होर्मुज खुला, US-Iran डील होते ही ट्रंप जाएंगे पाकिस्तान?

शुक्राना अदा किया जा रहा है। वादे निभाए जा रहे हैं। पीसमेकर का कहना है कि मैंने अपनी 10वीं रुकवा दी। इजराइल लेबनन में सीज फायर करवा दिया। बदले में ईरान ने स्टेट ऑफ फोरमूस खोल दिया है। पीसमेकर ने कहा थैंक यू। बड़ी-बड़ी शर्तों पर तो बात बन गई है इसका मतलब। लेकिन क्या आगे आने वाला रास्ता भी ऐसा ही फूलों भरा है? क्या इतनी आसान है एक पीस डील? का क्या होगा? क्या होगा? शुक्राना तो ठीक है लेकिन हरजाने का क्या होगा? ईरान जिस हरर्जाने की मांग कर रहा है

17 अप्रैल को ईरान के विदेश मंत्री अब्बास राक्षशी ने एक्स पर लिखा लेबनन में सीज फायर के ऐलान के बाद हम स्टेट ऑफ होमूस खोल रहे हैं। जब तक यह लागू रहेगा तब तक होरमूस भी सभी कमर्शियल जहाजों के लिए खुला रहेगा। ईरान की इस अनाउंसमेंट के बाद ट्रंप ने भी ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट किया और लिखा ईरान ने स्टेट ऑफ होरमूस को खोलने का ऐलान कर दिया है। थैंक यू। यानी होरमूस तब तक खुला है जब तक इजराइल और लेबनान के बीच लागू है। यह कब तक चलेगा? ट्रंप का कहना है 10 दिन तक। 16 अप्रैल को डोनल्ड ट्रंप ने इजराइल और लेबनान के बीच 10 दिन के का ऐलान किया। उन्होंने इजराइल लेबनन के बीच बातचीत शुरू करवाने के लिए अपनी पीठ थपथपाई और लिखा मेरे लिए सम्मान की बात है कि मैंने दुनिया में नौ जंगे रुकवाई हैं और यह मेरे लिए दसवीं होगी। ट्रंप ने लेबन के राष्ट्रपति जोसेफ आउन और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्या को वाइट हाउस का न्योता भी दिया। कहा कि 21 अप्रैल को दोनों लीडर्स नेगोशिएट करेंगे। 1983 के बाद दोनों देशों के बीच यह पहली सार्थक वार्ता होगी। फर्स्ट मीनिंगफुल टॉक्स। लेकिन ट्रंप ने l से जुड़े शुरुआती पोस्ट में हिजबुल्ला का नाम नहीं लिया।

करीब 7 आठ घंटे बाद उन्होंने एक और पोस्ट किया और लिखा कि आई होप हिजबुल्ला एक्ट्स नाइसली। यानी मुझे उम्मीद है कि हिजबुल्लाह सही बर्ताव जारी रखेगा। तो क्या हिजबुल्ला ट्रंप की उम्मीदों पर खरा उतरेगा? क्या 10 दिन तक भी यह टिक पाएगा? फिलहाल हिजबुल्लाह के लिए तैयार है। लेकिन उसकी मांग है कि लेबनन की पूरी जमीन पर हमले रोके जाएं और इजराइल की सेना को आवाजाही की छूट ना मिले। एक बयान में उसने कहा है कि हमारी उंगलियां ट्रिगर पर है ताकि इजराइल अगर धोखेबाजी करे तो हम तैयार हो। की शर्तों के मुताबिक हिजबुल्ला को रोकने का जिम्मा लेबनन की सेना को दिया गया है।

शर्त रखी गई है कि अगर इजराइल पर कोई हमला हो या हमले का खतरा हो तो उसके पास सेल्फ डिफेंस में फैसले लेने का हक है। लेबनन की सेना यह सुनिश्चित करेगी कि हिजबुल्ला या कोई और नॉन स्टेट ग्रुप इजराइली टारगेट्स पर हमला नहीं करेगा। लेकिन इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतिन याहू का बयान सुने तो को लेकर कई सवाल उठते हैं। उन्होंने कहा है कि हमारे पास एक ऐतिहासिक पीस डील एक हिस्टोरिक पीस एग्रीमेंट के लिए शानदार मौका है क्योंकि हमने इस बिल्ला को गजा जंग में ही कमजोर कर दिया था।

