ट्रंप को नानी याद दिला देंगे खामेनेई !अरविंद तेजावत ने कलई खोल दी।

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के दौरान ईरान के जो सर्वोच्च नेता है आयातुल्ला खामई उन्होंने अमेरिका को बड़ी चेतावनी दे दी है। रविवार यानी एक फरवरी को उन्होंने एक बड़े कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमेरिकियों को कहा कि अगर आपने शुरू की तो यह क्षेत्रीय जंग में बदल जाएगी। उनका कहना साफ था कि अगर अमेरिका की ओर से हमला किया गया तो यह सिर्फ हमला ईरान पर नहीं होगा। इस में कई और देश भी शामिल हो सकते हैं। अयातुल्ला खान के इस बयान को किस रूप में देखा जाना चाहिए और इसके क्या मायने हैं और क्या सच में होगा तो वो युद्ध सिर्फ ईरान और अमेरिका का नहीं होगा। उसमें कई और देश शामिल हो जाएंगे। तो इन्हीं सब सवालों के जवाब लेंगे। जी जो विदेश मामलों के जानकार हैं। तेजावत जी मेरा पहला सवाल यही है। हम लगातार इस बारे में बात कर रहे हैं। ईरान और अमेरिका के जो संभावित युद्ध को लेकर बातें हो रही हैं।

क्या खामनी कुछ ऐसा कह रहे हैं कि अगर अमेरिका का हमला हुआ तो कई और मुस्लिम देश भी इसमें कूट सकते हैं। देखिए खाने साहब जैसा कि मैंने पहले ही आपको बताया है वैभव जी कि यह दरअसल चाहेंगे कि यह जो लड़ाई है वो अरब इजराइल लड़ाई में तब्दील हो जाए वो अरब इजराइल हो जाए वो हमेशा से ये चाहेंगे क्योंकि अमेरिका इतना बड़ा भीम का राक्षस है कि उनसे अभी लड़ना मुनासिब नहीं है तो यह जाहिर है कि काम साहब है वो इसे अरब इजराइल लड़ाई का शक्ल देना चाहते हैं और ये तभी होगा.

जब वो इस तरीके के बयानात देते हैं या स्टेटमेंट देते हैं कि अगर ऐसी लड़ाई आगे बढ़ी तो कुछ और मुस्लिम कंट्रीज है वो भी इसमें कूद सकते हैं तो वो एक तरीके से मैसेज देना चाहते हैं और अगर ऐसा होता है तो वो अपनी दरअसल लीडरशिप भी इस्टैब्लिश करना चाहते हैं मुस्लिम वर्ल्ड में तो ये दो खास कारण है कि वो खासकर स्ट्रेटेजिकली या डिप्लोमेटिक रूप से इस तरीके के बयानात खाने साहब की ओर से आ रहे हैं। वैभव जी क्या इसे एक तरीके से हम यह भी कह सकते हैं कि ईरान खुद भी चाहता है कि अब जो जंग हो उस जंग में सिर्फ दो ही देश ना रहे और अगर ये जंग में कई और देश शामिल होते हैं तो आप उनके नाम बता सकते हैं कि कौन-कौन से देश शामिल हो सकते हैं और वो किसके पक्ष से शामिल हो सकते हैं।

देखिए वैभव जी आज के हालात में कोई भी देश ईरान का साथ नहीं देगा। चाहे वो कितना भी बड़ा दावा करे किसी भी मुस्लिम कंट्री में अमेरिका के खिलाफ जाने की हिम्मत नहीं है। तो कोई भी देश साथ नहीं देने वाला है। इनको तो छोड़िए जो बड़ी महाशक्तियां है वो तक बाहर से बयानबाजी करेगी। लड़ाई में कोई शामिल नहीं होगा। ईरान की रक्षा अगर कोई कर सकता है तो वह खुद ईरान ही है। तो देखते हैं कि क्या होता है। बाकी मुझे ऐसा कुछ भी नहीं लगता है कि कोई भी देश ईरान की मदद करने के मूड में है इस समय।

जी इजावत जी खामने के भाषण में एक अंश मुझे वो भी बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण लगा। उनका कहना था कि जो हालिया विद्रोह हुआ था उसे सिर्फ विद्रोह के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वो एक तख्ता पलट की कोशिश थी और आईआरजीसी ने उसे सफलतापूक उसे खत्म कर दिया। आपको भी ऐसा लगता है? नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता है। यह जरूर है डीप स्टेट तो हमेशा हर जगह सक्रिय होता है। बांग्लादेश से लेकर ईरान तक तो उसकी तो कोई मनाही नहीं है। पर यह कि ये पूरी तरीके से अमेरिका द्वारा प्रायोजित था या वहां से इंटरनल सपोर्ट नहीं था। ऐसा नहीं कह सकते हैं क्योंकि उसमें हजारों हजारों पपुलेशन उसमें इन्वॉल्व थी। लाखों लोग उस प्रोटेस्ट में शामिल थे। तो इतने बड़ी संख्या में कोई भी डीप स्टेट कहीं के भी पपुलेशन को मैनेज नहीं कर सकता है ना वहां के एनजीओस और ना ही कोई दूसरे ऑर्गेनाइजेशन। तो यह कहना तो ठीक नहीं है। दूसरी बात है कि ईरान में लगातार महिलाओं की और आम आदमी की आजादी को दबाया गया है।

