अमेरिका को अपने पर भरोसा और ईरान को अपने सिस्टम पर भरोसा। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को अपने सलाहकारों पर भरोसा। लेकिन ईरान को अपने सिस्टम पर ही भरोसा। यह सिस्टम चीज क्या है? बीते 48 घंटों में या कहें दो दिनों में जिस तरीके की घेराबंदी ईरान ने शुरू की अमेरिका या फिर कहें वाइट हाउस के भीतर वाकई खलबली मची हुई है।
यह खलबली इसलिए नहीं मची है कि अमेरिका के पास हथियार वाकई कम पड़ गए। यह खलबली इसलिए भी नहीं है कि अमेरिका सोच रहा है कि उसके पास जो कुछ है उसने झोंक दिया। बावजूद इसके ईरान खड़ा कैसे है?
दरअसल यह खलबली इस बात को लेकर है कि ईरान बीते दो दिनों में जिस तरीके की व्यू रचना एक तरफ मिडिल ईस्ट और दूसरी तरफ होमर्ज रूट यानी दुनिया के सामने एक ऐसी क्राइसिस की स्थिति जिसके बाद अमेरिका से सुरक्षा अमेरिका को लेकर भरोसा और विश्वास अगर नहीं होगा तो फिर अमेरिका अपने आप में कोई करेंसी है ही नहीं और इस बात का जिक्र गाहे बगाहे पश्चिमी देश तो कर रहे थे।
लेकिन आज यह सवाल जी7 की बैठक में भी आ गया और इंटरनेशनल एनर्जी एसोसिएशन आईएई ने अपनी बैठक जिसके मातत 32 देश आते हैं उन्होंने भी कहा कि जो अंतरराष्ट्रीय क्राइसिस एनर्जी के जरिए पैदा हो रहा है और पूरे मिडिल ईस्ट की इकॉनमी धराशाई हो चुकी है उसमें किस पर विश्वास और किस पर भरोसा जताया जाए तो क्या आत्मविश्वास दुनिया का इस को लेकर अमेरिका से डगमगा चुका है? क्योंकि दो-तीन बातें जो इस दौर में तय हुई उसने साफ तौर पर बतला दिया कि वाइट हाउस हर दिन प्रेस कॉन्फ्रेंस जरूर करता है।
जानकारी देने के लिए सामने जरूर आता है लेकिन उससे हटकर जमीनी जो हालात हैं वो हैरान करने वाले हैं। क्योंकि होमर्ज रूट पर एक भी जहाज जा नहीं रहा है और आज तीन जहाज ने जाने की कोशिश की तो उन पर अटैक हो गया। थाईलैंड का एक जहाज तो धूधू करके जल पड़ा। तीन लोगों की मौत भी हो गई।
23 लोग सवार थे। 20 लोगों को किसी तरीके से बचाया गया। तस्वीर देख लीजिए। यानी होमर्ज रूट से बिल्कुल आवाजाही अमेरिका के संरक्षण में या अमेरिका के बगैर तेल की हो नहीं पा रही है। मिडिल ईस्ट के भीतर तेल का प्रोडक्शन कम हो चुका है। अमेरिका के नागरिक भी गैसोलन की कीमत बढ़ रही है तो उसको लेकर अब अमेरिकी राष्ट्रपति का जो ओरा था आर्थिक क्षेत्र को लेकर वह भी डगमगाने लगा है। यानी अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने भी अपना चुनाव जो मिट्टर पोल है।
उसको लेकर उसके अपने वोटर उससे सवाल करने लगे हैं। यह सवाल हो क्यों रहे हैं? पहली बात तो यह है कि जो सलाहकारों की टीम थी उनको क्या वाकई इसकी कोई जानकारी नहीं थी कि इस तरीके से ईरान रिएक्ट करेगा और उसकी स्ट्रेटजी खाड़ी देश या फिर होमर्ज रूट को बंद करने की दिशा में बढ़ जाएंगे और इसके बाद जो परिस्थिति पनपेगी उसमें तेल अवीव या इजराइल मायने नहीं रखेगा। अमेरिकी डिफेंस सिस्टम भी मायने नहीं रखेगा क्योंकि अब जो जानकारी आ रही है उसमें तकरीबन 17 अमेरिकी जो बड़े यूनिट्स हैं उनके खाड़ी देशों में वो पूरे तरीके से डैमेज हो गए हैं। सीधे कहें तो 17 साइट्स डैमेज हो गए हैं। दुबई का कंसोलेट, कतार का रडार सिस्टम, बहरीन का नेवी बेस, रियाद की एंबेसी, कुवैत में एंबेसी, इराक में इरबल एयरपोर्ट जो अमेरिकी बेस है।