पावर बैलेंस बदल दिया था। उपलब्धियों की लिस्ट गिनवाते हुए नितिन याहू ने यह भी जोड़ दिया कि हमारी सेना लेबनन में मौजूद रहेगी। करीब 10 किलोमीटर तक फैला हुआ एक सिक्योरिटी ज़ोन बना रहेगा। हम लेबना के सिक्योरिटी जोोन में बने रहेंगे। यह वो पांच पॉइंट्स नहीं है जहां इजराइल ईरान से पहले मौजूद थी। यह एक सिक्योरिटी ज़ोन है जो मेडिटेरियन सागर से माउंट डोव और सीरियाई सीमा तक है। यह 10 किलोमीटर चौड़ा है। हम यहां हैं और यहां से नहीं जाने वाले। यह हमें किसी भी संभावित हमले और कब्जे से सुरक्षा देता है। अगर इजराइल की सेना लेबन में मौजूद रहेगी तो बात कैसे बनेगी? हिजबुल्ला इस मौजूदगी के खिलाफ है। ईरान ने भी अपील की है कि इजराइल पूरी तरह पीछे हटेगा तभी बात बनेगी। फिलहाल यह समझिए कि 10 कि.मी. तक सिक्योरिटी ज़ोन का मतलब क्या होता है? नक्शा देखिए। इजराइल की उत्तरी सीमा लेबनन की दक्षिणी सीमा से लगती है।

दक्षिणी लेबनन लंबे समय से हिजबुल्ला का गढ़ माना जाता रहा है। 2024 के सीज फायर के मुताबिक इस इलाके में सिर्फ लेबनन की सेना होनी चाहिए थी। लेकिन यह समझौता जमीन पर कभी लागू नहीं हुआ। लेबनन की सरकार ने हिजबुल्ला को कंट्रोल करने की कोशिश तो की लेकिन नाकाम रही। लेबनन की सेना के पास इतनी ताकत कभी थी ही नहीं कि वो हिज़बुल्लाह से हथियार जबरदस्ती छीन ले। इजराइल का तर्क था कि हमें अपने देश के उत्तरी इलाके में बसी जो जनता है उसकी सुरक्षा के लिए यह जरूरी है कि हम हिसबुल्लाह का खात्मा करें।

उसके हथियार छीन लें और एक बफर ज़ोन बनाएं। इसी तर्क पर इजराइल ने लितानी नदी तक बफर ज़ोन बनाने का प्लान सामने रखा। ये नदी इजराइल लेबनन के आधिकारिक बॉर्डर ब्लू लाइन के समानांतर पैरेलल चलती है। प्लान था कि सीमा के अंदर 8 से 29 कि.मी. तक घुसकर कब्जा जमा लिया जाए। प्लान के तहत इजराइल ने क्राउंड ऑपरेशन शुरू कर दिया। अब उसका कहना है कि इजराइली सेना कब्जे किए गए जो इलाके हैं उनसे पीछे नहीं हटेगी।

वहां पर मौजूद रहेगी। इस कब्जे के बावजूद अगर सीज फायर बरकरार रहा तो भी एक पेंच है। इजराइली सेना ने अपने बयान में कहा है कि जिन इलाकों पर हमारा कब्जा है उसमें लेबनन के आम लोगों को नहीं लौटना चाहिए। लड़ाई शुरू होते ही हम अपने मकसद पूरा करेंगे। सीज फायर के दौरान भी हम हिस्सबुल्ला का इंफ्रास्ट्रक्चर क्लियर करते रहेंगे। उसके ठिकानों पर हमला करते रहेंगे। इसका मतलब यह हुआ कि जिस भी बिल्डिंग से इजराइल की सेना को खतरा महसूस होगा उस पर हमले जारी रहेंगे। ऐसे में सवाल है कि हिजबुल्ला इन हमलों के जवाब में क्या करेगा? अगर हिजबुल्ला ने जवाब दिया तो का क्या होगा? और अगर टूटा तो ईरान क्या करेगा? नेतों पर यह दबाव भी है कि वो सेना को लेबनन में बने रहने दें। इजराइली अखबारों के मुताबिक देश के उत्तर में बसे लोग से नाराज हैं। वो चाहते हैं कि लड़ाई जारी रहे। इसके अलावा 56% इजराइली चाहते हैं कि दक्षिणी लेबनन में सेना की मौजूदगी बनी रहे।

