Trans Amendment बिल के ख़िलाफ प्रदर्शन के बीच एक ट्रांस ने बताई अपनी आपबीती

वंचित होने की सच्चाई यह है कि हमारे पास लड़ने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं है। वापस लो वापस लो। इंकलाब जिंदाबाद। इंकलाब जिंदाबाद। एक मेडिकल टेस्ट से क्या बदल जाएगा? ट्रांसेंडर आइडेंटिटी कार्ड दिलाने जाऊं। मैं अपने शरीर में कोई बदलाव नहीं करूंगा।

तो क्या मुझे अपने कपड़े उतार के दिखाने पड़ेंगे? और कौन? कौन है आप जो आप मेरे कपड़े उतार के देखें? हमारा संविधान हमें नीजता का अधिकार देता है। आप कल को बोलेंगे दलित होने का मेडिकल टेस्ट दो। कल को बोलेंगे मुसलमान होने का मेडिकल टेस्ट दो। और अगर फेक बन रहे होते लोग तो सिर्फ 35,000 टीजी कार्ड क्यों इशू हुए हैं?

आप बनोगे? आप बनेंगी? यहां पे कोई भी जो खड़ा है जो ट्रांसजेंडर नहीं है क्या वो बनना चाहेगा ट्रांसजेंडर? बजट का अंडर यूटिलाइजेशन क्यों है? फिर तो ओवर यूटिलाइजेशन होना चाहिए था ना। कोई लॉजिक है? ट्रांस कौन है? यह कौन तय करेगा? ये एक मेडिकल बोर्ड तय करेगा या वो शख्स तय करेगा जो यह महसूस करता है कि वो ट्रांस है। उसमें वो चीजें हैं। हमारे साथ इस वक्त टैन है। अभी प्रोटेस्ट चल रहा था। अभी कुछ देर पहले ही जंतरमंतर पर प्रोटेस्ट खत्म हुआ है। कैसे देख रहे हो इस सब चीजों को आप? ऐसा लगता है कि सरकार एक-एक करके हर वंचित वर्ग को गुस्सा करना चाहती है। तो अब देखिए वंचित होने की सच्चाई ये है कि हमारे पास लड़ने के अलावा कोई ऑप्शन नहीं है। क्योंकि अगर मैं नहीं लडूंगा ना तो मेरे पीछे 200 बच्चे हैं जो अभी कॉलेज जाना चाहते हैं वो नहीं जा पाएंगे। तो अब चाहे वह मनरेगा का दिक्कत हो या वो फार्मर का दिक्कत हो। या वो मुसलमान का दिक्कत हो या वो दलित का दिक्कत हो या ट्रांसजेंडर का दिक्कत हो। एक-एक करके दिक्कत वो सबको दे रहे हैं और हम सबको साथ में मिलके ही काम करना पड़ेगा। अच्छा जैसे सरकार कह रही है कि एक मेडिकल टेस्ट से क्या बदल जाएगा? इसके पीछे क्या वो तो ये बहुत आसानी से उन्होंने कह दिया मगर आप इसका बेहतर जवाब दे सकते हैं। तो पहली बात तो ट्रांस होना कोई मेडिकल रियलिटी नहीं है।

सरकार को ये समझना पड़ेगा। सेक्स और बायोलॉजी अह सेक्स बायोलॉजिकल होता है। जेंडर जो है वह सोशल होता है। सामाजिक होता है। उदाहरण के लिए आपको यह कैसे पता लगा कि आप लड़का हैं तो आपको यह कपड़े पहनने हैं? आपको किसी ने बताया ना तब आपको पता लगा। मुझे कैसे पता लगा कि जब मैं पैदा हुआ था तो मैं लड़की था तो मुझे दुपट्टा डालना जरूरी है। मुझे किसी ने बताया इसीलिए मुझे पता है। जस्ट बिकॉज़ आई वाज बोर्न विद द बायोलॉजी। आई वाज बोर्न विद। तो वो बायोलॉजी तो मुझे नहीं बताती है दुपट्टा डालना, बिंदी लगाना।