जॉर्डन में रडार डैमेज। सऊदी अरब में जो प्रिंस सुल्तान एयरबेस था जो पहले दिन ही डैमेज किया गया। कुवैत में अली अल सलेम एयरबेस कैंप जो व्यरिंग बेस है वह भी और कतार में अल उबद एयरबेस यह सभी डैमेज हुए हैं। और इसकी भरपाई कैसे होगी कोई नहीं जानता। और इन सबके बीच जो पूरे मिडिल ईस्ट के भीतर की इकॉनमी है वह किस तरीके से डामाडोल है और ग्लोबली अब दो बड़े सवाल हैं कि ग्लोबली इकोनॉमिक क्राइसिस भी है और ग्लोबली सिक्योरिटी ऑर्डर भी डैमेज हो गया है।
यानी जो पूरी व्यू रचना बीते दो दिनों में ईरान कर रहा था वो इस बात को समझ चुका था कि दरअसल निशाने पर इजराइल को लेने से काम नहीं चलेगा। इजराइल चाहकर भी समर्पण नहीं कर सकता है। लेकिन अमेरिका समर्पण करेगा। की शुरुआत उसने की और खुद राष्ट्रपति ट्रंप ने जब यह कहा कि उनके कुछ सलाहकार थे।
यह अलग मसला है कि अब उनके सलाहकारों की सलाह काम नहीं आ रही है। और यह सवाल बड़ा होते चला जा रहा है कि इन सबके बीच जो लिविंग कॉस्ट है डेवलप स्टेट्स का वो बढ़ चुका है। जो ट्रेड रूट है वो हर किसी को बदलना पड़ रहा है। जो एनर्जी डिपेंडेंसी थी जो एनर्जी पर आश्रय था वो भी पूरा डिस्टर्ब हो गया। ट्रैवल पैटर्न पूरी दुनिया का बदल गया। और इन सबके बीच यूक्रेन युद्ध में यूक्रेन क्या होगा अब कोई नहीं जानता है। गाजा पट्टी में क्या होगा कोई नहीं जानता है। चाइना और रशिया का जो पूरा मूवमेंट है उस मूवमेंट की हकीकत यह है कि होमर्ज रूट में लगातार अपना तेल का एक्सपोर्ट ईरान ने बढ़ा दिया है और 98.2% तेल वो सिर्फ और सिर्फ ईरान चीन को दे रहा है और चीन उसकी एवज में जाहिर है पैसा दे रहा है। वह पैसा जाहिर तौर पर हथियारों की खरीदफरोख्त में है जो एक लिहाज से रशिया से भी आ रहा है और अमेरिका का हथियार बाजार भी इस दौर में व्यापक तरीके से बेच रहा है और वही अमेरिका ईरान से लड़ रहा है। इस साइकिल को एक क्षण के लिए देख के समझ तो लीजिए।
यानी अमेरिका के लिए इकोनमी मायने रखती है और इकोनमी अगर वर्ल्ड इकॉनमी को डिगाने की स्थिति में कोई वार खड़ा हो जाए तो अमेरिका क्या करेगा? यह सवाल अब उसके सामने ईरान को लेकर है। लेकिन दूसरी तरफ यही सवाल चीन और रशिया के सामने भी अपनी इकॉनमी को लेकर है। जहां युद्ध को लेकर उसकी भागीदारी उस हथियार और एनर्जी को लेकर हो चली है। जहां उसके एवज में उसे सिर्फ ईरान को पैसे देने होंगे। यानी इस साइकिल को जब आप समझ रहे हैं तो इसके आगे की परिस्थिति में आइए कि खाड़ी देशों के भीतर अमेरिका की छवि, खाड़ी देशों की अपनी इकॉनमी और उनकी अपनी इकॉनमी के आश्रय जो अभी