती।

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