हरीश राणा की मुक्ति के बाद उठ रहे है कई सवाल।

हरीश राणा को उनके कष्टों से मुक्ति मिल चुकी है। एम्स में बीते मंगलवार यानी 24 मार्च कोउनका निधन हो गया और 25 मार्च दिन गुरुवार को ग्रीन पार्क के श्मशान घाट में दाह संस्कार भी। भारत में इच्छा मृत्यु के पहले केस के तौर पर हरीश राणा का नाम अब इतिहास में दर्ज हो चुका है। यह नाम तो आपके जेहन में भी दर्ज हुआ था। पर अब धुंधलाने लगा होगा। जैसे श्मशान से उठता यह धुआं अब शांत हो चुका है। लेकिन हरीश राणा की मुक्ति के बाद कई सवाल सिर उठा रहे हैं।

मसलन क्या यह मुक्ति सिर्फ हरीश राणा के लिए है या उनके माता-पिता को भी कोई मुक्ति मिली? मुक्ति की यह पूरी प्रक्रिया कानूनी रूप से भले सही हो, लेकिन क्या मानवीय आधार पर भी यह सही थी? क्या इस मुक्ति को इच्छा मृत्यु का नाम देना सही होगा या यह याचना मृत्यु थी? इस वीडियो में इन सारे सवालों के जवाब हम तलाशने की कोशिश करेंगे।

तो बात हो रही थी हरीश राणा को दी गई इच्छा मृत्यु की। इसमें कोई दो राय नहीं कि 13 बरस से जितनी पीड़ा में हरीश राणा थे उससे ज्यादा पीड़ा हरीश के पिता अशोक राणा और मां निर्मला देवी झेल रहे थे। सिर्फ यही दोनों नहीं बल्कि पूरा परिवार ही इस बीमारी से त्रस्त और तबाह हो चुका था। ऐसे में हर तरफ से नाउद होकर हरीश राणा के परिवार ने सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद भरी याचना की। उन्होंने हरीश राणा की मुक्ति के लिए अर्जी दाखिल की। फिर कोर्ट ने 11 मार्च को इस इच्छा पर अपनी मोहर लगा दी होगी।

जाहिर है यह एक ऐसा फैसला था जहां तक पहुंचने के लिए सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन को भी अपने आप से अपनी भावनाओं से [संगीत] लड़ना पड़ा होगा। फिर उन्होंने घर की मजबूरियां, हरीश राणा पर दी गई डॉक्टरों की राय और मेडिकल साइंस की सीमाओं को ध्यान में रखकर भारी मन से अपना फैसला सुनाया होगा। इसी के बाद 14 मार्च को हरीश राणा को एम्स लाया गया। इसके बाद इच्छा की पूरी प्रक्रिया की हर अपडेट हम आपसे हर दिन रहे।

कब-कब उनके लाइफ सपोर्ट के किस हिस्से को हटाया गया। कब भोजन बंद किया गया? कब पानी देना रोक दिया गया। खबरें पढ़ते सुनते वक्त जिस मानसिक तनाव और दुख से आप गुजरे हम सब भी खबर लिखते बोलते वही तनाव [संगीत] और वही दुख झेल रहे थे। ऐसे में सोचिए उस माता-पिता का हाल जो हर पल अपने बेटे की मुक्ति का इंतजार कर रहे थे। उनका क्या हाल रहा होगा? हरीश के भाई बहनों का क्या हाल रहा होगा? जाहिर है यह पूरा परिवार हरीश के मुक्ति के इंतजार में पल-पल मर रहा होगा।

हर घड़ी उन्होंने बहुत मुश्किल से काटी होगी। लेकिन बीते 13 वर्ष से चला आ रहा दुखों का यह पहाड़ 24 मार्च को अचानक भरभरा कर टूट गया। लेकिन क्या हरीश की मुक्ति के साथ ही इस परिवार को भी मुक्ति मिल गई?

