जब से इजराइल और ईरान के बीच वॉर शुरू हुआ है तब से काफी लोगों के मन में सवाल होगा कि आखिर यहूदी कौन होते हैं और यह किस खुदा को मानते हैं और इनका इबादत करने का तरीका क्या है? क्या यह भी नमाज पढ़ते हैं और अगर पढ़ते हैं तो किस तरह से?
दरअसल पूरी दुनिया में यहूदी सिर्फ 0.2% हैं और ज्यादातर यहूदी इजराइल में ही बसते हैं। यहूदियों और मुसलमानों के बीच इजराइल को लेकर सदियों से कंट्रोवर्सी होती आई है।
यहूदी मुसलमानों की तरह एक खुदा में यकीन रखते हैं। ईसाई और यहूदी दोनों की ही जड़े इस्लाम से जुड़ी हुई हैं। यहूदी धर्म को जानने के लिए आपको इस्लामिक इतिहास में पीछे जाना होगा। इस्लाम में मान्यता है कि चार किताबें अलग-अलग पैगंबरों यानी मैसेंजर्स पर उतारी गई थी ताकि वह समाज को जोड़ सकें और भटके हुए लोगों को सही राह पर चला सकें। इन तीन किताबों के नाम इंजील, तौरा, जुबूर और कुरान है। यहूदी धर्म को मानने वाले तौरा किताब को मानते हैं और उसी के मुताबिक अपनी जिंदगी बिताते हैं। उनका मानना है कि यह किताब मोसेस यानी हजरत मूसा अल सलाम पर उतारी गई थी।
वहीं मुसलमान कुरान को आखिरी और सबसे सही किताब का दर्जा देते हैं। उनका मानना है कि पैगंबर मोहम्मद साहब के आने के बाद इंजील, तौरा और जुबूर को रद्द कर दिया गया था। क्योंकि उन किताबों में लोगों के जरिए फेरबदल किया गया था। दोनों धर्मों के बारे में जानने के लिए आपको इब्राहिम यानी इब्राहिम अल सलाम के फैमिली ट्री को जानना होगा। इब्राहिम अल सलाम को इस्लामी पैगंबर माना गया और यही इजराइलियों और अरबों के पूर्वज माने जाते हैं। यहूदी इब्राहिम को खुदा और यहूदियों के बीच खास रिश्ता कायम करने वाला फाउंडिंग फादर बताते हैं। इब्राहिम की दो बीवियां थी सारा और हाजरा। सारा से इसहाक पैदा हुए और हाजरा से इस्माइल पैदा हुए। सारा के जरिए चले इस कुल में आगे चलकर याकूब, मूसा, दाऊद और सुलेमान पैदा हुए। और इस कुल को अरबी में बनी इसराइल [संगीत] बोला गया। किंग डेविड यानी हजरत दाऊद ने ही यरूशलम को बसाया और उनके बेटे सुलेमान ने हैकले सुलेमानी बनवाया जिसे यहूदी अपना सबसे बड़ा टेंपल मानते हैं। इस जगह को मुसलमान भी पवित्र दर्जा देते हैं।
वहीं हाजरा के जरिए चले कुल में आगे चलकर आखिरी पैगंबर मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम पैदा हुए। इस कुल को बनी इस्माइल [संगीत] बोला गया। पैगंबर मोहम्मद पर ही खुदा ने कुरान उतारा था। कुरान को अपनी पवित्र किताब मानने वालों ने खुद को मुसलमान [संगीत] माना। मुसलमान याकूब, मूसा, दाऊद और सुलेमान को भी पैगंबर मानते हैं। लेकिन उनका यकीन आखिरी किताब कुरान पर है। वहीं यहूदी तौरा के साथ-साथ 10 कमेंटमेंट्स और तलमत को मानते हैं। यह किताबें हब्रू में लिखी गई हैं। यरूशलम शहर को तीनों ही धर्म पवित्र मानते हैं। यहां मौजूद मस्जिद अल को मुसलमान शुरुआत से ही क़िबला मानते थे। क़िबला उस दिशा को कहते हैं जिधर मुंह करके मुसलमान नमाज़ पढ़ते हैं। बाद में क़िबला काबा हो गया। इसके साथ ही मुसलमानों का मानना है कि इसी जगह से मोहम्मद साहब स्वर्ग यानी जन्नत के सफर पर गए थे। ईसाइयों के लिए यह जगह इसलिए खास है क्योंकि इसी जगह ईसा मसीह को पर लटकाया गया था।
