विकसित यूपी बैठक गोरखपुर जल्द आ रहा है सिर्फ और सिर्फ यूपी तक पर जब वो गए थे मैं था मेरे साथ दो इंटर्न भी थे तो वो तो जब लिख रहे थे तो उनसे लिखा भी नहीं जा रहा था वो घबरा रहे थे उसके बाद जजेस ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पारदीवाला साहब और ये विश्वनाथन जी ने दोनों ने उनके पेरेंट्स से मीटिंग करी अच्छा इंडिविजुअली हां उनको कोर्ट में बुलाया मतलब मेडिएशन सेंटर में बुलाया एक स्पेशल डे पे उनसे बात करी उनके भाई से उसकी दीदी से मतलब सबसे परिवार परिवार वालों से सारी कहने की बातें तो अशोक राणा जी ने करी है। बस उनका तो मैं देख रहा था वो कितना मतलब मतलब धैर्य से हमारी बातें सुन रही थी और बस उनकी आंखों में आंसू थे।
यही दो चीजें और तो कुछ नहीं। मैं देख रहा था कोर्ट में जज साहब की लास्ट मोमेंट पे लास्ट के 15 मिनट उनकी आंखें सजल रही। पूरी कोर्ट में पिन ड्रॉप साइलेंस था और उसके बाद तो क्योंकि इतने फोन आते हैं ना उनको कि कितनी बात करें? वो अच्छा मेरे से भी क्यों ही बात करें?
क्या ही बात करेंगे तो क्योंकि सारा दिन फोन टन टन टन टन उनके भेजते हैं। कभी मेडिसिन वाले आ जाते हैं कि हमारी दवाई खिलवा लो। कोई भूत देके आता है। कोई जड़ी बूटी ले आता है। कोई पता नहीं मेरे को भी इतने सारे फोन आते हैं। उनको भी आते हैं क्योंकि हम टीम में थे। तो इतने लोग उनको संपर्क करना चाहते हैं।
एडवोकेट मनीष जैन जो कि हरीश राणा का मामला जो है सुप्रीम कोर्ट तक लेकर गए और बकायदा वहां से जो इच्छा मृत्यु वाले आदेश है वो जो है पारित उन्होंने कराया। मनीष जी आपका बहुत-बहुत स्वागत है यूपी तक पर। थैंक यू। तो मनीष जी मुझे सबसे पहले यह बताइए कि क्या यह पूरा मामला था आपके पास ये कब आया? ये 2024 जनवरी में मुझे ध्यान है तब आया था और तब एक ब्रह्माकुमारी दीदी है लवली दीदी।
उन्होंने मुझे अशोक जी से कनेक्ट किया था क्योंकि वहां पे वो राजयोगा सीखने जाते थे मेडिटेशन तो उन्होंने ही कहा कि एक सेवा है करके देख लो तो मैंने शुरू किया तो उसके लिए पहले पेपर वर्क होता है कि जुरिसडिक्शन बनाना मेंटनेबिलिटी के इश्यूज को देखना वो सारा चेक किया और उसके बाद हमने इनिशिएट किया कोर्ट में अच्छा हमारी आज सुबह ही जो है बातचीत हो रही थी ब्रह्मा कुमारी जी से उन्होंने बताया कि आप जब अपनी टीम के साथ पहली बार पहली दफा जब उनके घर पहुंचे थे तो आप भी भावुक हो गए थे। स्वाभाविक है क्योंकि सुना ही था ऐसी चीजें और जब वो गए थे मैं था मेरे साथ दो इंटर्न भी थे तो वो तो जब लिख रहे थे तो उनसे लिखा भी नहीं जा रहा था।