सप्रेस किया गया है। इसमें कोई दो राय नहीं है। तो वहां की जनता में खासकर जो न्यू जनरेशन है जो कि बाहर की दुनिया की हवा खा रही है। उसको बिल्कुल ये जो है वो खासकर जो वर्तमान सरकार था उसके खिलाफ विद्रोह था। असंतोष था और यह है कि अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण वहां पर महंगाई काफी बढ़ी हुई है।

बाजारों की हालत खराब है। तो ऐसे में आर्थिक असंतोष और उसका परिणाम स्वरूप इस तरीके के विद्रोह और सरकार के खिलाफ प्रदर्शन होना एकदम बिल्कुल जायज बात है। तो इस बारे में खाम साहब का बिल्कुल यकीन नहीं करना चाहिए और ना ही यह जायज लगता है। साहब तेजावत जी वर्षगांठ आने वाली है इस्लामिक क्रांति की जो 1979 में बदलाव हुआ था ईरान में और फिर उसके बाद ये सर्वोच्च नेता वाली सत्ता आई उस इस्लामिक क्रांति के बारे में हमारे दर्शकों को थोड़ा बहुत आप बताइए। देखिए यह दरअसल जो इससे पहले की जो सरकार थी जिसमें जो ईरान के शाह होते थे शुरू से ही शाह होते थे मध्यकाल से जब हमारे यहां पे मुगल होते थे तो मुगलों के ईरान के शाह उनसे संबंध होते थे जो हुमायूं थे वो भी वहां ईरान में शरण लेने के लिए गए थे और बाहर के बहुत सारे आक्रमणकारी यहां भारत पर आक्रमण करने के लिए ईरान से भी आए हैं। तो भारत के और उनके संबंध तो काफी पुराने हैं। इसके अलावा यह जो पूरी की पूरी जो सत्ता है.

वह दरअसल सामंती अवशेष था। तो एक तरीके से देखा जाए तो उसी जो सामंती सत्ताओं को हटा के पहली बार ऐसा हुआ था कि ईरान में एक सेमी डेमोक्रेटिक या अर्थ प्रजातांत्रिक सत्ता की स्थापना हुई थी। पर इसके मूल्य जो थे वो इस्लामिक थे। अब एक तरफ तो आप जो मध्यकालीन शासन सत्ता है उसके खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं। पर जो नई शासन सत्ता आ रही है वह भी अगर मध्यकालीन मूल्यों पर स्थापित होती है तो उसके लेटर कॉन्सक्वेंससेस होते हैं जो कि अभी हम देख रहे हैं। तो ये जो मध्यकालीन जो सत्ता का जो अवशेष क्योंकि ये उन्होंने जो बनाया था वो मॉडर्न स्टेट था नहीं। हर अपने आप में एक मिडवल फेनोमिनन है। तो मध्यकालीन फेनोमिनन होने के कारण उसके ऊपर तो अगर आप इस्लाम की और मध्यकालीन इस्लाम की बात करेंगे तो फिर पर्दे की भी बात करेंगे।

वो तमाम चीजों की बात करेंगे जो कि नई दुनिया के अनुरूप नहीं है। पर ये युवा पीढ़ी है वो मध्यकालीन नहीं है। तो उस समय तक तो चल गया जो पुराने स्टाइल का जो ढांचा है जिसमें खमानी साहब एक अकेले आदमी है। जैसे कि एक राजा होता है पूरी रियासत का वही हालात में है। तो बिल्कुल जनता का जो विद्रोह है ऐसे ही राजा के खिलाफ है। तो इसी तरह की ये ढांचे की मध्यकालीन सत्ता है। जो शिया लोग हैं वो कंपेरेटिवली एक तरीके से देखा जाए तो हेमेटिक और सेमेटिक जो दो रिलजन होते हैं तो वो हेमेटिज्म के ज्यादा नजदीक है सेमेटिज्म के थोड़ा सा कम करीब है। जी वैभव जी तेजाऊ जी मेरा दूसरा सवाल है भारत और ईरान के संबंधों को लेकर चाबहार पोर्ट बंदरगाह जो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है और उसकी जो बहुत लंबे समय से चर्चा होती आ रही है। लेकिन जो आज बजट प्रस्तुत किया गया है केंद्र की सरकार के द्वारा उसमें चाबहार पोस्ट पो को लेकर कुछ भी धनराशि आवंटित नहीं की गई है। इसे आप कैसे देख रहे हैं?