रिपोर्ट्स बता रही हैं कि सरकार का फैसला यानी इजराइली सरकार का फैसला सबके लिए चौंकाने वाला था। यहां तक कि नेतन्या की सिक्योरिटी कैबिनेट के लिए भी खबर है कि मंत्रियों को मीटिंग का मौका ही नहीं मिला। वोटिंग भी नहीं उनसे कराई गई और नेतयाू को ट्रंप की बात माननी पड़ी। का ऐलान हो गया। इजराइल की सेना को भी कुछ खबर नहीं थी। सिर्फ एक दिन पहले सैनिकों को बताया गया था कि हमें आगे बढ़ना है।

फिर अचानक हो गया। तो क्या नेतनियाू का फैसला ट्रंप के दबाव में लिया गया है? क्या यह लॉन्ग टर्म फैसला नहीं है? क्या ईरान से बातचीत का दरवाजा खोलने के लिए या फिर यह कहें कि होमूस खुलवाने के लिए ट्रंप ने इजराइल को सीज फायर पर मजबूर किया? क्या ईरान एक डील के बाद इजराइल फिर से अपने पुराने मकसदों की ओर लौट जाएगा? जैसे ही ईरान से डील होगी, क्या इजराइल अपने हमले फिर से शुरू करेगा? क्या लेबन से बातचीत सिर्फ एक दिखावा है जब तक ईरान से बातचीत चल रही है? हमने जानकारों से समझा। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार लेबनान के साथ कोई डील हुई थी। अगर इससे 35 साल पहले पीछे जाए तो भी एक डील हुई थी। लेकिन जो लेबनान के साथ डील है वो लेबनान इजराइल के साथ नहीं लड़ रहा है। बॉटम लाइन ये है वो हजबुला लड़ रहा है। हजबुला से कोई डील नहीं हुई है।

हजबुला ने इस इस स्टक्स का विरोध किया है। हजबुला इजराइल पे अटैक कर रहा है। हालांकि हजबुला पार्ट ऑफ गवर्नमेंट है। लेकिन अभी अभी जो डेवलपमेंट्स हुए हैं उनमें लेबनान चाह रहा है कि हजबुल्ला की जो आर्म विंग है या मिलिशिया है वो कमजोर हो जाए। वो वेपन सरेंडर कर दे और ऐसा एग्रीमेंट भी हुआ था और जो अब इसके पहले हुआ था हजबुल्ला के साथ इजराइल में उसमें बहुत सारे चीजें थे जैसे अभी लेबनान में ने ईरानियन एंबेसडर को वहां से एक्सपेल कर दिया है। अब वो एक्सपेल तो कर दिया है लेकिन हज़बोला कह रहा है कि आप एक्सपेल मत कीजिए। और हजबुला जो है वही इजराइल पर अटैक कर रहा है। तो जब तक हजबुला फैक्टर इन नहीं करेगा कोई भी नेगोशिएशंस में टॉक का कोई मतलब नहीं होता है। सीज फायर का मतलब कुछ नहीं होता है।