वो घबरा रहे थे उस चीज को उसको देख के भी क्योंकि पहली बार इतनी भावना से किसी को देख रहे थे और देख रहे थे उसकी केयर भी हो रही है। वो कोई रिसोंड भी नहीं कर रहा। हमें भी नहीं देख रहा है। हम भी उसको देख के जा रहे हैं। कुछ भी ऐसा नहीं कर रहा है। और उनकी बातें हम सुन रहे थे कि कैसे-कैसे उनकी सेवा करते हैं उन बच्चों की। हरीश की कैसे उसकी मम्मी पापा लगे रहते 24ों घंटे उसके लिए अवेलेबल रहते हैं तो नेचुरली होता तो है ही तो आप जब गए तो आपने कोशिश की कि मतलब जिस प्रकार से अभी वीडियो वायरल हो रहा है हमने देखा कि एक आखिरी जो है ब्रह्मा कुमारी द्वारा जो है एक वीडियो बनाया गया जिसमें उन्होंने कहा कि सबको माफ करते हुए सबसे माफी मांगते हुए जाओ जाओ तो उस उस वीडियो में जिस प्रकार से दिख रहा है कि उनकी आंखें जो है वो मतलब पलक झपका रहे हैं और ऐसा लग रहा है मुंह से कि कुछ बोलना चाह रहे हैं तो उस समय भी कंडीशन यही थी। देखो यह जो आपको पता है ना हमारा दिमाग सारे शरीर को कंट्रोल करता है।
बस वो दिमाग का कंट्रोल ही मिसिंग है। बाकी तो इनवॉलंटरी चीजें हमारे तो शरीर में वैसे भी चलती हैं। हृदय धड़क रहा है। लीवर काम कर रहा है। सांसे चल रही हैं। आंखें ब्लिंक कर रही है। वो सब कुछ कर रहा है। लेकिन किसी भी चीज को रिकॉग्नाइज कर नहीं कर रहा है। उसी को वेजिटेटिव स्टेज बोलते हैं। वही कंडीशन में था। वो अभी भी जैसे आप किसी को हिलाओगे, डुलाओगे तो थोड़ा सा तो करेगा ही। तो वो जब उसको तिलक लगाया थोड़ा हिला डुला तो उसकी वजह से वैसा थोड़ा एक्स्ट्रा सा दिखाई दिया देन अदरवाइज कुछ नहीं था और वो सब इनवोलंटर है वंटरी कुछ नहीं था उसमें जो आपके और मेरे साथ होता है मैं अब जैसे हम बात कर रहे हैं गर्दन हिला रहे हैं वो वैसा भी कुछ नहीं करता आप उससे कितनी भी बातें कर लो कितना भी उसकी तरफ देख लो कुछ नहीं रिएक्शन तो जब आप पहली दफा घर गए आपने वहां पर फैमिली को देखा फैमिली का रिएक्शन क्या था नहीं फैमिली तो बहुत ग्रेटट्यूड वाली है शुक्रिया करने वाली धन्यवाद करने वाली कोई उनके यहां आता था जर्नलिस्ट हो एडवोकेट हो कोई भी तो उसका वो थैंकफुल ही करते थे कि वह आया और ना ही वह दीनहीन बनके किसी की वो करते थे। बहुत अच्छे से उन्होंने अपने बच्चे की सेवा करी है। किसी से कोई सहयोग की अपेक्षा के बिना सबसे बड़ी बात है बिना किसी सहयोग की अपेक्षा के उन्होंने बहुत अच्छी सेवा करी है उसकी और आप कभी जाओगे अभी दो चार महीने बाद या पहले कोई जर्नलिस्ट गया वो वहां से खुशी हो के आया है।
वो ऐसा नहीं है कि वो दर्द देखने गया था तो दर्द में ही वापस लौटा है। वो दर्द के साथ एक करुणा लेके आया वहां से। हम तो ये बड़ी चीज है। आप भी बेसिकली जो है आप भी एक सेवा के तौर पर ये कर रहे हैं। हां देखिए सेवा हम असाइनमेंट सेवा के हिसाब से मिले और हमारे वकालत में तो होता ही है कि कुछ ऐसे मैटर्स पे काम किया जाए जहां देश की समाज की सेवा होती है। तो जब आपको पहली बार उन्होंने बताया ब्रह्मा कुमार जी ने तो आप आपके दिमाग में क्या था? नॉर्मल हमने अरुणा शानबाग वाला केस पढ़ा हुआ था। थोड़ा बहुत ही पढ़ा हुआ था या कॉमन कॉज की गाइडलाइन पढ़ी थी। लेकिन वो यूज़ कैसे