चार अंतरिक्ष यात्रियों को चांदकी 10 दिन लंबी यात्रा पर ले जाने वाला नासा का आर्टेमस टू 10 अप्रैल अप्रैल को अमेरिका के समुद्र में लैंडिंग कर सुरक्षित पृथ्वी पर वापसी कर चुका है। लेकिन इसी के विपरीत रूस के सोयूस और चीन के शजो अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष से वापसी के बाद जमीन पर सुरक्षित उतरते हैं। ऐसे ही 41 साल पहले जब रूस के सहयोग से भारत के अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा अंतरिक्ष में गए थे तब भी उनकी लैंडिंग जमीन पर हुई थी। तो चलिए आज इस वीडियो में हम जानते हैं कि अंतरिक्ष से पृथ्वी पर वापसी के वक्त अमेरिका के अंतरिक्ष यान समुद्र में जबकि चीन और रूस [संगीत] के अंतरिक्ष यान जमीन पर क्यों उतरते हैं? अंतरिक्ष यानों का समुद्री या जमीन पर उतरने के पीछे देश नहीं बल्कि भौगोलिक और तकनीकी कारण हैं। अमेरिका के चंद्र मिशन अपोलो 11 से लेकर आज स्पेस एक्स के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट तक सभी समुद्र में उतर रहे हैं। क्योंकि अमेरिका के लिए यह टेस्टेड और सुरक्षित तकनीक है।
समुद्र अंतरिक्ष यानों की लैंडिंग में नेचुरल कुशन का काम करता है। यानी अंतरिक्ष यान इतनी तेज गति से अंतरिक्ष से पृथ्वी पर वापसी कर रहा होता है। अगर उसे इस बीच जमीन पर उतारा जाता है तो अंतरिक्ष यात्रियों को अंदर बड़ा झटका महसूस होता है। जबकि समुद्र में उतरने पर कैप्सूल के अंदर बैठे हुए अंतरिक्ष यात्रियों को अधिक झटका महसूस नहीं होता है। समुद्र एक तकिए का काम करता है और अंतरिक्ष यात्री बिना किसी झटके के आसानी से समुद्र में उतर जाते हैं। इसी के साथ वापसी के वक्त जब अंतरिक्ष यान पृथ्वी पर उतरना शुरू करता है तो उससे एक हिस्सा अलग होता है। जैसे अभी ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट में ड्रैगन ट्रंक अलग हुआ था। अंतरिक्ष यान को जमीन पर उतारने का सबसे बड़ा खतरा यह है कि वो अलग हुआ हिस्सा यानी ड्रैगन ड्रंक किसी रिहाइशी इलाके, किसी गांव या फिर किसी शहर पर गिर सकता है। जबकि समुद्र में उतरने पर उसके टुकड़े समुद्र में आकर गिर जाते हैं।
जिससे किसी भी बड़े नुकसान से बचा जा सकता है। साथ ही समुद्र में उतरना इसलिए भी सुरक्षित माना जाता है क्योंकि समुद्र में उतरते वक्त अगर किसी कारणवश पैराशूट ना भी खुले तब भी अंतरिक्ष यान सुरक्षित समुद्र में उतर जाएगा क्योंकि वहां पर पहले से नासा की टीम नाव के साथ खड़ी होती है और कैप्सूल में भी पानी में तैरने की तकनीक होती है। जबकि जमीन की स्थिति में पैराशूट ना खुलने पर दुर्घटना की संभावना बेहद अधिक है। रूस और चीन के अंतरिक्ष यान जमीन पर उतरने के लिए भारी ब्रेकिंग तकनीक का उपयोग करते हैं।
यानी जब अंतरिक्ष यान अंतरिक्ष से वापसी कर रहा होता है और पृथ्वी के करीब होता है तब पैराशूट के साथ-साथ उसमें अंतरिक्ष यात्रियों के द्वारा मैनुअल ब्रेक्स भी लगाए जाते हैं। जिससे कि उसकी स्पीड को बिल्कुल कम किया जा सके। रूस के अंतरिक्ष यान कजाकिस्तान [संगीत] के रेगिस्तान में जबकि चीन के अंतरिक्ष यान शेनऊ श्रंखला के रेगिस्तान में उतरते हैं। यहां पर पहले से ही यान को जहां उतारना होता है, वहां पर जमीन को गीला कर दिया जाता है। जिससे कि अंतरिक्ष यात्रियों को अधिक झटका महसूस ना हो। फिर भी समुद्र में उतरने की तुलना में यह झटका बेहद अधिक होता है क्योंकि राकेश शर्मा जो कि भारत के अंतरिक्ष यात्री हैं।
41 साल पहले जब रूस के अंतरिक्ष यान सोयूस डी1 से कजाकिस्तान के मैदानों में लैंडिंग की थी। उसके बाद उन्होंने खुद बताया था कि अंतरिक्ष से वापसी का सफर बेहद ही खतरनाक था। हमें वापसी के वक्त तो ऐसा लग रहा था कि हम बस मरने ही वाले हैं। जब अंतरिक्ष यान के पैराशूट खुले तो इतनी तेज आवाज हुई जिसकी हमने कोई अपेक्षा तक भी नहीं की थी। यानी उनका साफ कहना था कि जमीन पर लैंडिंग बेहद खतरनाक थी। इसी के विपरीत रूस और चीन जमीनी लैंडिंग को ज्यादा सुरक्षित मानते हैं क्योंकि उनके अनुसार जमीन पर कैप्सूल तक पहुंचना बेहद आसान होता है जबकि समुद्र में बेहद कठिन।
वहीं इसके अलावा दूसरा कारण यह है कि अमेरिकी लॉन्च साइटें समुद्र के किनारे हैं जैसे कि फ्लोरिडा। इसलिए अमेरिकी यानों के लिए समुद्र में उतरना बेहद सुविधाजनक होता है। इसके विपरीत वगोनूर जो कि रूसी यानों के लिए लॉन्च साइट है वो जमीन के बीचोंबीच है और उसके पास कोई समुद्र नहीं है। तो रूस जमीनी लैंडिंग ही आसान विकल्प मानता है। लेकिन ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि अमेरिका के अंतरिक्ष यानों ने कभी जमीन पर उतरने का प्रयास ही ना किया हो। स्पेस एक्स के ड्रैगन स्पेसक्राफ्ट का भी पहले जमीन पर उतारने का प्लान था। जिसकी टेस्टिंग स्पेस एक्स ने की थी। लेकिन बाद में इसको बदल दिया गया। उसी के साथ अमेरिका का भावी अंतरिक्ष यान बोइंग स्टार लाइनर जमीन पर एयर बैग्स के साथ उतरता है। इसमें मार्शमेलो कुशन जैसी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है जिससे झटका कम लगता है। यानी जमीन पर उतरते वक्त इसके नीचे एक गुब्बारा सा खुल जाता है जिससे अंदर बैठे अंतरिक्ष यात्रियों को झटका महसूस नहीं होता। इसका इस्तेमाल 2026 तक होने की उम्मीद है।
वहीं आपको बता दें कि भारत के महत्वपूर्ण अंतरिक्ष मिशन गगनयान जो कि 2028 तक लॉन्च होना है उसकी लैंडिंग भी बंगाल की खाड़ी के समुद्र में ही होने वाली है। क्योंकि भारत का इसरो समुद्र में उतरने की तकनीक को ज्यादा सुरक्षित मानता है। इसका अभ्यास भी भारतीय नेवी और इसरो के वैज्ञानिकोंने कर लिया है।
