सबको माफ करते हुए उन सब से माफी मांगते हुए जाओ। ठीक है। सबको माफ़ करते हुए उन सब से माफी मांगते हुए जाओ। ठीक है। तो आपने देखा किस तरह से हरीश का ये वीडियो सामने आया है। काफी भावुक वीडियो है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इस वीडियो से ऐसा लग रहा है जैसे वो भीख मांग रहा हो।
जिंदगी की भीख मांग रहा हो। कुछ कहना चाह रहा हो लेकिन शायद कह नहीं पा रहा हो। क्योंकि जो उसकी हालत है पिछले 13 सालों से वो कोमा में है और ब्रह्मकुमारी वहां पर पहुंचती है माथे पर तिलक लगाती है और उसके बाद ये कहती है कि सभी को माफ करना और माफी मांगना और जाओ। आप सोचिए उसकी आंखें बहुत कुछ बयां कर रही थी।
वीडियो बहुत कुछ बयां करता है। बॉडी लैंग्वेज एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसा लगता है जैसे वो दया की भीख मांग रहा हो। वो जीना चाहता हो। कोई चाहता हो कि मुझे बचा लो। लेकिन आप सोचिए कि देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने जो इच्छा की जो याचिका है उसको स्वीकार किया है और ये याचिका लगाई थी उसके मां-बाप ने और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट का यह अहम फैसला आया जिसके बाद यह कहा जा सकता है कि एम्स में शिफ्ट कर दिया गया है हरीश को और अब उसका इलाज उसको देना बंद कर दिया है। यानी धीरे-धीरे अब तमाम चीजें हटा ली जाएंगी।
जैसे मैंने आपको एक वीडियो में बताया था किस तरह से यह पूरा प्रोसेस होता है जिसमें जो वेंटिलेटर है उससे हटाया जाता है। इसके अलावा फूड पाइप जो है वह हटाया जाता है। उसके बाद धीरे-धीरे जब पेन होना शुरू होता है बॉडी में तो दवा दी जाती है ताकि पेन ना हो। यानी दी जाएगी लेकिन कम से कम दर्द हो ऐसा सुनिश्चित किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि डिग्निटी के साथ दी जाए। ऐसे ना हो कि वो तड़प-तड़प के मरे। लेकिन आप यह वीडियो देखिए। मुझे तो यह वीडियो देखकर ही ऐसा लग रहा है कि शायद वो तड़प रहा है और वो कुछ कहने की कोशिश कर रहा है।
यह वीडियो बहुत कुछ बयां कर रहा है। हालांकि परिवार ने खुद चाहा कि इस तरह से जीने का कोई मतलब नहीं है। वो डेली मर रहे हैं। खुद सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा कि ये चिंता जो है वो चिता के समान है। और ठीक ऐसा ही लग रहा है कि परिवार पर दुखों का पहाड़ टूटा है। जाते-जाते इस वीडियो के साथ छोड़ता जा रहा हूं और आपको वह प्रोसेस भी बताता हूं जो इसके साथ अडॉप किया गया।
यानी किस तरह से की जाएगी। अब किसी भी वक्त हरीश की मौत हो सकती है। ये कहा जाए तो कुछ गलत नहीं होगा क्योंकि धीरे-धीरे जो वेंटिलेटर है वो हटे हट गया है। इसके अलावा फूड पाइप हटेगी। इसके अलावा जब बॉडी में रिएक्शनंस शुरू होंगे उस चीज के क्योंकि अभी तक वो सारा जो उसका सपोर्ट था जो ऑर्गन्स थे के थ्रू चल रहे थे। खाना उसको फूड पाइप के थ्रू दिया जा रहा था। मास्क लगे हुए थे। तो यह तमाम चीजें जब धीरे-धीरे हटाई जाएंगी तो साफ है कि हरीश की हो जाएगी। लेकिन ये कब होगी? कितने समय में होगी यह अभी नहीं कहा जा सकता।