होंगे ये हमें भी नहीं पता था। तो जब भी नया था हां बिल्कुल नया सबके लिए नया था क्योंकि जो केस में रहता है और क्योंकि यह वकालत रूटीन प्रोफेशन है हम सबके लिए तो जब तक कोई खास मैटर या कोई भी ऐसा मैटर ना आए जब तक तो व्यक्ति अवेयर भी नहीं होता है तो जब वो आया तो हमने बड़ी कॉन्शियस के साथ उसके फैक्ट और फिगर्स को देखा जो लॉ था अवेलेबल उसको देखा और उसके बाद उसको सब कुछ अच्छे से प्रेजेंट करने के लिए हमने हाई कोर्ट में रखा और हाई कोर्ट का जो भी डिसीजन है उसके अगेंस्ट हम सुप्रीम कोर्ट गए थे।
तो हाई कोर्ट में ऐसा क्या हुआ कि इसे जो है मतलब एक तरह से हटा दिया गया था। देखिए हाई कोर्ट ने जब रिजेक्ट किया केस को तो उसका कहना यह था कि कोई भी सपोर्ट सिस्टम पे हरीश नहीं चलता है और सपोर्ट सिस्टम का मतलब नॉर्मली माना जाता है वेंटिलेटर को और वेंटिलेटर तो था ही नहीं उसके पास। उसके पास था गले में एक ट्यूब थी जिससे उसका म्यूकस निकलता था। एक उसके पेट में पीईजी करके ट्यूब थी जिससे उसका खाना डायरेक्ट उसके पेट में जाता था। एक यूरिन कैथडर था।
ये तीन चीजें लगी हुई हैं। तो हमने वही रिक्वेस्ट करी थी, प्रेयर करी थी कोर्ट से, हाई कोर्ट से कि साहब यह भी डेफिनेशन में शामिल कर लिया जाए लाइफ सपोर्ट की और दूसरा एक मेडिकल बोर्ड कॉन्स्टिट्यूट कर दिया जाए जिससे यह असर्टेन हो जाए कि इसकी सिचुएशन एक्चुअली क्या है। हम वो दोनों उसने मना कर दिया। रिजेक्ट कर दिया। उसी के अगेंस्ट एसएलपी में स्पेशल लीव पिटीशन में हम सुप्रीम कोर्ट गए थे। तो मुझे यह बताइए कि जैसे मान लीजिए इस तरह का कोई केस होता है तो प्रोसेस क्या है? मतलब कैसे जो है मतलब उस स्टेज तक इच्छा मृत्यु के जो जो वो स्टेज है वहां तक पहुंचा जाता है? नहीं अभी तो ये कोई स्टेज ऐसा कुछ है नहीं। नॉर्मली आप इसको ऐसा समझिए जैसे हमारे भारत में एक परंपरा है संथारा सुना होगा आपने तो जैन साधु उसमें खाना पीना छोड़ के अपने शरीर को पूरा करते हैं मुक्त होने के लिए निकल पड़ते हैं तो ये जो पैसिव इथूनिया है इथूनिया का मतलब होता है गुड डेथ और पैसिव उसमें कि वो ऐसी सिचुएशनंस क्रिएट कर देना जिससे उसकी डेथ और अच्छी हो जाए गरिमापूर्ण हो जाए तो यही हरीश राणा के केस में भी हो रहा है कि उसकी जो ट्यूबे हैं वो धीरे-धीरे करके निकाल दी जाएंगी और डॉक्टरों के ऑब्जरवेशन में उसे रखा जाएगा और जैसे-जैसे से उसका शरीर और कमजोर होगा या जैसे भी चलेगा उसका अगले एक हफ्ते दो हफ्ते जब तक चलेगा तब तक वो चलता रहेगा और जब मुक्त होना होगा हो जाएगा क्योंकि मृत्यु हमारे हाथ में नहीं है और यही पश्चिम विथनीशिया की ब्यूटी है कि आप बस उसको प्रकृति की गोद में छोड़ देते हो ना हम कुछ दे रहे हैं ना हम कुछ रोक रहे हैं।
