मिडिल ईस्ट में अब रूप ले चुकी है और इससे शुरू हुए एक महीना पूरा हो चुका है। इसी बीच हमलों और जवाबी कारवाइयों का सिलसिला लगातार तेज होता जा रहा है। जिससे पूरे क्षेत्र में तैनात चरम पर है। ताजा विवाद कुवैत के एक बिजली और पानी के डिसलिनेशन प्लांट पर हुए हमले को लेकर सामने आया जिसने हालातों को और ज्यादा संवेदनशील बना दिया है। इस हमले को लेकर ईरान और इजराइल के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं।
ईरान ने इस हमले में किसी भी तरह की भूमिका से साफ तौर पर इंकार कर दिया बल्कि उल्टा इजराइल पर साजिश रचने का आरोप लगाया। ईरान की सेना के ऑपरेशनल कमान खत्म अल अंबिया ने बयान जारी कर कहा कि कुवैत के डिसलिनेशन प्लांट पर हमला जनिस्ट ताकतों की सुनियोजित साजिश है जिसका मकसद सिर्फ दोष ईरान पर डालना है। ईरान ने पश्चिम एशिया के देशों को चेतावनी देते हुए कहा कि उन्हें ऐसे उकसावे से सतर्क रहना चाहिए।
साथ ही साथ उसने क्षेत्र में अमेरिकी और इजराइयली मौजूदगी को अस्थिरता की जड़ बताते हुए इसे खत्म करने की बात दोहराई। दूसरी तरफ कुवैत के बिजली और पानी मंत्रालय के मुताबिक इस हमले में प्लान की एक सर्विस बिल्डिंग को भारी नुकसान पहुंचा है। मंत्रालय की प्रवक्ता फातिमा अब्बास जौहर हयात ने बताया कि इमारत को गंभीर क्षति हुई है और इस हमले में एक भारतीय कर्मचारी की जान चली गई। यह घटना इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि ईरान इजराइल संघर्ष के बीच भारतीय नागरिकों की मौत का सिलसिला थम नहीं रहा। दिल्ली में हुए एक इंटरमिनिस्ट्री ब्रीफिंग में अतिरिक्त सचिव असीम महाजन ने बताया कि के दौरान अलग-अलग घटनाओं में अब तक सात भारतीयों की हो चुकी है और एक व्यक्ति लापता था। कुवैत के इस घटना को जोड़ने पर मृतकों की संख्या बढ़कर अब आठ हो गई है।
पिछले हफ्ते अबू धाबी में हुए एक हमले में एक भारतीय नागरिक की जान चली गई थी। जबकि एक अन्य घायल हुआ था। जिसे बाद में अस्पताल से छुट्टी दे दी। इसी बीच भारत सरकार अपने नागरिकों को सुरक्षित निकालने के लिए बड़े स्तर पर अभियान चला रही है। 28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक करीब 4,75,000 भारतीयों को सुरक्षित वापस लाया जा चुका है।
सऊदी अरब और ओमान के एयरपोर्ट से निकासी अभियान जारी है। जबकि क़तर का हवाई क्षेत्र आंशिक रूप से खुलने के बाद वहां से भी लोगों को निकालना शुरू कर दिया गया है। व यूएई और बहरीन का हवाई क्षेत्र बंद होने की वजह से भारतीयों को वैकल्पिक रास्तों का सहारा लेना पड़ रहा है। इनमें ईरान से अमेरनिया, इजराइल से जॉर्डन, इराक से जॉर्डन और सऊदी अरब तथा कुवैत और बहरीन से सऊदी अरब के रास्ते वापसी कराई जा रही है। गौरतलब है कि इससे पहले भी ईरान ने अज़रबजान और तुर्की में हुए ड्रोन हमलों के लिए इजराइल को जिम्मेदार ठहराया था।
ईरान का आरोप है कि इजराइल पड़ोसी देशों के साथ उनके रिश्तों को खराब करने की कोशिश कर रहा है। मौजूदा हालात यह संकेत दे रहे हैं कि मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष अब सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहा बल्कि पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में लेता जा रहा है। यूरोप का एक छोटा सा देश अब ईरान युद्ध के बीच अमेरिका के सामने डट कर खड़ा हो चुका है। यह देश है स्पेन जिसने सीधे-सीधे अमेरिका को बड़ा झटका दे दिया है।
स्पेन ने साफ कह दिया है कि ईरान पर हमलों में शामिल किसी भी अमेरिकी फाइटर जेट को उसके हवाई क्षेत्र से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाएगी। इतना ही नहीं स्पेन ने अमेरिका को अपने उन सैन्य ठिकानों के इस्तेमाल से भी साफ तौर पर रोक लगा दिया गया जिन्हें दोनों देश मिलकर ऑपरेट करते हैं।
स्पेन के रक्षा मंत्री मार्कटा रोब्स ने साफ शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा स्पेन ना तो अपने सैन्य बेस का इस्तेमाल करने देगा और ना ही अपने एयर स्पेस का। अगर उसका संबंध ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कारवाही से होगा। इस फैसले ने अमेरिका के लिए एक बड़ी रणनीतिक मुश्किल खड़ी कर दी है। क्योंकि अब तक अमेरिकी युद्धक विमान जैसे F15, F35, B52 और टैंकर एयरक्राफ्ट अमेरिका से उड़ान भरकर अटलांटिक महासागर पार करते हुए स्पेन के रास्ते मध्य पूर्व पहुंचते थे।
