भारत पाकिस्तान के संघर्ष के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुजरात के वड़ोदरा पहुंचे थे। यहां उन्होंने रोड शो किया। इस रोड शो में कर्नल सोफिया कुरैशी का पूरा परिवार पहुंचा था। इन्होंने प्रधानमंत्री पर फूलों की बारिश की। इसी बड़ोदरा के रहने वाले यह ओन अली है। साल 2016 में अली ने एक प्रॉपर्टी खरीदी। यहां के चंपानेर दरवाजा फतेहपुरा में यह एक कमर्शियल प्रॉपर्टी है जिसे इन्होंने अपने बहनोई के साथ मिलकर दिनेश भाई मोदी से खरीदी थी। ऑन पेपर इसकी कीमत ₹20 लाख थी। ऑफ पेपर इससे करीब चार गुना बताई जाती है। भारत में अक्सर वही होता है। इसके बाद इन्होंने डिस्टर्ब एरिया एक्ट के तहत परमिशन के लिए डिप्टी कलेक्टर ऑफिस में अप्लाई किया जो नहीं मिला।
जनवरी 2017 में वड़ोदरा की असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर ने डिप्टी कलेक्टर को पत्र लिखकर जानकारी दी। यह गुजराती भाषा में है जिसे हम हिंदी में बता रहे हैं। इस पत्र में बताया गया कि विक्रेता और खरीदार के बयान लेते समय किसी प्रकार की धमकी नहीं दी गई। आसपास क्षेत्र में व्यवसाय करने वाले व्यापारियों के बयान लेने में भी कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन उक्त क्षेत्र मुस्लिम बाहुल्य है। जहां हिंदू आबादी कम संख्या में है। अल्पसंख्यक बहु संख्यक अनुपात संख्या को प्रभावित करता है। ऐसे में संपत्ति हस्तांतरित करने और बेचने को लेकर कोई राय नहीं दी गई। यानी नकारात्मक राय दी गई। डिप्टी कलेक्टर ने भी असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर की राय को ही स्वीकृति देते हुए परमिशन देने से इंकार कर दिया। डिप्टी कलेक्टर ने जो आदेश लिखा वह गुजराती में है। मैं हिंदी में पढ़ के सुनाता हूं।
इसमें कहा गया कि इस आवेदन की जांच के लिए पुलिस आयुक्त से राय मांगी गई थी। जिसमें सहायक पुलिस आयुक्त ने उक्त संपत्ति की बिक्री और हस्तांतरण की अनुमति नहीं देने का मत दिया है। इसलिए आपकी संपत्ति के हस्तांतरण की अनुमति मांगने वाले आवेदन को खारिज किया जाता है। इसके बाद अली ने राजस्व विभाग का रुख किया। वहां भी साल 2018 में राजस्व विभाग ने असिस्टेंट पुलिस कमिश्नर के आदेश को ही आधार बनाकर अपना फैसला सुनाया और इनके आवेदन को अस्वीकृत कर दिया। आपने सुना कि अधिकारियों का मानना है कि इस खरीद को अगर इजाजत दी जाती है तो अल्पसंख्यक बहुसंख्यक का अनुपात प्रभावित होगा।
इसके बाद अली और उनके बहनोई ने गुजरात हाईकोर्ट का रुख किया। जहां कुछ महीने चले कानूनी प्रक्रियाओं के बाद साल 2019 में उन्हें अपनी संपत्ति पर मालिकाना हक मिल गया। प्रॉपर्टी उनके नाम पर हो तो गया। हालांकि जून 2025 तक वह अपनी संपत्ति पर कब्जा नहीं ले पाए हैं। आखिर क्यों? ये हमने 2016-17 में खरीदी थी और जब हमने ये जमीन खरीदा तो हमको पता लगा कि ये अशांत बिस्तर में है। तो हमने परमिशन में रखा कलेक्टर के पास तो कलेक्टर ने ऐसा बोला कि ये हिंदू मुस्लिम का इलाका है तो इसमें हम लोग नहीं दे सकते।
ऐसा परमिशन तो फिर हम लोग मैसूल विभाग में गए वहां पर भी हमको परमिशन नहीं मिला। फिर हम लोग ने हाई कोर्ट में हमने अपील किया तो हाई कोर्ट ने हमको परमिट कर दिया। परमिशन दे दिया क्योंकि हमने ये जो है ना फ्री कंसेंट पे था क्योंकि हमने वो जो मालिक है उसने फ्री कंसेंट से दिया था। हंसीखुशी दिया था उसने और हमने उसके पूरे-पूरे पैसे भी हमने उनको दे दिए थे। तो कोर्ट ने ये सब कंसीडर करके फिर हमको परमिशन परमिट कर दिया। मालिक हिंदू थे उस जमीन के जी मालिक क्या नाम है उनका दिनेश भाई नाम है उनका तो जब आपको कोर्ट ने परमिशन दे दिया तो उस जमीन पे आपका कब्जा हो गया आप वहां अपना कारोबार शुरू कर दिए नहीं हम लोग के पास चाबी तो उसका आ गया मकान का दुकान का कमर्शियल प्रॉपर्टी है लेकिन ये लोग है ना हम लोग वहां जाते हैं तो ये लोग सब पीछे वाले भेगी हो जाते हैं और पॉलिटिशियन को सबको बुला के हम लोग को वहां पे धमकाते हैं जान से खत्म की देते हैं और खोलने नहीं देते दुकान यह कौन है? पीछे वाले लोग कौन है? पीछे वाले जो मोहल्ले में पीछे गली में रहते हैं, वह लोग हैं। तो उनको क्या दिक्कत है आपके दुकान खोलने से? क्या कहते हैं? आपको धमकाने आते हैं।