यह समाज बता रहा है मुझे। तो जेंडर जो है वह सामाजिक है और किसी सामाजिक सच्चाई का कोई मेडिकल टेस्ट नहीं हो सकता। आप कल को बोलेंगे दलित होने का मेडिकल टेस्ट दो। कल को बोलेंगे मुसलमान होने का मेडिकल टेस्ट दो। क्या कोई लॉजिक है? मेरी पहचान सामाजिक है। मेरी सामाजिक पहचान का मैं मेडिकल टेस्ट कैसे दूंगा? पहली तो यह बात हो गई। दूसरी बात यह है कि जब मेडिकल बोर्ड्स हुआ करते थे। ऐसा नहीं है कि मेडिकल बोर्ड्स नहीं थे पहले। पहले थे। राइट? चेन्नई में तमिलनाडु में मेडिकल बोर्ड इस्टैब्लिश हुआ था। ग्रे सक्का हमको कहानी बताती है कि वहां क्या हुआ है उनके साथ। आप इमेजिन करो। ठीक है? ट्रांस महिलाओं को ग्रामीण क्षेत्र में कैसे देखा जाता है वो आप भी जानते हैं। आपके सारे दर्शक भी जानते हैं। ठीक? एक ट्रांस महिला जाएगी तो क्या उसको उसका यौनिक शोषण नहीं होगा वहां पे? क्या उसको इधर-उधर छूने की कोशिश नहीं होगी? क्या यह नहीं बोला जाएगा कि अच्छा एक काम कर मेरे को यह कर दे तो फिर मैं तेरा कार्ड बना दूंगा? ये होता है? बिल्कुल हुआ है। इसीलिए तो इतना लड़ रहे हैं हम लोग। और सबसे बड़ी बात है कि हमारा संविधान हमें नीजता का अधिकार देता है। मैं एक नॉन बाइनरी व्यक्ति हूं।

मान लीजिए कल को मैं ट्रांसजेंडर आइडेंटिटी कार्ड दिलाने जाऊं। मैं अपने शरीर में कोई बदलाव नहीं करूंगा। ज्यादा मैं शायद हॉर्मोन थेरेपी लेना चाहूं तो क्या मुझे अपने कपड़े उतार के दिखाने पड़ेंगे? और कौन कौन हैं आप जो आप मेरे कपड़े उतार के देखेंगे? किस अधिकार से देख रहे हैं आप? क्यों देखना है आपको कि मेरे कपड़ों में क्या है? आपको मैं इंसान नहीं लग रहा हूं। आपको यह नहीं दिख रहा है कि समाज में मेरी कोई इज्जत नहीं है।

आपको यह नहीं दिख रहा है कि मेरे को हर जगह मतलब अभी तक जब तक ये एक्ट नहीं आया था तब तक हमको 2019 के एक्ट की कॉपी लेके घूमनी पड़ती है। अपना अस्तित्व साबित करने के लिए ग्रामीण क्षेत्र की तो यही सच्चाई है। नालसा के बाद जो लॉ है। नालसा के बाद जो ट्रांसजेंडर प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट आया था 2019 का वो लेके हम घूमते हैं। मेरे पास पीडीएफ है हिंदी में, इंग्लिश में, बंगाली में, मराठी में। क्यों? ताकि मैं अपना अस्तित्व स्थापित कर पाऊं हर जगह। उत्तर प्रदेश जहां पर मैं काम करता हूं, वहां पर यह सच्चाई है कि डीएम साहब को नहीं पता कि ट्रांसमैन क्या होता है। डीएम साहब को लगता है कि ट्रांसजेंडर मतलब किन्नर प्रथा और कुछ नहीं। ये डीएम का कहना है। उनको नहीं पता। उनकी गलती नहीं है।