लेकिन यह काउंटडाउन शुरू हो चुका है। हरीश 13 सालों से डेथ बेड पर था और कल सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला है। जिसमें हमने देखा किस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने उनके पिता की याचिका को मंजूर कर लिया। जिसमें उनके पिता ने दरख्वास्त की थी कोर्ट से कि इस मामले में इच्छा मृत्यु की जो उनकी याचिका है उसको मंजूर किया जाए और इसको कोर्ट ने मान लिया। बहुत बड़ा फैसला है।
यह पहली बार ऐसा हुआ है जब सुप्रीम कोर्ट ने इस तरह की बात मानी है। लेकिन क्या दोस्तों आपको पता है कि इसका मतलब क्या है? किस तरह से अब हरीश को दी जाएगी? इसका तरीका क्या है? इसके बारे में आपको बताता हूं।
दरअसल कोई घातक नहीं दिया जाएगा। इस तरह की बात है और ना ही कोई ऐसी मेडिसिन दी जाएगी जिससे हरीश की जान ली जाए। इसका एक प्रोसेस है वो आपको बताता हूं। हम सबको पता है कि ऑल इंडिया इंस्टट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज ने एम्स के जो पेिलिएटिव केयर सेंटर है वहां पर उसको भर्ती कराया जाएगा। वहां की एक रिपोर्ट भी आई थी जिसमें उसको कहा था कहा गया था कि वो ठीक नहीं हो सकता।
ऐसे में डॉक्टरों का जो पैन पैनल है वो पूरा बाकायदा मूल्यांकन करेगा। क्या स्थिति है पूरे अह मरीज की और उसके बाद यह पुष्ट करेगा कि उसके ठीक होने की संभावना है या नहीं। आप सोचिए परिवार के लिए कितना दुखद बात है कि इतना लगातार वो इतने सालों से गम झेल रहा है। अब इसी वजह से सुप्रीम कोर्ट ने भी शायद ये सोचा कि एक बार गम देना ज्यादा सही है। बार-बार इतने लंबे समय तक गम देना ठीक नहीं है।
हम सबको पता है कि मरीज को जीवित रखने के लिए कई मेडिकल सपोर्ट्स लगाए जाते हैं। जिसमें वेंटिलेटर होता है, ऑक्सीजन सपोर्ट होता है। फीडिंग ट्यूब होती है। ये ऐसी तमाम चीजें होती है। लेकिन अब धीरे-धीरे वेंटिलेटर जिससे शरीर के ऑर्गन्स चल रहे हैं उसको हटाया जाएगा। इसके अलावा फीडिंग ट्यूब को हटाई जाएगी।
ऑक्सीजन सपोर्ट है उसको हटाया जाएगा और उसके बाद यानी इलाज को वापस ले लेना इसको कहा जाता है। इसको एक प्रॉपर टर्म जो कहा गया वो है इलाज को वापस ले लेना। इसमें इसके बाद शरीर को उसके हाल पर छोड़ दिया जाएगा। ऑब्वियस्ली ऐसे में शरीर में कुछ दर्द या उसके जो साइड इफेक्ट शुरू होंगे तो उनके लिए मेडिसिंस दी जाएगी बकायदा उन दर्द को कम करने के यानी अंतिम समय में कम से कम पीड़ा हो इसका ध्यान रखा जाएगा और इस तरह से मौत जो है वो आ जाएगी। अब यह देखना होगा कि वो कितने दिनों में मौत आती है। कई बार ऐसा होता है कि कुछ घंटे लगते हैं, कुछ दिन लगते हैं।