आपने बताया कि आपके दूसरे दुकान पे भी आते हैं। तो उनका कहना क्या होता है? उनका कहना यह है कि यह अशांत विस्तार में है। हिंदू का प्रॉपर्टी मुसलमान नहीं ले सकता है। लेकिन हमने सब टेक्निकली परफेक्ट किया हुआ है। सब कायदे से किया हुआ है। फिर भी वह लोग ऐसा प्रॉब्लम क्रिएट करते हैं। अधिकारियों के नकारात्मक राय के पीछे स्थानीय हिंदुओं का भी विरोध एक बड़ा कारण बना। दरअसल ओन अनिल ने पहली बार जब हाई कोर्ट में जीत दर्ज की तब स्थानीय हिंदुओं के दबाव में इस प्रॉपर्टी की खरीद के दो गवाह एक स्थानीय मुस्लिम दुकानदार फरहान और दूसरा पास में ही दुकान चलाने वाले केशव राणा हाई कोर्ट गए और पिटीशन दायर कर बताया कि हमें झूठ बोलकर प्रॉपर्टी खरीद के कागजात पर हस्ताक्षर कराए गए। इनके साथ ही आसपास के हिंदू जो ओन अली के प्रॉपर्टी खरीद का विरोध कर रहे थे वह भी हाई कोर्ट गए और खुद को पक्ष बनाने के लिए कहा। जो लोग उस परमिशन के प्रोसेस में पार्टिसिपेंट थे जिन्होंने परमिशन जब की प्रोसीडिंग चल रही थी।
ये कहा था कि इतनी परमिशन दी जाए तो हमको ऐतराज नहीं है। उन्होंने एप्लीकेशन फाइल करी यह कहते हुए कि हमको गुमराह करके हमसे ऐसा स्टेटमेंट लिया और इसलिए परमिशन कैंसिल होनी चाहिए। जब उन्होंने यह एप्लीकेशन करी उस सो वो जो ये शॉप का ट्रांजैक्शन है कमर्शियल है घर का नहीं एक शॉप का ट्रांजक्शन है तो अड़ोसी पड़ोसी तकरीबन 10 से 12 लोग आए हिंदू लोग उन्होंने कहा कि भ ये परमिशन जब देने की कार्यवाही चल रही थी तो हमारे से स्टेटमेंट नहीं लिया गया हमसे नहीं पूछा गया हमसे भी पूछना चाहिए था कि ये ट्रांजैक्शन होना चाहिए या नहीं होना चाहिए तो उन्होंने दखल अंदाजी की और उन्होंने हाई कोर्ट में एप्लीकेशन फाइल हाई कोर्ट ने जो दो एप्लीकेशन फाइल थी वो दोनों को 25-25,000 का कॉस्ट लगा के डिसमिस करी कि आप इतनी गलत बात लेके इतनी गलत एप्लीकेशन लेकर यहां हाई कोर्ट में आए हो और इतनी गलत बात कर रहे हो। यहां पर भी बात खत्म नहीं हुई। उन लोगों ने उस ऑर्डर को हाई कोर्ट के डिवीजन बेंच में लेटर पेटेंट अपील जो कायदे में की जा सकती है वो उसको चैलेंज किया। वहां पर चैलेंज किया और हाई कोर्ट के दो जजेस की बेंच ने डिवीजन बेंच ने वो सिंगल जज सब का जजमेंट है वो कंफर्म किया परमिशन देते हुए और जो कॉस्ट इंपोज किया था उसको भी कंफर्म किया ये बिल्कुल सही बात है कॉस्ट लगाना चाहिए ऐसी गलत कोई एप्लीकेशन हाई कोर्ट में लेकर आए अब यहां तो जीत हो गई उनकी लेकिन ग्राउंड रियलिटी क्या है वो ओन अली भाई आज तक अपनी प्रॉपर्टी को कंस्ट्रक्शन जो उनको कॉरपोरेशन नोटिस दे रहा है उनकी प्रॉपर्टी जो है वो जजरित हालत में है।
डिलपिटेड कंडीशन में है। कॉरपोरेशन ने कहा कि आप इसका जल्द से जल्द ठीक-ठाक करो। अगर आने जाने वाले रास्ते पे अगर गिर गई गिर गई ये प्रॉपर्टी और किसी को चोट आई कोई कोई हादसा बना तो आप जिम्मेदार होगे। इसके बावजूद अड़ोसी पड़ोसी जो लोग हैं, लोकल पॉलिटिशियंस हैं वो उनको कंस्ट्रक्ट नहीं करने दे रहे। ओन अली को अपनी प्रॉपर्टी पर कब्जा नहीं करने देने वाले स्थानीय बीजेपी के कॉरपोरेटर, पूर्व कॉरपोरेटर और दूसरे अन्य हिंदू हैं। उनका दावा है कि हां मकसद के तहत मुस्लिम प्रॉपर्टी खरीद रहे हैं। इन्होंने मुझसे कहा कि आप ओन अली को बोलिए कि जितने में उसने खरीदी थी उतने में ही हमें बेच दे। बचपन से वहां रहता हूं और अभी आके वो लोग दुकान ले लेंगे। बाद में एक दूसरा आएगा मोडन वो दुकान लेगा। फिर अपना जो पूरा विस्तार है हमारा हमारा विस्तार मोमेंट मिस्टर में पलट जाएगा। फिर हम रहने कहां जाएंगे? तो उसके लिए हमको लड़ाई तो लड़नी पड़ेगी ना उसके सामने। आपको ऐसा क्यों लग रहा है कि एक ने दुकान खरीदा तो बाकी आएंगे तीसरा आएंगे। सभी लाइन पड़ी हुई है। दुकान खाली करने के लिए सब बैठे हैं और लेने के लिए भी बैठे हैं। और विस्तार ऐसा नहीं है। एक विस्तार 25 विस्तार ऐसे हैं कि जहां पे उन लोगों ने प्रॉपर्टी ज्यादा दाम देके खरीदी। फिर वो अखा बिस्तर खाली हो गया है बड़ा के अंदर। लेकिन जो मैंने जानकारी इकट्ठा की इस मामले में कि हाई कोर्ट ने इजाजत दे दी है और जो यहां का नगर निगम है उस घर के रनोवेशन के लिए भी उसी फैमिली को नोटिस दे रहा है। तो जब सरकार मान चुकी है कि उस पर्टिकुलर जमीन पे उनका हक है तो आप लोग किस आधार पे संघर्ष कर रहे हैं, लड़ाई कर रहे हैं या प्रोटेस्ट कर रहे हैं। उसके लिए हम क्या सोचते हैं कि हमारा घर है पीछे के स्तर पर पीछे घर मेरा पड़ता है।
मैं वहां से उन लोगों के बीच में नहीं पडूंगा तो मेरा घर कल परसों मेरे को खाली करके जाना पड़ेगा क्योंकि वहां पर एक दुकान और दूसरी दुकान दोनों मोमेंटन की लगती है। अगर वहां पे वो लोग अपार्टमेंट बना देंगे तो हमारा घर खाली करना पड़ेगा। हम चाहते हैं कि हाई कोर्ट हमको थोड़ी सपोर्ट करे और यह केस यहां पर रफादफा करके उसकी कीमत उसको वापस दिला देवे और हम देने के लिए भी तैयार है उनको जो मार्केट वैल्यू है उनके पैसे लेने के लिए भी वो लोग तैयार है व प्रॉपर्टी खुद हिंदू लेने के लिए तैयार है तो आप लोग चाहते हैं कि वो बेच दे बेच दे तो अच्छा रहेगा और अगर नहीं बेचते हैं तो नहीं बेचेगा तो उसके साथ प्रोटेक्शन शुरू शुरू ही होगा। आंदोलन जारी रहेगा।
