13 साल किन मशीनों पर टिकी थी हरीश राणा की जान?

इंजीनियर बनने का सपना लेकर हरीश चंडीगढ़ गया था। वहां जाकर उसने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया। वो नहीं जानता था कि उस रात उसकी जिंदगी एक झटके में खत्म हो जाएगी। उस नौजवान के सपने सच्चाई का रूप लेने से पहले ही गायब हो जाएंगे। वो कहां जानता था कि 13 साल उसे एक जिंदा लाश की तरह निकालने पड़ेंगे।

उस पिता की बेबसी उस मां का जी क्या महसूस कर रहा होगा जब वो अपने जवान बेटे को इस हालत में बेसहारा पाते। शुरुआत सर ऐसे हुई कि 20 अगस्त दो 20 अगस्त 2013 को इस चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में ये पढ़ रहा था लास्ट सेमेस्टर था डिग्री का सिविल इंजीनियरिंग का तीन डीएमसी अभी मैंने दिखाई उनको डीएमसी दिखाई डिप्लोमे की वो दिखाई इसको छह सेमेस्टर सी जो मिलती है।

डीएमसी तो हमें फोन आया 7:21 को शाम को कह रहे ऋषभ ना गिर गया है मैं कहा ऋषभ गिर मैंने कहा ऋषु इसको ऋषु बोलते थे प्यार से तो हरीश राणा नाम है इसका मैं कहा मैं समझा नहीं कह रहा आपका बेटा ना छत से गिर गया मैंने कहा गिर गया मैंने कहा आप कौन बोल रहे हैं कह रहे मैं उसका दोस्त बोल रहा हूं मैंने कहा क्या नाम है बेटा उसने नाम उसका वहां भी लिखा है मैंने वो जो एफआईआर की थी तो उसके बाद मैं घर आया घर में मैंने दीदी को बोला मैंने दीदी ऐसीऐसी बात हो गई हमारे साथ और मैं हम जा रहे हैं चंडीगढ़ इनको बोला फिर हम दोनों 2 2:30 बजे हम चंडीगढ़ पहुंचे। हॉस्पिटल में हमें कोई लेने आ गया।

हमारा रिलेटिव जैसे आ जाते हैं। जी 3:00 बजे हम पीजीआई ट्रामा सेंटर पहुंचे। वहां डॉक्टर राकेश जी से मिले जो न्यूरो के थे। वो हमें हमें नहीं पूछा। हम खड़े हो गए उनके सामने। मैंने कहा जी हम मरीज के फादर हैं। आपसे कुछ पूछना चाहते थे जो बच्चे कह रहे यार वो सीधे बोलते। कह रहे यार इसने छलांग क्यों लगाई? अच्छा मैं चुप रहा मोनरा रहा मैंने कुछ नहीं कहा हौसला रखिए सर मतलब कुछ चीजों पे इंसान का जोर नहीं है इन्होंने हौसला रखा मेरा हौसला टूट गया नहीं नहीं आप फिर भी हौसला रखिए देखिए हम अब भी देखतेदेखते ना हम कुछ और तो कर नहीं सकते नहीं नहीं ऐसी कोई बात नहीं हां हम आपके फिर मन मन में ही संकल्प उठा कि छलांग क्यों लगाएगा फिर हम गए उसके पास पहले देखा रात को उसके पांच सिटी स्कैन हुए।

तब देखा तो शरीर में उसके यहां उंगलियों के निशान थे। यहां उंगलियों के निशान थे। यह नीली थी। यहां ऐसे लग रहा बैट मारा और बैट था वहां। यह कहने में कोई शक नहीं कि इस दुनिया में मां-बाप से बढ़कर कुछ भी है। कहते हैं एक पिता कभी जता नहीं पाता कि वह अपने बच्चों से कितना प्यार करते हैं।

लेकिन हरीश के पिता के आंसू यह साफ बयां कर रहे थे कि उन पर क्या बीती होगी। उस मां-बाप का कलेजा कितना मजबूत होगा जिन्होंने अपने बेटे की सांसों को बचाने के लिए 13 साल लगातार जद्दोजहद करते रहे। और अब जाकर हरीश को इच्छा मृत्यु देने की इजाजत कोर्ट ने दे दी है। हरीश को फुटपाइप से खाना खिलाने से लेकर उसकी सांसे मशीनों पर टिकी हुई है। 13 साल पहले पीजी के चौथी मंजिल से हरीश गिर गया था। इसके बाद से उसका पूरा शरीर पैरालाइस मार गया और फिर हरीश कोमा में चला गया। इस दौरान किस तरीके से हरीश के मां-बाप ने उसकी सेवा की बताते हैं आपको। हरीश को पीईजी ट्यूब से खाना खिलाया जाता था। पेट में एक पाइप डाली जाती थी जिसके सहारे उसके पेट तक खाना पहुंचाया जाता था। कुछ ऐसी मशीनें हैं जिसके सहारे हरिश की देखभाल की जाती थी। उसमें से एक जिसको सांस लेने के रास्ते में एक छेद करके इस ट्यूब को डाला जाता था ताकि सांस लेने में मदद मिल सके और फेफड़ों तक हवा पहुंचती रहे। इसके बाद आईवी ड्रिप और हाइड्रेशन सिस्टम शरीर में पानी और दबाव का बैलेंस बनाए रखने के लिए आईवी ड्रिप यूज़ किया जाता था। पैिलिएटिव केयर बिस्तर पर पड़े रहने के कारण होने वाले घाव को रोकने के लिए एयर मैट्रिस का भी यूज करते थे और खाने में उसे लिक्विड डाइट दिया जाता था। जैसे दाल का पानी, पतला सूप, दूध, जूस और बहुत बारीक पिसा हुआ पतला दलिया।

शरीर में पोषण की कमी ना हो इसके लिए प्रोटीन और विटामिन वाले पाउडर को पानी में घोलकर उसे दिया जाता था। सभी दवाइयों को भी पीसकर पानी में मिलाकर इसी नली के जरिए शरीर के अंदर भेजा जाता था फूड पाइप के जरिए और अब डॉक्टर्स ने प्रोसेस स्टार्ट कर दी है जिससे हरीश को नेचुरल तरीके से मृत्यु दी जाएगी। ब्यूरो रिपोर्ट क्राइम तक

Leave a Comment