अपनी फिल्म को सिल्वर जुबली बनाने का सपना लिए मुंबई आया था एक्टर, निधन के बाद मिली कामयाबी।

एक ऐसे शख्सियत की कहानी जिसने हिमाचल की पहाड़ियों से निकलकर बॉम्बे की चकाचौंध में अपने सपनों का आलम रचा यह कहानी है जुगल किशोर की एक इंसान जिसने गरीबी की कड़वी सच्चाई को ठुकराया और सिनेमा की दुनिया में अपनी मेहनत से एक अलग मुकाम हासिल किया उनकी जिंदगी में संघर्ष था जुनून था और एक ऐसा सपना था जो उन्हें कभी रुकने नहीं देता था तो चलिए इस रोमांचिक सफर को शुरू करते हैं जुगल किशोर का जन्म हिमाचल प्रदेश के पालमपुर के पास थकुर द्वार गांव में हुआ।

हरी-भरी वादियों में बसा यह गांव उनकी जिंदगी का पहला ठिकाना था मगर यहां की जिंदगी आसान नहीं थी छोटी उम्र में ही उनके पिता का साया उठ गया मां दिन रात मेहनत करती पर घर में दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से जुटती जुगल की आंखों में सपने थे वो सपने जो गांव की तंग गलियों में कैद नहीं रह सकते थे एक दिन अपनी मां के हाथों में खाली थाली देखकर जुगल ने ठान लिया कि वे इस गरीबी को हटाएंगे उनके पास ना पैसा था ना रास्ता लेकिन हौसला था और यही हौसला उन्हें 1940 के दशक में बॉम्बे की ओर ले गया बॉम्बे पहुंचते ही जुगल को इस शहर की हकीकत समझ आ गई सड़कों पर भीड़ स्टूडियो के बाहर लंबी कतारें और हर चेहरे पर एक ही सवाल काम कब मिलेगा जुगल ने छोटे-मोटे काम शुरू किए कभी स्टूडियो के बाहर पानी बेचा कभी सेट पर सामान ढोया।

लेकिन उनकी नजर हमेशा पर्दे पर थी 1942 में उनकी किस्मत ने पहला दरवाजा खोला फिल्म नजराना में उन्हें एक छोटा सा रोल मिला यह उनकी एक्टिंग की शुरुआत थी फिर 1946 की फिल्म धरती में वो गोपाल के किरदार में नजर आए उनकी सादगी और मेहनत ने लोगों का ध्यान खींचा 1951 में शोखियां और 1953 में दो बीघा जमीन में भी वह छोटे किरदारों में दिखे जुगल की अदाकारी में एक अलग अंदाज था वो बड़े रोल्स में नहीं बल्कि छोटी-छोटी भूमिकाओं में अपनी छाप छोड़ते थे ।

1950 का दशक आते-आते जुगल की जिंदगी में नया मोड़ आया वो सिर्फ एक्टिंग तक सीमित नहीं रहना चाहते थे एक दिन सेट पर बैठे-बैठे वो अपनी डायरी में कहानियां लिखने लगे उनकी मुलाकात हुई मशहूर फिल्म मेकर सोहराब मोदी से सोहराब मोदी ने चुगल की स्क्रिप्ट देखी और कहा इस लड़के में कुछ बात है 1956 में जुगल ने डायरेक्शन की दुनिया में कदम रखा उनकी पहली फिल्म थी गुलाम बेगम बादशाह एक ऐतिहासिक ड्रामा जिसे उन्होंने डायरेक्ट किया फिल्म ने ठीक-ठाक कमाई की और जुगल को यकीन हो गया कि वह सही रास्ते पर है।

इसके बाद 10 ओ क्लॉक 1958 और भांगड़ा 1959 जैसी फिल्मों में उन्होंने अपनी डायरेक्शन की कला को और निखारा जुगल का असली जादू तब चमका जब उन्होंने पंजाबी सिनेमा में कदम रखा 1964 में आई फिल्म जगगा जिसमें दारा सिंह ने मुख्य भूमिका निभाई यह फिल्म 20वीं सदी के डाकू जगट की कहानी थी जुगल ने दारा की ताकत को पर्दे पर ऐसे उतारा कि फिल्म ने नेशनल फिल्म अवार्ड जीत लिया दारा ने बाद में कहा जुगल ने मुझे वो मौका दिया जिसने मेरी जिंदगी को नई दिशा दी इसी साल एक दिन का बादशाह में भी जुगल ने डायरेक्शन और एक्टिंग दोनों की उनकी एक्टिंग का सिलसिला भी चलता रहा लाल बंगला 1966 में वो सीआईडी इंस्पेक्टर शंकर कपूर बने तो फैसला 1965 में मोती के रोल में दिखे जुगल की नजर हमेशा नए टैलेंट पर रहती थी 1976 में उनकी फिल्म दो खिलाड़ी आई जिसमें उन्होंने एक युवा शशि पुरी को मौका दिया।