कई बार होता है कि काफी वक्त लगता है और जब तक डॉक्टर्स मेडिकली किसी को डेथ डिक्लेअर नहीं कर देते तब तक एक तरह से कहा जाए कि पूरे प्रोसेस को अडॉप किया जाएगा और तब तक प्रोसेस खत्म नहीं होगा। ये दरअसल इसलिए मैंने आपको बताया क्योंकि ये एक बहुत बड़ा मामला है हरीश राणा का यानी गाजियाबाद का जिस जो 13 साल पहले फोर्थ फ्लोर से गिर जाता है और उसके बाद उसको वो कोमा में चला जाता है।
उसकी हालत को ठीक करने के लिए उसके पेरेंट्स ने उसके माता-पिता ने खूब खर्चा किया। सरकारी अस्पतालों में भी गए। उनको एड भी मिली। लेकिन फाइनली वो ठीक नहीं हो पाया। और अब स्थिति यह है कि उसको बेड सोल्स हो गए क्योंकि वो बेड पर रहता है। इसके अलावा उसको बहुत ही मां-बाप का बेहद दर्द है। किस तरह से उसको फीड किया जाता है।
आप सोचिए फूड पाइप लगा हुआ है। ऑक्सीजन के लिए बकायदा अलग यंत्र लगा। यानी कि एक तरह से कृत्रिम तरीके से वो जी रहा था। इसी वजह से पेरेंट्स बहुत परेशान थे और उनका ये कहना था कि इस मामले में न्याय मिलना चाहिए। इस मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि प्लीज इसको मुक्ति दे दो। और कई बार दलील हुई, कई बार इस पर साइटेशंस लगाई गई और आखिरकार कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसमें कोर्ट ने कहा कि ठीक है हम आपकी बात मानते हैं कि चिंता जो है साथ में ये भी देखा कि चिता जो है वो एक बार जलती है। आप सोचिए लेकिन चिंता इंसान को रोजाना जला रही है। तो ये ठीक वैसा ही मामला लगा जिसमें चिंता ने रोजाना जलाया। अब आप सोचिए इस तरह का उपचार दरअसल हम भारत में अगर बात करें तो दो तरह से पैसिव एनाथूसिया और एक्टिव एनार्सिया यह कहा जाता है।
इस तरह से यानी इलाज हटाना जो हमारे यहां प्रचलन में है जिसको जो हम कानूनन हम कर सकते हैं और एक है घातक इंजेक्शन देकर मृत्यु करना या फिर कोई ऐसी मेडिसिंस दे देना जिससे डेथ हो जाए इसको भारत में अवैध बताया गया हालांकि कई ऐसे देश हैं जहां पर ये वैध भी है। अब सवाल ये उठता है कि जब ये सारी चीजें हो जाएंगी तो ये किस दिन ये प्रक्रिया शुरू होगी? कब डेथ होगी? कब डिक्लेअर होगा? और क्योंकि चार हफ्तों के अंदर रिपोर्ट देनी है सुप्रीम कोर्ट को? तो यह माना जा सकता है कि एम्स के जो मैंने आपको बताया शुरुआत में जो सेंटर है यानी पेिएटिव सेंटर जो है वहां पर रखा जाएगा पेशेंट को और वहां पर इस तरह से इलाज हटाने की प्रक्रिया इलाज घटाने की प्रक्रिया शुरू होगी क्योंकि हमने देखा वो घर पर था काफी वक्त तक हरीश और वो बहुत परेशानी में उसका परिवार है और इसी वजह से उसने दरख्वास्त लगाई थी। जाते-जाते आपको ये बताना चाहूंगा क्या कहना है उनके पिता का और क्या कहना है वकील का? हमारी जो मैडम थी उनके मन में संकल्प उठा आज से चार साल पहले कि आप प्रधानमंत्री को कहो या राष्ट्रपति को कहो मैंने कहा भाई ऐसे हो नहीं सकता है परंतु चलो जैसे भी हमने फिर अपने जो भी है हमारी मैं एक संस्था से जुड़ा हुआ ब्रह्मा कुमारी से दीदी को बताया दीदी ने एक वकील को भेजा मनीष जैन उनका नाम है तो हाई कोर्ट तक गए परंतु वो गलत चलो जो भी था अच्छा हुआ उसके बाद हम सुप्रीम कोर्ट में किया सुप्रीम कोर्ट से भी हम सरकारी न्यायाधीशों का सर्वोच्च अदालत के जो भी न्यायाधीश रहे उनका हम कोटि-कोटि धन्यवाद करते हैं।