प्रेशर तो है अमेरिका पर ईरान के साथ सीजफायर या अंडरस्टैंडिंग करने की और जिस तरह अटैक्स हो रहे थे और जिस तरह नितिन याू कह रहे थे कि ईरान की वॉर के साथ लेबनान का मसला या हजबुल्ला का मसला नहीं है। वो इंडिपेंडेंटली है। वो हम उनसे पहले भी लड़ रहे थे और हम यहां रुकेंगे नहीं। तो वो वो शायद मोमेंटम देने के लिए है। ईरान के लिए भी एक एक कहा जाए कि कहीं ऐसा कोई एग्रीमेंट हो जिसमें ईरान हजबुल्ला के साथ ऑन बोर्ड हो जाए और लेबनान उस पे एग्री कर जाए तो शांति वार्ताएं आगे बढ़ती रहेंग। लेकिन अगर इसी तरह सिविलियंस पे अटैक करते रहे और बहुत भीषण बमबारी कर रहे हैं। कभी-कभी तो ये देख के लगता है कि इजराइली कहीं इसको भी गजा बनाने के चक्कर में तो नहीं है। तो उनको भी देख के लग रहा है कि इजराइल को इस समय रेस्ट्रेन करना जरूरी है। क्योंकि इंटरनेशनल कम्युनिटी जो या वेस्ट एशिया के जो और जीसीसी कंट्रीज है मुस्लिम स्टेट्स हैं वो देख रहे हैं कि ये रुक नहीं रहे हैं। जो इनका प्रोजेक्ट है ग्रेटर इजराइल का शायद वो वो स्पष्ट करते नहीं है। कहीं वह तो एक्टिवेट नहीं हो जाएगा।

इसी बहाने क्योंकि इस समय ईरान भी पड़ गया है। तो वह एक मैसेजिंग भी देना है कि आप इस समय शांत रहिए क्योंकि वाइडर वॉर है ये और उस वाइडर वॉर में एक अगर आप माइनर वॉर भी साथ-साथ चलाते रहे तो वार्ताओं में दिक्कत होगी और आपके हित में भी है लेबनान और इजराइल के भी हित में है कि शांति हो और एक तरह से कहें कॉम्प्रहेंसिव शांति हो कि जिसमें और रिलेटेड इश्यूज भी इनवॉल्वड हो। वो उनका बेसिक इंटेंशन है। वो अचीव होता दिख दिखेगा। अगर जैसा जैसे कयास लगाए जा रहे हैं कि जो इस्लामाबाद पीस प्रोसेस है वो आगे बढ़ेगा। शायद ट्रंप भी आएंगे तो कहीं कुछ एग्रीमेंट वैसा हो जाए। तो ये इंपॉर्टेंट है ये बात को समझना। अब तक जो चर्चा हमने की वो इजराइल, लेबनन और अमेरिका के सरकारी दफ्तरों से आए बयानों पर आधारित थी।

ऐसे बयान जो जंग से कोसों दूर कड़ी सुरक्षा में रह रहे हुक्मरानों ने दिए हैं। सवाल यह है कि उन लोगों का क्या होगा जिन्हें इजराइल के क्राउंड ऑपरेशन के बाद अपना घर बार छोड़ना पड़ा। जिनके अपने इस में मारे गए। छह हफ्तों तक चली लड़ाई में लेबनन के 2000 से ज्यादा लोग मारे गए हैं। हर पांच में से एक शख्स को विस्थापित होना पड़ा है। अपना घर छोड़ना पड़ा है। वहीं इजराइल के दो आम नागरिक और 13 सैनिक मारे गए हैं। न्यूज़ एजेंसी एएफपी से बातचीत में लेबनन के लोगों ने कहा है कि वे एक टेंपरेरी सीज फायर से संतुष्ट नहीं है। उन्हें ना तो ट्रंप के अमेरिका पर भरोसा है और ना ही नितनिन याहू के इजराइल पर। ट्रंप की कही बातों पर विश्वास नहीं कर सकते और ना ही नेतू पर हमें पता है कि ईरान के खिलाफ से प्रेशर बन रहा है। और उनकी आर्मी कंफ्यूज है। इसी वजह से उन्हें करना पड़ा। लेबन के विस्थापित लोगों का कुछ हिस्सा ही अपने घरों तक लौटने की हिम्मत जुटा पा रहा है। लौटने का मन बना भी ले तो यह डर है कि शायद अब घर बार बचा ही ना हो। शायद अब सब कुछ मलबे में तब्दील हो चुका हो। डर यह भी है कि लड़ाई शुरू हुई तो दोबारा घर छोड़ना होगा।