तक वहां पर सिस्टम चल रहा था वो आप कह सकते हैं कि वर्ल्ड कैपिटल के तौर पर दुबई की जो भी पहचान थी एयरपोर्ट हो, फाइव स्टार होटल हो, जो वहां की रिफाइनरीज हो, जो वहां की इकॉनमी हो, जो वहां का टैक्स सिस्टम हो, जो दुनिया भर के 500 से ज्यादा बड़े कॉर्पोरेट के हेड क्वटर्स दुबई में मौजूद हो और दुनिया भर और खासतौर से यूरोपीय कंट्रीज के लोग ज्यादा से ज्यादा दुबई जा रहे हो उन सब चीजों में एक झटके में डगमगाने लगी चीजें और उसकी सबसे बड़ी वजह बीते दो दिनों में जो होमर्ज रूट के नीचे बारूदी सुरंगे बिछाई जा रही थी इससे पहले सिर्फ अपने संरक्षण में अमेरिका कह रहा था कि हम तमाम जहाजों को निकालेंगे। वो धमकी दे रहा था।
ईरान को कि आप किसी भी हालत में कुछ भी नहीं करेंगे अन्यथा हमारी मिलिट्री आप पर हमला कर देगी। लेकिन खेल उलट गया। परिस्थितियां बदल गई और परिस्थिति इस रूप में बदली कि दुनिया के सामने जब संकट आ गया तो इंटरनेशनल एनर्जी एसोसिएशन को फैसला लेना पड़ा कि अब जितने भी देशों के पास जो उसके सदस्य हैं उनके पास जो भी रिजर्व ऑयल है उस ऑयल को वह रिलीज़ करें। और तय यह हुआ कि 300 से 400 मिलियन बैरल हर दिन रिलीज किया जाएगा। इतनी बड़ी तादाद में इससे पहले कभी रिलीज नहीं हुआ। चाहे वो 2008 में आई हुई मंदी के वक्त तेल की कीमत बढ़ी हो या फिर रूस ने जब यूक्रेन पर हमला किया और उस वक्त एक झटके में दुनिया में तेल का संकट गहराया उस वक्त भी इतना रिलीज इंटरनेशनल एनर्जी एसोसिएशन ने नहीं किया था। लेकिन इस वक्त उसको फैसला लेना पड़ा क्योंकि अमेरिका की अपनी साख और उसकी अपनी इकॉनमी जो वर्ल्ड इकॉनमी को चलाने के लिए टेरिफ और ट्रेड के आश्रय चल रही थी वो डगमगा चुकी है। धमकी अभी तक अमेरिका दे रहा था। लेकिन चीजें जब पलटी तो आज ईरान खुलकर सामने आया। कहा आप किसी भी स्थिति को संभालिए होमर्ज रूट से 1 लीटर तेल भी निकलने आपको नहीं देंगे। और कच्चे तेल की कीमत विश्व बाजार में $200 प्रति बैरल तक हो जाएगा। यह धमकी कल तक अमेरिका ईरान को दे रहा था। अब ईरान के जो एमए के प्रवक्ता हैं वो सामने आ गए और उन्होंने इस बात का जिक्र कर दिया हगहना हो एमरे देवी सोशी यानी बीते दो-तीन दिनों से अमेरिका की धमकी कहीं भी जमीन पर इंप्लीमेंट या कहें कारगर तौर पर नजर नहीं आई।
लेकिन ईरान ने जैसे ही कहा 1 लीटर तेल नहीं निकलने देंगे और इन सबके बीच अब निशाने ाने पर वह इकोनमी है, वह फाइनशियल इंस्टीटशंस हैं। यहां तक कि बैंक का जिक्र भी कर दिया कि खाड़ी देशों में हम बैंकों को भी निशाने पर लेंगे। इसका असर तुरंत दुबई में यह हुआ कि दुबई के जो बड़े बैंक हैं, उन्होंने अपने कर्मचारियों से कहा आप सेफ जगह पर चले जाइए। यानी कभी भी किसी रूप में कोई सुरक्षा की व्यवस्था अंतरराष्ट्रीय तौर पर जो डिप्लोमेसी थी जो सिक्योरिटी सिस्टम था जो खुद अमेरिका द्वारा खाड़ी देशों में क्रिएट किया गया था सब कुछ तबाह इस दौर में हो चुका है क्या और इसीलिए