उन्होंने स्टेट गवर्नमेंट को अच्छे आर्डर दिए परंतु आदेश तो पारित सर्वोच्च न्यायालय से हो जाते हैं। परंतु जब व्यावहारिक रूप में आते हैं तो उन आदेशों का पालन ठीक ढंग से नहीं किया जाता है। चलो जो भी है हम धन्यवाद करते हैं उन अभिवक्ताओं का भी उन मुख्य चिकित्सकों का भी चिकित्सकों का भी उप चिकित्सकों का भी सहयोग मिला हमें परंतु हम सेटिस्फाइड हम दोनों बूढ़े हो रहे 62 63 साल मेरी उम्र हो रही है 60 के लगभग उसकी हो रही है न्यायाधीश ने तो बोर्ड बिठाए यहां के सीएमओ आए गाजियाबाद के आए नोडा के आए मेठ के आए परंतु हमने बोले नहीं जी एम्स का बोर्ड बैठाओ उन्होंने हमारे लिए एम्स का भी बोर्ड एम्स की रिपोर्ट एम्स में लड़के को ले जाया गया। उन्होंने चेक किया। उसके बाद उन्होंने ब्रेन डेड उसका डिक्लेअ किया। उसके बाद हमें 13 फरवरी को जनवरी को न्यायाधीश ने अपने सामने हमें बुलाया तो हम गोपनीय मीटिंग हुई हमारी। बहुत अच्छे न्यायाधीश हैं। मैं कहता हूं ये मुख्य न्यायाधीश बने अभी। बन जाएंगे और जिस हिसाब से क्योंकि यह मेरा अपने लड़के का मामला नहीं है। ऐसे इस भारत देश में पता नहीं कितने लड़के पड़े रहते हैं। तो हम चाहते हैं कि सबका भला हो, कल्याण हो। तो इस जनहित के हेतुया ऐसा होना चाहिए जज साहब को। उन्होंने उसके बाद 15 को जजमेंट होनी थी।
उसके बाद ये रूल जो इंडिया में आज लागू हुआ। ये सात देशों में भी लागू है जो आज ये लागू है परंतु कितने लोगों का इसके द्वारा भला होगा मैं एक पिता होने के नाते आप भी बच्चों के पिता होंगे कितना दुख होता होगा तो दुख तो हर माता पिता इसकी कोई पूर्ति नहीं कर पाएगा लेकिन अपने के लिए भी अब जो ये काम किया है अब देखो बेटा छोटा आएगा जो सेवा करता है सुबह 5:00 बजे 4:30 बजे उठता है वो उसकी फिजियोथरेपी करते हैं हम अपने आप करते हैं हालांकि कि चीफ ऑफ जस्टिस चंद्रचूर ने तो हमें फिजियोथरेपी भी अलाउड किया था। नर्स भी अलाउड की थी।
परंतु यहां मैंने बोला ना अभी व्याहारिक तरीके में से 15 दिन फैजियोथरेपी आया। नर्स तो चलो हमने मना किया कहां इतना छोटा मकान है। बड़ा मकान तो है नहीं। तो हमें सुविधाएं दी। इसके लिए हम कोटि-कोटि धन्यवाद करते हैं। सर्वप्रथम तो हम परमात्मा का धन्यवाद करते हैं जिन्होंने दिशा निर्देश जज साहब को जो न्यायाधीश थे अच्छे बैठे थे। वो भी परमात्मा की कृपा होगी और उनके मुखारविंद से आज यह जो जजमेंट हम चाह रहे थे हमारी इच्छा अनुसार होगी। मैं आप सब लोगों से वैसे मिलना नहीं चाहता था। लेकिन यह भी प्रभु की कृपा आप लोगों को देखना होगा। अगर किसी को प्यास लगी है तो मैं पानी लाया हूं।
