लड़ाई के 11 दिन ! ट्रंप बुरी तरह बौखलाया ?ईरान ने कहां जीती बाजी।

अल्लाहू अकबर। अल्लाहू अकबर। अल्लाहू अकबर। मिडिल ईस्ट में जारी के बीच एक सवाल खड़ा हो रहा है कि आखिर इस पूरी तबाही में नुकसान किसको ज्यादा हो रहा है? इसका जवाब जब हम आपको बताएंगे तो आप भी हैरान रह जाएंगे। आंकड़ों के साथ की रणनीति के साथ सब बताएंगे। ईरान को कमजोर समझने वालों की यही सबसे बड़ी भूल साबित हुई है।

जाहिर सी बात है कि ईरान के रहबर अयातुल्लाह अली खामने के जाने से ईरान ही नहीं बल्कि पूरे विश्व के मुसलमानों को भारी नुकसान हुआ है। लेकिन ईरान ने मातम मनाने के साथ ही अपने नहीं छोड़ेऔर एक नुकसान के बदले अमेरिका और इजराइल को छील रहा है। जी हां, शुरुआत में लगा था कि ईरान अमेरिका और इजराइल के आगे वेनेजुएला की तरह समर्पण कर देगा क्योंकि उसके पास अमेरिका जैसी शक्तिशाली देश से लड़ने की क्षमता नहीं होगी।

लेकिन ईरान के लोग कर्बला को भूले नहीं हैं। उन्हें अंतिम वक्त तक लड़ने की आदत है और यही आदत अब इजराइल और अमेरिका को भारी पड़ रही है। ईरान भावुक तो था लेकिन दिमाग से बहुत होशियारी के साथ अमेरिका पर हमला कर रहा था। सबसे पहले ईरान ने अमेरिका के उन सैन्य बेस को तबाह किया जो उसके पड़ोसीदेशों में मौजूद थे ताकि अमेरिका ईरान पर नजदीक से हमला कर ही ना सके। एक के बाद एक आठ देशों में ईरान अकेला हमला करता रहा और अमेरिका अपनी का मंजर देखता रहा। करीब 11 दिन बीत चुके हैं। लगभग कई अमेरिकी सैन्यवेश तबाह हो गए हैं। जिन्हें बनाने में अमेरिका के अरबों रुपए खर्च हुए थे। जिन का उपयोग अमेरिका करता है, उसकी भी लागत अरबों में है। नौबत ऐसी आई है कि अमेरिका अब इस से पीछे खुद को हटाना चाहता है क्योंकि उस पर उसके ही लोग अधिकारी दबाव बना रहे हैं।

अधिकारियों का कहना है कि साहब अब तो अपने ही लोगों नेकह दिया है कि आपने गलत किया किसी देश में बिना मतलब हमला करके। ईरान के साथ चल रहे संघर्ष में अमेरिका को शुरुआती 10 दिनों में ही सात सैनिकों की मौत, 140 से अधिक घायल और अरबों डॉलर का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। की लागत प्रतिदिन लगभग 1 बिलियन डॉलर यानी कि ₹000 करोड़ आकी गई है। जिसमें थारड़ रडार सिस्टम, फाइटर जेट और ड्रोन नष्ट होने की खबर है। आर्थिक नुकसान की बात करें तो प्रतिदिन लगभग 1 बिलियन यानी 9000 करोड़ से अधिक की लागत का खर्च अमेरिका को उठाना पड़ रहा है।

सैन्य उपकरण की बात करें तो क़तर औरजॉर्डन में थर्ड डिफेंस सिस्टम को नुकसान हुआ है। कुवैत में 3F15 ई फाइटर जेट और 3m9 रिपर को क्षति पहुंची है। साथ ही अमेरिका के जितने मंसूबे थे वह नाकाम हुए हैं।

पहला प्लान था कि ईरान के परमाणु ठिकानों को पूरी तरह तबाह करना। लेकिन अब तक ऐसे कोई सबूत नहीं नजर आए हैं जहां ईरान के परमाणु ठिकानों पर आज भी आई हो। क्योंकि ईरान हमेशा से अमेरिका के मंसूबे को भांप चुका था। इसी वजह से उसने अपने ठिकानों को पहले ही सुरक्षित कर लिया था। इतना ही नहीं खामने के बाद अमेरिका ने सोचा था कि ईरान में सिस्टमबदल जाएगा। वहां के लोग सड़कों पर आ जाएंगे और इस्लामिक राज खत्म हो जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। लोग सड़कों पर तो उतरे लेकिन शोक मनाने।

कुछ ऐसे थे जो खुशी मना रहे थे लेकिन वह भी अमेरिका की चाल मानी जा रही है। अधिकतर ऐसे खुशी मनाने वाली महिला ईरान के बाहर ऐसे प्रदर्शन कर डोनाल्ड ट्रंप की तरफदारी कर रही थी। लेकिन जब खामनई के मातम में पूरे विश्व से मुसलमान निकलने लगे तो अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के होश उड़ गए। उन्हें लगा था कि डोनाल्ड ट्रंप के मुताबिक ईरान में सरकार बनेगी और वह जिसे चाहे उसे सत्ता सौंप देंगे।

