ट्रंप के खिलाफ देश में भारी प्रदर्शन No King आंदोलन से हिला अमेरिका !

एक ओर मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा है तो दूसरी ओर अमेरिका में देशव्यापी प्रदर्शन हो रहे हैं। प्रदर्शन अमेरिकी राष्ट्रपति डोन्ड ट्रंप की नीतियों के खिलाफ।

जी हां, राष्ट्रपति ट्रंप की दूसरी प्रेसिडेंसी की नीतियों के खिलाफ नो किंग्स आंदोलन के तहत आयोजित देशव्यापी प्रदर्शनों में लगभग 90 लाख लोगों ने सड़क पर उतर कर अपनी आवाज बुलंद की।

वाशिंगटन डीसी से लेकर लॉस एंजेल्स और न्यूयॉर्क से लेकर शिकागो तक अमेरिका के लगभग सभी राज्यों में जनसैलाब उमड़ पड़ा जो मुख्य रूप से ईरान के साथ जारी युद्ध और प्रशासन के अधिनायकवादी रवय का विरोध कर रहा था। युद्ध और महंगाई के खिलाफ ।

इस आंदोलन का तीसरा और सबसे बड़ा चरण कल 28 मार्च को देखा गया। प्रदर्शनकारियों का सबसे मुख्य मुद्दा ईरान के जारी सैन्य संघर्ष हैं। फरवरी में शुरू हुए इस युद्ध ने ना केवल वैश्विक तनाव बढ़ाया बल्कि अमेरिका के भीतर आर्थिक संकट भी पैदा कर दिया है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि प्रशासन ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के नाम पर अरबों डॉलर युद्ध की आग में झोंक रहा है।

जबकि घरेलू मोर्चे पर अमेरिकी नागरिक रिकॉर्ड तोड़ महंगाई से जूझ रहे हैं। गैस, भोजन और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती कीमतों ने मध्यस्थ और निम्न आय वर्ग के बीच भारी असंतोष पैदा किया है। मिनसोटा में एक विशाल रैली को संबोधित करते हुए सेनेटर बर्नी सेंडर्स ने कहा कि हमें राजा नहीं चाहिए। राष्ट्रपति चाहिए। हमें नहीं दवाइयां चाहिए। आंदोलन का नाम नोकिन सीधे तौर पर राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा कार्यकारी आदेशों के अत्यधिक उपयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं को दरकिनार करने की कोशिशों पर गहरा प्रहार है।

प्रदर्शनकारियों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन संविधान के चेक एंड बैलेंस सिद्धांत को खत्म कर राजा की तरह शासन करने का प्रयास कर रहा है। प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में मध्य पूर्व से अमेरिकी सेना की वापसी और कूटनीतिक समाधान की मांग शामिल है। इसके अलावा युद्ध के फंड को शिक्षा और चिकित्सा अनुसंधान में ट्रांसफर करना, आईसीई द्वारा की जा रही कथित हिंसक कारवाइयों और निर्वासन पर रोक लगाना उनकी मांगों में शामिल है।

इसके अलावा जनवरी में आवरजन एजेंटों द्वारा रेनगुड और एलेक्स प्रिटी जैसे अमेरिकी नागरिकों की मौत के बाद यह गुस्सा और ज्यादा भड़क गया है। आयतित वस्तुओं पर लगाए गए भारी टेरिफ को हटाना भी उनकी मांग में शामिल है ताकि दैनिक उपभोग की वस्तुओं की कीमत कम हो सके।

यह आंदोलन केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा बल्कि लंदन, पेरिस, बर्लिन और रूम जैसे दुनिया के 16 बड़े शहरों में भी नो किंग्स के समर्थन में हजारों लोग सड़कों पर उतरे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे वियतनाम के बाद का सबसे बड़ा युद्ध विरोधी आंदोलन माना जा रहा है। दूसरी ओर वाइट हाउस ने इन प्रदर्शनों को खारिज करते हुए इन्हें राजनीतिक स्तंभ करार दिया है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह प्रदर्शनकारी कट्टरपंथी वामपंथी हैं जो अमेरिका की सुरक्षा और सीमाओं को कमजोर करना चाहते हैं। कई शहरों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच छिटपुट झड़पें भी हुई जिसके बाद कुछ राज्यों में नेशनल गार्ड्स को अलर्ट पर रखा गया है।

दो किंग्स आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ट्रंप प्रशासन के लिए आगे की राह आसान नहीं होगी। विरोधी भावना और आर्थिक तंगी ने अलग-अलग विचारधारा वाले लोगों को एक मंच पर ला खड़ा किया है। अगर प्रशासन इन मांगों पर ध्यान नहीं देता तो आने वाले महीनों में यह जो तनाव है वह और ज्यादा बढ़ सकता है।

ना सिर्फ मिडिल ईस्ट के मोर्चे को लेकर बल्कि अमेरिका में जो एक बड़ा तबका है वह ट्रंप की नीतियों से भारी परेशान है और आक्रोशित है जो कि सड़कों पर अब दिख रहा है। देखना यह होगा कि इस मामले में आगे क्या कुछ होता है। [संगीत] [संगीत]

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