आप अगर कहोगे इसको एज अ रियलिटी देखोगे लारी की बिल्कुल 100% ये रियलिटी है नहीं आप इसको कह सकते हो कि 25% ये लेरी की रियलिटी हो सकती है लेकिन 75% ये नहीं हो सकती है लारी की रियलिटी अक्षय खन्ना ने किया तो उन्होंने रोल तो बहुत ही बेहतरीन निभाया है लेकिन अगर हकीकत कहो तो मैं एज अ लारी का खुद रहने वाला हूं बल्कि मैं रहमान भाई का खुद हमसाया हूं मेरा घर उनके घर के साथ ही और हम कारोबार भी करते हैं यहां पे। तो मैं उनको कभी नहीं कहूंगा। मैं उनको रहमान भाई कह सकता हूं। उनको खान भाई कहता था
चौधरी असलम जो एसपी उनको दिखाया गया ना इस फिल्म में उसको बहुत ज्यादा हीरो बनाकर दिखाया गया ना। तो मैं खुद एज अ लारी वाला होके ना तो मैं आपको यह बता दूं के उनको इस कदर दिखाया गया कि वन मैन आर्मी शो कर दिया गया। रहमान बलोच जो है ना हमारे इलाके के रहने वाले बच्चा था। हमारा साथी था, भाई था वो इस तरह नहीं है जिस तरह उनको दिखाया गया। जिस तरह दिखाया गया वो दहशत गर्द नहीं था। वो बिल्कुल समाजी बंदा था। बिल्कुल फलाई काम करता था। अच्छों के लिए अच्छा था। बुरों के लिए बुरा था। चौधरी असलम को जो दिखाया गया वो बिल्कुल एक अदाकार है हमारे कराची के लिए वो। वो जाली मुकाबले में आठ दिन उन्होंने जो कहानी बनाई उस पे सिर्फ हमारे आवाम को लूटा गया। बुलडोजर किया गया और बख्तरबंद गाड़ी के नीचे मासूम बच्चों को कुचला गया। उसमें सबसे अच्छी बात ये लगी कि इसमें बलोचों को प्रमोट किया गया। लहरी के जैसे हमारे इलाकों का नाम लिया गया। शेरोन, बगदादी, कलाकोट ये सारा कुछ लिया गया।
तो फिल्म में रहमान डकैड कहलाया गया। वो फर्स्ट ऑफ ऑल डकैड नहीं था। क्योंकि लिया वालों के अगर हम बात करें ना तो उसे हम कान भाई के नाम से बुलाते थे। रहमान बलोच के नाम से बुलाते थे। ठीक है? में उसको कोई डकैड नहीं था। और फर्स्ट ऑफ ऑल मतलब लिहारी में तो ये डकैती वगैरह ये कुछ जो फिल्म में बताया गया है वगैरह वैसा कुछ नहीं था। वो लिहारी के ऊपर ज्यादा लिया पे ज्यादा फोकस है उसका। सही है। कैसी लगी फिल्म आपको और वो कैसी लगी आपको? यार फिल्म एज अ फिल्म एक्शन के हिसाब से बहुत ही बेहतरीन फिल्म है। हमने बहुत ही उसको एंजॉय किया। अ आप एज अ एक्शन उसको कह सकते हो कि अभी तक की जितनी फिल्में जो लास्ट जैसे एनिमल चली थी उसके मुकाबले में इसको बहुत प्रमोट किया गया। लेकिन आप अगर कहोगे इसको एज अ रियलिटी देखोगे लारी की बिल्कुल 100% ये रियलिटी है नहीं। आप इसको कह सकते हो कि 25% ये लेरी की रियलिटी हो सकती है।
लेकिन 75% ये नहीं हो सकती है लारी की रियलिटी। अच्छा इसमें जो रहमान का जो रोल है जी उसमें और फिल्म में जो उसमें कितनी हकीकत अ रहमान डकैत का जो रोल अक्षय गन्ना ने किया तो उन्होंने रोल तो बहुत ही बेहतरीन निभाया है लेकिन अगर हकीकत कहो तो मैं एज अ लारी का खुद रहने वाला हूं बल्कि मैं रहमान भाई का खुद हमसाया हूं मेरा घर उनके घर के साथ ही है और हम कारोबार भी करते हैं यहां पे। तो मैं उनको कभी डकैत नहीं कहूंगा। मैं उनको रहमान भाई कह सकता हूं। उनको खान भाई कहता था। तो क्योंकि वो कभी इलाके वालों के लिए गलत नहीं थे, खराब नहीं थे, बुरे नहीं थे। अगर जो उनकी जिंदगी में बाकी उनकी गुजरी हुई जो हालात थे वो उनके शायद सियासी हिसाब से बहुत से मामलात थे। लेकिन वो एज अ एक इंसान बहुत अच्छे इंसान थे।