जी7 की बैठक की अगुवाई जब मैक्रोन कर रहे थे आज तो उन्होंने कहा कि जिस स्थिति में सब है उसमें एनर्जी एसोसिएशन यानी आईएई को तो निर्णय लेना ही होगा और जो देश हैं फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूके, कनाडा ध्यान दीजिए G7 के भीतर कमोबेश हर देश ने इस दौर में अमेरिकी की युद्ध को लेकर सवाल खड़ा किया। वो चाहे फ्रांस हो, चाहे जर्मनी हो, चाहे इटली हो, जापान हो, यूके हो, कनाडा हो सभी ने सवाल खड़े किए।
और जिस तर्ज पे ईरान में हमला हुआ उसको लेकर कभी अमेरिका ने कहा हमारे साथ जर्मनी है कभी कहा इटली है और आज तो इटली की तरफ से भी यह जवाब आ गया कि आपने एक स्कूल पर हमला कैसे कर दिया और यह बात अमेरिकी राष्ट्रपति के सबसे करीब रही मिलोनी ने इस बात का जिक्र कर दिया यानी को लेकर पहली बार ऐसी स्थिति है जिसमें नाटो कंट्रीज हो, वेस्टर्न कंट्रीज हो, यूरोपियन कंट्रीज हो या फिर दुनिया के किसी भी हिस्से में अमेरिका के साथ खड़े होकर लड़ने की परिस्थिति इजराइल के अलावे आपको कोई दूसरा देश नजर नहीं आएगा। जो देशों को सुरक्षा दी जा रही थी, वह देश भी अमेरिका पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। जो इंटरनेशनल एनर्जी एसोसिएशन ने निर्णय लिया कि 400 मिलियन बैरल हर दिन रिलीज किया जाएगा और जी7 ने भी निर्णय लिया कि हां यह जरूरी है और वो देश भी खुद भी रिलीज़ करेंगे। लेकिन बावजूद इसके उनके भीतर भी इस युद्ध को लेकर सवाल है। यानी पहली बार वर्ल्ड इकनमी या ग्लोबल इकॉनमी के सामने और वर्ल्ड पावर को लेकर जो नए तरीके की नई परिस्थिति बनी है उसमें सवाल इस युद्ध में कोई सिस्टमेटिक लाइन अप नहीं है क्या?
क्योंकि जो बात शुरुआती दौर में आई थी कि अमेरिका में जो सलाहकार हैं उन्होंने वो कौन सी परिस्थिति समझाई जिसमें मिलिट्री ऑपरेशन को लेकर सक्सेस की लकीर खींची गई थी और लेकिन ईरान का रिस्पांस क्या होगा इसको मिसकैलकुलेट किया गया। यह मिडिल ईस्ट पर अटैक नहीं सोचा गया था।
ऑयल सप्लाई पर असर पड़ जाएगा नहीं सोचा गया था। होम के जरिए वर्ल्ड इकॉनमी या कहीं इकोनॉमिक वारफेयर की शुरुआत हो जाएगी। यह नहीं सोचा गया था। अमेरिका के भीतर गैसोलाइन का संकट होगा। यह नहीं सोचा गया था। और इन सबके बीच जो यह माना गया था कि रिजम चेंज हो जाए खामनई की मौत के बाद उसके बावजूद भी परिस्थिति नहीं बदली। तो फ्रस्ट्रेशन अब अपने सलाहकार वो हेक्सेट हो, मार्को रूबियो हो, लिटविक हो, ट्रेजरी सेक्रेटरी स्कॉट बेसेंट हो सभी को लेकर वहां के जो इकोनॉमिस्ट हैं और जो पॉलिटिशियन हैं अब उस दिशा में देख रहे हैं कि मिड टर्म इलेक्शन को लेकर एक हड़बड़ाहट अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के सामने उभर तो नहीं गई। क्योंकि वेंजुला पर कब्जा करने के बाद अमेरिका मानकर चल रहा था कि अब कोई जरूरत और कोई संकट एनर्जी को लेकर नहीं आएगा जो पहली बार उभर कर सामने आकर खड़ा हो गया। इसकी कल्पना की ही नहीं