यू!ध रोकने के पीछे अमेरिका की नई साजिश!

से पीछे हट गया अमेरिका। अब ईरान से बात शुरू हो गई है सीज फायर को लेकर। पांच दिन तक कहा गया है कि ईरान के ऊपर नो अटैक। आखिर जब तीन हफ्तों से जंग छिड़ी हुई है तो यह फैसला अचानक से क्यों लिया गया? इसके पीछे का ट्रंप का इंटेंशन क्या है?

क्या पांच दिन के बाद वाकई ईरान इजराइल अमेरिका के बीच में जो छिड़ी जंग है वो रुक जाएगी? आखिरकार आईए ने दुनिया को लेकर किस संकट के बारे में चेताया था? इन सब मुद्दों पर हम बातचीत करेंगे। ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध रोकने को लेकर बातचीत शुरू हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह दावा किया है कि कि ट्रंप के मुताबिक पिछले दो दिन में ईरान और अमेरिका की अधिकारियों ने पीस डील को लेकर बातचीत की।

ट्रंप का कहना है कि इसी वजह से अगले 5 दिन तक वाशिंगटन ईरान के किसी भी ऊर्जा ठिकानों पर हमला नहीं करेगा। ट्रुथ पर ट्रंप ने लिखा पिछले दो दिनों में काफी रचनात्मक बातचीत हुई है। हम उम्मीद करते हैं कि इस सप्ताह के अंत तक समझौता हो जाएगा। तब तक हम ईरान के पावर प्लांट्स और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर पर कोई हमला नहीं करेंगे। ट्रंप ने अमेरिकी रक्षा विभाग को निर्देश दिया है। फिलहाल ईरान के पावर प्लांट्स और ऊर्जा ढांचे पर कोई हमला ना किया जाए। हालांकि उन्होंने यह भी साफ किया है कि यह फैसला बातचीत के नतीजों पर निर्भर करेगा।

अगर बातचीत सफल नहीं होती है तो आगे फिर से सैन्य कारवाई हो सकती है। इस पर ईरान की सरकारी मीडिया ने कहा कि ट्रंप पीछे फिर से पीछे हट गए हैं। यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब स्ट्रेट ऑफ होम्स को लेकर तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इससे पहले ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे के अंदर इस रास्ते को पूरी तरह खोलने की चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो अमेरिका ईरान के बड़े पावर प्लांट्स पर हमला कर सकता है। इसके जवाब में ईरान ने भी सख्त प्रतिक्रिया दी थी।

ईरान ने कहा है कि अगर उसके पावर प्लांट्स या दूसरे जरूरी ढांचों पर हमला हुआ तो वह होमोस्ट स्टेट को पूरी तरह से बंद कर देगा। यह समुद्री रास्ता दुनिया के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और गैस इसी रास्ते से आता जाता है। ट्रंप ने ईरान के साथ शांति समझौते के लिए अपने पुराने दो दूतों पर भरोसा जताया। ट्रंप ने ईरान से बातचीत के लिए स्टीव विटक और अपने दामाद जेरड कुशनेर को अधिकृत किया।

दोनों ही दूत ईरान के साथ बातचीत करेंगे। दोनों की कोशिश उन मांगों को मनवाने की होगी जो ईरान पहले से नहीं मान रहा था। अब ईरान को लेकर अमेरिका की पांच मुख्य मांगे हैं। पहले इनमें होमर्स को खोलना, दूसरा परमाणु हथियार ना बनाना, तीसरा मिसाइल भंडारण समिति सीमित करना, चौथा प्रोगजी को फंड ना देना प्रमुख है। और यहीं ईरान सिर्फ परमाणु समझौते को लेकर बातचीत करना चाहता है।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराक्षी के साथ अमेरिका के साथ अब कोई बातचीत तभी होगी जब भविष्य में कभी भी हमला ना करने की गारंटी मिलेगी। वहीं आपको बता दें कि इस समय पावर प्लांट पर हमला ना करने का यह जो बड़ा फैसला इसलिए लिया गया है क्योंकि दुनिया पर दशकों के सबसे बड़े ऊर्जा संकट की आहट दिखाई पड़ी है। आईएए के चीफ फातिह बिरोल की चेतावनी आई थी कि 1970 के ऑयल शॉक से भी बदतर हो सकते हैं हालात।

