7 नवंबर 1925 को जरीन खान ने मुंबई में अपने घर पर अंतिम सांस ली। उम्र से जुड़ी बीमारियों के चलते वह कुछ समय से अस्वस्थ थी। उनके निधन के बाद एक बड़ी हलचल मच गई। लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि जरीन तो पारसी थी और संजय खान मुस्लिम तो फिर उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति रिवाजों से क्यों हुआ? दरअसल दोस्तों इसका जवाब उनके धर्म से जुड़ा है।
जरीन एक पारसी महिला थी लेकिन पारसी धर्म के नियम बहुत सख्त होते हैं। अगर कोई पारसी महिला किसी गैर पारसी पुरुष से शादी करती है तो उसे पारसी धर्म से निष्कासित कर दिया जाता है। वही बात पुरुषों पर भी लागू होती है और इसी वजह से जरीन को पारसी धार्मिक रीति से अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दी गई।
याद करिए फिरोज गांधी को वह भी एक पारसी थे और इंदिरा गांधी हिंदू। लेकिन जब फिरोज गांधी का देहांत हुआ तब उनका अंतिम संस्कार हिंदू रिवाजों से किया गया क्योंकि पारसी धर्म में ऐसा विवाह स्वीकार्य नहीं माना जाता। पारसी समुदाय में जो लोग गैर पारसी से शादी करते हैं उन्हें मंदिरों में प्रवेश की अनुमति तक नहीं दी जाती। इसी वजह से जरीन का भी अंतिम संस्कार पारंपरिक पारसी रीति से नहीं हो सका।
अब सवाल उठता है फिर उन्हें मुस्लिम रीति से क्यों नहीं विदा किया गया? इसका भी स्पष्ट जवाब है क्योंकि जरीन ने इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया था और इस्लाम के अनुसार वही व्यक्ति कब्रिस्तान में दफनाया जा सकता है जिसने कलमा पढ़कर इस्लाम कबूल किया हो इसलिए जरीन के लिए वो रास्ता भी बंद था।
आखिरकार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया और इसमें कुछ भी गलत नहीं क्योंकि हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के समय व्यक्ति के धर्म से ज्यादा उसके मानव रूप को महत्व दिया जाता है। हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि भारत भूमि में जन्मा हर व्यक्ति सनातन धर्म का अंश है। चाहे वो किसी भी पंथ या मत में क्यों ना विश्वास रखता हो। साल 1963 में एक फिल्म आई थी। नाम था तेरे घर के सामने। कहने के लिए यह फिल्म 1963 की एक मध्यम स्तर की हिट फिल्म थी। लेकिन यह बात शायद ही कोई जानता था कि इस फिल्म को खास बनाया था जरीन कतरक ने। जी हां, वही जरीन जिनके नाम पर अभिनेत्री जीनत अमन पर अत्याचार करने का रिकॉर्ड मौजूद है। आप सोच रहे होंगे कि हम इस तरह की बातें कैसे बोल सकते हैं? लेकिन यह बात चाहे झूठी ही क्यों ना हो।
एक पत्रकार ने इस सच्चाई को सिनेब्लिट्स मैगजीन में विस्तार के साथ लिखा। साथ ही उन्होंने जीनत के डॉक्टर का भी विवरण पेश करते हुए कहा कि संजय खान ने जीनत को पहली बार नहीं मारा था। अब आप सोच रहे होंगे कि इस कहानी में जरीन कहां से आती हैं?
