मुकेश अंबानी रिलायंस इंडस्ट्री और अब वनारा यह नाम पिछले कुछ महीनों से सुर्खियों में है। लेकिन इस बार चर्चा सिर्फ इंडस्ट्री या कारोबार का नहीं है बल्कि एक ऐसे प्रोजेक्ट की है जिस पर सवाल उठे हैं। कानून पर्यावरण और यहां तक कि नैतिकता का भी।
मामला इतना गंभीर है कि अब इसमें सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ गया है और सीधे तौर पर एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम बनाई गई है एसआईटी। इस एसआईटी का नेतृत्व कर रहे हैं ।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस जे चलमेश्वर। उनके साथ हैं जस्टिस राघवेंद्र चौहान जो उत्तराखंड और तेलंगाना हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। टीम में शामिल है मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर हेमंत नागराले और कस्टम विभाग के सीनियर अधिकारी अनीश गुप्ता। यानी जांच दल अपने आप में इतना मजबूत है कि कोई बड़ा नाम या ताकतवर लॉबी इस पर आसानी से असर नहीं डाल पाएगी।
अब जरा मुद्दे की बात कर लेते हैं। बंटारा प्रोजेक्ट को लेकर लगातार जो चर्चा सामने आ रही है वो है आरोप का। आरोप है कि यहां वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं और मनी लॉन्ड्रिंग जैसी गतिविधियां भी जुड़ी हो सकती हैं।
यहां यानी जानवरों खासकर हाथियों की खरीद परो को लेकर भी सवाल उठे हैं। क्या यह सब कानूनी तरीके से हुआ है? क्या भारत और विदेश में आए इन जानवरों की खरीद वाइल्ड लाइफफ़ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 और अंतरराष्ट्रीय नियम सिटीज के तहत हुआ है?
टीम इस बात की भी जांच करेगी कि क्या यहां जानवरों की देखभाल, पशु चिकित्सा, उनका रखरखाव और उनकी मृत्यु दर के मामले में मानक पूरे किए जा रहे हैं या नहीं। एक बड़ा आरोप यह भी है कि वंटारा जैसे प्रोजेक्ट को ऐसे औद्योगिक क्षेत्र में खड़ा किया गया है जो पर्यावरण और जलवायु की दृष्टि से इन जानवरों के लिए बिल्कुल भी उपयुक्त नहीं है।
अब सोचिए एक और देश में लोग वाइल्ड लाइफ की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वहीं अगर कोई कंपनी इसे निजी शौक वैनिटी प्रोजेक्ट या प्राइवेट कलेक्शन की तरह इस्तेमाल कर रही है तो सवाल उठना लाजमी है। आरोप तो यहां तक भी है कि पानी और कार्बन क्रेडिट्स का भी दुरुपयोग किया जा रहा है और सबसे गंभीर आरोप वन्य जीव तस्करी और अवैध व्यापार की संभावनाएं। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी को साफ निर्देश दिया है कि जांच में किसी तरह की ढिलाई बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अगर किसी ने सहयोग नहीं किया तो वह सीधा अमानना के दायरे में आएगा।
को केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण, सिटीज अथॉरिटी, प्रयावरण मंत्रालय, गुजरात सरकार, वन विभाग और पुलिस सभी से पूरा सहयोग मिलेगा। और हां, सबसे जरूरी बात एसआईटी को वंटारा का फिजिकल इंस्पेक्शन यानी जमीनी हकीकत देखने की पूरी स्वतंत्रता दी गई है। अब सवाल यह भी है कि क्या इस जांच का असर होगा क्या? अदालत ने एसआईटी से कहा कि वह अपनी रिपोर्ट 12 सितंबर 2025 तक जमा करें और 15 सितंबर को यह मामला फिर सुप्रीम कोर्ट में सुना जाएगा। अगर रिपोर्ट संतोषजनक रही तो मामला यहीं खत्म हो सकता है। लेकिन अगर गड़बड़ी पाई गई तो अदालत और कड़े आदेश जारी कर सकता है। यह समझना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर पीआईएल को खारिज नहीं किया बल्कि उसने कहा कि जब इतने बड़े आरोप हैं तो एक हाई लेवल इंडिपेंड इंडिपेंडेंट इंक्वायरी होनी चाहिए।
यह अपने आप में बड़ा संदेश है। चाहे मामला किसी भी उद्योगपति या कंपनी से जुड़ा क्यों ना हो। कानून के राज्य में सबको जवाब देना ही पड़ेगा। इस पूरे प्रकरण को सबसे अहम बात ये रही कि सिर्फ एक प्रोजेक्ट या एक कंपनी का सवाल नहीं है। यह सवाल है देश की जे विविधा पर्यावरण वन्य जीवों की सुरक्षा का। सवाल यह है कि क्या हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को छेड़ रहे हैं और निजी वैभव के लिए दांव पर लगा देंगे या फिर अदालत और व्यवस्था मिलकर यह सुनिश्चित करेगी कि देश का कानून और पर्यावरण किस पर निर्भर करता है।
मुकेश अंबानी का नाम हो, रिलायंस जैसी ताकतवर कंपनी हो या फिर अरबों-खरबो का साम्राज्य हो। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम बताता है कि कानून की नजर में सब बराबर है और शायद यही वजह है कि अब पूरे देश की नजर इस की रिपोर्ट पर टिकी हुई है।