देखिए वैभव साहब यह वाकई भारत के डर को बताता है कि अगर हम ईरान में कोई भी इन्वेस्टमेंट करेंगे तो वो रिस्की इन्वेस्टमेंट है। ईरान के चाहार पोर्ट में जो भारत ने पहले भी इन्वेस्टमेंट किया है वह खटाई में पड़ चुका है। काफी दुखद स्थिति है और अगर यह चाब पोर्ट भारत के हाथ में नहीं आता है तो भारत के लिए रोजगार की संभावनाएं जो हम आगे की जो योजनाएं बना रहे हैं वो सारी की सारी कटाई में पड़ सकती है और ऐसे में बहुत सारी तमाम दिक्कतें और तमाम समस्याएं पैदा हो सकती है जो देख रहे हैं। एक दूसरा ये कि डिफेंस बजट में वृद्धि के लिए इसका मतलब ये हुआ कि पूरा का पूरा जो भारत है वो वेस्टर्न लाइन पे चल रहा है। जैसा जैसा अमेरिका और यूरोपियन कंट्रीज जैसेजैसे नीतियां निर्धारित कर रहे हैं हम उनके ट्रैक में आ चुके हैं। हम उनके चक्कर में आ चुके हैं। क्योंकि डिफेंस बजट में बढ़ोतरी का मतलब ये हुआ ये सारा का सारा पैसा हमारे लिए फाइटर जेट्स खरीदने के नाम पर हथियार खरीदने के नाम पर ये पूरा का पूरा या तो अमेरिका में जाएगा जो एसयू कैटेगरी या एसयू सीरीज के जो स्टील फाइट फाइटर जेट है वो भी भारत खरीद सकता है ताकि अमेरिका को मनाया जा सके और टेरिफ कम करवाया जा सके अमेरिका का साफसाफ कहना है हमसे हथियार खरीदो हम आप पर टेरिफ कम कर देंगे तो इसी तरीके से ब्लैकमेलिंग का भारत शिकार हो रहा है और जो बजट है .

वो इसको रिप्रेजेंट कर रहा है वैभव साहब तेजावत जी क्या इसे हम संभावित खतरे के रूप में नहीं देख सकते क्योंकि कई दिनों से बातें चल रही है खासकर जब ऑपरेशन सिंदूर हुआ उसके बाद से ही कि भारत और पाकिस्तान के बीच में हालिया महीनों में कुछ और सहन संघर्ष देखने को मिल सकते हैं तो क्या सरकार इस ओर तैयारी करती हुई नहीं दिख रही है आपको देखिए ये मुझे कहना पड़ेगा पिटिकल पार्टीज या किसी भी लाइन से दूर हटकर पिटिकल पार्टी का मामला नहीं है। पर राजीव जी के जमाने जमाने में 20 साल तक हमारी जो सीमाएं थी वो चीन की तरफ से सुरक्षित थी। चीन ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया। फिर अचानक से चीन ने हम पर हमला किया और हमारी जो सुरक्षा जो समझ थी वो खत्म हुई है चीन के साथ में। पाकिस्तान के साथ भी क्लशेस बढ़े हैं। बातचीत करनी चाहिए दोनों देशों से और कोई ना कोई समाधान ढूंढना चाहिए और पाकिस्तान के साथ कोई ना कोई ऐसा रास्ता ढूंढना चाहिए कि भारत को ईरान के सहारे ना जाने पड़कर सीधा का सीधा भारत जो कश्मीर है या पंजाब के जरिए वो अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच जाए। हालांकि यह बेहद मुश्किल है पर बावजूद उसके अगर डिप्लोमेसी यह नहीं कर सकती है तो फिर हम कौन से डिप्लोमेट्स की बात कर रहे हैं जो कि सफलतापूक काम कर रहे हैं। फिर तो फेलर ही हुआ ना व्यवस्था साहब।

जी बिल्कुल तेजावत जी इस बातचीत का छोटा सा सवाल और रहेगा वो ईरान को लेकर ही रहेगा। जो हम पहले बातचीत किए हुए थे कि ईरान पर हमला करेगा अमेरिका वो खाली हाथ नहीं जाएगा। क्या अभी भी आज का जो अपडेट है उसके आने के बाद भी आपको यही लगता है कि अमेरिका हमला करेगा? निश्चित रूप से क्योंकि अगर इस समय हमला नहीं हुआ व्यवस्था तो अमेरिका फिर आगे कभी नहीं कर पाएगा। यह समझ मोटा मोटी मेरी है और मुझे लगता है कि ऐसा ही होगा व्यवसा।

बिल्कुल। तो दर्शकों के लिए तो आज की ईरान और अमेरिका के बढ़ते तनाव के बीच की अपडेट जो थी वो हमने बता ही दी और तेजावत जी ने बखूबी समझा दिया कि कैसे स्थितियां बिगड़ती जा रही है और हमला तो निश्चित रूप से होगा। कैसे होगा उसका स्वरूप क्या होगा ये आने वाले दिनों में पता चल जाएगा। लेकिन अमेरिका ने तय कर लिया है कि ईरान से वो सैन संघर्ष में जाने वाला है।

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