ठेले पर पड़ा रहा पिता का पार्थिव देह, अंतिम संस्कार के लिए भीख मांगते रहे बच्चे।

तस्वीरें उत्तर प्रदेश के महाराजगंज की है और यह सिर्फ एक खबर नहीं बल्कि हमारे और आपके लिए सैकड़ों सिसकते हुए सवाल भी है। यह कहानी 14 साल की राजवीर और उसके छोटे भाइयों की है। 14 साल एक ऐसी उम्र जिसमें बच्चे खिलौनों से खेलते हैं। लेकिन राजवीर अपने भाइयों के साथ अपने पिता की लाश को ठिकाने लगाने की जिम्मेदारी ढो रहा है।

मां पहले ही छोड़कर जा चुकी थी और लंबी बीमारी के बाद पिता का साया भी सिर से उठ गया। उम्मीद की पहली किरण रिश्तेदार होते हैं लेकिन यहां तो दरवाजे पर दस्तक देने से पहले ही उम्मीदों ने दम तोड़ दिया। किसी ने साथ नहीं दिया। हिम्मत करके तीनों भाई पिता के शव को एक ठेले पर रखकर श्मशान घाट पहुंचे। सोचा था यहां कोई तो होगा जो इस बोझ को समझेगा।

पिता की चिता सजाने में मदद करेगा। लेकिन यहां इंसानियत नहीं नियम खड़े थे। उनसे कहा गया लकड़ी लेकर आओ। तभी अंतिम संस्कार होगा। अब जरा सोचिए उस 14 साल के बच्चे पर क्या गुजरी होगी जिसके पास कफ़न के पैसे नहीं वो चिता की लकड़ी कहां से लाता? यहां धर्म के नियमों ने एक बच्चे की बेबसी पर तरस नहीं खाया। क्या नाम है बाबा? राजवीर। कहां रहते हो? माला। क्या हुआ? तबीयत खराब था। किसका? मेरे पापा का। तो वहां पर मेडिकल हॉस्पिटल ले गए थे। ले गए थे तो वहां से आए 15 20 दिन जिए थे तो देहांत हो गया।

तो एक दिन पहले जिस दिन देहांत हुआ था उसी दिन हम लोग द्वार पे ठेला लेके खड़ा थे। खड़े थे ना रिश्तेदार से मदद मांग रहे थे। मदद कोई नहीं कर रहा था। तो फिर उनके बाद चेयरमैन आए, सब आए और सब देख चले गए तो हम लोग मदद मांगे नहीं दिए। श्मशान से ठुकराए जाने के बाद यह मासूम पिता की लाश को लेकर एक कब्रिस्तान पहुंचे।

शायद उन्हें लगा हो कि मिट्टी तो हर किसी को पनाह देती है। लेकिन यहां धर्म की दीवारें और भी ऊंची थी। उन्हें बताया गया कि तुम हिंदू हो। यहां सिर्फ मुसलमानों को दफनाया जाता है। एक दरवाजे पर नियम और दूसरे दरवाजे पर धर्म और इन दोनों के बीच सड़क पर बिलखता लाचार बचपन। अब राजवीर के पास एक ही रास्ता था पिता की लाश ठेले पर रखकर सड़क पर भीख मांगना ताकि वो अपने पिता का अंतिम संस्कार कर सके।

राहगीर आते जाते रहे। किसी को लगा यह भीख मांगने का नया तरीका है तो किसी ने इसे फिल्मी कहानी समझकर नजरअंदाज कर दिया। लेकिन किसी ने उन आंखों में झांकने की कोशिश नहीं की जहां एक बेटे का दर्द सैलाब बनकर बह रहा था। सवाल यह कि उस भीड़ में कोई ऐसा क्यों नहीं था जो पूछता कि बेटा क्या हुआ? और फिर जब अपनों ने समाज ने और एक ही धर्म के लोगों ने मुंह फेर लिया तब इंसानियत दो फरिश्तों के रूप में सामने आई। राशिद और वारिस कुरैशी दो मुस्लिम युवक जिन्होंने ठेले पर रखी लाश और रोते हुए बच्चों को देखा।

उन्होंने यह नहीं पूछा कि तुम हिंदू हो या मुसलमान। उन्होंने सिर्फ एक बच्चे का दर्द देखा और एक बाप की लाश का अपमान। वह आगे आए। लकड़ी का इंतजाम किया और एक बेटे की तरह उन सभी रीतियों को निभाया जो राजवीर अकेला नहीं कर सकता था। मानवा घाट ले गए तो वहां से वहां पर कहे कि दफनाना है। दफनाना है। तो जो वहां पर रहते हैं वो कहे यहां पर फकाता है। दफनाना नहीं। तो वहां से कहे कि मुसलमान का जो दफनाने वाला है वहां पर ले जाओ। वहां पर गार्डन है तो वहां पर हम लोग गए ।

तो वहां से सब लोग भगाए भगाए तब आए छपवा चौकी पे खड़ा हुआ खड़ा हुए 4 घंटा खड़े थे तो उसके बाद सब भगा रहे थे इधर जो गाड़ी आ रहा था उनसे पैसा मांग रहे थे राशिद और वारिस ने ना सिर्फ अंतिम संस्कार कराया बल्कि उन बच्चों को आगे की जिंदगी के लिए आर्थिक मदद भी दी उन्होंने वो किया जो उस वक्त समाज प्रशासन और रिश्तेदारों को करना चाहिए था। राशिद बताते हैं कि उन्होंने सिर्फ इंसानियत का फर्ज निभाया।

मैं वहां पहुंचा तो लोगों ने बताया उनके परिवार वालों ने जो बच्चे थे सब कि दो दिन हो गया कोई मदद नहीं कर रहा है। और हम लोग देखिए कुदार उदार लाए हैं दफन करने के लिए और इसको गाड़ने के लिए तो वहां पे जो दुनवा घाट के गौतम भैया हैं हमारे वो बेचारे कहने लगे कि यहीं दफन करवा दो। तो ये लोग कहने लगे अच्छा अभी दफन करा दिया जाएगा। पहले देख लिया जाए लकड़ी की कहीं व्यवस्था हो जाती है। थक मान के हार के ये लास्ट में दफन करने के लिए एग्री भी हो गए। तो इधर-उधर भटका दफन भी नहीं लोगों ने करने दिया।

इसके बाद जो है मैंने सारी व्यवस्थाएं करा करके जो भी रीति रिवाज धार्मिक हिसाब से होती हैं उस हिसाब से हमने लकड़ी तमाम चीजें करा करके मैंने रात्र रात्रि 11 12:00 बजे तक वहां रह के सब कराया। यह घटना हमें बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। क्या हमारे पूजा स्थल और अंतिम संस्कार की जगहें इतनी संवेदनहीन हो गई है कि एक लाचार बच्चे का दर्द भी उन्हें पिघला नहीं सकता। कि हमारे रिश्ते और सामाजिक बंधन इतने खोखले हो चुके हैं कि मुश्किल वक्त में साथ देने वाला कोई नहीं। यह कहानी बताती है कि इंसानियत का कोई धर्म नहीं होता।

जब धर्म के ठेकेदारों ने दरवाजे बंद कर दिए तब इंसानियत ने ही दरवाजा खोला। आज राशिद और वारिस की तारीफ हर कोई कर रहा है और करनी भी चाहिए। लेकिन सवाल यह कि क्या इंसानियत को जगाने के लिए हर बार किसी राजवीर के बचपन को इस तरह सड़क पर सिसकने की जरूरत पड़ेगी?

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