स्पेन के रोटा नेवल बेस और मोरान एयरबेस इन ऑपरेशनों के लिए बेहद अहम पड़ाव माने जाते हैं। यहां विमान रुकते थे, ईंधन भरा करते थे और फिर आगे ईरान के आसपास के इलाकों की ओर बढ़े चलते थे। लेकिन अब स्पेन के इंकार के बाद यह पूरा खेल बदल चुका है। अमेरिकी विमानों को अब स्पेन को बाईपास करके लंबा रास्ता अपनाना पड़ रहा है। उन्हें जर्मनी, इटली या पुर्तगाल के रास्ते घूमकर जाना पड़ रहा है। जिससे न सिर्फ दूरी बढ़ रही है बल्कि ऑपरेशन की लागत और समय भी बढ़ रहा है।
स्पेन का कहना है कि वह ऐसे किसी भी युद्ध का हिस्सा नहीं बनेगा जिसे एक तरफ़ा और अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ शुरू किया गया हो। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेस पहले ही अमेरिका और इसराइल की कार्यवाही की आलोचना कर चुके हैं और इसे गैर कानूनी और लापरवाह बता चुके हैं।
यानी साफ है कि यह सिर्फ एक सैन्य फैसला नहीं बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी है। स्पेन यह दिखाना चाहता है कि वह अंतरराष्ट्रीय नियमों और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के आधार पर फैसले ले रहा है। हालांकि इस फैसले से अमेरिका और स्पेन के रिश्तों में तनाव बढ़ सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह तो यहां तक कह दिया अगर स्पेन सहयोग नहीं करता तो उसके साथ व्यापारिक संबंधों पर भी असर पड़ेगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है क्या स्पेन का यह कदम सिर्फ शुरुआत है? क्या और यूरोपीय देश भी इसी तरह राह पर चलेंगे क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो ईरान युद्ध सिर्फ मध्यपूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की राजनीति और सैन्य समीकरणों पर पड़ सकता है। ईरान से जंग भड़काने की कोशिश में बैठे ट्रंप हर रोज नए-नए और एक से बढ़कर एक दावे कर रहे हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन दावों को अमेरिकी मीडिया ही कई बार गलत साबित कर रहा है। एक देसी कहावत है बिच्छू का मंत्र ना जाने और सांप के बेल में हाथ डाले। कुछ ऐसा ही हाल अमेरिका का दिख रहा है जिसने ईरान को कमजोर समझकर उस पर हमला तो कर दिया लेकिन अब उसके असर को लेकर खुद ही उलझन में है। जी हां, शुरुआत में ट्रंप की तरफ से लगातार यह दावा किया गया कि अमेरिका और इसराइल ने मिलकर ईरान की सैन्य क्षमता को पूरी तरीके से खत्म कर दिया है। कहा गया कि ईरान अब जवाब देने की स्थिति में नहीं है। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। ईरान आज भी उसी रफ्तार से जवाबी हमले कर रहा है जैसे पहले किया करता था। अब नई रिपोर्ट्स और विश्लेषण सामने आ चुकी हैं। जिनमें कहा जा रहा है कि अमेरिकी और इसराइली हमलों का ईरान की मिसाइल क्षमता पर उतना असर नहीं पड़ा जितना बताया जा रहा था। सवाल उठ रहे हैं क्या वाकई अमेरिका सिर्फ ऊपर दिखने वाले ठिकानों को ही निशाना बना पाया। दरअसल ईरान ने पिछले कई दशकों में अपनी सैन्य रणनीति को पूरी तरीके से बदल दिया है। उसने अपनी मिसाइल ताकत को जमीन के नीचे, पहाड़ों के अंदर और गहरी सुरंगों में छिपा कर रखा है। इन ठिकानों को इस तरह डिजाइन किया गया कि ऊपर से होने वाली हमलों का असर बहुत कम हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान के कई मिसाइल बेस ऐसे इलाकों में हैं जहां छोटी-मोटी चट्टानों और पहाड़ों की परतें उन्हें ढकती हैं। ऐसे में ऊपर से गिराए गए बंकर बस्टर जैसे बम सिर्फ सतह को नुकसान पहुंचाते हैं। जबकि असली सैन्य ढांचा नीचे सुरक्षित रह सकता है। कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि अमेरिका अब तक सिर्फ ईरान की कुल क्षमता का एक हिस्सा भी नुकसान नहीं करीब-करीब पहुंचा पाया। जबकि एक बड़ा हिस्सा अभी भी या तो सुरक्षित है या उसकी जानकारी पूरी तरीके से साफ नहीं। यही वजह है कि हमले के बावजूद ईरान की जवाबी ताकत कम होती नजर नहीं आ रही।