ये भी मंशा थी आपकी कि आप हरीश के धन्यवाद परंतु एक बार बात याद रखना जो यूरोथेिया जो भी पत्रकार यूज कर रहे हैं। मैं आपको अपशब्दों से बोल रहा हूं कि आपको अगर पता नहीं है तो पूछ लो। का मतलब होता है इंजेक्शन देके किसी को मारना जैसे किसी को कुत्ते ने काट लिया और पागल हो गया फिर उसको इंजेक्शन लगा देते हैं। इसकी सिर्फ फूड पाइप जैसे आम जब महात्मा गांधी ने अनशन लिया था तो 21 दिन वो भूखे रहे थे। परंतु इसकी फूड पाइप हम हटाएंगे और फूड पाइप के बाद अनुभवी चिकित्सक चिकित्सकों की देखरेख में इसको एम्स में रखा जाएगा और धीरे-धीरे पानी देते रहेंगे और इसकी फिर जो भी पार्थिविक शरीर होगा हम इसको बड़े सम्मान और गौरव से लाएंगे। हमें खुशी भी है। खुशी इस बात की है कि चलो इस भारत देश में हर स्टेट में पता नहीं कितने ऐसे लोग हैं उनका भला होगा। दुख इस बात है कि सिविल इंजीनियरिंग कर रहा था और टॉपर था चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी का दो कंपटीशन जीत चुका था और तीसरा इसने पंजाब यूनिवर्सिटी में जितना था 20 अगस्त 2013 की घटना मंगलवार था राखी थी इसने मैसेज भी भेजे तो हमें फोन आया कि यह गिरा है हम जब रात को 3:00 बजे पीजीआई ट्रामा सेंटर पहुंचे तो इसके सिर में चोटें थी यहां उंगलियों के निशान थे पैर के तलवे नीले थे परंतु जैसे तैसे यूनिवर्सिटी किसी सीबीआई वाले ने बताया कि प्रकाश सिंह बादल थी या प्रकाश सिंह बादल की उसमें सरकार थी। चलो जो भी हुआ होना होगा वो वो ऐसे ही शायद हमारे कर्मों में लिखा था सेवा लिखी थी।
हम सेवा कर रहे हैं और आज भी मैंने मैसेज ये भेजा था अपनी कि परमात्मा की कृपा से हम सेवा कर रहे हैं और करेंगे और करते रहेंगे। क्योंकि हमारा तो बच्चा है। हम गलत हालांकि हमारी एएसजी साहब यहां आई तीन बार दो तीन बार उनकी मीटिंग हुई हमारी ऑनलाइन घर पर नहीं तो फोन आता। उन्होंने अपने आप देखा।
मैं आपने आपकी अंतरात्मा जो आपको इजाजत दे वो आप स्टेटमेंट कोर्ट में दे सकते हैं। ठीक है। देखिए आज हरीश राणा के केस में लव, मेडिसिन और मर्सी के बीच में एक जो डलेमा था उसको क्लियर कर दिया और लाइफ टू राइट टू लाइफ के साथ-साथ राइट टू डाई का भी एक फ्लोरिश कर दिया है एक कांसेप्ट पूरे देश के लिए और हरीश राणा के माता-पिता ने 13 साल उसकी सेवा की लेकिन कोई रिकवरी नहीं फर्स्ट सेकंड बोर्ड के बाद भी तो लगभग 8284 दिन के बाद जजमेंट आया है रिजर्व हो गया था और उसमें मेडिकल बोर्ड को मतलब एम्स को कहा गया है सुप्रीम कोर्ट के थ्रू कि आप इसको बच्चे को लेके जाइए और उसके जितने भी इक्विपमेंट्स उसके शरीर में लगे वो सब निकाल दीजिए और उसके बाद जब तक वो जी सकता है जिएगा प्राकृतिक प्राकृतिक अवस्था में उसको छोड़ दिया गया है और एक बहुत अच्छी नजीर पूरे देश के लिए बनाई गई है कि पूरे देश में जितने भी गवर्नमेंट हॉस्पिटल हैं उन सबके सीएमओ को गाइडलाइन जारी कर दी गई है कि आप ऐसे पैेटिव केयर के जो पेशेंट्स हैं उनका ध्यान रखेंगे। उनके केयर अगर नहीं हो पाती है, ढंग से वह रिकवर नहीं हो पाता है, तो उसके लिए मेडिकल बोर्ड कंस्टीट्यूट करेंगे और उसकी रिपोर्ट समय-समय पर मंत्रालय को देते रहेंगे और आज के केस में भी अगले 30 दिन का टाइम दिया गया है।