आंदोलन जारी रहेगा। ओन अली इस जगह पर दुकान बनाना चाहते हैं। आसपास के लोगों ने उनकी प्रॉपर्टी के गेट पर मिट्टी भर दिया है। जब भी वह यहां जाते हैं तो आसपास के लोग भगा देते हैं। अली कहते हैं कि वह तो कमर्शियल प्रॉपर्टी है। वहां रहने कौन जाएगा? ऐसे में मुसलमानों की आबादी बढ़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता। वो लोग हमसे बात करें तो हम उससे डिस्कशन करें ना। जी डिस्कशन कब होता है? जब सामने दो पार्टी बैठे बात करे तब डिस्कशन। ये लोग तो सीधे हमको धमकाने की बात करेंगे तो हम कैसे उसको समझाएंगे? हमने हमारा इतना पैसा फंसा हुआ है और हम है ना इतना परेशान है ना हमको धमकी मिला है। हम है ना वहां हमारी जगह पे जाने को भी हमको डर लगता है। जी। कभी-कभी दिल में आता है बेच दो। रेट बढ़ भी गया होगा कहीं और खरीद लें। कभी ऐसा भी ख्याल आता है? देखो बेचने में हमारा कोई मन नहीं है क्योंकि हमने दिल से प्रॉपर्टी लिया है और हमारा इच्छा यही है कि हम लोग वहां पर हमारा बिजनेस करें बैठे इत्मीनान सुकून से और हमारा काम करें और ये लोग का का इंटेंशन ही ये है कि हम लोग यहां से बेच के चले जाए लेकिन हमको वो करना नहीं है। पुलिस को हम लोग ने कंप्लेन भी किया कि ये लोग आ रहे हैं। हमको सपोर्ट दो आप हमको प्रोटेक्शन दो। लेकिन वह प्रोटेक्शन भी नहीं मिल रहा है हमको पुलिस का। जब ओन अली अपनी संपत्ति पर कब्जा नहीं ले पाए और पुलिस से भी उनको कोई मदद नहीं मिली तो एक बार फिर उन्होंने हाई कोर्ट का रुख किया।
बीते 19 जून 2025 को मामला एक बार फिर हाई कोर्ट पहुंचा। जहां जस्टिस एचडी सुथार ने कठोर आदेश जारी किया जिसमें उन्होंने लिखा याचिकाकर्ता संबंधित संपत्ति का मालिक है और अपनी संपत्ति का इस्तेमाल करना चाहता है। मामले के तथ्यों और अनुबंध ए में याचिकाकर्ता की शिकायत को देखते हुए संबंधित प्रतिवादी प्राधिकारी को कानून के अनुसार याचिकाकर्ता की शिकायत का निवारण करने का निर्देश दिया जाता है। क्योंकि कानून और व्यवस्था बनाए रखना राज्य का कर्तव्य है। यदि कोई प्रतिकूल परिणाम होता है तो याचिकाकर्ता उचित मंच के समक्ष उचित कारवाई दायर करने के लिए स्वतंत्र है। इस आदेश के बाद भी ओन अली की परेशानी कम नहीं हुई है। पुलिस के पास वो हाई कोर्ट का आदेश लेकर गए तो कहा गया कि अभी त्यौहार का समय है। रथ यात्रा निकलने वाली है। उसके बाद मुहर्रम है।
7 जुलाई के बाद तुम्हें जमीन पर कब्जा दिला देंगे। देखना होगा कि ओन अली अपनी जमीन पर कब्जा ले पाते हैं या नहीं। बड़ोदरा में ऐसे कई और लोग हैं जिसमें बिल्डर भी हैं जिन्होंने करोड़ों रुपए खर्च कर अपार्टमेंट बनाए लेकिन वह अपना फ्लैट बेच नहीं पा रहे हैं क्योंकि आसपास के लोगों के दबाव में प्रशासन से डिस्टर्ब एरिया एक्ट के तहत क्लीयरेंस नहीं मिल रहा है। हालांकि डर की वजह से वह बात करने से इंकार कर देते हैं। बड़ोदरा ही नहीं अहमदाबाद में ऐसे कई मामले हैं, जहां जमीन खरीदने और करोड़ों रुपए खर्च के बाद भी मुस्लिम समुदाय के लोग उस जमीन पर कब्जा नहीं ले पा रहे हैं। इसके पीछे स्थानीय लोगों, बीजेपी नेताओं और सरकारी अधिकारी हैं और यह सब हो रहा एक कानून की आड़ में जिसका नाम है डिस्टर्ब एरिया एक्ट। इसे हम आगे विस्तार से समझेंगे। लेकिन उससे पहले इनसे मिलिए। अहमदाबाद के रखियाल इलाके के रहने वाले नबी से। रखियाल एक कमर्शियल इलाका है।
यहां छोटे-छोटे कारखाने हैं। यहां के दो बिल्डिंग की बोली एक बैंक द्वारा लगाई गई थी। 4 नवंबर 2023 को यह बोली लगी। इस बोली में आसपास के हिंदू और मुस्लिम भी शामिल हुए। सबसे ज्यादा कीमत ₹1 करोड़ 111600 देकर नबी ने जीत ली। बैंक को उन्होंने पैसे भी दे दिए लेकिन आज तक उस जमीन पर उनका कब्जा नहीं हो पाया है। 411.223 को मैंने बैंक ऑप्शन में प्रॉपर्टी खरीदी। उसमें ऑप्शन में और लोग भी शामिल थे जिसमें वही के स्टेट के लोग भी थे जिसमें हमने सबसे अधिक बोली लगाकर वो परचेस की। परचेस करने के बाद हमने पेमेंट भी कर दिया है। पेमेंट करने के बाद अभी तक हमको कोई पजेशन नहीं दिया गया। इसमें कहा गया कि असद परमिशन ले आएगी। असा परमिशन के लिए अप्लाई किया। स्टेट वालों ने लिखित में वहां अर्जी की कि इन्हें परमिशन ना दिया जाए। हम एक ही कम्युनिटी के लोग हैं। हिंदू कम्युनिटी के लोग हैं। मुस्लिम आएगा तो जाहिर साहब का भंग होगा। इसलिए मैं भी अप्लाई किया हुआ है और अप्लाई करने के बाद क्या नाम है? डिप्टी कलेक्टर ने उसका रिजेक्शन का एक ऑर्डर बना के दिया। उसमें भी यही उन्होंने उल्लेख किया है। 