मैं उनको जिम उनका जिम्मेदारी नहीं बना रहा हूं। ये किसी ने बताया ही नहीं उन्हें। उन्हें किसी ने बताया ही नहीं है। सरकार का काम है उनको ट्रेन करना। इतना बड़ा-बड़ा जो आप बजट एलोकेशन कर रहे हैं और उसका सिर्फ 15% इस्तेमाल कर रहे हैं। इसीलिए इस्तेमाल हो रहा है ना सिर्फ 15% या 12% किसी साल में। संजय सिंह अभी कोट कर रहे थे कि 67 करोड़ पास हुआ और महज 7 करोड़ यूज़ हुआ है। एक्सैक्ट्ली तो जो उनका स्टेटमेंट ऑफ ऑब्जेक्शंस है जिसके आधार पे वो ये अमेंडमेंट ला रहे हैं। उसमें उन्होंने ये बोला है कि वेलफेयर का दुरुपयोग हो रहा है। फेक ट्रांस लोग आ रहे हैं। पहली बात पहला क्लेम यही है उनका। पहली बात तो आप बताइए मुझे। क्या आप बनना चाहेंगे ट्रांसजेंडर? बनना चाहेंगे आप ट्रांसजेंडर? आपको हर महीने ₹5,000 दे देगी सरकार। आप बनोगे ट्रांसजेंडर? बताओ जवाब दो सच्ची में। आप बनोगे? आप बनेंगी? यहां पे कोई भी जो खड़ा है जो ट्रांसजेंडर नहीं है। क्या वो बनना चाहेगा ट्रांसजेंडर? उस तरह का गरिमाहीन जीवन जीना कोई भी चाहेगा? क्या लॉजिक है यह सरकार का? और अगर फेक बन रहे होते लोग तो सिर्फ 35,000 टीजी कार्ड क्यों इशू हुए हैं? बजट का अंडर यूटिलाइजेशन क्यों है? फिर तो ओवर यूटिलाइजेशन होना चाहिए था ना। अगर मिसयूज है तो ओवर यूटिलाइजेशन होना चाहिए। उसका प्रूफ होना चाहिए था। कोई प्रूफ होना चाहिए। आप प्रूफ दीजिए। है ही नहीं।

आपके पास आंकड़े ही नहीं है। आपको पता ही नहीं है। आप कुछ भी करे जा रहे हैं। ऐसे तो नहीं चलेगा ना। आपके हाथ पे क्या लिखा हुआ है? आजादी। कब लिखा है ये? ये कल जब राज्यसभा में पास हुआ तो हम कुछ साथी देखिए हमारा जो सिख समुदाय है ना बहुत फनी बात है। जब बीजेपी समाज की बात करती है ना वो एक ऐसे समाज की बात करती है जहां पे सब लोग मिलजुल के रहते हैं। सब एक दूसरे का ध्यान देते हैं। वो जो पुराना समय था उसकी बहुत बात करती है। कम्युनिटी ओरिएंटेड हम इंडिविजुअलिस्टिक समाज नहीं है। ये सब बातें बहुत करती है। ट्रांसजेंडरों से ज्यादा नॉन इंडिविजुअलिस्टिक समाज कौन सा है? हमारे परिवार नहीं है। हमें बच्चे नहीं पैदा करने। हम सिर्फ समाज में ही हैं। हम एक दूसरे के लिए ही हैं। मेरे घर पर खाना बनता है तो चार और लोग जिनके घर पे खाना नहीं बनता है वो मेरे घर से खाना खाते हैं। जिस दिन मेरे घर में खाना नहीं बनता है। चार और लोग हैं जो मुझे खाना खिलाते हैं। जब मैं बीमार हूं मेरे मम्मी पापा नहीं आ पाते हैं मेरा ध्यान देने। मेरी ट्रांस बहनें आती हैं मेरा ध्यान देने। मेरी किन्नर बहनें आती हैं मेरा ध्यान देने।

उस सिस्टम को यह लोग क्रिमिनलाइज कर रहे हैं। उसी कम्युनिटी सपोर्ट सिस्टम को क्रिमिनलाइज कर रहे हैं। तो एक जगह यह लोग बात करते हैं कि हमें इंडिविजुअलिज्म से दूर हटना है। हमें कम्युनिटी ओरिएंटेड होना है। हमें अपने समाज के बारे में सोचना है। और जो इकलौता ऐसा समाज है इस देश में जो यही करता है उसके इसी प्रैक्टिस को क्रिमिनलाइज कर रहे हैं। मुझे नहीं समझ आ रहा है ये लोग क्या कर रहे हैं। आपको कब पता चला? ट्रांस होने के बारे में एक्सपीरियंस जो है ना वो बहुत छोटी उम्र से था। मेरे नाना एक बहुत इनएप्रोप्रियट मजाक करते थे। देखो यूपी से हैं। यूपी के पुरुष कैसे होते हैं आप जानते हैं। तो कहते थे कि इसको तो लड़का ही पैदा होना था। भगवान जी को मिट्टी कम पड़ गई। बचपन से मेरे बारे में मेरे नाना जी ये कहते थे। पर मैं जब लड़कों की तरह व्यवहार करता था।