पूरे देश में क्या इसके ऊपर काम हुआ है और क्या काम होना बाकी है वह सारा बताया जाएगा और साथ ही यूनियन ऑफ इंडिया को भी यह गाइड रिक्वेस्ट की गई है कि इस मुद्दे पे कोई कानून बनाया जाए जिससे माता-पिता को ऐसे पेशेंट को कुछ रिलीफ मिल सके। कास्टेबल केस ये पहली बार हां ये मतलब ये इस हां पहली बार इंप्लीमेंट हुआ अरुणाशान बाग में इसके बारे में डिस्कशन हुआ था लेकिन 2018 का कॉमन कॉज में बहुत सारी गाइडलाइन बनाई गई थी तो एक तरह से ये आज पहली बार इंप्लीमेंटेशन होगा कॉमन कॉज की गाइडलाइंस का 2018 की और जज साहब ने शुरू किया था शेक्सपियर और हेनरी साहब से कि डू एंड डाई का जो डलेमा होता है क्या करें और क्या ना करें लेकिन आज कोर्ट ने संविधान को सारे चीजों को देखते हुए हरीश राणा को मुक्ति का एक मार्ग दिखा दिया है। पहले भी दो जजमेंट आए। आज उनका जो जजमेंट है किस तरह से अलग है और क्या क्लेरिटी कोर्ट में? जजमेंट अलग नहीं है। यह साइमलटेनियसली स्टेप बाय स्टेप हुआ है। पहले अरुणा शान बाग में डिस्कस हुआ था। उसके बाद कॉमन कॉज में और अच्छे से डिस्कस हुआ था और आज और भी ज्यादा स्टेप बाय स्टेप डिस्कस हो गया है। और ऐसे पेशेंट जिनकी रिकवरी का कोई स्कोप ना हो उनको इतने लंबे टाइम तक नहीं रखा जाना चाहिए। उसके ऊपर मेडिकल बोर्ड बनना चाहिए। उसकी रिपोर्ट आनी चाहिए और अकॉर्डिंगली उस पे मेडिकल बोर्ड को डॉक्टर्स को अपनी ओपिनियन देके उसके साथ न्याय करना चाहिए। सर हरीश राणा की बता दीजिए कि क्या स्थिति थी? कैसे थे? कब से हुआ?
मामला क्या था पूरा? नॉर्मली 21 साल की ऐज में वो बीटेक पढ़ने के लिए पंजाब यूनिवर्सिटी गया था। चंडीगढ़ में था। वहां से फोर्थ फ्लोर पे फर्स्ट ईयर में ही फोर्थ फ्लोर पे से वो गिर गया। गिरा दिया गया। उसके गर्दन में बहुत सीवियर चोट लगी। मतलब पूरा हेड इंजर हो गया। और तब से ही वो 100% पेटिव केयर पे चला गया। मतलब कोई रिकवरी के चांस नहीं थे और 20 अगस्त 2013 की यह बात है और आज हम 2000 26 में खड़े हैं। 13 साल की लगातार मेहनत से सारी तरह की जितनी भी एडवांस चीजें अवेलेबल है मेडिकल साइंस की सारी यूज़ की गई लेकिन कोई भी रिलीफ नहीं मिला। तब हम सुप्रीम कोर्ट आए। इससे पहले हम हाई कोर्ट गए थे। हाई कोर्ट ने रिजेक्ट किया और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट आए। उसके बाद भी सुप्रीम कोर्ट से भी एक रिलीफ मिली थी। अब थर्ड स्टेप में हम एमए में आए थे मिसलेनियस एप्लीकेशन लेकर और जिसे अलऊ कर दिया गया। तो दिक्कतें आ रही थी परिवार को उनके मां-बाप की क्या स्थिति थी? उनको क्या दिक्कतें आ रही? देखिए सबसे ज्यादा होती है अपने बच्चों के लिए मां-बाप को कि उसकी केयर हो जाए। मेडिकलली वो नहीं सेटल हो पा रहा था। ना ही रिकवरी हो रही थी।