दरअसल यह वाकया अब्दुल्ला की शूटिंग के दौरान हुआ था। उस वक्त संजय अपनी पत्नी के साथ ताज होटल में एक फंक्शन अटेंड करने आए थे। वहां ज़ीनत भी आ पहुंची। कुछ बातचीत के बाद जीनत अमन होटल के एक रूम में जा पहुंची। जहां जरीन भी मौजूद थी। सिनेब्लेट्स मैगजीन के अनुसार जरीन ने संजय से कहा इस कुतिया को वह दे दो जिसकी वह हकदार है। उसके बाद संजय ने अपनी पत्नी जरीन के सामने जीनत को इतनी बुरी तरह मारा कि जीनत अस्पताल में दाखिल हो गई। पत्रकार के अनुसार घटना स्थल पर होटल के कर्मचारी भी मौजूद थे। लेकिन किसी ने भी ज़ीनत की मदद नहीं की। इस घटना के बाद अब्दुल्ला फिल्म रिलीज हुई और फिल्म के गानों ने तहलका मचा दिया।
लेकिन शायद ही कोई जानता था कि यह ऐसी सुपरहिट फिल्म थी जो दो बड़े कलाकारों की आखिरी हिट फिल्म थी। जी हां, संजय खान का करियर पूरी तरह से बर्बादी के मोड़ पर आ गया था। तो वहीं जीनत अमन भी कुछ खास कारनामा नहीं कर पाई। अब इस घटना पर एक बारीक नजर डालते हैं। जीनत अमन के चाहने वाले बताते हैं कि उस मारपीट के दौरान संजय ने जीनत की आंख फोड़ दी थी। इस वजह से आज भी ज़ीनत अमन की एक आंख पूरी तरह से नहीं खुलती। लेकिन हमारा सवाल यह है कि अगर संजय खान ने जीनत की आंख फोड़ दी थी तो अब्दुल्ला फिल्म के बाद तो जीनत ने दशकों फिल्मों में काम किया था। उन सभी फिल्मों में तो जीनत की आंख बिल्कुल सही दिखाई देती है।
तो यह कैसे हो सकता है? हमने संजय खान की ऑटोबायोग्राफी भी पढ़ी। उस किताब में संजय ने विस्तार के साथ असली हकीकत लिखी है। संजय के अनुसार अगर मैंने जीनत की आंख फोड़ी थी तो 1980 के बाद जीनत की बहुत सारी फिल्में रिलीज हुई। उन फिल्मों में तो उनकी आंख सही दिख रही है। संजय के अनुसार उन्होंने जीनत के साथ कोई अत्याचार नहीं किया था। खैर क्योंकि यह वीडियो संजय खान की पत्नी जरीन के बारे में है। इसलिए अब उनकी कहानी पर गौर करेंगे। दोस्तों जरीन कतरक यानी जरीन खान का जन्म 12 जुलाई 1944 को बेंगलुरु में एक पारसी परिवार में हुआ था।
वह सेंट जोसेफ्स कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ी थी। लेकिन कॉलेज नहीं गई। कॉलेज ड्रॉप आउट होते हुए भी उन्होंने आगे चलकर अपने जीवन में वो मुकाम हासिल किया जहां पहुंचना कई लोगों का सपना होता है। बचपन से ही उनका झुकाव कला, फैशन और खाना पकाने की ओर था। 1960 के दशक में जरीन ने कुछ फिल्मों में काम किया। जिनमें तेरे घर के सामने 1963 और एक फूल, दो माली, 1969 शामिल है। लेकिन उनका फिल्मी करियर बहुत लंबा नहीं चला। शादी के बाद उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली और अपना पूरा ध्यान परिवार, बच्चों और घर को सजाने सवारने में लगा दिया। बाद में वह एक शानदार इंटीरियर डिजाइनर और कुक बुक राइटर के रूप में जानी जाने लगी।