हालांकि मेरा सवाल ये था कि जैसे अगर मान लीजिए ये केस तक आप लेकर गए हैं तो ये केस बेसिकली कैसे मतलब क्या इसमें डॉक्टर की का कोई काउंसिल बैठती है या कोई चेक होता है। उसके बाद फाइनली यह अप्रूवल आता है। यह हां जैसे अभी सुप्रीम कोर्ट ने दो बार इसमें मेडिकल बोर्ड सेटअप किए थे। पहला था गाजियाबाद के डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के चार चार डॉक्टर बैठे थे। उसमें उन्होंने अपनी नेगेटिव रिपोर्ट दी कि कोई सर्वाइवल का स्कोप नहीं है। उसके बाद सबसे पहले सर्वाइवल का स्कोप चेक किया जाता है। हां तभी तो अगर स्कोप ही नहीं होगा तो फिर आगे बढ़ेंगे कैसे? तो ये कोर्ट की तरफ से आया था ये। कोर्ट ने ही उसको कॉन्स्टिट्यूट करवाया था। कोर्ट ने करवाया। देन उसके बाद सेकंड बोर्ड बना। एम्स के डॉक्टर के एक्सपर्ट्स थे, न्यूरोलॉजिस्ट थे, साइकेटिस्ट थे।
उसमें थे और फिजिशियन भी थे, सर्जन भी थे। तो सात लोगों की एक्सपर्ट्स की टीम थी। उन्होंने भी सारी रिपोर्ट देख के जांच करके अपने यहां करके उसके बाद यह डिसाइड किया कि नहीं इसमें कोई संभावना नहीं है आगे इसके दर्द को कंटिन्यू करने की। यानी इस तरह का जब मामला था तो उसमें पहले डिस्ट्रिक्ट लेवल पर जो है एक टीम बनाई गई जिसने पूरा जांचा परखा हर चीज को। उसके बाद जो है बकायदा नेशनल लेवल पे एम्स के डॉक्टर्स ने भी बकायदा टीम बनाते हुए इसको पूरा जो है जांचा परखा। उसके बाद इस तरह का जो है उन्होंने जब जजमेंट दिया तब इस तरह से तब तब और नहीं खाली इतना ही नहीं उसके बाद जजेस ने सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस पारदीवाला साहब और ये विश्वनाथन जी ने दोनों ने उनके पेरेंट्स से मीटिंग करी। अच्छा इंडिविजुअली हां उनको कोर्ट में बुलाया मतलब मेडिसिन सेंटर में बुलाया एक स्पेशल डे पे उनसे बात करी उनके भाई से उसकी दीदी से मतलब सबसे परिवार वालों से अलग-अलग या फिर सब एक साथ सब एक साथ ही थे सब एक ही साथ थे और सबसे अलग-अलग राय जानी कि क्या है कैसे हुआ सारा कुछ उन्होंने जब लगा कि यह सच में ही सही मैटर है।
इसकी पीड़ा को ज्यादा प्रोलोंग नहीं करना चाहिए तब ये जजमेंट आया है। तो आप भी उस समय वहां मौजूद थे। मैं उस टाइम उस टाइम उस टाइम हम नहीं थे मौजूद और इस केस में एक अच्छी बात हुई जब ये डिस्कशन हो रहा था मीडिएशन में तो दोनों साइड से महिलाएं ही दोनों साइड से वकील थी हमारी टीम में भी महिलाएं थी और सरकार की टीम से भी महिलाएं थी अच्छा तो ये नारी शक्ति का एक बहुत अच्छा मैंने देखा कि सृजन की जिम्मेवारी उनकी है तो उन्हीं ने यह काम किया है और वही सबसे आगे रही इस केस में। हम ब्रह्मा कुमारी जी ने इससे यह भी पता चला कि यह डिसीजन जो है वो हरीश की माता जी का था। सबसे पहले उन्होंने ही जो है इसको आगे बढ़ाया।