मेरा परिवार मुझे रोक-टोक करके महिला बनाता था। फिर जब मैं बड़ा हुआ तो मैं थोड़ा सा महिला भी महसूस करता था, थोड़ा सा पुरुष भी महसूस करता था और कभी कुछ नहीं महसूस करता था कि बस इंसान हूं। पर मेरे पास भाषा नहीं थी क्योंकि ये सब चीजें हमेशा से थी हमारे देश में। लेकिन कॉलोनियलिज्म ने ना इसको तोड़ दिया। इसको क्रिमिनल बना दिया। इन प्रथाओं को खत्म कर दिया। इन प्रथाओं को वंचित कर दिया। एकदम समाज के बाहर कर दिया। तो वो भाषा घूम गई है। फिर एक इंडियन अमेरिकन है। उन्होंने एक वीडियो डाला था जिसमें उन्होंने नॉन बाइनरी क्या होता है समझाया था हमको। आलोक वेद मेनन वो वीडियो देख के मुझे पहली बार ऐसा लगा कि ओ तो ये हो रहा है मेरे साथ। अच्छा भाषा है मेरे अनुभव के लिए। मैं पागल नहीं हूं। क्योंकि अक्सर यही लगता है ना क्योंकि आप मेरे घर में तो जो लड़कियां हैं उनको लड़की ही लगता है। जो लड़के हैं उनको लड़का ही लगता है। सब अपने जेंडर में खुश हैं। सिर्फ मेरा अनुभव अलग था। और जब आसपास कोई ऐसा नहीं होता ना जिसके पास वो अनुभव हो जो आपका है तो आपको ये लगने लगता है कि आप गलत हो।

आप किसी को बताते थे ये सब या अपने तक ही रखते थे। यार तो मैं स्पोर्ट्स खेलता था और मैं लड़कों के साथ ही घूमता था। मेरे बहुत कम फीमेल फ्रेंड्स हो पाते थे। मुझे लड़कियां समझ नहीं आती थी। जैसे लड़के कहते हैं ना हमें लड़कियां नहीं। मेरे को भी वही वाली फीलिंग होती थी कि किस चीज से हर्ट हो जाएंगी पता नहीं। वो जो फीलिंग्स हैं वो सेम एक्साक्ट सेम वो फीलिंग्स होती थीं मेरे को। आज भी होती हैं। और मैं लड़कों में ये बातें करता था। अच्छा बात होती थी दोस्तों में। हां हां हां। मतलब स्पोर्ट्स खेलते थे बास्केटबॉल। मतलब मैं हरियाणा में स्टेट लेवल खेला हूं। तो स्पोर्ट्स स्पेस में ना बड़े ओपनली बातें होती हैं ये। और मतलब उस टाइम पे तो हरियाणा में जितनी भी लड़कियां थी बास्केटबॉल में वो सब मर्दाना ही थी। तो वहां पे मुझे बड़ा अच्छा लगता था। अपना जैसा लगता था। अपना मिला। हां। तो वहां कभी-कभी ये बातचीत हो जाती थी। पर जब शब्दावली मिली, जब आइडेंटिटी समझ आई, जब रिसर्च करने लगा, फिर मैं समुदाय को ढूंढा, फिर और बातें करने लगा। फिर और समझ आया।