इन सारी आशंकाओं को किनारे रखकर अगर आगे बढ़ भी जाए तो घर जाने का रास्ता ही नहीं है। कई ऐसे पुल हैं जो इजराइल की बमबारी में तबाह हो चुके हैं। इजराइल का तर्क था कि हिजबुल्लाह इन पुलों का इस्तेमाल की सप्लाई के लिए करता है। ऐसे माहौल में भी कुछ लोग ऐसे हैं जिनका कहना है कि अब हम मरे या जिए इससे हमें फर्क नहीं पड़ता। हम अपने घरों तक जरूर वापस लौटेंगे। हम रह जाएंगे। मायने यह रखता है कि हम अपने गांव अपने घर लौट रहे हैं। चाहे कुछ भी हो जाए हम अपनी जमीन नहीं छोड़ेंगे। मुझे नहीं पता कि अब मेरा घर बचा भी है या नहीं। अगर वह तबाह भी हो गया है तब भी कुछ नहीं बदलने वाला। मैं वहीं पर टेंट लगाकर रहूंगी। मुमकिन है कि लेबन के इन लोगों का भविष्य उनसे 3500 कि.मी. दूर पाकिस्तान में लिखा जाए। जहां उनसे 10,000 कि.मी. दूर बसे एक देश, अमेरिका और 2000 कि.मी. दूर बसे एक देश ईरान के बीच बातचीत होगी, नेगोशिएशन होंगे। ट्रंप ने कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच जल्द ही डील पर बात बन सकती है। ईरान डील करना चाहता है।

अमेरिका और ईरान के बीच पहले राउंड की बैठक 11 अप्रैल को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई थी। 21 घंटे की मीटिंग के बाद भी दोनों विदेशों के बीच कोई बात नहीं बनी थी। लेकिन तमाम रिपोर्ट्स का दावा था कि 80% मुद्दों पर सहमति बन गई थी। बात अटकी थी सिर्फ दो मुद्दों पर। इनमें से भी सबसे बड़ा मुद्दा ईरान के पर जो है पेच फंसा था। अमेरिका ने शर्त रखी थी कि ईरान 20 साल तक अपनी गतिविधियां पूरी तरह बंद कर दे। ईरान ने कहा था कि वो अपना प्रोग्राम सिर्फ तीन से 5 साल तक रोकने के लिए तैयार है। अब ट्रंप ने कह दिया है कि 20 साल जैसा कुछ भी नहीं है। ईरान को हम कभी भी हासिल नहीं करने देंगे। यानी ट्रंप को ईरान से फॉरएवर का वादा चाहिए। ईरान दावा करता है कि ऐसे वादे उसने पहले भी कर दिए हैं। पहले ही उसने किए हुए हैं। उसका दावा है कि उसका न्यूक्लियर प्रोग्राम सिर्फ सिविलियन मकसदों के लिए है। हथियार बनाने का कोई प्लान ना तो कभी था और ना आगे होगा। 1968 में ही उसने l अप्रसार संधि एनपीटी पर दस्तखत किए थे। ईरान के पहले सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह रुल्लाह खुमैनी ने 1979 में ही न्यूक्लियर वेपंस पर फतवा लगा दिया था। उनका कहना था कि मानव जाति को ऐसा भयानक नुकसान पहुंचाने वाला हथियार बनाना हराम है। इसके बाद 2015 में ईरान ने अपना न्यूक्लियर प्रोग्राम लिमिट करने की कसम खाई थी।