इसके बाद जो है परिवार एक साथ जब डिस्कशन किया उसके बाद आप तक ये मामला आया। तो जब आप पहुंचे थे तो उनकी माता जी का क्या रिएक्शन था? आपसे माता जी कुछ कह रही थी। देखिए माता तो वैसे भी नॉर्मली माता भावुक होती है। अपने बच्चों को लेकर तो वैसे भी भावुक होती है। तो वो क्या ही कहती है। तो कहानी सारी कहने की बातें तो अशोक राणा जी ने करी है। बस उनका तो मैं देख रहा था वो कितना मतलब मतलब धैर्य से हमारी बातें सुन रही थी और बस उनकी आंखों में आंसू थे। यही दो चीजें और तो कुछ नहीं। बट हां अशोक जी ने मुझे असिस्ट करा। प्रॉपर मैनर में सारी चीजें जो भी डॉक्यूमेंटेशन था जो भी पुराने पेपर थे जो सारा कुछ अवेलेबल था वो सब उन्होंने अवेलेबल कराया। उसी के बिहाफ पे हम सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तक चले थे। धीरे-धीरे चलते चले गए।
तो 11 मार्च को जब ऑर्डर आया तो उस समय जो है मतलब आप लोगों के दिमाग में क्या था? नहीं हम लोग तो प्रे कर रहे थे कि कुछ अच्छा होना चाहिए और जब ये 10:30 बजे शुरू हुई कोर्ट और धीरे धीरे धीरे धीरे मैं देख रहा था कोर्ट में जज साहब की लास्ट मोमेंट पे लास्ट के 15 मिनट उनकी आंखें सजल रही। पूरी कोर्ट में पिनड्रॉप साइलेंस था। सब लोगों का रिएक्शन था कि कुछ ऐसा समथिंग डिफरेंट मैटर चल रहा है। वैसे जज वकील ज्यादा हरीड में होते हैं लेकिन उस टाइम सब लोग शांत बने हुए देख रहे थे कि अगर जज की भी आंखों में पानी है इसका मतलब कुछ समथिंग डिफरेंट है। तो पूरी कोर्ट सन्नाटा था और उसके बाद मतलब जजेस भी एमथी मतलब समानुभूति बहुत ज्यादा कर रहे थे और दोनों जजेस ने बहुत अच्छे से इसको केस को किया और मैं देख रहा था पूरे मतलब घूम चारों तरफ में दृष्टि घुमा के कि हां वकीलों में भी देखो हैं तो हम मनुष्य ही चाहे हम कितना भी कठोर काम करें या कितना भी सरल करें।
लेकिन जहां करुणा की बात आती है तो सबका मन पिघलता है और वो पिघल रहा था हां ये मामला भी ऐसा था कि इसमें मतलब एक तरह से सभी भावुक थे और सभी ये देख रहे थे कि इसमें भला होना चाहिए सामने। बस वही वही वही क्योंकि कैपिटल पनिशमेंट देना मृत्युदंड देना तो कोर्ट का काम है। वह ट्रायल करके दे देती है। उसमें कहां दिक्कत है? एक्सीडेंटल मामले होते हैं और भी बहुत सारे तरीके के मामले होते हैं। लेकिन जहां करुणा मैं वही कह रहा हूं कंपैशन होता है ना जहां पे वहां मृत्यु और जीवन के बीच में जब चुनना हो कि जी पानी रहे और मृत्यु आ नहीं रही। तो क्या करें? तब यह करुणा काम करती है और तभी यह कोर्ट ने जजमेंट दिया है कि ऐसे लोगों की पीड़ा को ज्यादा ना बढ़ाते हुए उनको मुक्ति के मुक्ति के मार्ग पे ले जाना चाहिए और यही इस मैटर में हुआ है। तो ऑर्डर आने के बाद जो है क्या कुछ हो रहा है इस वक्त? ऑर्डर आने के बाद तीन-चार दिन के बाद एम्स में शिफ्ट कर दिया गया है हरीश राणा को और वहां डॉक्टर्स की टीम है पांच छह डॉक्टर्स की एक्सपर्ट्स की जो उसको पैेटिव केयर में रखा हुआ है वहां देख रहे हैं और धीरे-धीरे उसकी जैसे-जैसे सिचुएशन बनती है उसकी ट्यूबें निकाल देंगे और उसको नॉर्मल स्टेज पे छोड़ देंगे जैसे मतलब कुछ फीडिंग नहीं देंगे अगर जरूरत पड़ी तो देखो मैं उनके उसमें एंबिट में नहीं घुसना चाहता क्योंकि डॉक्टर ही जानते हैं बट हां जितना मुझे जानकारी है बस इतना ही मुझे पता था वो मैंने बता दिया आपको तो किस तरह की अरेंजमेंट्स जो है वो वहां और हरीश राणा के आसपास जो है किया गया। क्या कैबिन परिवार को अलग से दिया गया है? नहीं वो तो नहीं पर हां उनको वहां पहुंचते हैं।