1 करोड़ 11600 के पैसे भर के मैंने ऑप्शन लिया। और भी लोग थे तो उन्होंने बोलिंग नहीं पढ़ पाए। मैंने ऑप्शन ज्यादा पैसे भरे उसके बाद भी मैंने प्रॉपर्टी ली पैसे भरने के बाद अभी तक मेरा ये ट्रांसफर का ऑर्डर नहीं हो पा रहा है उसमें परमिशन नहीं दे रहे लोग तो अभी आप हाई कोर्ट में है जी हाई कोर्ट में है अभी हम इससे आपका क्या नुकसान हो रहा है मेरा भाई एक्चुअली हम तो डेवलपर और व्यापारी है इससे हमारा एक करीबन डेढ़ साल हो गए हमारे पैसे फंसे हुए हम कम से कम व्यापार कर सकते थे व्यापार हमारा रुका हुआ है आसपास के लोग आपको क्या कह रहे हैं आसपास के लोगों ने कभी विरोध नहीं किया भी स्टेट की जो चेयरमैन है उन्होंने लेटर लिखा एक्चुअली एक बार इन्होंने ऑफर भी की भ हमको ही दे दो नहीं हम दे देंगे लेकिन हमारे को कुछ उचित मूल्य मिले तब ना हम डेढ़ साल पैसे लगे हुए हैं हमारा उचित मूल्य भी नहीं देना चाहते हैं आप हम तो व्यापारी आदमी नबी ने 4 नवंबर को बोली जीती उसी दिन जहां इनकी जमीन है उसके आसपास जिन लोगों की फैक्ट्री है उन्होंने एक पत्र डिप्टी कलेक्टर को लिखा यह पत्र स्मॉल स्केल कोऑपरेटिव स्टेट स्टेट लिमिटेड के प्रमुख बाबूलाल पटेल की तरफ से लिखा गया।
4 नवंबर 2023 को यह पत्र पटेल ने कलेक्टर को लिखा था जो गुजराती भाषा में है। हम इसका हिंदी आपको पढ़कर सुनाते हैं। इस पत्र में उन्होंने कलेक्टर को लिखा कि वर्तमान में हमारे स्टेट में सभी हिंदू व्यापारी एक ही समुदाय के हैं और इसी में अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति ने वर्तमान नीलामी में हमारे स्टेट में शेड नंबर 23 और 44 खरीदा है। इस शुभ भावना के साथ हमारी स्टेट का शांतिपूर्ण माहौल खराब ना हो। हमें आपसे विनम्र निवेदन करना है कि इस नीलामी में अल्पसंख्यक समुदाय जिसने संपत्ति खरीदी है उसे गुजरात अशांत क्षेत्र संपत्ति हस्ताक्षरण अधिनियम 1991 और संशोधन अधिनियम 2009 की अनुमति ना मिले। इस पत्र का कोई खास असर नहीं हुआ। नबीबुल्ला डिप्टी कलेक्टर के ऑफिस में गए। डिस्टर्ब एरिया एक्ट का सर्टिफिकेट लेने के लिए सेम पत्र पटेल ने 19 दिसंबर 2023 को लिखी फिर डीएम और दूसरे अधिकारियों को इसमें उन्होंने वही बातें दोहराई जो उन्होंने नवंबर के पत्र में कहा था। इसमें वो कहते हैं कि हमारे क्षेत्र में सभी हिंदू व्यापारी है और एक अल्पसंख्यक ने जमीन खरीदी है। उसे आसान धारा अधिनियम के तहत परमिशन ना दिया जाए।
यह पत्र भी गुजराती में था और हमने आपको हिंदी में पढ़ के सुनाया। कुछ ही दिनों में डिप्टी कलेक्टर ने डिस्टर्ब एरिया एक्ट के तहत अपना फैसला सुनाया। डिप्टी कलेक्टर के आदेश में लगभग वही बातें दोहराई गई जो पटेल ने अपने पत्र में लिखी थी। उसके बाद डिप्टी कलेक्टर का रिजल्ट आता है उस पे असान धारा को लेकर और यह भी गुजराती में ही है और वो डिप्टी कलेक्टर इन दो पत्रों का जिक्र अपने ऑर्डर में करते हैं और कहते हैं कि उन्हें मार्केट एसोसिएशन के चेयरमैन यानी पटेल का पत्र मिला था और उसके बाद वह फैसला लेते हैं कि यदि मुस्लिम समुदाय के व्यक्ति को यहां दुकान दिया जाता है जो उन्होंने खरीदा है तो सार्वजनिक शांति और सौहार्द भंग होने की संभावना है। इसीलिए हमारे पास संपत्ति के हस्तांतरण के लिए कोई राय नहीं है। हम नकारात्मक राय देते हैं। पटेल द्वारा लिखे पत्रों में और डिप्टी कलेक्टर द्वारा लिखे पत्र में कोई खास अंतर नहीं है। नजीमुल्ला इसके बाद हाई कोर्ट चले गए हैं। इस मामले में पत्र लिखने वाले पटेल से मिलने हम उनकी कंपनी में पहुंचे। तब वहां वह मौजूद नहीं थे। हमने मिलने के लिए फोन किया तो उन्होंने कहा कि मामला अभी कोर्ट में है। मेरे वकील ने मीडिया से बात करने से मना किया। वहीं जो पत्र लिखा गया उसमें दूसरा हस्ताक्षर चिंतन पांड्या का है। यह शख्स भी इस जमीन की बोली में शामिल था। यह जानकारी खुद इन्होंने हमें दी। हालांकि यह कहकर बात करने से इंकार कर दिए कि बात बढ़ाने की अब जरूरत नहीं है। यह मामला भी हाई कोर्ट में है। डिप्टी कलेक्टर ऑफिस कोर्ट को इसको लेकर जवाब नहीं दे रहा। जिसको लेकर उन्हें कई बार फटकार पड़ी है। जैसा कि आपने देखा नबी के मामले में अधिकारी कह रहे हैं कि मुस्लिमों की आबादी बढ़ने से कानून व्यवस्था खराब होगी। इस तरह के जवाब वाला यह इकलौता मामला नहीं है। पुराने अहमदाबाद इलाके में अल अमीन पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट ने अस्पताल बनाने के लिए 492 वर्ग मीटर की एक जमीन खरीदी जो पुष्पक नाम की इस बिल्डिंग में है। लेकिन 2024 में डिस्टर्ब एरिया एक्ट के परमिशन को लेकर जब ट्रस्ट ने डिप्टी कलेक्टर के दफ्तर में आवेदन दिया तो जवाब आया कि संपत्ति के हस्तांतरण से एक समुदाय की लोगों की संख्या का विनाश एवं बर्बादी होने की संभावना है तथा भविष्य में हिंदू मुसलमानों के मध्य सांप्रदायिक घटनाएं घटित होने की संभावना है।