लेकिन अच्छाई बुराई तो सब अल्लाह को पता है। अल्लाह ही जानते हैं। अच्छा चौधरी असलम का जो इस फिल्म का रोल है सर हकीकत जोड़ी में ऑपरेशन करते रहे उस टाइम कुछ और था। फिल्म में कुछ और दिखाया गया। उस पर आप क्या सर? चौधरी असलम जो एसपी उनको दिखाया गया ना इस फिल्म में उसको बहुत ज्यादा हीरो बनाकर दिखाया गया ना। तो मैं खुद एज अ लारी वाला होके ना तो मैं आपको यह बता दूं के उनको इस कदर दिखाया गया कि वन मैन आर्मी शो कर दिया गया। वो एक बंदा घुस के सब कुछ कर सकता है। लेकिन आप हकीकत ये है जब आठ दिन की लड़ाई हुई ना लहरी में जो आठ दिन की लड़ाई में ये चीलचौक में थे और चील चौक से आठ दिन तक आगे नहीं बढ़े।
वो इस कदर बहादुर थे कि वो चलचौक से आगे नहीं बढ़े। मैं उनको नहीं कहता बुरा। वो एक पुलिस वाले थे। अच्छे बंदे थे। अच्छे काम किए उन्होंने लेकिन इस कदर जो उनको प्रमोट किया गया है ना और लारी को डिफेम किया गया है तो यह मैं इसको नहीं जस्टिफाई नहीं समझता इसको मैं कि ये लारी के साथ जस्टिफाई है नहीं तो उनके तो बहुत से मामलात ऐसे थे आठ दिन की लड़ाई में चौधरी असलम के जो मुकाबले में एक बच्चा भी शहीद हो गया जो पुलिस की गाड़ी के नीचे आ गया था वो चीज भी दिखानी चाहिए थी वो नहीं दिखाई गई तो बहुत से मामलात अब आपको पता है बॉलीवुड तो वैसे भी चलता है पाकिस्तान को बुरा बनाकर ही चलता है। तो वो अपनी तरफ से जितना उसने करना था उसने कर दिया है।
बाकी जो रियलिटी है वो तो हम रहने वाले हैं। हमारे को पता है ना तो मैं 25% इसमें बोल सकता हूं कि है लेकिन 75% एसएल यारी है नहीं। फिल्म तो मैंने देखा उसमें भरत जो दिखाया गया उस तरह नहीं दिखाया गया जिससे रियल होता था। इस पे एक खूबी है कि इस फिल्म में अक्षय खन्ना का जो 27 साल तक रिलाप रहा था और रहमान के नाम से उनका वक्त खुल गया है। बाकी बरक्स इसमें कहानी जो दिखाया गया जिस तरह रहमान को दिखाया गया उस तरह नहीं है। बिहारी में हमारे गरीब लोगों के लिए मसीहा बनता था और सियासत में उनका कदम रखना फिर उसके बाद ये सारे मामलात हो गए थे। जिस तरह उनको सियासी पीपल्स पार्टी को दिखाया गया।
पीपल्स पार्टी इस तरह नहीं है। सियासी जमात है। बड़ा अरसे दराज से यहां काम कर रहे हैं गरीबों के लिए। बहुत से माशी मामलात भी किए हुए हैं। जिस तरह इंडिया वालों ने हमारे ऊपर जो फिल्म बनाया गया वो बरक्स गलत है। उसको हम लोग तस्लीम नहीं करते हैं इस फिल्म को। अच्छा फिल्म में जो दिखाया गया है की जिंदगी को दिखाया गया और जो जिंदगी किस तरह जी बिल्कुल रहमान बलोच जो है ना हमारे इलाके के रहने वाले बच्चा था हमारा साथी था भाई था वो इस तरह नहीं