घर पे कब बताया जाए? तो मेरा घर थोड़ा लिबरल परिवार है। मतलब मेरे मां-बाप पढ़े लिखे हैं। मेरी दादी लॉयर थी। तो मैं बहुत प्रिविलेज्ड परिवार से आता हूं। मम्मी को तो तुरंत ही बता दिया था। मतलब बिल्कुल इंतजार नहीं किया था। क्या रिएक्शन रहा? मम्मी मेरी एडवरटाइजिंग में वगैरह में मुंबई में काम करी हुई थी। तो उनको पता था यह सब होता है और क्योंकि मतलब ट्रांस होने से पहले मैं बाईसेक्सुअल था। अभी भी हूं पर मतलब बाईसेक्सुअलिटी के बारे में मम्मी को नाइंथ में ही बता दिया था। तो मेरे घर में आते-जाते रहते थे ट्रांस साथी मेरे। तो एक नॉर्मल था मेरे घर में वो बात। एक सेफ स्पेस थी सबके लिए। तो मम्मी ने कभी कुछ बोला नहीं। अ ठीक है। पापा के साथ समय लगा। वो बात भी है कि पापा थोड़े कंजर्वेटिव हैं। वो एक बीजेपी आरएसएस बैकग्राउंड से ही आते हैं। तो उनकी सोच थोड़ी अलग है। तो उनको समय लगा लेकिन आज शायद वो मुझे नहीं समझते हैं। लेकिन भी हां लेकिन इतना प्यार करते हैं कि मुझे रोकते भी नहीं। कि ठीक है बेटा। मैं सपोर्ट करूंगा क्योंकि तू मेरा बच्चा है। मैं इसलिए नहीं सपोर्ट करूंगा कि मैं तेरे आईडिया में बिलीव करता हूं। पर तू बच्चा है मेरा इसलिए मैं सपोर्ट करूंगा। और ऐसे परिवार लाखों में एक को मिलता है। तो मेरे को पता है मैं कितना लकी हूं। और इसीलिए मैं उन लोगों के लिए लड़ता हूं जिनको यह परिवार नहीं मिल पाता है। क्योंकि ज्यादा कर परिवारों में हिंसा होती है। ज्यादा कर परिवारों में कन्वर्शन थेरेपी होती है। ज्यादा कर परिवारों में करेक्टिव रेप होता है। यह सच्चाई है। मेरे पास प्रिविलेज है तो मैं लड़ पाता हूं और मैं लड़ता रहूंगा। घर जाते हो आप? हां। दो-ती साल में एक बार रिश्तेदार मिलते रहते हैं। सबको पता है। मैंने किसी से छुपाया नहीं। वो समझे ना समझे वो मेरे को मैटर नहीं करता। लेकिन मैं अपनी पहचान कभी छुपाऊंगा नहीं। क्योंकि पहचान अगर मैं छुपाऊंगा ना तो मुझे पता है अभी यह वीडियो देखते हुए बच्चे प्रेरित हो रहे हैं। मुझे पता है।

और अगर मैं छुपाने लगा तो बच्चे शायद प्रेरित ना हो। शायद गलत दिशा में प्रेरित हो जाएं। विभाजन करने वाली दिशा में प्रेरित हो जाए। वो मैं होने नहीं देना चाहता। मैं चाहता हूं कि हर बच्चा अपने घर में रह पाए। मैं चाहता हूं कि जो लड़ाई मैं घर में लड़ रहा हूं वो हर बच्चा अपने घर पे लड़ पाए। क्योंकि हम नहीं चाहते हैं कि बच्चे अपने घर से निकल के अकेले हो जाएं और परिवार में ना रहे। हम यह नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि वो घर पे रह पाए। लेकिन वो करना एक बहुत बड़ी लड़ाई है और वो लड़ाई लड़ने के लिए ना समर्थन लगता है। ऐसे लोग लड़ते हैं जिन्होंने वो लड़ाई पहले लड़ी हो। उन लोगों से दोस्ती करनी पड़ती है। स्ट्रेटजी समझनी पड़ती है। तकनीकें समझनी पड़ती है मम्मी पापा को समझाने के लिए। इसलिए स्वीकार जैसे पेरेंट्स ऑर्गेनाइजेशंस भी एक्सिस्ट करते हैं।