वो रोज ही पहुंच जाते हैं और वो उसका तो अपना पूरा पूरा रूम सेटअप किया गया है उसी हिसाब से क्योंकि इसी में तीन-चार दिन लग गए थे। पूरा जो प्रोसीजरल चीजें हैं करने में। अब वो वहीं है हरीश राणा और दुआ करते हैं कि अच्छे से वो नए रास्ते पे चले, नए जीवन की तरफ चले। हम क्योंकि ये ऐसी चीज है मैं क्या ही बताऊं इसमें जो डॉक्टर का काम है वो तो डॉक्टर ही करेंगे और एम्स जैसी बड़ी संस्था एम्स जैसी देश और देश में विख्यात संस्था देख रही है इस चीज को तो ये देश का नहीं पूरी दुनिया का मामला है क्योंकि पैसिव इथनेशिया कुल मिलाकर और एक्टिव जितना भी है ये सिर्फ सात आठ देशों में है पूरी दुनिया में और एक्टिव भी दो-तीन एक दिन है।
लेकिन पैसिव भी साथ में ही है तो ये दुनिया के लिए नजीर बनेगा खासकर तीसरी दुनिया जैसे अफ्रीकन कंट्रीज हो गई छोटी कंट्री हो गई वहां तो इसको साइट भी किया जाएगा कि ऐसे करके करके इस तरह जो पेटिव केयर पे हैं या जो लंबे समय से कोमा में है या टर्मिनली इल लोग हैं या वेजिटेटिव स्टेट में है इन लोगों को मुक्ति की तरफ ले जाया जाए कि जिससे उनकी पीड़ा कम हो और गरिमापूर्ण जीवन बने उनका। तो इस मामले के बाद जो है क्या लग रहा है कि मतलब बाहर से भी लोग आपसे कांटेक्ट कर रहे हैं किसी चीज को लेकर। एक नागपुर से एक महिला का मतलब उसके बेटा का फोन आया था।
उसने फोटो भी भेजे तो 16 साल से वो कोमा में है और लगभग उसको भी शायद पीईजी ट्यूब से ही खाना खिला रहे हैं वो तो वही उसने फोटो देखे वो तो मैं थोड़ा सा घबरा से गया था उसके फोटो को देख के तो हां भेजा तो है मतलब आपके पास केसेस ऐसे आ रहे हैं हां एक एक तो वो कह भी रहा था मैं मिलने आऊंगा नागपुर से तो देखते हैं क्या होगा अच्छा हमने ये भी सुना कि बायोपिक भी कोई बनाना चाहता है हरीश राणा पे हां फोन तो आए थे मुझे दो-तीन दिन तक पर मेरे तो ध्यान नहीं कि कौन था वो अभी आ जाएगा जाएगा ध्यान हम तो क्या बातचीत हुई थी क्या आपको कि वो चाहते हैं कि इस तरह के संवेदनशील मुद्दे पे हम एक बायोपिक बनाना चाहते हैं और आप हमें उनसे मिलवाइए परमिशन दिलवाइए मैंने कहा जी वो तो खुद ही देंगे जब आप चीजें ठीक होंगी तब देख लेना अभी तो मैं क्या ही कहूंगा इसके बारे में हम तो ऐसा कुछ बताया था मतलब लोग इंटरेस्टेड हैं और बायोपिक भी बनाना चाहते हैं हां वो जैसा उसकी फोन से मुझे लगता है तो होगा बनेगी तो सही क्योंकि इतना मतलब इतना संवेदनशील मुद्दा है। जीवन मरण से संबंधित मुद्दा है और लोग जानना भी चाहते हैं। तो वैसे भी बननी चाहिए।