दो चेतावनी उन्होंने दी। दो दौर का जिक्र किया। 1970 और 2022 जब रशिया यूक्रेन का युद्ध हुआ जिस दौर से पूरा विश्व गुजरा ना सिर्फ यहां पर तेल गैस बल्कि ऊर्जा बल्कि आप देखिए कि बेरोजगारी का आलम भी पूरा विश्व कहीं ना कहीं झेल सकता है। तो उसके बाद से ही यह बातचीत शुरू हुई क्योंकि स्टेट ऑफ फॉर्म्स में अमेरिका नाटो देशों से मदद मांग रहा था। वहां पर अपने युद्धपोत की तैनाती कर रहा था। नाटो देशों के साथ-साथ और भी जो देश थे वह अमेरिका का साथ देने से सामने से नहीं लेकिन बैकफुट से मना किए। यहां पर अमेरिका पीछे हो हट गया। 20% वहीं से स्टेट ऑफ होमर्श के सिकरे गलियों से ही वहां से तेल और गैस आता है।

अब जब दो दिन जब दो दिनों तक स्टेट ऑफ होमर्श को पूरे खोलने की चेतावनी अमेरिका की तरफ से दी गई तो ईरान ने कहा कि अगर किसी भी पावर प्लांट या जरूरी ठिकानों पर हमला हुआ तो वो स्टेट ऑफ होमस को पूरी तरह से बंद कर देगा। अब इसके पीछे की अमेरिका की डिप्लोमेसी को समझने की जरूरत है। अमेरिका पांच जो रीज़ंस हैं वो बता रहा है। पांच जो प्रमुख उसकी डिमांड है इस युद्ध को रोकने के लिए। अभी वो कह रहा है कि दो दिन से अमेरिका और ईरान की अच्छी बातचीत हो रही थी। उसके बाद पांच दिनों के लिए अमेरिका वाशिंगटन किसी भी पावर प्लांट पर हमला नहीं करेगा क्योंकि इसके पहले इजराइल ने गैस फील्ड पर ईरान के हमला किया।

ईरान ने रिटिलिएट करते हुए क़तर के गैस फील्ड पर हमला हुआ और यह जो लड़ाई थी वो दूसरे एंगल में शिफ्ट हो गई। ऊर्जा अह की तरफ़ यह शिफ़्ट होती हुईज़ आई। इसीलिए आईए ने कहा कि 1970 की तरह कहीं ऐसा ना हो कि यहां पर ऊर्जा का संकट पूरे विश्व में खड़ा हो जाए। बा क्योंकि बहुत सारी ऐसी कंट्रीज हैं जिनके पास ऑल रिजर्व नहीं है। और अगर भारत के पास भी ऑल रिजर्व है तो वो भी 50-60 दिनों के अंदर। चाइना के पास 100 दिनों के अंदर। तो अगर यह लड़ाई नहीं रुकती और पांच दिनों के रुकने के पीछे यह है कि बातचीत से यह मसला हल हो जाए तो अच्छा है। पांच दिन में स्ट्रेटजी भी अपनी बना सकते हैं।

स्टेट ऑफ होम और उस खरग आइलैंड को जिसको अमेरिका हथियाने की कोशिश कर रहा है उस पर भी प्लानिंग बनाकर पूरी वो कर सकता है। तो ये पांच दिनों के लिए कहीं ना कहीं डोनाल्ड ट्रंप समझ रहे होंगे कि पांच दिनों में अगर बातचीत हो जाती है। उनकी प्लानिंग किस तरह है। क्या वो हमला कर सकता है नहीं कर सकता है?

क्या है और उसके बाद बातचीत के बाद अगर यह लड़ाई रुक जाएगी तो वह अच्छा है। लेकिन फिलहाल अच्छे संकेत यही है कि पांच दिनों के लिए पावर प्लांट पर कोई हमला नहीं होगा। लेकिन अमेरिका की भी जो नेचर है उसको समझने की जरूरत है। खासकर डोन्ड ट्रंप की कि डोन्ड ट्रंप जो कहते हैं वो करते नहीं हैं।

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