जो पेरेंट्स को समझाते हैं क्योंकि हमारे समुदाय में कोई यह नहीं बोलेगा कि हम यह चाहते हैं कि लोग अपने परिवार में ना रहें। सब अपने परिवार में रहना चाहते हैं। बस कुछ लोग रह नहीं पाते क्योंकि हिंसा इतनी ज्यादा होती है। आप जैसों की कहानियां इसलिए भी कही जानी चाहिए [गला साफ़ करने की आवाज़] क्योंकि आपकी कहानी शायद कोई गांव में बैठा है या कोई शहर में बैठे शख्स को उम्मीद देती है। अभी आप क्या कर रहे हो? अभी मैं अपना मास्टर्स खत्म कर रहा हूं। मैं बस अभी मंडे ट्यूसडे वापस जाऊंगा। मेरे फोर्थ सेमेस्टर के फाइनल्स हैं। पेपर दूंगा। उसके बाद तैयारी भी हो रही है या सिर्फ प्रोटेस्ट हो रहे हैं? जब आप सड़क पर काम करते हो। जब आप गांव में काम करते हो ना, आपको तैयारी करनी नहीं पड़ती है। मतलब मैं पॉलिटिकल साइंस पढ़ता हूं। तो मुझे जितना पता है इस काम की वजह से उतना किताब मुझे कभी नहीं पढ़ा पाएगी। तो मैं पढूं या ना पढ़ूं मार्क्स तो आते हैं। क्योंकि मुझे मुद्दे आते हैं। क्योंकि 10 साल मैंने गांव को अपना कॉलेज बनाया था। 10 साल मैंने देश की सड़कों को अपना कॉलेज बनाया था। देश के आंदोलनों को अपना कॉलेज बनाया था। वहां से जो शिक्षा मिली है ना उसी के बिना पे मैं पास हो जाता हूं। अभी आप एक एनजीओ चला रहे हो।

जी क्या करता है वो एनजीओ? अ हम लोग बनारस में अ समुदाय के साथ काम करते हैं। मोटा-मोटी हम लोग लोगों को पॉलिसी से जोड़ने का काम करते हैं जो सरकार ने बनाया है। हम एलआई शिप बिल्डिंग का काम करते हैं। मतलब अ रिपोर्टर्स को सेंसिटाइज करना, डॉक्टर्स को सेंसिटाइज करना। कर रहे हैं आप। प्रोफेसर्स को सेंसिटाइज करना यह सारा काम करते हैं। साथ में हम एक कम्युनिटी केयर कॉमोनेंट चलाते हैं। जहां पर हमारी हेल्पलाइन है। हम मंथली मीट अप्स करते हैं। कम्युनिटी के लोगों के लिए इवेंट्स करते हैं। मेंटल हेल्थ केयर सेशंस करते हैं और साथ में हम रिसर्च का भी काम करते हैं। क्योंकि लोकल लेविड लेवल एविडेंस जनरेशन नहीं है ट्रांस समुदाय की रियलिटी पे। तो जो मैं पिछले एक साल से जिस रिसर्च पे काम कर रहा हूं वो एक्चुअली 2019 के ट्रांस राइट्स एक्ट की इंप्लीमेंटेशन को चेक कर रहा हूं मैं बनारस में।

अच्छा जब आप काम करते हो, फील्ड में रहते हो, लोगों से मिलते हो तब ऐसे केसेस आते हैं क्या जिन्होंने अभी तक आइडेंटिटी छुपा रखी हो और आप गए हो और मोटिवेट होने के बाद आपके पास आए हो अकेले में कि हम यह हैं मगर हम बताने में डरते हैं। हम लोगों से को जाहिर करने में डरते हैं। रोज होता है। मैं कहीं भी जाऊं होता है। मतलब मैं किसी सरकारी दफ्तर भी जाऊंगा अपना काम करने। मान लो मैं वहां से निकलूंगा। बाद दो लोग आके मेरे को बोलेंगे कि हम भी ऐसा फील करते हैं लेकिन बोल नहीं पाते हैं डर लगता है। तो मुझे पता है कि मेरे समाज के कितने लोग अभी भी इनविज़िबल हैं। उनको विज़िबल करना जरूरी है। पर उनको मैं विज़िबल तभी कर पाऊंगा जब मैं ऐसा समाज बना पाऊंगा जहां पे वो गरिमा के साथ जी पाए।

मेरी सबसे बड़ी लड़ाई वैसा समाज बनाना है जहां पे मेरे समुदाय के लोग गरिमा से जी पाएं। क्योंकि ऐसा समाज बन जाएगा तो कानून अपने आप बदल जाएगा। फिर कानून ऐसा आ ही नहीं पाएगा। बहुत शुक्रिया आपका। तो इस जो बिल है उसको लेकर अलग-अलग तर्क है, तर्क हैं। अलग-अलग बहसें हो रही हैं। सबके अपने-अपने पक्ष हैं। अब ये देखना होगा कि इनकी जो मांगे हैं उन पर सरकार क्या एक्शन लेती है। क्या सरकार उन पर सुनवाई करती है या सीधा राष्ट्रपति के पास हस्ताक्षर के लिए जाता है और वह बिल एक्ट बन जाता है।

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