हुमैनी का भारत से भी खास नाता था। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से गए एक लड़के के पोते ने ईरान को एक कट्टर इस्लामिक देश में तब्दील कर दिया। अहमद हिंदी मुसावी ने शायद ही यह सोचा होगा कि उनकी आने वाली पीढ़ी एक मुल्क की तस्वीर हमेशा के लिए बदलने वाली है। लेकिन इसके पीछे उत्तर प्रदेश का बाराबंकी कहां से आ गया? इस दिलचस्प कहानी को हम इस वीडियो में जानेंगे।
इजराइल और अमेरिका के हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामनेई समेत ईरान के लगभग पूरी टॉप लीडरशिप खत्म हो गई। लेकिन अयातुल्ला अली खामने सिर्फ ईरान के सर्वोच्च लीडर ही नहीं थे। बल्कि शिया मुस्लिमों के सबसे बड़े धर्मुरु भी थे। लिहाजा खामनेई की मौत पर शिया मुस्लिमों का वर्ग बेहद गुस्से में है और बेहद गमजदा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि अयातुल्ला अली खामने के परिवार का भारत के बाराबंकी से बेहद गहरा नाता रहा है।
अयातुल्ला अली खामनेई के दादा तो हिंदी के नाम से भी पुकारे जाते थे। देखिए खामने परिवार के भारत से कनेक्शन का यह अनूठा किस्सा। लेकिन उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से गए एक लड़के के पोते ने ईरान को एक कट्टर इस्लामिक देश में तब्दील कर दियाईरान की छवि एक कट्टर शिया इस्लामिक मुल्क के तौर पर दुनिया भर में मशहूर है। लेकिन यही ईरान आज से चार दशक पहले एक आधुनिक राष्ट्र हुआ करता था। शहरी तबका वेस्टर्न जीवन शैली अपना चुका था। बीच पर बिकनी में लड़कियों का दिखना और क्लब्स में पब में नौजवानों का जाना रोजाना की बात थी। लेकिन उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से गए एक लड़के के पोते ने ईरान को एक कट्टर इस्लामिक देश में तब्दील कर दिया। 1979 की इस्लामिक क्रांति के नेता के तौर पर उसने ना सिर्फ ईरान बल्कि पूरी दुनिया में ख्याति पाई। अयातुल्लाह खामनी या अयातुल्ला खुमैनी भी जिन्हें कहते हैं। उनके परदादा उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से ईरान गए थे। कैसे बाराबंकी से गए एक लड़के ने एक पूरे मुल्क को ही तब्दील कर दिया।
आज उसी ईरान और इजराइल के बीच जंग छिड़ी हुई है। अमेरिका और ईरान की दुश्मनी के किस्सों से दुनिया वाकिफ है। लेकिन इसके पीछे उत्तर प्रदेश का बाराबंकी कहां से आ गया? इस दिलचस्प कहानी को हम इस वीडियो में जानेंगे। हाल ही में हेलीकॉप्टर हादसे में जान गवाने वाले ईरान के पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के ईरान का अगला सुप्रीम लीडर बनने के कयास लग रहे थे। ईरान में सुप्रीम लीडर सबसे ताकतवर होता है।
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे तमाम पद उसके नीचे आते हैं। ईरान के पहले सुप्रीम लीडर रुल्ला खुमनई थे। जिन्हें 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद यह पद मिला। रोहल्ला कुमैनी को ईरान की राजनीतिक और सामाजिक दिशा को पूरी तरह से बदल देने वाले शख्स के तौर पर जाना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि लिबरल देश में पले बढ़े और फिर एक कड़ा धार्मिक शासन लाने वाले हुमैनी का भारत से भी खास नाता था। उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से ईरान गए थे। ईरान में साल 1979 की इस्लामिकक्रांति के जनक रुल्ला खुमेनी जिस ईरान में बड़े हो रहे थे, वह काफी अलग था। वो एक उदार देश था। उन्हें अपने बचपन में ही शिया धर्म की शिक्षा मिली जो उन्हें उनके दादा सैयद अहमद मुसावी हिंदी से विरासत में मिली थी।
हुमैनी के दादा शिया मौलवी अहमद मुसावी हिंदी का जन्म उत्तर प्रदेश के पास बाराबंकी में हुआ था। उनके पिता ईरान से ही भारत आए थे। बाराबंकी में जन्म लेने के बाद वह 30 साल तक भारत में ही रहे। जिसके बाद बेहतर जिंदगी की तलाश में मौलाना अहमद हिंदी ईरान चले गए थे और उनके पोते रुहेल्ला खुमैनी ने इस देश में एक बड़ी क्रांति की और एक उदार राष्ट्र ईरान को एक कट्टर शिया इस्लामिक गणराज्य में तब्दील कर दिया। बाराबंकी में बचपन गुजारने वाले अहमद हिंदी मुसावी ने शायद ही यह सोचा होगा कि उनकी आने वाली पीढ़ी एक मुल्क की तस्वीर हमेशा के लिए बदलने वाली है। मौलाना अहमद मुसावी ने हिंदुस्तान से मोहब्बत जताने के लिए ही अपने नाम में उपनाम हिंदी लगा रखा था। इन्हीं मौलाना अहमद मुसावी हिंदी के पोते रूहेल्ला खुमैनी ने लिबरल ईरान को एक कट्टरपंथी शिया देश और पश्चिम एशिया में शक्ति के एक अहम केंद्र में तब्दील कर दिया। खुमेनी के दादा अहमद हिंदी अगर ईरान नहीं गए होते तो फिर ईरान का आज का वर्तमान स्वरूप शायद होता ही नहीं।