13 साल से सिर्फ सेवा सेवा सेवा और कुछ भी नहीं। कोई सिंगल रिएक्शन नहीं। कोई सिंगल रिएक्शन नहीं। और एक माता-पिता के सामने उसका बच्चा जिंदा लाश बन के रहे। उससे बड़ी विपदा कुछ नहीं हो सकती एक मां-बाप के लिए। तो ने परिवार वालों की बड़ी हां परिवार वालों की बहुत धैर्य की तारीफ करी इतनी ज्यादा करी और बनता भी है इतना सेवा आज के टाइम में इतनी सेवा करना ये अपने आप में बहुत आउटस्टैंडिंग बात है तो वो करी है तो कोर्ट ने भी उसे अप्रिशिएट किया और पूरा देश अप्रिशिएट कर रहा है थैंक यू थोड़ा सा पैसिव यूथनेशिया यानी इच्छा मृत्यु इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले में 2018 में दिए गए अरुणा शारण बाग के फैसले को आधार बनाते हुए अपना निर्णय इसे और आगे बढ़ाया है। हमारे साथ हरीश राणा के वकील मनीष जैन हैं। मनीष जी कितना अहम है यह फैसला और कितना भविष्य उन्मुखी है। बहुत ज्यादा भविष्य उन्मुखी है इसलिए क्य कि पूरे देश के सीएमओस को सारे डिस्ट्रिक्ट हॉस्पिटल्स को डायरेक्शन दे दी गई है कि इस तरह का कोई भी मैटर आता है का नहीं मतलब केयर से रिलेटेड जहां पे पेशेंट किसी भी तरह से रिकवरी ना कर पाता है तो कर पाए तो उसके लिए प्राइमरी और सेकेंडरी मेडिकल बोर्ड बनाया जाए और इसकी समय-समय पर रिपोर्ट अपने मंत्रालय को करते रहे और साथ में सेंट्रल गवर्नमेंट को भी रिक्वेस्ट की गई है कि इस तरह के मैटर पे कोई एक फर्म लेजिसलेशन बनाए जिससे पूरे देश में एक फॉर्मेलिटी आ जाए और इस मामले में तो बहुत-बहुत अच्छा जजमेंट हो गया है और जस्टिस पारदीवाला और विश्वनाथन साहब बहुत ही संवेदनशीलता के साथ बहुत सेंसिटिविटी के साथ इस मैटर को डील कर रहे थे। इसमें 2018 में जो अरुणा शान बाग का के मामले में मैटर वो निर्णय आया था कोर्ट का उसमें कोर्ट का इन्वॉल्वमेंट था। लेकिन इस बार कोर्ट ने कहा है कि जो दो मेडिकल बोर्ड होंगे वही तय करेंगे।
यानी कोर्ट का कोई इन्वॉल्वमेंट। देखिए अरुणा शानबाग का मैटर बहुत पुराना है। 2018 में कॉमन कॉज की जो पीआईएल थी उस पे डिस्कशन हुआ था और अब फाइनली एक फ्रेश केस के साथ ये डिस्कशन हुआ और उसमें सारी चीजें अभी वापस से डिस्कस हुई है। क्या एक्टिव है क्या पैसिव है क्योंकि डिटेल ऑर्डर प्रोनाउंस वो बाद में मिलेगा।
अभी तो जो उसका ऑपरेटिव पार्ट है वो हमारे साथ डिस्कस किया गया कोर्ट में। तो बस इतना ही सबको पता है। थोड़ी देर में घंटे दो घंटे में हमारे पास पूरी डिटेल आ जाएगी। क्या क्या डिस्कशन हुआ है एक्चुअली? तो इसमें एक चीज़ और कि एक्टिव यूथेनेशिया और पैसिव यूथेनेशिया तो हमारे दर्शकों के लिए आप बता दें कि दोनों में फर्क क्या है? एक्टिव में मतलब आप किसी को जैसे पोइजन का इंजेक्शन लगा देते हो और पैसिव में मतलब आप उसको ऐसी सिचुएशन में ले आते हो जो वो नेचुरल होती है। बस इतना सा ही फर्क है और कुछ ज्यादा। 