लेकिन ईरान नेअपने नए रहबर मुस्तबा खामने को चुन लिया और अब अमेरिका के इस मंसूबे पर भी पानी फेर दिया गया। शो में नहीं शो यानी ट्रंप जिस वजह से जानबूझकर इस जंग में कूदे थे उनमें से कुछ भी मंसूबा उनका पूरा ही नहीं हो सका बल्कि अमेरिका को अरबों का नुकसान झेलना पड़ रहा है और अब ट्रंप पर ही दबाव है कि इस युद्ध को रोक दिया जाए लेकिन ईरान ऐसा नहीं चाहता। ईरान इस जंग को लंबा खींचना चाहता है।

ईरान के सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारीजानी ने भी 2 मार्च को यही बात कही थी। उन्होंने कहा कि ईरान अमेरिका के विपरीत एक लंबी जंग के लिए खुद को तैयारकर चुका है।

उन्होंने बातचीत की संभावना को भी खारिज किया था। अधिकारी ने यह भी कहा कि अमेरिकी इजराइली के जवाब के लिए कोई तय समय सीमा नहीं है। ईरान की रणनीति सीधे जीत हासिल करने की नहीं बल्कि धीरे-धीरे दुश्मन को थकाने की है। कई सैन्य विश्लेषक इसे एंट्रीशन वॉर यानी थकाने वाली रणनीति कहते हैं। इस रणनीति के तहत ईरानी बल लगातार इजराइल के ठिकानों और मध्य पूर्व में मौजूद यूनाइटेड स्टेट्स के सैन्य बेस पर मिसाइल और हमले कर रहे हैं।

इन हमलों का एक बड़ा मकसद है अमेरिका और इज़राइल की एयर डिफेंस प्रणाली कोलगातार सक्रिय रखना। अमेरिका के पेट्रोइट सिस्टम और थर्ड डिफेंस सिस्टम दुनिया के सबसे उन्नत सिस्टम माने जाते हैं। लेकिन उनकी एक बड़ी कमजोरी है उनकी लागत।अक्सर ऐसा होता है कि जिस ड्रोन या को गिराने के लिए इंटरसेप्टर दागा जाता है उसकी कीमत उस से कई गुना ज्यादा होती है।

मतलब साफ है कि ईरान के सस्ते ड्रोन दुश्मन के महंगे खर्च करवा रहे हैं। साथ ही बार-बार होने वाले इन हमलों से इंटरसेप्टर के भंडार, लॉजिस्टिक सप्लाई और सैन्य तैयारी पर भी दबाव बढ़ सकता है। अगर यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तोविरोधी पक्ष के लिए युद्ध का खर्च और चुनौती दोनों बढ़ जाते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि 1980 के दशक में हुए ईरान इराक वॉर के बाद ईरान ने अपनी सैन्य रणनीति को इसी दिशा में ढाला था।

ईरान जानता था कि पारंपरिक सैन्य ताकत में वह पश्चिमी देशों से पीछे हैं। इसलिए उसने ऐसी रणनीति पर निवेश किया जिससे कम संसाधनों से भी शक्तिशाली दुश्मन को उलझाया जा सके। इस रणनीति का लक्ष्य सीधी जीत नहीं होती बल्कि युद्ध को लंबा, महंगा और अनिश्चित बना देता है। वहीं इसी बीच ईरान ने दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक स्ट्रेट ऑफ हॉर्मोंस कोभी बंद करने का ऐलान कर दिया। यह वही रास्ता है जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल गुजरता है।

अगर यह मार्ग लंबे समय तक बाधित रहता है तो इसका असर सिर्फ में शामिल देशों पर ही नहीं बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। यही वजह है कि दबी जुबान में कई देश अब अमेरिका पर दबाव बना रहे हैं कि वह इस संघर्ष को जल्द खत्म कराने की दिशा में कदम उठाएं।

लेकिन संकेत यह भी मिल रहे हैं कि ईरान फिलहाल दबाव में पीछे हटने के मूड में नहीं है। ट्रंप अब इस युद्ध से निकलने के लिए बहाना बना रहे हैं। जी हां, ऐसेबयान दे रहे हैं मानो पीछा छुड़ा रहे हो। अभी हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने कई बयान दिए जिसका जवाब ईरान ने ऐसा दिया जिसे माना जा रहा है कि ईरान अमेरिका को का मैदान छोड़ भागने नहीं देगा। भले अमेरिका ने शुरू किया हो लेकिन खत्म कब करना है वह ईरान तय करेगा। दरअसल हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने बयान दिया था। कहा था कि ईरान के खिलाफ जारी युद्ध अब लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है।

लेकिन ईरान अब हाथ पैर धोकर अमेरिका के पीछे पड़ गया है। ईरान ने ट्रंप के दावों को एक बार फिर से खारिज करते हुए कहा कि अमेरिका नहीं बल्किईरान तय करेगा कि को कब खत्म करना है। तो सुना आपने इस तरीके से ईरान अपनी रणनीति बना रहा है। अमेरिका को थका रहा है। एक अकेला ईरान आठ देशों पर भारी पड़ रहा है। तो अब आपको समझ आ गया होगा कि नुकसान भारी ईरान ने तो झेला है। अपने रहबर को गवाया है।

Leave a Comment