ईरान अमेरिका जंग में ईरान की पूरी सभ्यता को खत्म करने की धमकी देने पर अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रंप को कैथोलिक ईसाइयों की सर्वोच्च सत्ता के जरिए आलोचना का सामना करना पड़ा था। जी हां, पोप लियो ने इस तरह की धमकी पर ट्रंप को आड़े हाथों लिया था और इसे मानवीयता के इंसानियत के खिलाफ बताया था।
हालांकि ट्रंप अभी भी माफी ना मांगने को लेकर बजिद हैं। लेकिन पोप लियो ने क्रिश्चियनिटी और इस्लाम को जोड़ने और शांतिपूर्ण सह अस्तित्व के लिए एक और नई कोशिश शुरू कर दी है। पोप लियो ने अपने अफ्रीका दौरे की शुरुआत अफ्रीकन देश अल्जीरिया की राजधानी अल्जीरिया से की। जहां पोपलियो 14वें ने अलजीरियस की ग्रैंड मस्जिद का दौरा किया और मस्जिद के पेश इमाम मोहम्मद मामून अल कासिम के साथ मिलकर इस विशाल मस्जिद के दीदार किए। इस दौरान पोपलियो थोड़ी देर के लिए मस्जिद में खामोश बैठे रहे और खुदा की याद में खो गए। फिर उन्होंने कहा कि यह एक ऐसी जगह है जो परमेश्वर यानी खुदा के घर की नुमाइंदगी करती है।
यहां आकर एक अलग तरह की रूहानियत और दिव्यता का अनुभव हुआ और हो भी क्यों ना जब यहां आकर हजारों लोग परमेश्वर से प्रार्थना करते हैं, इबादत करते हैं और उस खुदा की अपनी जिंदगी में मौजूदगी को महसूस कर पाते हैं। अल्जीरियस की ग्रैंड मस्जिद के दौरे के दौरान पोप लियो ने आपसी सम्मान और शांति की स्थापना का आह्वान किया। यहां पर उन्होंने गोल्डन बुक पर साइन किए और बड़ी मस्जिद में खुले तौर पर वेटिकन इस्लाम का महागठबंधन बनाया। यानी दोनों धर्मों इस्लाम और ईसाइयत के लोग आपस में मिलजुलकर रहें।
साथ ही शांति और सहयोग पर जोर दें। गौरतलब है कि इस्लाम और क्रिश्चियनिटी दोनों ही इब्राहिमिक रिलीजन हैं। और ईसाइयों के जीसस मुसलमानों के भी पैगंबर हैं। जिन्हें वो हजरत ईसा अलह सलाम के नाम से पुकारते हैं। इतना ही नहीं कुरान में ईसा मसीह की मां मदर मैरी को हजरत मरियम कहा गया है और खुदा का संदेश सूर्य मरियम के नाम से है। धरती पर मौजूदा दौर में ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप लियो ने मस्जिद में यह भी कहा कि ईश्वर की खोज का अर्थ यह भी है कि हम हर इंसान में चाहे वह मर्द हो या औरत उस खुदा के स्वरूप को पहचाने कि खुदा हर कहीं है। उन्होंने कहा कि ऐसी पहचान के लिए एक दूसरे का सम्मान और सह अस्तित्व की जरूरत होती है। अपने संबोधन में उन्होंने अल्जीरिया के लोगों और सभी राष्ट्रों के लिए प्रार्थना करने का आश्वासन भी दिया।
उन्होंने कहा कि शांति, न्याय, मेल मिलाप और एक दूसरे को माफ करने की भावना का विकास आने वाले वक्त में जरूर होगा। गौरतलब है कि प्रेसिडेंट ट्रंप ने पोपोलियो पर जिस तरह की टिप्पणी की थी, उससे अमेरिका में भी कैथोलिक ईसाई नाराज हैं। इतना ही नहीं ट्रंप ने खुद की जीसस क्राइस्ट जैसी एक तस्वीर भी सोशल मीडिया पर डाल दी थी। बाद में उसे हालांकि डिलीट कर दिया। इसको लेकर भी लोगों ने उन्हें काफी सुनाया था।
एक्सपर्ट कहते हैं कि इसराइल की दोस्ती में ईरान से भिड़े और भारी नुकसान उठा चुके प्रेसिडेंट ट्रंप के जरिए पोप लियो की आलोचना ने उनके समर्थकों को भी बड़ी ठेस पहुंचाई है। ट्रंप ने यहां तक कह दिया था कि पोप लियो मेरी वजह से पोप बने हैं और मैं उनसे माफी नहीं मांगूंगा। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच टकराव अब एक ऐसे बड़े भू राजनीतिक संकट में बदलता जा रहा है। इस खतरनाक हालात में पाकिस्तान खुद को एक मध्यस्थ के तौर पर पेश भी कर रहा है। लेकिन उसकी कूटनीतिक कोशिशों की सफलता पर अब सवाल भी उठने लगे हैं। दरअसल हाल ही में इस्लामाबाद में हुई शांति वार्ता बेनतीजा रही जिससे पाकिस्तान की साख को झटका लगा। बावजूद इसके इस्लामाबाद ने हार नहीं मानी और अब वह नए सिरे से दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाने में जुट गया।