आज नहीं तो कल बननी चाहिए और नहीं भी होता तो यह बनती ही और किसी मुद्दे पे बनती बनती तो थी। इस मामले में एक और जो मतलब एक मतलब लोग चर्चा कर रहे हैं ज्यादा। पिता के संघर्ष की भी चर्चा कर रहे हैं। पिता का जो कैरेक्टर इसमें बता रहे हैं काफी स्ट्रांग है। हां बहुत स्ट्रांग है। वो फाइव स्टार होटल में शेफ होते थे और वहां से रिटायर हो गए। अपना घर उन्होंने बेचा दिल्ली से गाजियाबाद में लिया क्योंकि वहां एंबुलेंस की सुविधा नहीं मिल पाती थी। तंग गलियां थी। वहां से दिल्ली से गाजियाबाद शिफ्ट किया। वहां सारा सेटअप जमाया। वहां अपने काम से मतलब वो सैंडविच बना के लोगों को खिलाते हैं। सैटरडे संडे वहां पे पार्क है ढेर सारे। वहां लोग आते हैं खेलने के लिए। दो-तीन दिन लगातार क्रिकेट खेलने के लिए आते हैं। तो वो खाते हैं लोग। सैंडविच तो उनको अवेलेबल कराते हैं तो वही उनकी दिनचर्या है और उसी से वो जो कमाते हैं और उसमें भी कोई डिग्निटी से वो समझौता नहीं करते। खिलाने में थोड़ा सा ज्यादा ही खिलाते हैं किसी को ये नहीं और पैसे भी जितने लेने हैं उससे कम भी ले लेते हैं। ऐसा भी कुछ नहीं है कि भाई मैं गरीब हूं या मेरे साथ ऐसी कुछ नहीं ऐसी कोई दिक्कत नहीं। पूरी डिग्निटी के साथ वो अपना काम करते हैं और कहीं भी नहीं लगता वो बेचारे हैं। तो उन्होंने मन को इतना मजबूत किया और उसके पीछे मेडिटेशन राजयोग का मेडिटेशन बहुत है जो वो राजयोग रूटीन में ब्रह्माकुमारी से जुड़े हैं और रोज सुबह शाम जाते हैं ।
वहां तो उससे उनका मन मजबूत हुआ क्योंकि वो सिखाते हैं कि आत्मा है शरीर है और दोनों का अलग-अलग वो है और संबंध है तो इस वजह से बहुत मजबूत हुए। मन से भी और तन से भी। मन से जब व्यक्ति मजबूत होता है तो हर चीज से मजबूत हो जाते हैं। तो आपको कैसा लगा उनसे मिलने के बाद? तो मैं तो कह ही रहा हूं ग्रेटट्यूड मतलब मुझे तो लगता है कि आप सबको मिलना चाहिए उनसे। जीवन में इतने संघर्ष के बाद भी अगर आपके मुंह से सिर्फ फूल बरसे आपको ग्रेटट्यूड की बातें आए तो इससे बढ़िया क्या ही हो सकता है। वरना तो हम थोड़ी सी बात में गालियां देने लग जाते हैं। चार बातें उल्टी-पुल्टी करने लग जाते हैं। लेकिन नहीं वो इतने के बावजूद भी आप कभी मतलब आपसे 2 महीने तीन महीने बाद आप कभी नॉर्मली मिलके आना। आप यह मैं जो बोल रहा हूं शायद उससे भी अच्छा कुछ बोलेंगे आप उनके लिए। मतलब जर्नलिस्ट उनके पास इससे पहले भी गए हैं। मतलब उनको खिला पिला के भेजते हैं और इतना मन तृप्त करके भेजते हैं उनका सामने वालों का कि वो आके ये नहीं कहते वो बेचारे से मिलके आए। वो कहते हैं कि ऐसे व्यक्ति से मिलके आए जो मन से भी रिच है और हर चीज से रिच है। तो मतलब बेचारे नहीं है वो। बेचारे तो वो हैं जो उनको ये कह रहे हैं कि वो बेचारों के साथ क्या तकलीफ हो रही है। नहीं बहुत मजबूत है।