उन्होंने अपने डिजाइन सेंस और खाना बनाने के हुनर से बॉलीवुड और मुंबई के समाज में एक खास जगह बनाई। उनकी शादी अभिनेता निर्माता संजय खान से हुई थी और इस रिश्ते ने उन्हें बॉलीवुड के खान परिवार से जोड़ दिया। उनके बच्चे हैं फरा खान अली, सिमोन खान अरोड़ा, सुजैन खान और जायद खान। उनके करीबी बताते हैं कि वह एक ऐसी महिला थी जो किसी कमरे में जाती तो वहां का माहौल अपने आप बदल जाता था। उनका सेंस ऑफ ह्यूमर, उनका खाना बनाने का शौक और घर को एक कला की तरह सजाने की उनकी आदत ने उन्हें अलग पहचान दी थी। 7 नवंबर 1925 को जरीन खान ने मुंबई में अपने घर पर अंतिम सांस ली।
उम्र से जुड़ी बीमारियों के चलते वह कुछ समय से अस्वस्थ थी। उनके निधन के बाद एक बड़ी हलचल मच गई। लोगों के मन में सवाल उठने लगे कि जरीन तो पारसी थी और संजय खान मुस्लिम तो फिर उनका अंतिम संस्कार हिंदू रीति-रिवाजों से क्यों हुआ? दरअसल दोस्तों इसका जवाब उनके धर्म से जुड़ा है। जरीन एक पारसी महिला थी। लेकिन पारसी धर्म के नियम बहुत सख्त होते हैं। अगर कोई पारसी महिला किसी गैर पारसी पुरुष से शादी करती है तो उसे पारसी धर्म से निष्कासित कर दिया जाता है। वही बात पुरुषों पर भी लागू होती है और इसी वजह से जरीन को पारसी धार्मिक रीति से अंतिम संस्कार की अनुमति नहीं दी गई। याद करिए फिरोज गांधी को वह भी एक पारसी थे और इंदिरा गांधी हिंदू।
लेकिन जब फिरोज गांधी का देहांत हुआ तब उनका अंतिम संस्कार हिंदू रिवाजों से किया गया क्योंकि पारसी धर्म में ऐसा विवाह स्वीकार्य नहीं माना जाता। पारसी समुदाय में जो लोग गैर पारसी से शादी करते हैं उन्हें मंदिरों में प्रवेश की अनुमति तक नहीं दी जाती। इसी वजह से जरीन का भी अंतिम संस्कार पारंपरिक पारसी रीति से नहीं हो सका। अब सवाल उठता है फिर उन्हें मुस्लिम रीति से क्यों नहीं विदा किया गया? इसका भी स्पष्ट जवाब है क्योंकि जरीन ने इस्लाम धर्म स्वीकार नहीं किया था और इस्लाम के अनुसार वही व्यक्ति कब्रिस्तान में दफनाया जा सकता है जिसने कलमा पढ़कर इस्लाम कबूल किया हो इसलिए ज़रीन के लिए वह रास्ता भी बंद था। आखिरकार हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया गया और इसमें कुछ भी गलत नहीं क्योंकि हिंदू धर्म में अंतिम संस्कार के समय व्यक्ति के धर्म से ज्यादा उसके मानव रूप को महत्व दिया जाता है। हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि भारत भूमि में जन्मा हर व्यक्ति सनातन धर्म का अंश है। चाहे वह किसी भी पंथ या मत में क्यों ना विश्वास रखता हो।
दोस्तों जरीन खान ने अपनी जिंदगी बहुत ही रॉयल अंदाज में जी थी। एक पत्नी, एक मां, एक डिजाइनर और एक इंसान के रूप में उन्होंने अपने आसपास के हर व्यक्ति पर अमिट छाप छोड़ी। वो चली गई लेकिन उनके द्वारा बनाई गई हर याद, हर रेसिपी, हर डिजाइन और हर मुस्कान आज भी उनके परिवार के बीच जीवित है। और हां, हिंदी रेडियो वही प्लेटफार्म है जो सच्चाई बताने से कभी पीछे नहीं हटता। एक तरफ पूरी दुनिया ने धर्मेंद्र को जीते जी मार दिया था। उसी वक्त हिंदी रेडियो पहला प्लेटफार्म था जिसने बताया कि धर्मेंद्र की निधन की खबर झूठी थी।