है जिस तरह इनको दिखाया गया। जिस तरह दहशत दिखाया गया वो दहशत गर्द नहीं था। वो बिल्कुल समाजी बंदा था। बिल्कुल फलाई काम करता था। अच्छों के लिए अच्छा था। बुरों के लिए बुरा था। अच्छा फिल्म में एक और किरदार निभाएगा चौधरी असलम का। असम रहमान बहुत ज्यादा फिल्म जो चौधरी असलम को जो दिखाया गया वो बिल्कुल एक अदाकार है हमारे कराची के लिए वो और जाली मुकाबले में आठ दिन उन्होंने जो कहानी बनाई उस पे सिर्फ हमारे आवाम को लूटा गया बुलडोजर किया गया और बख्तरबंद गाड़ी के नीचे मासूम बच्चों को कुचला गया। कोई ऐसा कहानी नहीं हुआ। वहां पर उन्होंने कोई जाली मुकाबला था और कुछ भी नहीं था। आपको क्या बस फिल्म में मैंने आपको शुरू में बताया ना फिल्म में अक्षय खन्ना का जो 27 साल तक नाकाम रहे और रहमान के नाम से उनका वक्त खुल गया। बस गई जो फिल्म आई अच्छा कैसा देखा आपने? खासकर बिहारी का सारा है। बिहारी को कैसी लगी? कैसी? फर्स्ट ऑफ ऑल मैंने सबसे पहले ये चीज देखी उसमें मतलब हम बलोचों को बहुत प्रमोट किया गया और सबसे बड़ी बात मतलब उसमें अगर रियलिटी की बात करें तो उसमें 25% हम रियलिटी कह सकते हैं लेकिन 75% उसमें रियलिटी नहीं था 25% उसमें क्या कह सकते हैं जैसे उसमें लिया शील चौक को दिखाया गया ठीक है कुछ हादसा दिखाया गया वो हम कह सकते हैं उसमें से 20 से 25% रियलिटी थी लेकिन 100% रियलिटी नहीं थी लेकिन उसमें सबसे अच्छी बात यह लगी कि इसमें हम बलोच को प्रमोट किया गया।
लारी के जैसे हमारे इलाकों का नाम लिया गया। शेरोन, बगदादी, कलाकोट ये सारा कुछ लिया गया। तो इसमें ये चीज हमें अच्छा लगा। अच्छा अच्छा जिंदगी में फिल्म की जो फर्स्ट ऑफ़ ऑल अगर उसको फिल्म में रहमान डकेट खिलाया गया तो यह अच्छा नहीं खिलाया गया। क्योंकि बिहारी वालों के लिए चैन फ्री हासिल करें। फ्री के साथ गिफ्ट हासिल करें। चैनल फ्री हासिल करें। फ्री हासिल करें और फ्री के साथ फिल्म में रहमान की जिंदगी में जिंदगी।
फर्स्ट ऑफ़ ऑल इसको फिल्म में रहमान डकैड कहलाया गया। वो फर्स्ट ऑफ ऑल डकैड नहीं था क्योंकि लहरी वालों के अगर हम बात करें ना तो उसे हम कान भाई के नाम से बुलाते थे। रहमान बलोच के नाम से बुलाते थे। ठीक है? लहरी में उसको कोई नहीं था। और फर्स्ट ऑफ ऑल मतलब लहरी में तो ये वगैरह ये कुछ जो फिल्म में बताया गया है वगैरह वैसा कुछ नहीं था। हम लहरी वालों के लिए तो बहुत अच्छा था। मतलब लारी में अगर किसी से किसी भी बंदे से पूछे तो उसके बारे में आपको पॉजिटिव रिव्यूज ही बताएगा। वो करता था अगर कुछ लहरी के लहरी से आउट ऑफ होता था। लारी में नहीं होता था। लहारी में आप किसी बंदे से पूछे उसके बारे में तो आपको 100% उसके पॉजिटिव रिव्यूज ही मिलेंगे। फिल्म है असलम को बहुत अच्छा दिखाया गया। चौधरी असलम ज्यादातर तैयारी में बहुत ज्यादा इसने ऑपरेशन किया। तो जो ऑपरेशन किया जाता था उस तैयारी कर रहे थे।