ये सब कुछ अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में एक डील के तहत हुआ था। पेज सिर्फ इतना था कि ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर यह पाबंदी सिर्फ 10 से 15 साल के लिए लगाई गई थी। बस इसी बातचीत को इसी क्लॉज़ को कमजोर बताकर ट्रंप ने 2018 में ये डील तोड़ दी और अमेरिका को खुद खुद अमेरिका को इससे अलग कर लिया। दूसरा पेज है ईरान का एनरड्ड यूरेनियम। इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी आईएएईए के आंकड़ों के मुताबिक ईरान के पास करीब 440 किलो है जो करीब 60% तक एनरड्ड है। ये इसान और नतंश के ठिकानों में अंडरग्राउंड टनल्स में छिपा हुआ है। 90% एनरचमेंट के बाद इस से करीब 10 से 12 परमाणु बनाए जा सकते हैं। ध्यान दीजिए कि ये स्टॉक पाइल जो ये है ये 2018 में ट्रंप के डील तोड़ने के बाद तैयार किया गया था। 2018 के पहले यह स्टॉक ईरान के पास नहीं था। ट्रंप के दावों के मुताबिक इस स्टॉक पाइल पर ईरान के ठिकानों पर अमेरिका ने जून 2025 में ही हमला कर दिया था। तब ट्रंप ने दावे किए थे कि ईरान के यूरेनियम और प्रोग्राम को अमेरिका ने मिट्टी में मिला दिया है। उसके बी टू ने उन्हें नस्तनाबूत कर दिया है।

फिर अब इस यूरेनियम को बाहर भेजने की बात उठ रही है। ट्रंप चाहते हैं कि ईरान ये यूरेनियम देश से बाहर भेज दे। लेकिन ईरान का कहना है कि वो इसे डाइल्यूट करने को तैयार है। यानी वो इसे देश से बाहर नहीं भेजेगा। लेकिन इसमें मिलावट कर देगा। इसे कमजोर बना देगा जिससे यह हाईली एनरड्ड ना रहे। ऐसा करने के बाद ईरान को यूरेनियम वापस उसी स्तर पर लाने में कई साल लग सकते हैं। यानी परमाणु बम बनाने से काफी दूर चला जाएगा।

खैर बात जो भी हो लेकिन अब ऐसा लग रहा है कि दोनों ही पक्ष इन दो मुद्दों पर भी अमेरिका और ईरान बीच का बीच का रास्ता निकाल सकते हैं। पहले राउंड की मीटिंग फेल होने के बाद पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर 15 अप्रैल को ईरान गए। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास राक्षशी के साथ मीटिंग की। अब ब्रिटिश मीडिया रटर्स ने पाकिस्तानी सूत्र के हवाले से बताया है कि पर्दे के पीछे चल रही इस मीटिंग में कुछ प्रोग्रेस जरूर हुई है। अगली मीटिंग में दोनों देश एक एमओयू साइन कर सकते हैं मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग और उसके बाद 60 दिनों के अंदर एक बड़ा समझौता हो सकता है। एक पीस डील हो सकती है। इस दौरान इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी आईएईए के एक्सपर्ट्स भी बातचीत का हिस्सा हो सकते हैं। सूत्र ने नाम बता ना बताने की शर्त पर कहा कि दोनों देश बड़े मुद्दों पर लगभग मान गए हैं। बाकी छोटी-छोटी तकनीकी बातें बाद में तय होंगी। उधर ट्रंप ने भी दावा किया है कि ईरान अपना एनरस्ट अमेरिका को देने के लिए तैयार हो गया है।

सबसे जरूरी बात यह है कि ईरान के पास ना हो और वो इसके लिए मान गया है। वो हमें अपनी न्यूक्लियर डस्ट सौंपने को भी तैयार हो गया है। यह जमीन के बहुत नीचे रखी हुई है क्योंकि हमने वहां बी टू से हमला किया था। ईरान के साथ बहुत सी बातों पर सहमति बन गई है। अब कुछ पॉजिटिव हो सकता है। न्यूज़ एजेंसी रइर्स ने ईरान के सूत्रों के हवाले से बताया है कि तेहरान अपना पूरा हाई एंडरिस्ट यूरेनियम विदेश भेजने के लिए तैयार तो नहीं है। ईरान ने कहा है कि थोड़ा यूरेनियम वो अपने पास रखेगा क्योंकि इसका इस्तेमाल दवाइयों और टेस्ट के लिए रेडियो आइसोटोप बनाना और तेहरान के रिसर्च रिएक्टर्स में होता है।