इसी रणनीति के तहत पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर अचानक तेहरान पहुंचे। उनके साथ गृह मंत्री मोहसीन नगदवी भी मौजूद हैं। यह दौरा केवल औपचारिक नहीं बल्कि सीधे तौर पर अमेरिका ईरान तनाव को खत्म करने के लिए एक कोशिश मानी जा रही है। दूसरी तरफ प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी समांतर कूटनीतिक मोर्चा संभाल ही लिया। वह सऊदी अरब, कतर और तुर्की के दौरे पर हैं। यह सभी देश मिडिल ईस्ट की राजनीति में अहम भूमिका निभाते हैं और अमेरिका, ईरान के बीच किसी भी संभावित समझौते में मध्यस्थ या सहायक की भूमिका निभा सकते हैं।
शरीफ इन देशों के नेताओं से ना सिर्फ द्विपक्षीय संबंधों पर बल्कि क्षेत्रीय शांति और सुरक्षा पर भी चर्चा कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बनाता है डोनाल्ड ट्रंप का बयान। ट्रंप ने संकेत दिया है कि अमेरिका और ईरान के बीच [संगीत] दूसरे दौर की वार्ता इस्लामाबाद में हो सकती है। उन्होंने पाकिस्तानी सेना प्रमुख आसिम मुनीर की तारीफ करते हुए कहा कि उनकी कोशिशों की वजह से ही बातचीत की संभावना बनी हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक [संगीत] इस वार्ता में अमेरिकी प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व जे डी वेंस कर सकते हैं।
जबकि जेरेट कुश्शनर जैसे अहम चेहरे भी शामिल हो सकते हैं। हालांकि हालात इतने आसान नहीं है। मिडिल ईस्ट पहले से कई संकटों से जूझ रहा है। गाजा में संघर्ष ईरान और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव और खाली क्षेत्र में अस्थिर था। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच सीधा टकराव पूरे क्षेत्र को बड़े में धकेल सकता है। पाकिस्तान की चुनौती यही है कि वह ना सिर्फ दोनों देशों को बातचीत के लिए राजी करें बल्कि उनके बीच भरोसा भी कायम कर सके। पिछली वार्ता की विफलता को देखते हुए यह रास्ता और ज्यादा कठिन हो चला है।
अगर इस्लामाबाद में प्रस्तावित वार्ता सफल होती है तो यह पाकिस्तान के लिए बड़ी कूटनीतिक जीत होगी। लेकिन अगर यह प्रयास भी विफल रहा तो अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी साख को और ज्यादा नुकसान पहुंच सकता है। कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट के इस संवेदनशील दौर में पाकिस्तान की भूमिका बेहद अहम है लेकिन जोखिम भरी बनी हुई है। अब निगाहें इस बात पर टिकी है कि क्या इस्लामाबाद सच में शांति की राह खोल पाएगा या फिर यह कोशिश भी अधूरी रह जाएगी।
मिडिल ईस्ट में हालिया तनाव और सेनेट टकराव के बीच एक नया और अहम खुलासा सामने आया है। जिसने वैश्विक राजनीति में हलचल पैदा कर दी है। फाइनेंसियल टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक ईरान ने कथित तौर पर चीन के जासूसी सेटेलाइट्स का इस्तेमाल कर क्षेत्र में मौजूद अमेरिका के सैन्य ठिकानों की निगरानी की थी। इस जानकारी के आधार पर ईरान ने बाद में सटीक हमले किए थे।
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि ईरान ने कीई01 बी नाम की सेटेलाइट्स की सेवाएं नी थी जिन्हें चीन की कंपनी अर्थ आई ने विकसित किया है। बताया जा रहा है कि इन सेटेलाइट्स को लॉन्च किए जाने के कुछ ही दिनों बाद ईरान की एयररोस्प फोर्स ने इनकी सेवाएं खरीद ली थी। लीक हुए दस्तावेजों के हवाले से यह बात सामने आई है कि ईरानी सैन्य अधिकारियों ने इन सेटेलाइट्स को अमेरिकी ठिकानों की लगातार मॉनिटरिंग के निर्देश दिए थे। जिसके जरिए उन्हें तस्वीरें और रणनीतिक जानकारियां मिली थी।
