ईरान-यूएस लड़ाई ! SBI की रिपोर्ट में चौंकाने वाला दावा, बढ़ेगी महंगाई..

एक तरफ ईरान अमेरिका की लड़ाई चल रही है तो दूसरी ओर भारत में एसबीआई की ओर से एक रिपोर्ट जारी हुई है। इस रिपोर्ट में अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे जंग का अर्थव्यवस्था पर आखिर कितना असर पड़ सकता है इसके बारे में विस्तार से बताया गया है। एसबीआई की रिसर्च की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह संघर्ष लंबा चलता है.

तो इससे वैश्विक मंदी का दबाव, महंगाई में वृद्धि और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता बढ़ सकती है। हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के घरेलू वित्तीय बाजारों को फिलहाल आरबीआई यानी भारतीय रिजर्व बैंक के कदमों से सपोर्ट मिला है। आरबीआई ने सरकारी बॉन्ड यील्ड को संतुलित रखने और रुपए की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए हस्तक्षेप भी किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक अगर यह संघर्ष लंबे वक्त तक जारी रहता है तो इससे भारत के मैकोनमिक संकेतकों पर भी दबाव पड़ सकता है रिपोर्ट में कहा गया है कि आरबीआई ने स्पॉट मार्केट में हस्तक्षेप करके रुपए की अधिक अस्थिरता को कम किया है और इससे 92 के स्तर से नीचे रखने में सफलता हासिल हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक मौजूदा अनिश्चितता के बीच यह कदम काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके साथ ही रिपोर्ट में स्ट्रेट ऑफ हार्मोंस के बारे में बात की गई। रिपोर्ट में कहा गया कि इसके बंद होने से वैश्विक ऊर्जा बाजार पर असर पड़ा।

दुनिया के लगभग 20% कच्चे तेल का व्यापार इसी मार्ग से होता है और इसीलिए यहां बाधा आने से तेल की कीमतों [संगीत] में तेजी बिकी जा रही है। फिलहाल ब्रैंड क्रूड की कीमत $91.84 प्रति बैरल और WTI $89.62 प्रति बैरल तक पहुंच चुकी है और एसबीआई की रिसर्च बताती है कि अगर कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल $10 की बढ़ोतरी होती है तो वित्त वर्ष 2027 में चालू खाते का घाटा करीब 36 बेसिस पॉइंट तक बढ़ सकता है। अगर तेल की कीमत $130 प्रति बैरल तक पहुंच जाती है.

तो भारत की जीडीपी वृद्धि दर घटकर लगभग 6% तक आ सकती है। एसबीआई रिसर्च ने ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भी इस संघर्ष का विश्लेषण किया। रिपोर्ट के मुताबिक यह जंग कॉन्राटीएफ वेव के अंतिम चरण के दौरान हो रहा है जो लंबे वक्त तक चलने वाले आर्थिक चक्र का सिद्धांत है और इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संरचनात्मक प्रभाव पड़ सकते हैं। रिपोर्ट बताती है कि संघर्ष में कुछ देशों को फायदा हो सकता है। एग्जांपल के तौर पे अमेरिका को तेल और गैस की कीमतें बढ़ने से लाभ मिल सकता है।

साथ ही यूरोप की रूसी ऊर्जा पर निर्भरता कम होने से अमेरिका के लिए नया अवसर बन सकते हैं। वहीं दुनिया के ज्यादातर अन्य क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया कि बाजार में बढ़ती अस्थिरता के बीच कई केंद्रीय बैंक सुरक्षित निवेश के तौर पर सोने के भंडार बढ़ा रहे हैं। भारत की विदेशी मुद्रा भंडार में फिलहाल लगभग 17.6% हिस्सा सोने का है।

रिपोर्ट के मुताबिक इस संघर्ष का असर भारत पर कई तरीकों से पड़ सकता है। इसमें खाड़ी देशों से आने वाली रेगिटेंस, कच्चे तेल का आयात और पश्चिम एशियाई देशों के साथ व्यापार शामिल है।

हालांकि रूसी कच्चे तेल की खरीद और फॉरवर्ड कॉन्ट्रैक्ट जैसे कदमोंके कारण आपूर्ति से जुड़े जोखिम कुछ हद तक कम हो सकते हैं। रिपोर्ट में इस बात का भी ज़िक्र है कि भारतीय बैंक और निजी कंपनियां भी उन क्षेत्रों से जुड़ी हैं जो इससंघर्ष से प्रभावित हो सकते हैं। रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि खाड़ी क्षेत्र में बढ़ती अनिश्चितता तेल की कीमतों, महंगाई की उम्मीदों और निवेशकों के भरोसे को आने वाले वक्त में प्रभावित करती रहेगी। इसलिए नीति निर्माताओं और निवेशकों को इस स्थिति पर करीबी नजर बनाए रखने की जरूरत है।

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