लेकिन यूरेनियम का दूसरा हिस्सा वो किसी तीसरे देश में भेजने के लिए राजी हो सकता है। अगर अमेरिका ने भी ईरान की यह शर्त मान ली, तो दोनों देशों के बीच एक इनिशियल कॉम्प्रोमाइज बन सकता है। इसी पर डिटेल में बात करने के लिए दोनों देशों के बीच दूसरे राउंड की मीटिंग भी हो सकती है। इसकी चर्चा तेज है। पाकिस्तान में इसके लिए तैयारियां भी शुरू हो गई हैं। 17 अप्रैल को इस्लामाबाद की सड़कों पर सेना की टुकड़ियां गश्त करती दिखी। लेकिन पाकिस्तान की सड़कें और व्यापार अब भी खुले हुए हैं। पिछली बार ऐसा नहीं हुआ था। पिछली बातचीत से पहले इन सारी चीजों को बंद कर दिया गया था। फिलहाल किसी भी इन पर्सन मीटिंग का ऐलान नहीं हुआ है। लेकिन ट्रंप का प्लान इससे थोड़ा अलग है। वो अपना ट्रैवल सूटकेस तैयार कर चुके हैं। कह रहे हैं कि अगर डील पर बात बन गई तो वो भी इस्लामाबाद जा सकते हैं। मैं पाकिस्तान जा सकता हूं। पाकिस्तान ग्रेट है।

उन्होंने अच्छा काम किया है। अगर डील इस्लामाबाद में हुई तो मैं वहां भी जा सकता हूं। फील्ड मार्शल आसिम मुनीर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने भी बढ़िया काम किया है। इसलिए मैं वहां जा सकता हूं। ये सुनकर लग रहा है कि ट्रंप को पूरी उम्मीद है कि पाकिस्तान डील के लिए ईरान को मनाने में कामयाब हो जाएगा। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में स्ट्रेटेजिक स्टडीज के प्रोफेसर अमेरिटस ब्रह्मा चिलानी ने एक्स पर लिखा ट्रंप अपनी ही शुरू की गई ईरान से निकलने के लिए अब पाकिस्तान का सहारा ले रहे हैं। यानी वो एक ताकत वाले मुस्लिम देश से कह रहे हैं कि वो ताकत बनाने की कोशिश कर रहे दूसरे मुस्लिम देश को समझाए उसे रोके। पाकिस्तान यह सब करने के लिए तैयार भी है।

यह वही पाकिस्तान है जिसके पूर्व राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने 70 के दशक में एक फ्रेज इजाद किया था। इस्लामिक बम उनका तर्क था कि एक इस्लामी देश के पास भी परमाणु बम होना चाहिए और और पाकिस्तान एक पहला इस्लामी देश ऐसा बना जिसके पास एक इस्लामिक इस्लामिक बॉम्ब हो और आखिरी भी। खैर सवाल ये है कि पाकिस्तान अपनी कोशिशों में कितना कामयाब हो पाएगा? क्या अमेरिका और ईरान एक दूसरे की शर्तें मान लेंगे? बड़ी खबर यहीं तक अब सुर्खियों की बारी। अमेरिका में न्यूक्लियर और स्पेस रिसर्च से जुड़े करीब 10 वैज्ञानिक लापता हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक 2023 के बाद से कम से कम 10 वैज्ञानिक या सरकारी कर्मचारी जो एडवांस डिफेंस और एयररोस्पेस रिसर्च में काम कर रहे हैं, लापता हो गए हैं या उनकी मौत हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने 16 अप्रैल को इस मामले को गंभीर बताया और जांच के आदेश दिए। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे पर बैठक की गई है और जल्दी ही इसकी जांच की जाएगी।