यहूदियों का मानना है कि इस शहर को 3000 साल पहले किंग डेविड ने बसाया था। किंग डेविड को मुसलमान पैगंबर मानते हैं। अब चलिए आपको बताते हैं कि आखिर यहूदी कैसे इबादत करते हैं। इस्लाम से जुड़ी मान्यताओं के मुताबिक एक वक्त पर यहूदी कौम अल्लाह की सबसे पसंदीदा कौमों में से एक हुआ करती थी। इस कौम की हिदायत के लिए अल्लाह ने 48 अंबिया इकराम को इनके बीच भेजा था। लेकिन यहूदी धर्म की निस्बत यानी ताल्लुक खासतौर पर पैगंबर हजरत मूसा अलैहिस्सलाम से माना जाता है। क्योंकि इनका नस्ली ताल्लुक हजरत याकूब अलैहि ससलाम से था।
जिनका लकब इजराइल था। इसी वजह से इन्हें यहूदी धर्म के लोगों को बनी इजराइल भी कहा जाता है। यहूदी धर्म में इबादत कैसे की जाती है? आइए जानते हैं। जहां इस्लाम धर्म में दिन में पांच वक्त नमाज अदा की जाती है, वहीं यहूदी धर्म में रोज की तीन इबादत मुकर्रर की गई हैं। जिनमें से सुबह और दोपहर की तो फर्ज इबादत है। जबकि शाम की इबादत अपने आप पर खुद लागू की जा सकती है। यहूदी धर्म में यह सब इबादतें उस वक्त तक लागू नहीं होती हैं। जब तक कि इंसान इनको अपने रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बनाने के लिए नियत ना कर ले। जब कोई यहूदी इबादत करने की नियत कर लेता है तो उस नियत के बाद में तमाम इबादतें उस पर वाजिब हो जाती हैं। जिस तरह मुसलमान मस्जिद में नमाज पढ़ते हैं उसी तरह यहूदी धर्म के लोगों के लिए खबाद हाउस बेहद खास होता है। इसी जगह यहूदी अपनी प्रार्थना करते हैं। इसके अलावा यहूदी धर्म में तमाम इबादत अपने तौर पर यानी अकेले भी अदा की जा सकती है और बा जमात यानी सभी लोगों के साथ भी अदा की जा सकती है। यहूदी धर्म का मानना है कि सभी लोगों के साथ इबादत करने की ज्यादा फज़लत है।
यहूदी धर्म की जमात को पूरा होने के लिए इन्हें कम से कम 10 लोगों की जरूरत होती है। अगर कम से कम 10 लोग एक साथ नहीं इकट्ठा होते तो फिर यह लोग अपनी अलग-अलग इबादत करते हैं। यहूदी अपनी प्रार्थना करते हैं यरूशलम की ओर मुंह करते हैं जो यहूदी धर्म में सबसे पवित्र जगह है। यहूदी लोग प्रार्थना करते वक्त अपने सिर पर किपा जरूर पहनते हैं। किपा उस खास टोपी को कहते हैं जो हर यहूदी खास मौके पर पहनता है। दरअसल यहूदी धर्म में माना जाता है कि इबादत करते वक्त या कोई भी धार्मिक काम करते वक्त अपना सिर किब्बा से जरूर ढकना चाहिए। हालांकि ऐसा इस्लाम में भी देखा जाता है। इस्लाम धर्म में भी नमाज पढ़ते वक्त टोपी पहनना जरूरी है।
यह तो आप जानते होंगे कि मुसलमान नमाज पढ़ने से पहले वजू करते हैं। ऐसे ही यहूदी लोग भी मुसलमानों की तरह जब अपनी प्रार्थना शुरू करते हैं और अपनी इबादतगाह में जाते हैं तो यह भी पहले पानी से अपने हाथ धोते हैं। यहूदियों का यह तरीका मुसलमानों के वजू से अलग होता है। यहूदी धर्म के लोग इबादत करने से पहले एक लोटे में पानी भरते हैं। लेकिन वो मुसलमानों की तरह ना ही अपना मुंह धोते हैं और ना ही अपने पैरों को धोते हैं।
बल्कि यहूदी लोग अपने लोटे से पानी लेकर अपने हाथ को तीन बार धोते हैं और फिर दूसरे हाथ को भी तीन बार धोते हैं। यहूदी इबादत के दौरान बुलंद आवाज में अपनी पवित्र किताब तरात को पढ़ते हैं। साथ ही इस धर्म के लोग अपनी इबादत के दौरान कभी खड़े-खड़े चूमने लग जाते हैं। कभी जोर-जोर से तरात की तिलावत करने लगते हैं। फिर कभी झुकते हैं तो कभी सजदा करते हैं। इस तरह वह अपनी प्रार्थना को पूरा करते हैं।