भविष्य में क्योंकि रथ यात्रा शाहपुर थाना क्षेत्र से होकर गुजरती है तथा विगत वर्षों में रथ यात्रा जैसे धार्मिक अवसरों पर सांप्रदायिक घटना घटित हुई है। अतः मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या में वृद्धि होने की संभावना है। संभावना है। जिससे कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हो सकती है तथा सांप्रदायिक घटनाएं घटित हो सकती है। विचाराधीन संपत्ति का हस्तांतरण हिंदू और मुस्लिमों के बीच होने की संभावना है। जिसे भविष्य में लॉ और व्यवस्था की स्थिति में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है। जिससे कानून व्यवस्था की स्थिति खराब हो सकती है। विचाराधीन संपत्ति का हस्तांतरण विभिन्न समुदायों के बीच है। चूंकि अशांत धारा संपत्ति हस्तांतरण अधिसूचना इस क्षेत्र के लिए है। इसलिए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उक्त संपत्ति हस्तांतरण से सार्वजनिक शांति और सौहार्द भंग होगा। यदि संपत्ति के हस्ताक्षरण के लिए नकारात्मक राय दी गई है तो हम उसकी राय से सहमत हैं। तो इस तरीके से इसमें भी आसान धारा का परमिशन नहीं मिला और इसमें लिखा गया जो कुछ भी लिखा जा रहा है संभावना जताई जा रही है कि भविष्य में ऐसा हो सकता है। मुस्लिमों की आबादी बढ़ेगी तो कानून व्यवस्था खराब हो सकता है। आपने सुना कि डिप्टी कलेक्टर ऑफिस की तरफ से लिखा जा रहा कि अगर यहां मुस्लिम समुदाय को जमीन दी जाती है तो विनाश हो जाएगा। दंगे हो सकते हैं। इसीलिए डिस्टर्ब एरिया एक्ट का एप्लीकेशन रिजेक्ट किया जाता है। सर आप लोगों ने बीते साल एक जमीन दी थी। उसमें क्या हुआ है थोड़ा बताइए। हुआ ऐसा कि हमने आशानधारा के लिए कलेक्टर साहब डिपुटी कलेक्टर साहब के वहां पर एप्लीकेशन दी। तो कलेक्टर साहब के इसकी प्रोसीजर ये रहती है कि पहले पुलिस स्टेशन से ओपिनियन मंगाया जाता है। तो सारा उसमें दो विटनेसेस जिसमें दो हिंदू हो दो मुस्लिम्स हो और वो लोग आके ये एप्लीकेशन को जवाब वहां पर दाखिल करना पड़ता है और ये एप्लीकेशन जो सेलर है बयर नहीं सेलर जो के सेल कर रहा है प्रॉपर्टी को उनके द्वारा दी जाती है और उसके ऊपर फिर आगे का प्रोसेस होता है तो पुलिस स्टेशन में दो विटनेस आए जिसमें से दो हिंदू थे दो मुस्लिम थे दोनों ने सही तरीके से जवाब दिया और सारे उनको किसी भी तरह का कोई भी प्रकार का कोई आपत्ति उन्होंने दर्ज नहीं कराई और सारी पॉजिटिव बातें हुई और उसमें पुलिस की तरफ से भी सारा पॉजिटिव रहा पहले तो फिर उसके बाद में जब ये पुलिस कमिश्नर के द्वारा उसका कुछ नेगेटिव रिप्लाई आया जिसको कि जब डिपुटी कलेक्टर श्री ने उसका जो हमको ना मंजूर करने का यानी कि उसको परमिशन डिनाई की उसका हमको एक लेटर लिख के दिया जिसका जो रीजन दिया वो ये था कि यहां से रथ यात्रा निकल रही है और उसकी वजह से यहां पर दो कौम के बीच में डिस्टरबेंस हो सकता है कम्युनल यह बात कही गई है और इसी वजह से हमारी ये जो एप्लीकेशन है इसको इसको रिजेक्ट की गई।
लेकिन यह एक्चुअली कोई मुस्लिम नहीं खरीद रहा है। यह खरीद रहा है एक ट्रस्ट। यह मामला भी अभी हाई कोर्ट में चल रहा है। लेकिन इसी बिल्डिंग में पहले से ही अल अमीन अस्पताल चल रहा है। उसे विस्तार देने के लिए ट्रस्ट और जमीन खरीद रहा था। पहले आसान धारा की इजाजत मिल गई। लेकिन अब नहीं मिल रही है। आखिर क्यों? एक्चुअली यह प्रॉब्लम जो है यह कोई दो कौमों के बीच का नहीं है। यह पॉलिटिकल प्रॉब्लम है और यह पॉलिटिकल प्रॉब्लम की वजह से आफ्टर गुजरात इलेक्शन जो नए एमएलए और एमपीज और ये लोग इेड होके आते हैं। इन लोगों की एक कमेट बैठती है और वो लोग चाहते हैं कि भ सेंट्रलाइजेशन ऑफ द पपुलेशन ना हो। अच्छा दूसरा जो जो नकारा गया हमारा डिनाई किया गया आशानधारा की परमिशन को माननीय डिपुटी कलेक्टर सर की तरफ से तो वो ये रीजन दिया गया कि और पुलिस डिपार्टमेंट की तरफ से कि यहां से रथ यात्रा निकलती है। दिस अ रूट बराबर है। बट आप जाकर के मैप में चेक कर सकते हैं कि व्हाट इज द रूट? बराबर है। Google पर आज सब कुछ अवेलेबल है। तो रथ यात्रा का रूट में यह जगह आती ही नहीं है। यहां पर कोई रथ यात्रा निकलती ही नहीं है।