यह दिलचस्प है कि कैसे उत्तर प्रदेश के एक शहर के परिवार की ईरान को बदल देने में इतनी महत्वपूर्ण भूमिका है। रोहेल्ला खुमेनी के दादा और शिया धर्मुगुरु सैयद अहमद मुसावी बाराबंकी के पास किटूर नाम की जगह पर पैदा हुए थे। सैयद अहमद मुसावी हिंदी 1830 में बाराबंकी से ईरान चले गए थे। हालांकि उनके लिए ईरान जाना घर वापसी जैसा ही था क्योंकि उनके पिता दीन अली शाह 18वीं शताब्दी की शुरुआत में मध्य ईरान से भारत आए थे। यह वो दौर था जब ब्रिटिश औपनिवेशिक शक्तियां मुगलों को हराकर भारत पर नियंत्रण हासिल कर रही थी। अहमद हिंदी ने अंग्रेजों के बढ़ते प्रभाव के बीच बेहतर जिंदगी की तलाश में 19वीं शताब्दी की शुरुआत में 1830 में भारत छोड़ दिया। उन्होंने इराक होते हुए ईरान की यात्रा की।
भारत से निकलने के करीब 4 साल बाद अहमद मुसावी हिंदी ईरान के शहर खोमैन पहुंचे। उन्होंने एक घर खरीदा और यही बस गए। इसी खोमेन को उनके बच्चों ने अपने उपनाम में इस्तेमाल किया। यही खोमैन खमैन हुआ। अहमद मुसाबी हिंदी ने ईरान में तीन शादियां की और उनके पांच बच्चे थे। [संगीत] इन्हीं में से एक रुहेल्ला के पिता मुस्तफा भी थे। यह वो समय था जब ईरान में कजार वंश का शासन था। रोहेल्ला खुमैनी को शिया धर्म की तालीम अपने पिता और दादा से विरासत में मिली थी। कुमैनी भी कम उम्र में ही शिया इस्लाम के एक बड़े विद्वान बन गए। एक मौलवी के तौर पर हुमैनी का कद बढ़ा तो उन्होंने राजनीति में भी दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। उस समय के ईरान के शाह मोहम्मद रजा पहलवी के शासन में देश में आधुनिकरण और पश्चिमीकरण पर काफी जोर दिया जा रहा था। जो शहरी एलट्स थे उन्होंने तो पश्चिमी जीवन शैली अपना भी ली थी। लेकिन ग्रामीण तबका इसे पचा नहीं पा रहा था। ईरान में 1920 के दशक में सत्ता में आए पहलवी राजवंश की धर्मनिरपेक्ष नीतियों को रुहेल्ला खुमैनी ने पश्चिमी शक्तियों l खासकर अमेरिका की कठपुतली के रूप में काम करना बताया।
खुमेनी ने ईरान में अमेरिकी दखल के खिलाफ आवाज उठाई। आंदोलन शुरू कर दिए। इसका नतीजा यह हुआ कि 1960 और 1970 के दशक में ईरान में बड़े पैमाने पर राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल हुआ। खुमेनी ने इस्लामिक मूल्यों की ओर लौटने के लिए एक धार्मिक ईरान की स्थापना का आवाहन किया। खुमेनी को जेल हुई लेकिन वह अपनी मांग उठाते रहे। साल 1978 में विरोध प्रदर्शनों की वजह से शाह पर दबाव बढ़ गया और देश में हालात शाह के हाथ से जब निकले तो 1979 में इस्लामिक क्रांति होती है और शाह पहलवी के हाथों से ईरान की सत्ता निकल जाती है। 1979 में जब शाह के हाथ से सत्ता निकल गई और खुैनी इसके सबसे बड़े नायक बने तो उन्होंने ईरान को एक आधुनिक राष्ट्र से कट्टर शिया इस्लामिक मुल्क में तब्दील कर दिया। ईरान के सुप्रीम [संगीत] लीडर बने खुमैनी ने देश को इस्लामिक रिपब्लिक बताते हुए इस्लामी कानून लागू किए। इसके साथ ही ईरान एक उदारवादी समाज से एक रूढ़िवादी समाज बन गया। आने वाले दशकों में रूढ़िवाद और मजबूत हुआ। देश में महिलाओं और खुले विचार वाले लोगों पर कई तरह की सख्ती की गई। इंटरनेशनल पॉलिसी डाइजेस्ट की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि खुमेनी की क्रांति ने ईरानी समाज के हर पहलू को पूरी तरह बदल दिया।
जो देश पहले दुनिया में बिल्कुल अलग तरीके से देखा जाता था वो खुैनी के आने के बाद बिल्कुल ही अलग स्वरूप में आ गया। खुमेनी ने 1989 में अपनी मृत्यु तक 10 वर्षों तक देश मेंएक छत्र राज किया। खुैनी के बाद अयातुल्लाह अली खुैनी ईरान के सुप्रीम लीडर बने और आज भी इस पद पर काबिज हैं। आज दुनिया भर में ईरान को जिस रूप में देखा जाता है उसके पीछे उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से निकला एक शख्स जिम्मेदार है। ना अहमद मुसावी हिंदी ईरान जाते और ना आज उनके वंशज अयातुल्लाह खुमैनी ईरान के सर्वोच्च नेता होते। ना ईरान में कट्टर कानून आता और ना जाने दुनिया कैसी होती। लेकिन उत्तर प्रदेश के बाराबंकी से गए एक लड़के के पोते ने ईरान को एक