आपने इस ऑपरेशन को देखा बिलकुल देखा है। उस ऑपरेशन को और जो फिल्म में जो ऑपरेशन दिखाए इसको आपने क्या किया? हां। ऑपरेशन तो फिल्म में अभी तक मैं कहता हूं फिल्म में तो अभी तक ऑपरेशन दिखाया नहीं गया क्योंकि वो आठ दिन हम लोगों ने जो देखा जिस तरह से फिल्म में तो कुछ भी मतलब ऑपरेशन वगैरह नहीं था। आठ दिन में वो थे असलम चौधरी चीचक की साइड में खड़े थे। उसने लहरी के अंदर तो उसने एंट्री नहीं मारा। वो मार नहीं सका यहां पे लेरी के अंदर। लेकिन फिल्म में उसको कुछ ज्यादा ही मतलब हीरो दिखाया गया। ऐसा नहीं कहता कि वो ऐसा नहीं थे। मतलब वो थे अच्छे पुलिस वाले थे। लेकिन रियलिटी की अगर हम बात करें तो मतलब फिल्म में उसको ओवरप कह सकते हैं। ओवर रेटेड हम कह सकते हैं उसको लेकिन चौधरी असलम थे। फिल्म के लिहाज से वो ओवरेटेड है क्योंकि फिल्म में अभी तक आठ दिन का जंग दिखाया ही नहीं गया। जो आठ दिन का जंग मैं कहता हूं अगर आठ दिन का जंग दिखाया जाए तो इस पे बकायदा एक वेब सीरीज बन सकता है। जो नई फिल्म आई है रवि आपने देखी कैसी लगी आपको?
फिल्म बहुत अच्छी बनी है। मतलब देखने लायक है। इसमें बंदा 3 घंटे हो जाता है। एक ही जगह बैठ जाता है। और इसके अलावा फिल्म में जो कास्टिंग की गई है जैसे रहमान बलोच हो, चौधरी असलम हो गई है और बाकी सारे हो गए। कास्टिंग ओवरऑल बेहतरीन पावरफुल कास्टिंग थी इसलिए फिल्म चली है वो। अच्छा इसमें जो किरदार दिखाया गया है जी। इसकी जो फिल्म में जो जिंदगी दिखाई गई है और इसकी जो गिरी जिंदगी है उसका आप देखो फिल्म में जो जिंदगी दिखाई गई है वो हकीकत से बिल्कुल हटके बरक से हकीकत के हकीकत में सरदार अब्दुल रहमान बलोच वो मसीहा थे लारी के मतलब वो गरीबों के लिए वो रोबिन हुड थे बाकी उनका सियासत में आना फिर उसके जिंदगी के आखिरी दिन वो हो गए सियासत में आए वो यही चाहते कि लहरी को सर्व करो बेहतरीन तरीके से तो बस उनका ये कदम उठाना उनके लिए आखरी बन गई जिंदगी अच्छा चौकी असलम ने बहुत दिन ऑपरेशंस किए आठ दिन तक ऑपरेशन करता रहा पूरा एक का माहौल बना दिया हो जाता था देखो फिल्म की जिंदगी में जो चौधरी असलम को दिखाया गया है कि वो बहुत बेहतरीन मतलब एक निडर बहादुर सिपाही थे बिल्कुल ऐसे नहीं है वो एक बुज़दिल किस्म के इंसान थे। अगर उनको लहरी में ऑपरेशन करना था, को पकड़ना था तो अंदर आ जाते, पकड़ लेते।
चलचक पे खड़े होके जो है बेगना पर फायरिंग करके इस तरह ये उनकी बहादुरी नहीं है। ये कैसी लगी फिल्म आपको? आप क्या समझते हैं कि पाकिस्तान के हक में बेहतर क्या? पाकिस्तान के हक में पता नहीं लेकिन बलोचों के हक में बेहतर है क्योंकि अक्सर पाकिस्तान में जो ड्रामे फिल्म बनते हैं उनको बलोचों को दिखाया गया कि बलोचों की लैंग्वेज जो होती है ना वो ये इस तरह दिखाया गया है जो इंडिया में फिल्म है उनको जो है ना एक तो बात ये है कि जो पाकिस्तान में फिल्म बनते हैं अक्सर बलोच को बलोची कहते हैं। तो बलोच बलोची नहीं है वो बलोच ही होते हैं। तो, एक कल्चर को प्रमोट किए गए मौज के कि वह डांस जिस तरह करते हैं, अक्षय खन्ना, बहुत प्यारा लगा उस वक्त।