लेकिन फिर भी यह रीजन दे के इसको डिनाई करा गया कि भ ये हम आप नहीं परचेस कर सकते। आपने तीनों कहानी देखी। ऐसे दर्जनों मामले गुजरात के अलग-अलग जिलों में सामने आए हैं। मुस्लिम समुदाय के लोग जमीन खरीदते हैं तो कभी आसपास के हिंदू कभी हिंदूवादी संगठन तो कभी बीजेपी के विधायक पत्र लिखकर इसका विरोध करते हैं। इसका असर यह होता है कि डिप्टी कलेक्टर द्वारा डिस्टर्ब एरिया एक्ट का एप्लीकेशन रिजेक्ट कर दिया जाता है। उसका कारण भी आपने देखा ही। मुस्लिमों की आबादी बढ़ेगी तो दंगे होंगे। कानून व्यवस्था खराब होगी। यहां सभी हिंदू आबादी रहती है। आधी-आधी।
अब हम डिस्टर्ब एरिया एक्ट को समझते हैं। अभी तक आपने देखा कि कैसे डिस्टर्ब एरिया एक्ट के जरिए गुजरात के आम मुसलमान परेशान हैं। ऐसे कई मामले गुजरात हाई कोर्ट और दूसरी कानूनी संस्थाओं में चल रहे हैं। हमने जो डिस्टर्बड एरिया के अलग-अलग शहरों में और जगहों पे जो नोटिफिकेशंस इशू किए हैं। ऐसी 14 पिटीशंस फाइल करी हुई है तकरीबन। हम तो 14 यह पिटीशन है जो हम परसों कर रहे हैं कि नोटिफिकेशंस ही गलत है। आप नोटिफिकेशन को रिकॉल करो, रिसेंड करो। और तीसरा जो लिटिगेशन है वह यह है कि हम जहां गलत तरीके से डिस्टर्बड एरिया की परमिशन रिजेक्ट की गई है उन ऑर्डर्स को अगर हमको सही लगता है तो हाई कोर्ट में चैलेंज करते हैं क्योंकि हाई कोर्ट में चैलेंज करना अ एक लीगल प्रिंसिपल है कि आप हाई कोर्ट कब चैलेंज कर सकते हो कि जब आपके फंडामेंटल राइट्स का वायलेशन हो या प्रिंसिपल्स ऑफ नेचुरल जस्टिस का वायलेशन हो या स्टचटरी प्रोविजन के वायलेशन से ऑर्डर कर तभी कर सकते हो। नहीं तो आपको जो अपेलेट रेमेडी है जो स्पेशल सेक्रेटरी है गवर्नमेंट के वहां पर चैलेंज करना पड़ता है जो अपील प्रोवाइड की है तो हम वहां अपील कर रहे हैं कि जहां हमको लगता है कि अपील करनी चाहिए और नहीं होता तो हाई कोर्ट कर रहे हैं। हाई कोर्ट में आप देखिए कि हमारी तकरीबन 26 27 पिटीशंस ऐसी लगी हुई है हमारी और दूसरे लोगों की जो सब इसी इशू पे है कि जहां गलत तरीके से परमिशंस रिजेक्ट की गई है। जब यह कानून आया तो प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। गुजरात के जानेमाने वकील आनंद यागने का मानना है कि यह कानून अपनी शुरुआत से ही संविधान के खिलाफ रहा। मेरा यह मानना है कि कांग्रेस की सरकार ने 80 के दशक में यह सांप्रदायिक कानून को लागू किया।
मुसलमानों को हिंदू एरिया में घर लेने के लिए रोकने के लिए यह कानून लागू होता है। मैंने ऐसे कभी नहीं देखा कि किसी हिंदू मुसलमान एरिया में गया और उसको घर लेते हुए रोका गया। मुसलमान को रोका जाता है। लेकिन यह डिस्टर्ब एरिया एक्ट है क्या जो गुजराती मुसलमानों के लिए सिरदर्द बना हुआ है? एक तरफ जहां दावा किया जाता है कि 370 हटाए जाने के बाद कश्मीर में कोई भी जमीन खरीद सकता है। लेकिन गुजरात के मुस्लिम अपने ही राज्य के कई इलाकों में जमीन नहीं खरीद पा रहे हैं और अगर खरीद भी लेते हैं तो उस पर कब्जा नहीं कर पाते।
गुजरात में 80 के दशक में काफी भयावह दंगे हुए। जिसके बाद हिंदू इलाकों में रहने वाले मुस्लिम और मुस्लिम इलाकों में रहने वाले हिंदुओं का घर असामाजिक तत्व धमका कर सस्ते दरों पर खरीदने लगे। फिर से मैं कहूंगा कि बहुत लोडेबल और बहुत नोबल ऑब्जेक्ट से ये एक्ट लाया गया था और इसलिए अभी तक इसका किसी ने कोई ऐतराज नहीं जताया। लोग नकार करते रहे। लेकिन इतना अच्छा एक्ट था। उसका इस्तेमाल गलत तरीके से होने लगा। 1995 के बाद वो ऐसे होने लगा के डिस्टर्बड एरिया डिक्लेरेशन होता है सेक्शन थ्री के नोटिफिकेशन से। सेक्शन थ्री यह कहता है कि इफ देयर आर इंटेंस राइट्स फॉर अ लॉन्ग ड्यूरेशन देन द एरिया कैन बी डिक्लेयर्ड टू बी डिस्टर्बड एरिया। अब हुआ यह कि 1995 के बाद जब से यहां पर गुजरात में भारतीय जनता पार्टी की गवर्नमेंट बनी है। इन्होंने इंटेंस रायट है कि नहीं? लगर ड्यूरेशन के रस है या नहीं उस वो अगर नहीं भी है तो भी एक एरिया को अगले 5 साल के लिए डिस्टर्बड एरिया डिक्लेअ करना शुरू कर दिया और वो डिक्लेरेशन के बाद में जैसे पांच साल खत्म हो रहे हैं वो पांच साल एक्सटेंड करे जा रहे हैं और वो 1995 से आज तक एक्सटेंड होता जा रहा है वो इसलिए है कि ये डिस्टर्बड एरिया को इनको इस्तेमाल करना था लोगों को सेग्रगेट करने के लिए अलग-अलग हिस्सों में बांटने के लिए ताकि एक कम्युनिटी के लोग एक एरिया में आ जाए। हिंदू लोग एक एरिया में आ जाए, मुसलमान लोग एक एरिया में आ जाए और इस तरह से लोग बिल्कुल बट जाए।