गई थी और शायद इसीलिए टेक्सस में नई रिफाइनरी लग रहे Reliance के साथ मिलकर लगाएंगे। इसका जिक्र करने में देरी नहीं की। ना Reliance ने जिक्र किया ना भारत ने जिक्र किया लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने कर दिया क्योंकि उसके अपने वोटर समझ रहे हैं संकट गहराने वाला है लेकिन बात सिर्फ इतनी रही है। पहली रिपोर्ट पेंटागन ने पहले दो दिनों की दी 5.6 बिलियन डॉलर का हथियार खर्च हुआ। बहुत बड़ी रकम अमेरिका के लिए नहीं है। तकरीबन 51 थाउज करोड़ ये होते हैं। लेकिन जो 11 दिनों का खर्चा है अगर उसमें जो चीजें नस्ट रडार सिस्टम से लेकर सिक्योरिटी सिस्टम है इसको जब गिनना शुरू करेंगे तो यह मिलियन डॉल ध्वस्त हो चुके हैं। अब शायद इसीलिए पहली बार यह सवाल बड़ा हो चुका है कि अगर दुनिया की दूसरे संस्थान अब अमेरिका के खिलाफ रुख अपनाएं और उसमें बड़ी भूमिका ब्रिक्स की हो सकती है क्या? एससीओ की हो सकती है क्या? क्योंकि दोनों जगह ईरान सदस्य है और उसमें रशिया भी है और चाइना भी है और इंडिया भी है। लेकिन इंडिया ने इस दौर में अमेरिका के साथ खड़े होकर मैसेज बहुत साफ दिया है।
इजराइल के साथ खड़े होकर मैसेज बहुत अनुकूल इस रूप में दिया है कि हम तो उनके साथ खड़े हैं। आज जब थाईलैंड के कारगो जहाज जो होमोज स्ट्रेट पर जहां हमला हुआ और ओमान के करीब वो था वहां पर प्रोजेक्टाइल से निशाना जो साधा गया और उसके तुरंत बाद आईआरजीसी यानी इस्लामिक रेवोलशनरी गार्ड ने जो मिसाइलों की 39थ के यानी 39वां हमला जो शुरू किया उसने मैसेज और कड़ा और उग्र दे दिया। क्या आज की रात भी जो तेल अवीब नहीं बल्कि बात अब खाड़ी और होमर्ज रूट के दायरे में जो वर्ल्ड इकोनमी को कटघरे में लाकर ईरान खड़ा कर चुका है और दुनिया के तमाम देश उससे निकलने का रास्ता एक ही मान रहे हैं कि अमेरिका हाथ पीछे खींच ले। सवाल सिर्फ इतना है कि अमेरिकी राष्ट्रपति क्या वाकई अपने घर का चुनाव देख रहे हैं या युद्ध की परिस्थितियों को देख रहे हैं? क्योंकि युद्ध को लेकर जो सोच उनकी पहले थी वह तो डगमगा चुकी है। रशिया पर प्रतिबंध लगाया गया था।
रशिया से प्रतिबंध हटा लिया गया और कहा गया कि आप अब तेल बेच सकते हैं। लेकिन रशिया ने कहा हम यूरोप को तेल नहीं बेचेंगे। यानी वह भी झटका देने को तैयार हो गए। और इस परिस्थिति में अमेरिका के भीतर उठने वाले सवालों में अब क्या अमेरिका अपने पांव पीछे खींचकर वर्ल्ड इकनमी को सहेजना चाहेगा या खुद अपने देश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद कानूनी तौर पर अपनी राजनीतिक साख और अपनी पॉलिसी की साख गवा चुके ट्रंप कौन सा निर्णय लेंगे? यह निर्णय को लेकर होगा।
यह निर्णय हमले को लेकर होगा। यह निर्णय दुनिया को एक साथ खड़े करके अमेरिका अपने ताकत को दिखाना चाहेगा या फिर यह निर्णय क्या होगा? इस दौर में शायद सबसे बड़ा अंधेरा उसी वाइट हाउस में है जिसकी चमकदमक तले दुनिया उसको सुनना चाहती थी।