21 साल का एक युवा अब 33 साल का हो गया है। लेकिन 21 साल 12 साल से ज्यादा पहले जो घटना हुई थी जिसमें पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी में वो बीटेक करते हुए छत से गिर गया था। तब से अब तक की स्थिति क्या रही? माता-पिता किन स्थितियों से गुजरे? आप तो वकील हैं। वो वकील भी हूं। मैं उनके घर भी गया हूं। मैं बच्चे से मिलकर भी आया था। सारी चीजें मैंने देखी हैं। और जब मैं पहली बार देख के आया था तो जैसे करुणा किसी के भी मन में जाग जाती है। ऐसी सिचुएशन मैंने देखा है वो। और एक उसमें मैंने बहुत अच्छी जो चीज नोट करी कि वो ना एक मेडिटेशन से ब्रह्मकुमारी से जुड़े हुए हैं। तो वहां हर चीज में ग्रेटट्यूड देखते थे। हर बात में कोर्ट आए, मीडिया से मिले, मुझसे मिले, तो कुछ भी हुआ सब में ग्रेटट्यूड और उसी ग्रेटट्यूड का परिणाम है कि आज यह बहुत अच्छा जजमेंट आ गया है। ऐसी स्थिति आ गई कि माता-पिता को खुद ही कहना पड़ा कि वो देखिए खुद ही 52 साल के थे और सेवा करते-करते बूढ़े हो गए। उनकी शक्लों से लगने लग गया कि बूढ़े हो गए। तो बूढ़े मां-बाप को डर हो जाता है कि हमारे बाद कौन देखेगा।
इसलिए अपने ही सामने उन्होंने ये कोशिश करी है। कोर्ट ने इस पूरे मामले को एक मतलब कहें तो कानूनी से ज्यादा इमोशनल साहित्यिक टच भी दिया और यह बताया कि क्यों यह जजमेंट इतना महत्वपूर्ण है। तो होमर से शुरू किया, हेनरी से शुरू किया और फिर शेक्सपियर पे आए। फिर जस्टिस विश्वनाथन ने इसमें संस्कृत का एक श्लोक बताया कि चिंता जीवित को जलाती है। चिता मरे को जलाती है। तो क्योंकि जीवन बहुत पोएटिक है। जीवन ये कानून से बहुत ऊपर है। जीवन मेडिकल से बहुत ऊपर है। जीवन तो बस जीवन है और जीवन को किसी भी परिभाषा में आप सेट नहीं कर पाओगे। लेकिन हां उसके लिए बातें कर सकते हो। वही ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट ने भी करी है।
आपका बहुत-बहुत शुक्रिया। यानी सुप्रीम कोर्ट ने जब इस मामले में फैसला सुनाया तो जस्टिस पारदीवाला ने अपने निर्णय की शुरुआत निर्णय सुनाने की शुरुआत हेनरी से की जिसमें उन्होंने कहा कि वो वो दार्शनिक जिन्होंने कहा कि जीवन ईश्वर देता है तो हमें उसे स्वीकार करना चाहिए और साथ ही फिर शेक्सपियर को उित किया उन्होंने कहा कि टू बी और नॉट टू बी कि जीवन जिया जाए क्या किया जाए यानी जो एक जीवन की उहापोह है उसके बारे में बताया और जब जस्टिस विश्वनाथन ने अपना निर्णय सुनाया तो उन्होंने यह कहा कि चिंता और चिता में एक बिंदु मात्र का फर्क है। लेकिन चिता निर्जीव को जलाती है और चिंता जले को जला जीवन को जलाती है यानी जीवित व्यक्ति को जलाती है।
तो यह निर्णय अपने आप में यह बताता है कि जब जीने की आस बिल्कुल खत्म हो जाए तो जीवन जीने का अधिकार जो संविधान देता है गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार तो वही संविधान जिसकी व्याख्या सुप्रीम कोर्ट ने की और एक बार फिर यह कहा कि यह संविधान गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार देता है तो गरिमा से जीवन की मृत्यु का अधिकार भी देता है। यानि भी हो तो गरिमा के