तो अभी हाल फिलहाल में उनसे बात हुई एम्स में पहुंचने के बाद। हां बात हुई थी मेरी तो जब वो गए थे तो लेके गए थे और उसके बाद तो क्योंकि इतने फोन आते हैं ना उनको कि कितनी बात करें वो अच्छा मेरे से भी क्यों ही बात करें क्या ही बात करेंगे तो क्योंकि सारा दिन फोन टन टन टन टन उनके भेजते हैं कभी मेडिसिन वाले आ जाते हैं कि हमारी दवाई खिलवा लो कोई भूत देके आता है कोई जड़ी बूटी ले आता है कोई पता नहीं मेरे को भी इतने सारे फोन आते हैं उनको भी आते हैं क्योंकि हम टीम में थे तो इतने लोग उनको संपर्क करना चाहते हैं भाई 13 साल से था तब भी तो कर सकते थे लेकिन अभी हाईलाइटेड हो गया मैटर सबकी की जानकारी में हो गया है तो सब चाहते हैं कि हम भी मिले हम भी बात करें उनसे और अपनी तरफ से जो योगदान दे सकते हैं वो देना चाहिए तो आखिरी बार जो फोन में अभी हाल फिलहाल में बात हुई थी क्या किस बारे में हुई थी बस यही कि हॉस्पिटल पहुंचे कि नहीं पहुंचे तो बस हॉस्पिटल पहुंचे थे और डॉक्टर ने अपने ऑब्जरवेशन में उनसे ले लिया था यही दो-ती दिन पहले की बात है तो उसके बाद तो ये जो मीडिया में आ रहा है वो सब वैसा ही बेकार है।
इसका कोई मतलब नहीं है। ये कोई डॉक्टर नहीं बता रहा है। कोई घर वाला नहीं बता रहा है। ऐसा कुछ नहीं है। वो तो मीडिया अपने हिसाब से या सोशल मीडिया जो जो उनको ठीक लग रहा है वह कर रहे हैं। बाकी जो सही है वो ईश्वर जाने और डॉक्टर जाने। बाकी हम सबको तो गेस ही करते हैं और वो गेस उल्टापुल्टा करे जा रहे हैं लोग। तो ये मैं कई बार समझता हूं कि जब उनके घर वाले पढ़ते होंगे। कई बार जब मैंने कई दिन पहले पढ़ा कि हरीश ने तो की तो डेथ हो गई। तो मैंने तुरंत उनको फोन लगाया भाई ये कैसे तो उन्होंने कहा नहीं नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है ये तो बस मीडिया वाले चला रहे हैं तो है मीडिया वाले थोड़ा टीआरपी के चक्कर में लगे रहते हैं।
वही कर रहे हैं तो मतलब कुछ गलत भी लोग जो है इनफेशन दे रहे हैं इनफैक्ट ज्यादा हो रहा है ये तो इनफैक्ट ज्यादा हो रहा है जब सूचना ही नहीं है तो फिर आप कैसे कहां से निकल के आ रहे हो वहां एंट्री तो है नहीं आम आदमी की ना खास आदमी की जिसजिस ब्लॉक में उसको रखा गया है हरीश राणा को तो ये कैसे तो कोई लोग कह रहे हैं कि विदाई एक दो वीडियो मैंने देखी विदाई कि इतने लोग इकट्ठे हो रखे हैं भाई कैसे इतने लोग कहां पहुंच गए एम्स में तो वैसे ही नहीं जाने देते इतने लोगों को वहां कहां से आ गए तो हालांकि वो वीडियो जो है उसमें देखा जाए तो गुजराती में कुछ लिखा हुआ है हां हां वो कुछ भी चल रहा है कुछ भी चल रहा है बट मैं रिक्वेस्ट करूंगा कि सोशल मीडिया वाले ऐसा ना करें क्योंकि बहुत पीड़ा होती है खासकर घर वालों को भी और जो उस बात से परिचित हैं क्लोजली उन सबको लगता है कि ये क्या हो रहा है।