वैज्ञानिकों की लापता या मौत के सभी मामले अमेरिका की हाई सिक्योरिटी रिसर्च संस्थाओं से जुड़े बताए जा रहे हैं। इनमें लॉस एलमोस नेशनल लैब, नासा का जेट प्रोपल्सन लैब और एमआईटी का प्लाज्मा साइंस इनफ्यूज़न सेंटर शामिल है। ये संस्थान न्यूक्लियर हथियार, एडवांस्ड प्रोपल्सन और नई ऊर्जा तकनीकों पर काम करते हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक कई लापता वैज्ञानिक अपने घरों से अचानक पैदल निकल गए। उन्होंने फोन, वॉलेट और चाबियां तक पीछे छोड़ दी। यह पैटर्न कई मामलों में देखा गया है जिससे शक और भी ज्यादा बढ़ रहा है। रिटायर्ड एयरफोर्स जनरल विलियम नील मैक कैसलैंड का मामला हाल में बहुत चर्चा में रहा है। वे 27 फरवरी को अपने न्यू मेक्सिको स्थित घर से गायब हो गए थे। बताया गया था कि वे अपने साथ सिर्फ पिस्तल लेकर निकले थे और उनकी पत्नी ने 911 पर कॉल किया और वे खुद को छिपाने की कोशिश कर रहे थे। उनके अलावा अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा के जेट प्रोपल्शन लैब से जुड़े एक प्रोजेक्ट में काम कर रही मोनिका रेजा भी पिछले 8 महीनों से लापता हैं।

अमेरिका के रिटायर्ड एयरफोर्स जनरल विलियम मैक कैसलैंड सरकारी ठेकेदार स्टीवन गार्जिया लॉस अलामोस नेशनल लैब से जुड़े एंथनी शावेज़ और मेलिसा कैसियास भी मिसिंग पर्संस की लिस्ट में शामिल है। दूसरी खबर ब्रिटेन में प्रधानमंत्री की स्टारमर पर इस्तीफा देने का दबाव बन रहा है। वजह है अमेरिका में ब्रिटेन के राजदूत रह चुके पीटर मैडलसन की पोस्टिंग। बीबीसी के मुताबिक पीटर मेंडलसन अमेरिकी राजदूत बनने के लिए हुई सिक्योरिटी वेटिंग यानी सुरक्षा जांच में फेल हो गए थे। इसके बावजूद उन्हें यह बड़ी जिम्मेदारी दे दी गई थी। इससे पहले मेंडलसन का नाम अमेरिकी सेक्स ऑफेंडर जेफरी एफसीन के साथ रिश्तों की वजह से चर्चा में रहा था। इसी वजह से उन्हें अपने पद से इस्तीफा भी देना पड़ा था। 16 अप्रैल को सिक्योरिटी चेक में फेल होने की बात सामने आने के बाद से विपक्ष स्टारमर पर भड़का हुआ है।

वो पीएम पर संसद को गुमराह करने का आरोप लगा रहे हैं। ब्रिटेन के सीनियर मंत्री डरन जों्स ने कहा कि स्टारमर इस बात से काफी नाराज हैं कि उन्हें यह जानकारी पहले क्यों नहीं दी गई। सरकार ने मामला शांत करने के लिए विदेश मंत्रालय के बड़े अधिकारी को पद से हटा दिया। लेकिन इससे मामला शांत नहीं हुआ। उल्टा सवाल उठने लगे कि अगर इतनी बड़ी जानकारी प्रधानमंत्री को नहीं पता थी तो उनकी टीम कैसे काम कर रही कैम मेंडलसन की सिक्योरिटी क्लीयरेंस की घोषणा करते वक्त स्टारमर ने जानबूझकर संसद को गलत जानकारी दी थी। पीटर मेंडलसन को दिसंबर 2024 में अमेरिका में ब्रिटेन का राजदूत बनाया गया था।

उन्होंने फरवरी 2025 में यह पद संभाला था। एप्सन से संबंध सामने आने के बाद सितंबर 2025 में उन्हें पद से हटा दिया गया था। मेंडलसन पर यह भी आरोप है कि उन्होंने एस्टीन को सरकारी दस्तावेज लीक किए थे। जिसके पुलिस जांच कर रही है।

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