1979 से ईरान की तकदीर लिखने वाले एयतुल्ला अली खामने का युग समाप्त हो गया है। अमेरिका और इजराइल के हमले ने ना केवल ईरान के को ध्वस्त किया बल्कि सुप्रीम लीडर की सत्ता का भी अंत कर दिया। लेकिन इस मौत की गूंज तेहरान से ज्यादा दिल्ली के सियासी गलियारों में सुनाई दे रही है।
भीम आर्मी चीफ और नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने एक ऐसा बयान दे दिया है जिसने भारतीय राजनीति में भूचाल ला दिया है। इजराइल और अमेरिका के दावों के बाद अब खुद ईरानी मीडिया ने भी आधिकारिक पुष्टि कर दी है। ईरान के रक्षा मंत्री और कई शीर्ष अधिकारियों के साथ खाम अब इस दुनिया में नहीं रहे।
पूरे ईरान में 40 दिनों के राजकीय शोक की घोषणा भी कर दी गई है। सड़कें मातम में डूबी हैं। लेकिन भारत में इस मौत पर शहादत और दोस्ती की नई बहस छिड़ गई है। नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने खामनई को भारत का वफादार दोस्त करार देते हुए एक लंबी पोस्ट लिखी।
आजाद ने अमेरिका को वैश्विक तानाशाह बताते हुए कहा कि हमला संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का खुला उल्लंघन है। आजाद ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा ईरान के सर्वोच्च नेता और भारत के मित्र अयातुल्ला अली खामनी के निधन की खबर एक युग के अंत का संकेत है।
भारत ईरान संबंध सदियों पुराने सांस्कृतिक व्यापारिक और रणनीतिक विश्वास पर आधारित है। ऊर्जा सुरक्षा से लेकर क्षेत्रीय स्थिरता तक यह रिश्ता अहम रहा है। पाकिस्तान के साथ तनाव के दौर में भी ईरान ने भारत के साथ सहयोग और संतुलन का रास्ता चुना।
पश्चिम एशिया में बढ़ता चिंताजनक है। दुनिया कब तक तथाकथित वैश्विक तानाशाहों की दखल अंदाजी झेलेगी? क्या संयुक्त राज्य अमेरिका हर सहमति का जवाब प्रतिबंध और युद्ध से देगा? अमेरिका की यह कारवाई अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद दो चार का खुला उल्लंघन है जो किसी भी संप्रभु राष्ट्र की क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान का निर्देश देता है। किसी भी देश के राष्ट्रीय अध्यक्ष को उनके अपने देश की सीमा के भीतर बिना किसी युद्ध की घोषणा या कानूनी प्रक्रिया के निशाना बनाना एक गंभीर अपराध है।
यह कदम वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए अत्यंत घातक है। अब प्रधानमंत्री जी को स्पष्ट करना चाहिए कि भारत युद्ध की राजनीति के साथ खड़ा है या बुद्ध की करुणा और स्वतंत्र कूटनीति के साथ। भारत की आवाज शांति, न्याय और बहुध्रवीय विश्व व्यवस्था के पक्ष में बुलंद होनी चाहिए। ऐसे योद्धा की शहादत को हम नमन करते हुए शांति, सद्भाव और मानवता के संदेश में बदले।
अलविदा भारत के वफादार दोस्त समाधान नहीं विनाश है। वहीं एआईएमआईएम चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने इसे एक अनैतिक कृत्य बताया। ओवैसी ने जिनेवा शांति वार्ता के बीच लड़कियों के स्कूल पर हुई बमबारी और 108 छात्राओं की मौत पर गहरा दुख जताया। उन्होंने इजराइल और पाकिस्तान दोनों को उपद्रवी शक्तियां कहा। सबसे पहली बात तो यह है कि ट्रंप ने और बेंजामिन ने नितिन याहू ने रमजान के मुबारक महीने में जहां पर पूरी दुनिया के मुसलमान रमजान में रोजा रखते हैं।
इबादत करते हैं रातों में। ऐसे मुबारक महीने में उन्होंने मिलकर ईरान पर हमला किया है और ये भी नहीं समझा कि मुबारक महीना रमजान का है मगर खैर वो तो इंसानियत को नहीं मानने वाले हैं बियन ननिया और जो हमला हुआ ईरान के ऊपर हम उसकी मजम्मत करते हैं और खासतौर से जब जेनेवा में बातचीत के जरिए से एक ब्रेक एक थ्रू हुआ था और हो सकता था कि अगर वो बातचीत को मान लेते तो जितने न्यूक्लियर स्टॉक पाइल्स थे ईरान के पास वो शायद इस्तेमाल नहीं होते। मगर अब इन्होंने मिलकर ईरान पर हमला किया जिसकी वजह से 200 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। और एक लड़कियों के स्कूल में 108 जो बच्चियां स्कूल में पढ़ते हैं उनकी मौत हो गई। आयतुल्लाह खामिनी की मौत हुई है और मैं इसको इमोरल और अनलॉफुल एक्ट मानता हूं आयतुल्लाह खामिनी की मौत को और मेरी तरफ से हमारी पार्टी की तरफ से ना सिर्फ उनके शिया वर्ल्ड को बल्कि बुरे लोगों को जो उनको अपना रहबर मानते थे शिया कौम उनको अपना रहबर मानती थी और हम ये मुतालबा करते हैं कि ये जंग खत्म होनी चाहिए। और भारत सरकार को इसमें अपना रोल निभाने की जरूरत है और हम उम्मीद करते हैं कि मौजूदा बीजेपी की सरकार आयतुल्लाह खामन की
खामने की ने मिडिल ईस्ट के साथ-साथ भारत की आंतरिक राजनीति को भी गमा दिया है। एक तरफ अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की बात हो रही है तो दूसरी तरफ भारत की रणनीतिक हितों की। क्या चंद्रशेखर आजाद की यह वफादार दोस्त वाली टिप्पणी भारत की विदेश नीति पर कोई दबाव डालेगी और क्या सरकार इस पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण देगी?