शशि एक साधारण परिवार से आए थे मगर उनकी आंखों में वही जुनून था जो कभी जुगल की आंखों में जलता था दो खिलाड़ी में शशि ने सेकंड लीड रोल निभाया और इस फिल्म की मशहूर कवाली रात अभी बाकी है बात अभी बाकी है ने उन्हें खूब सुर्खियां दिलाई जानी बाबू कवाली की आवाज में गाई यह कवाली आज भी लोगों के दिलों में बसी है एक ऐसा गीत जो रात की खामोशी में जिंदगी की बातें कह जाता है इसके बाद 1979 में दादा में भी शशि ने सेकंड लीड किरदार निभाया जुगल ने उन्हें ऐसा मंच दिया कि वह इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने लगे शशि हमेशा कहते जुगल साहब मेरे लिए गुरु थे उनकी फिल्मों ने मुझे वह पहला कदम दिया जिसने मेरी राह आसान की इसके साथ ही जुगल की फिल्में चलती रही खोज 1971 सबक 1973 अपराधी 1974 और दो खिलाड़ी 1976 तक उन्होंने डायरेक्शन और एक्टिंग दोनों में हाथ आजमाया दो खिलाड़ी में वह जग के रोल में भी नजर आए लेकिन जुगल का सबसे बड़ा सपना था एक ऐसी फिल्म बनाना जो इतिहास में दर्ज हो 1979 में वो सपना सच हुआ फिल्म दादा इसे उन्होंने डायरेक्ट भी किया और प्रोड्यूस भी विनोद मेहरा बिया गोस्वामी जीवन और अमजद खान जैसे सितारों से सजी यह फिल्म एक क्राइम ड्रामा थी गाना दिल के टुकड़े-टुकड़े करके इतना हिट हुआ कि केजे युसुदास को फिल्मफेयर अवार्ड मिला अमजद खान को बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर मिला दादा ने सिल्वर जुबली मनाई 25 हफ्ते थिएटर में चलने का रिकॉर्ड और यह जुगल की जिंदगी की सबसे बड़ी कामयाबी थी सेट पर वो कहते यह फिल्म मेरे सपनों का आखिरी चिराग है मगर किस्मत को कुछ और मंजूर था दादा की रिलीज के कुछ ही दिन बाद 21 जून 1979 को चुगल किशोर इस दुनिया से चले गए बॉम्बे में उनका निधन हुआ।

दुख की बात यह थी कि वो अपनी पहली सिल्वर जुबली फिल्म की पूरी कामयाबी देख भी ना सके जब थियेटर में लोग तालियां बजा रहे थे जुगल अस्पताल में अपनी आखिरी सांसे ले रहे थे उनकी मृत्यु ने इंडस्ट्री को झकझोर दिया जो शख्स कभी थकुर द्वार की गलियों से निकला जिसने जगगा से लेकर दादा तक का सफर तय किया वो चुपचाप चला गया जुगल किशोर की जिंदगी एक मिसाल है 1940 में नजराना से एक्टिंग शुरू की 1956 में गुलाम बेगम बादशाह से डायरेक्शन की दुनिया में आए और 1979 तक अपने जुनून को जिया चोरी चोरी 1972 में जेलर लालच 1972 में एक किरदार हम पांच 1980 में उनकी आखिरी झलक वो हर रोल में चमके उन्होंने शशि पुरी जैसे सितारों को मौका दिया दारा सिंह को नई ऊंचाइयां दी और अपनी फिल्मों से दर्शकों को बांधे रखा मगर आज जुगल किशोर जैसे लोग भुला दिए गए हैं।

उनकी कहानियां उनका संघर्ष उनकी मेहनत यह सब अब पुरानी यादों में सिमट गया है शायद हमें ऐसे सितारों को फिर से याद करना चाहिए जो कभी सिनेमा के आसमान में चमके मगर वक्त की धूल में कहीं खो गए।

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