ये डिवाइड करने के लिए सेग्रगेट करने के लिए इनको ये करना था। तो इन्होंने डिस्टर्बड एरिया डिक्लेअ करना शुरू किया क्योंकि डिक्लेयर एक बार वो एरिया डिक्लेअ हो जाता है डिस्टर्बड एरिया और उसमें किसी को भी सेल ट्रांजैक्शन करना है तो कलेक्टर की परमिशन के बगैर हो नहीं सकता और कलेक्टर तभी परमिशन देगा कि जब उसको लगेगा कि भाई सरकार का जो पर्पस है वो सर्व हो रहा है। अगर नहीं हो रहा है तो परमिशन नहीं देगा। एक्ट में साफ लिखा है कि दंगे की इंटेंसिटी और उसके ड्यूरेशन को देखते हुए यह धारा लगाई जाती है। लेकिन प्रदेश में बीजेपी की सरकार आने के बाद इसको बड़े स्तर पर अलग-अलग जिलों में लगाया गया। सूचना के अधिकार के तहत साल 2023 में मिली जानकारी के मुताबिक अभी तक यह प्रदेश के 12 जिलों में लगा हुआ है। एक तरफ जहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दूसरे बीजेपी के नेता दावा करते हैं कि साल 2002 के बाद गुजरात में कोई दंगा नहीं हुआ है। मने एक बात कहो छले 2002 मा लोगों ने चमकलू करवानी हिम्मत करी थी। 2002 में करी थी ना हिम्मत। ये वक्त वो पाठ बनाो वि सीधा करा जेल मा ना तो 22 वर्ष थ्या जी सुधि एक बार कर्फ्यू नको पड़ो भाई एक बार कर्फ्यू ऐसे में यह कानून क्यों अलग-अलग जिलों में लगाए जा रहे हैं उनका ड्यूरेशन बढ़ाया जा रहा है जैसा कि ऊपर हमने बताया कि किसी भी जमीन या संपत्ति की बिक्री के दौरान इस कानून के तहत दो बिंदुओं को देखना था। बेचने वाला अपनी मर्जी से बेच रहा है और उसे उसकी संपत्ति की बाजार कीमत मिल रही है।
इसके जरिए भी मुस्लिमों को जमीन खरीदने में परेशानी तो आ ही रही थी। जैसे ऊन अली के मामले में हुआ। लेकिन साल 2020 आते-आते इस कानून में प्रदेश सरकार ने संशोधन किया। जब यह रिलीजियस लाइन पे परमिशंस रिजेक्ट करने लगे तो लोगों ने उसको चैलेंज किया। वो चैलेंज हाई कोर्ट तक पहुंची और हाई कोर्ट में जब केस आने लगे तो हाई कोर्ट ने कायदा देखा जो लॉ है और हाई कोर्ट ने कहा ये इस तरह से रिलीजियस लाइन पे आप जो रिजेक्ट कर रहे हो वो गलत है और हाई कोर्ट वैसे सारे जो रिजेक्टेड परमिशंस थी उनको अलव करने लगी। अब जब हाई कोर्ट अलव करने लग गई तो सरकार को लगा कि भाई हमारा जो मंशा है वो पूरा नहीं हो रहा है। तो सरकार ने क्या करा कि जब मालूम पड़ा कि हाई कोर्ट से सब परमिशन हो रही है तो सरकार ने कायदे के अंदर अमेंडमेंट लाई। और अमेंडमेंट ऐसा लाई कि क्या यह ट्रांजैक्शन से पोलराइजेशन हो रहा है? पोलराइजेशन का मतलब यह है कि अगर कोई एरिया हिंदू का एरिया है तो उस एरिया में क्या कोई मुसलमान तो नहीं खरीद रहा। अगर खरीद रहा है तो वह भी डिस्टर्ब एरिया है। और दूसरी चीज है कि डेमोग्राफिक इक्विलब्रियम देखा जाएगा कि एक मिसाल के तौर पे अगर एक इलाके के अंदर 60% हिंदू हैं, 40% मुसलमान है तो अगर मुसलमान और कुछ प्रॉपर्टी खरीदते हैं, मुसलमान का परसेंटेज बढ़ जाता है तो इनके हिसाब से डेमोग्राफिक इक्विलिब्रियम चेंज हो जाता है। वो भी डिस्टर्बड एरिया का क्राइटेरिया में आ गया। तीसरा है इंप्रोपर क्लस्टरिंग। यानी अगर एक इलाका हिंदू एरिया है तो एक प्रॉपर क्लस्टरिंग है।
एक समाज के एक धर्म के लोग उस एरिया में रह रहे हैं। अब अगर मुसलमान उस एरिया में कभी प्रॉपर्टी लेने की कोशिश करेगा तो वो इंप्रोपर हो जाएगा। इसलिए उसको भी मॉनिटर किया जाएगा। उसको भी रोका जाएगा। अब ये दो ये तीन बहुत बड़े क्राइटेरिया इन्होंने डाल दिए कि इस तरह से भी होगा तो डिस्टर्ब एरिया डिक्लेअ किया जा सकता है और उसके ट्रांजैक्शंस को भी रोका जा सकेगा। हमने उसको उसकी कॉन्स्टिट्यूशनल वैलिडिटी हाई कोर्ट में चैलेंज की क्योंकि यह आर्टिकल 14 और 15 के डायरेक्टली अगेंस्ट में है। यानी कॉन्स्टिट्यूशन के जो बेसिक फीचर्स हैं जिसको जो फंडामेंटल फीचर्स है जो बेसिक कैरेक्टर जो स्ट्रक्चर है सॉरी बेसिक स्ट्रक्चर है जो कॉन्स्टिट्यूशन का जो सुप्रीम कोर्ट ने अपोल्ड किया उसके खिलाफ है। फ्रेटरनिटी एक बहुत बड़ा उसका एक पार्ट है हमारे प्रएमबल का तो उसके खिलाफ है। हमारी पिटीशन हाई कोर्ट ने एक्सेप्ट करी और हाईकोर्ट ने यह जो अमेंडमेंट लाए उसको स्टे कर दिया ताकि इस तरह से इस ग्राउंड पे डिस्टर्बड एरिया ना डिक्लेअ किया जाए ना ट्रांजैक्शन में दखल अंदाजी हो।
