पाकिस्तान में बातचीत से पहले अड़ गए अमेरिका और ईरान !

पूरी दुनिया की नजर इस वक्त अमेरिका और ईरान के फैसले पर टिकी है। वो फैसला जो यह तय करेगा कि पिछले करीब 40 दिनों से चल रहा तनाव अब किस ओर मुड़ेगा। हाल ही में दोनों देशों के बीच जारी तनाव को कम करने के लिए दो हफ्ते का अस्थाई संघर्ष विराम लागू किया गया था। लेकिन यह शांति अभी भी बेहद नाजुक मानी जा रही है। आज दोनों देशों के बीच वार्ता होनी है। यह वार्ता पाकिस्तान में होनी है।

लेकिन इन सबके बीच दोनों देशों का रुख बेहद अडियल है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाते हुए ईरान को चेतावनी दी है कि यदि समझौता नहीं हुआ तो अमेरिका दोबारा सैनिक कारवाई कर सकता है। ट्रंप के इस बयान ने दुनिया भर में हलचल मचा दी है। क्योंकि यह सिर्फ एक चेतावनी नहीं बल्कि आने वाले संभावित संकट का संकेत भी है। फिलहाल आज पाकिस्तान की मध्यस्था में होने वाली यह वार्ता दोनों देशों के बीच स्थाई शांति की दिशा में एक बड़ा कदम मानी जा रही है। इस बैठक का मुख्य उद्देश्य हाल ही में हुए दो सप्ताह के संघर्ष विराम को मजबूत बनाना और आगे की रणनीति तय करना है। वार्ता के लिए राजधानी के एक बड़े हिस्से को पूरी तरह सील कर दिया गया है। सुरक्षा एजेंसियां किसी भी प्रकार की चूक से बचने के लिए हाई अलर्ट पर है।

संभावना जताई जा रही है कि बातचीत एक प्रतिष्ठित पांच सितारा होटल में होगी जिसे पूरी तरह खाली भी करवा दिया गया है। सुरक्षा कारणों से राजधानी के रेड जोोन में 3 कि.मी. का क्षेत्र सील कर दिया गया है। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि यदि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री मेजबान की भूमिका निभाते हैं तो बातचीत प्रधानमंत्री आवास हिल टॉप पर भी हो सकती है। इस वार्ता में दोनों देशों के शीर्ष नेता और अधिकारी हिस्सा लेने वाले हैं। ईरान की तरफ से ईरानी संसद के अध्यक्ष और पूर्व सैन्य कमांडर मेजर जनरल गालीब, विदेश मंत्री अब्बास अराची, राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव, उप विदेश मंत्री और इस्लामाबाद में ईरान के राजदूत मौजूद होंगे। वहीं अमेरिका की तरफ से उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के शीर्षदूत स्टीव [संगीत] विटफ और दामाद जेरेड कुशनर इस युद्ध विराम वार्ता में हिस्सा लेंगे। सूत्रों का कहना है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ शनिवार सुबह सबसे पहले वार्ता की औपचारिक [संगीत] शुरुआत करेंगे। वार्ता सीधे आमने-सामने नहीं होगी। पहले दोनों पक्षों के साथ अलग-अलग प्रारंभिक बैठकें होंगी।

इसके बाद मध्यस्थ दोनों के बीच तालमेल बनाने की कोशिश करेंगे। जब दोनों पक्ष कुछ बुनियादी मुद्दों पर सहमत हो जाएंगे तभी आमने-सामने की बातचीत होगी। यह तरीका तनाव को कम करने और टकराव से बचने के लिए अपनाया जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच हालिया संघर्ष लगभग 40 दिनों तक चला था। जिसमें दोनों पक्षों ने सैन्य ताकत का खुलकर इस्तेमाल किया था। इसके बाद एक अस्थाई संघर्ष विराम लागू किया गया। जिसकी अवधि दो सप्ताह तय की गई।

हालांकि यह शांति अभी भी कई शर्तों और बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर है। इस शांति प्रक्रिया में सबसे बड़ा अवरोध लेबनान और इजराइल के बीच जारी संघर्ष बनता जा रहा है। ईरान समर्थित संगठन हिजबुल्ला और इजराइल डिफेंस फोर्सेस के बीच लगातार झड़पें हो रही है। ईरान ने साफ कर दिया है कि जब तक लेबनान में हमले बंद नहीं होते और विदेशों में जब्त उसकी संपत्तियां वापस नहीं की जाती तब तक वह वार्ता में हिस्सा लेने को लेकर असमंजस में रहेगा। ईरान के शीर्ष नेताओं ने दो टूक कहा है कि वार्ता से पहले कुछ अहम शर्तों को पूरा करना जरूरी है। इसमें लेबनान में पूर्ण युद्ध विराम और विदेशों में फंसी ईरानी संपत्तियों की रिहाई शामिल है। ईरान का मानना है कि बिना इन मुद्दों के समाधान के बातचीत का कोई ठोस परिणाम नहीं निकल सकता। डॉन्ड ट्रंप ने भी एक इंटरव्यू में बेहद आक्रामक बयान दे दिया।

उन्होंने कहा कि अमेरिका अपनी सैन्य ताकत को लगातार मजबूत कर रहा है और उसके पास दुनिया के सबसे उन्नत हथियार मौजूद है। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा अगर कोई समझौता नहीं होता तो अमेरिका इन हथियारों का इस्तेमाल करेगा और ऐसा असरदार तरीके से करेगा कि दुश्मन पूरी तरह तबाह हो जाएगा।

उनके इस बयान को कूटनीतिक दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। व अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वेंस ने भी वार्ता से पहले सख्त लहजा अपनाया। उन्होंने कहा कि अमेरिका सकारात्मक बातचीत की उम्मीद कर रहा है। लेकिन अगर ईरान ने किसी तरह की चालाकी या धोखा देने की कोशिश [संगीत] की तो उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। वेंस ने यह भी संकेत दिया कि अमेरिका अपने नागरिकों की रिहाई का मुद्दा भी इस वार्ता में उठा सकता है। इस बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा पाकिस्तान।

इस वार्ता को सफल बनाने के लिए पूरी तैयारी कर रहा है। देश में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। हजारों सुरक्षाकर्मी तैनात कर दिए गए हैं। सरकार ने वार्ता में शामिल होने वाले प्रतिनिधियों और पत्रकारों के लिए विशेष वीजा [संगीत] व्यवस्था भी की है ताकि प्रक्रिया में कोई बाधा ना आए। हालांकि इतनी तैयारियों के बावजूद वार्ता पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं। यह पूरी स्थिति ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां एक तरफ कूटनीति है और दूसरी तरफ युद्ध का खतरा।

अगर यह वार्ता सफल होती है तो यह ना सिर्फ अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार ला सकती है बल्कि पूरे पश्चिम एशिया में स्थिरता का रास्ता भी खोल सकती है।

लेकिन अगर बातचीत विफल रहती है तो ट्रंप की चेतावनी हकीकत में बदल सकती है और इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ेगा। फिलहाल पूरी दुनिया की नजरें इस वार्ता पर टिकी हुई है। आने वाले कुछ दिन यह तय करेंगे कि दुनिया शांति की ओर बढ़ेगी या एक और बड़े संघर्ष की ओर।

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