जी नहीं। ऐसा नहीं हुआ होगा। जाहिर है कि हरीश जिस तकलीफ में थे और हरीश के साथ-साथ उनका परिवार जिस तकलीफ में था [संगीत] उससे तो दोनों को मुक्ति मिल गई। लेकिन अपने जवान बेटे को ना बचा पाने का दुख इस परिवार को निश्चित रूप से साल रहा होगा। इस अर्थ में हरीश के माता-पिता के लिए अब तकलीफों की यादों का एक नया गलियारा खुल गया होगा। जिसमें ना चाहते हुए भी यह परिवार टहल रहा होगा।

इच्छा मृत्यु की प्रक्रिया पर दी जा रही अपडेट पर जो रिएक्शन आपकी मिली वे बताते हैं कि मानवीय स्तर पर इच्छा की यह प्रक्रिया आप पाठकों को यातना के तौर पर लग रही थी। 14 मार्च से 24 मार्च के बीच के 10 दिन का हर पल इस खबर से जुड़े हर शख्स के लिए किसी यातना से कम नहीं था। [संगीत] हम जैसे हर सामान्य जन को ऐसा लगता था जैसे उनका भोजन पानी नहीं रोका जाना चाहिए था। यह अलग बात है कि हरीश को हो रही जिस तकलीफ की कल्पना कर हम सब सिहर रहे थे। डॉक्टरों की टीम वह समझती रही कि हरीश को ऐसा कुछ अनुभव नहीं हो सकता। ऐसे में हमें बार-बार मुन्ना भाई एमबीबीएस [संगीत] के पात्र आनंद बनर्जी की याद आते रहे। जिसे डॉक्टर सब्जेक्ट सब्जेक्ट कहकर संबोधित करते थे।

जो कुछ भी फील नहीं कर सकता था। शायद कुछ वही हाल हरीश का भी रहा हो। लेकिन फिल्म के आखिरी दृश्य में जो जादू आनंद बनर्जी के साथ हुआ। क्या वैसे किसी जादू की कोई उम्मीद हरीश के साथ नहीं की जा सकती थी? शायद यह रियल लाइफ और रियल लाइफ का फर्क था। लेकिन सामान्य जन को इस रियल लाइफ में यह बात गले से उतर नहीं पा रही थी कि स्वाभाविक मौत देने [संगीत] के इंतजार में हरीश का भोजन पानी बंद रखा गया। उन्हें लगता था कि क्या कोई मेडिकल साइंस के जरिए ऐसा उपाय नहीं किया जाना चाहिए था जिससे हरीश को तुरंत मुक्ति मिल जाती? बहरहाल अब सवाल यह कि इस मृत्यु को इच्छा मृत्यु कहा जाए या याचना मृत्यु।

दरअसल इच्छा तब कहा जाना चाहिए था जब यह डिमांड हरीश की ओर से की गई होती। लेकिन यहां हरीश की ओर से उसके परिवार ने यह याचना की थी। इसलिए मुझे लगता है कि इसके लिए एक याचना शब्द का इस्तेमाल किया जाना ज्यादा बेहतर होगा।

लेकिन अब आखिरी सच तो यही है कि हरीश राणा अब अपने कष्टों से मुक्ति पा चुके हैं। 13 बरस से जो पीड़ा और परेशानी उनका परिवार झेल रहा था उससे उन्हें मुक्ति मिल चुकी है।

माता-पिता को संतोष होगा कि उनके बेटे के हार्ट के वाल्व और कॉर्निया अब दूसरे शरीर को सपोर्ट कर रहे हैं और अंततः उनके बेटे को मुक्ति मिल गई। हालांकि यह अलग बात है कि बेटे के जाने का दुख मांबाप को अब भी खातिर कर रहा होगा। ऐसे में हम और आप बस यही दुआ कर सकते हैं कि इस परिवार को दुख सहने की हिम्मत मिले।

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