हाई कोर्ट ने इस अमेंडमेंट पर रोक लगा दी। हालांकि हकीकत यह है किसी अमेंडमेंट के जरिए जो बदलाव किया गया था उसी के आधार पर कई डिप्टी कलेक्टर फैसला ले रहे हैं। जैसे नबी उल्ला और अल अमीन ट्रस्ट के मामले में ही देख सकते हैं। अहमदाबाद के एक डिप्टी कलेक्टर ने न्यूज़ ल्ड्री को बताया कि उनके क्षेत्र में डिस्टर्ब एरिया एक्ट के भी आधे दर्जन से ज्यादा मामले चल रहे हैं और हम अमेंडमेंट वाला कानून ही इस्तेमाल कर रहे हैं। मैंने पूछा कि उस पर तो हाई कोर्ट का स्टे है। इस पर वह कहती है हमने उसे चैलेंज तो किया हुआ है। डिप्टी कलेक्टर सही कह रही थी। ऐसा मोहम्मद ताहिर बताते हैं। एक प्रोविजन या अमेंडमेंट जिसको हाई कोर्ट ने स्टे किया है। उसको अप्लाई करते हुए गलत तरीके से एप्लीकेशन में रिजेक्ट कर रहे हैं। हमारे पास ऑप्शन है कि हम उसको चैलेंज करें। कोर्ट कचहरी के धक्के खाए। हाई कोर्ट जब उसको सेटसाइड करे। हाई कोर्ट कहे कि ये गलत है। तब हमको वो रिलीफ मिलेगी। डिस्टर्ब एरिया एक्ट को लेकर हम प्रदेश के गृह मंत्री हर संघवी से मिलने उनके गांधीनगर स्थित दफ्तर पहुंचे। वहां हमसे इंटरव्यू किस विषय पर है इसकी जानकारी ली गई। बताने के बाद कहा गया कि आपको बुलाया जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बिना बात किए हमें लौटना पड़ा। डिस्टर्बरी एक्ट का असर यह हुआ कि गुजरात के मुस्लिम घटों यानी एक इलाके में तब्दील होते गए। आज यहां अमीर से अमीर मुसलमान पैसे होने के बावजूद किसी सोसाइटी में घर नहीं खरीद सकता। उसे उसी इलाके में रहना पड़ता है जहां मुस्लिम आबादी रहती है।
रिस्चर सारिक लालीवाला अहमदाबाद के जुहापुरा को संभवत देश की सबसे बड़ी आबादी वाला मुस्लिम इलाका बताते हैं। बड़े शहरों अहमदाबाद, बरोड़ा धीरे-धीरे दूसरे शहरों में भी जा रहा है। छोटे शहरों में हिम्मत नगर, खंभात इन जगहों पे एक धारणा बन चुकी है कि हिंदू मुसलमान प्रॉपर्टी एक दूसरे से नहीं खरीदेंगे या नहीं बेच पाएंगे। एक धारणा एक यह कानून से बनी है कि यह कानून आपको रोकेगा और दूसरा यह है कि इन जनरल सोसाइट का सोसाइटी का पोलराइजेशन इतना हो चुका है कि ये जनरली अहमदाबाद में हम नहीं देखते और अब बरोड़ा में भी नहीं देखते कि मुसलमान कोई हिंदू से प्रॉपर्टी खरीदना चाहे। तो मेरा मानना यह है कि 2010 के बाद एक ऐसा सिलसिला चला है कि अगर यह लॉ रहे भी नहीं फिर भी ज्यादातर मुसलमान आबादी अब अपने गेटोस में सीमित हो चुकी है। अहमदाबाद उसका एक एक्सट्रीम उदाहरण है।
लेकिन अब वही हो रहा है बरोड़ा में और दूसरे शहरों। साल 2011 के जनगणना के मुताबिक गुजरात में मुस्लिम आबादी तकरीबन 10% है। लेकिन आज उस समुदाय का महज एक ही विधायक है इमरान खेड़ावाला। यह डिस्टर्ब एरिया एक्ट पर प्राइवेट बिल लाने की बात कर रहे हैं। प्राइवेट बिल जिसको कहते हैं आसान धारा का तो मैं खुद लेके आया था। इस वक्त मैंने बिल रखा था लेकिन चर्चा में नहीं आया। नेक्स्ट टाइम अब जो सत्र चालू होगा विधानसभा की असेंबली चालू होगी जब आएगा। उसके अंदर मैंने यह बताया कि सरकार एक तरफ कहती है कि 30 साल से हमारी गवर्नमेंट है। 30 साल से यहां पर कोई भी दंगा नहीं हुआ। कोई भी कर्फ्यू नहीं लगा। आज यंग जनरेशन जो बच्चे हैं उनको 28 से 25 वाले उनको पता ही नहीं है कि कर्फ्यू क्या चीज है। जब इतनी बड़ी-बड़ी बातें सरकार करती है तो मैं उनको बोला तो फिर भी कि आप नए-नए विस्तारों में आसान धारा क्यों लगाते हैं? आज हिंदू भी परेशान है। उसको उसका मकान बेचना है। यहां से जाना है। लेकिन वो आसानधारे के मंजूरी के लिए बहुत सी जगहों पे फाइल चली जाती है। और उसमें बड़े पाए पे करप्शन होता है। वक्त भी खराब होता है। पैसा भी खर्च होता है और परिणाम कुछ नहीं मिलता। परमिशन फिर तो मिल तो जाती है। ऐसी बात भी नहीं है कि परमिशन नहीं मिलती। परमिशन तो मिल ही जाती है लेकिन उसके अलग-अलग प्रोसेस के अंदर गुजरने के बाद वो परमिशन मिलती है। वो जगह पे जहां आसान धारा है वहां भी परमिशन मिल जाती है। तो बात ये है कि इस सिस्टम को इजी करने के लिए इनको ये जो आसान धारा लाए लेकिन ये सिस्टम और मैं समझता हूं कि पेचीदा बना दिया इन्होंने। तो आने वाले दिनों के अंदर ये जब मैं बिल विधानसभा के अंदर रखूंगा तो ये बिल को रद्द करने के लिए मैंने बात की है कि कोई दूसरे स्टेट के अंदर कोई जगह पे एहसानधारा नहीं है।
सिर्फ गुजरात के अंदर ही गुजरात स्टेट के अंदर ही आसान धारा का कायदा है। हमारी इस रिपोर्ट में आपने देखा कि एक कानून की वजह से कैसे गुजरात के मुसलमान परेशान है। वो जमीन या कोई संपत्ति नहीं खरीद पा रहे हैं। जिसके कारण ये गेटों में तब्दील होते जा रहे हैं। लेकिन गेटों में तब्दील होने के बाद क्या होता है? हमारी दूसरी रिपोर्ट में आप जानेंगे कैसे लोगों को अपने इलाके में डेवलपमेंट कराने के लिए मामूली सा विकास जैसे नाली बनवानी हो सड़क बनवानी हो तालाब हो पानी पहुंचवानी हो इन तमाम चीजों के लिए कोर्ट का रुख करना पड़ता है और कोर्ट के आदेश के बाद उन तक पानी या दूसरी सुविधाएं पहुंचती है। ऐसे ही गुजरात में जो मुस्लिम समुदाय के लोग हैं, वह किन-किन परेशानियों से गुजर रहे हैं?