ट्रंप की सनक के खिलाफ हो गए खड़े !जिगर वाले देश।

मिडिल ईस्ट की आग अब सिर्फ एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं बल्कि यह वैश्विक ताकतों की साख और रणनीति की असली परीक्षा बन चुकी है। 28 फरवरी से शुरू हुई ईरान के साथ जंग को 32 दिन बीत चुके हैं।

लेकिन हालात उम्मीद के बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं। जहां अमेरिका और इजराइल दबाव में दिख रहे हैं, वहीं उनके अपने सहयोगी देश ही अब पीछे हटते नजर आ रहे हैं।

सबसे चौंकाने वाली बात तो यह है कि इटली और तुर्की जैसे अहम नाटो सहयोगियों ने ना सिर्फ इस में शामिल होने से इंकार कर दिया बल्कि अपनी जमीन का इस्तेमाल तक नहीं करने दिया। यह फैसला सिर्फ सैन्य रणनीति नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति में बदलते समीकरणों का बड़ा संकेत है। इधर डोनाल्ड ट्रंप का गुस्सा भी खुलकर सामने आ रहा है।

सहयोगियों की इस दूरी को वह धोखा मान रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई धोखा है यह या फिर अमेरिका की नीतियों पर उठता अविश्वास? तो आखिर क्यों इटली तुर्की ने अमेरिका का साथ देने से साफ तौर पर इंकार कर दिया? क्या यह सिर्फ राजनीतिक चाल है या आने वाले समय में बदलती विश्व व्यवस्था की झलक? इटली इटली सरकार ने मिडिल ईस्ट की ओर जा रहे एक अमेरिकी विमान को सिसली में उतरने नहीं दिया। विमान ने सीगोनेला एयरबेस पर लैंडिंग की परमिशन मांगी थी। इटली के रक्षा मंत्री गुजडो क्लास्ट ने कहा कि लैंडिंग से पहले कोई औपचारिक अनुमति नहीं मांगी गई थी और इटली के मिलिट्री कमांड से सलाह नहीं दी गई थी। विमानों के हवा में होने के दौरान ही उड़ान योजना की सूचना दी गई थी। यह इटली और अमेरिका के बीच मौजूदा संधि के तहत आने वाले नियमित या रसद उड़ाने नहीं थी।

इटली का मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि इटली नाटो मेंबर है। तुर्की नाटो का सदस्य होने के बावजूद तुर्की ने इस जंग में सीधे अमेरिका का साथ देने के बजाय मध्यस्थ की भूमिका चुनी है। तुर्की दोनों देशों के बीच संदेश पहुंचाने का काम कर रहा है और उसने बार-बार विराम की अपील भी की है। तुर्की के अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि वह ईरान में सैन्य दखल के खिलाफ हैं। तुर्की के राष्ट्रपति फ्रेसे तैयर एद्रोगान ने कहा कि यह युद्ध इजराइल का है।

लेकिन इसकी कीमत सबसे पहले मुसलमान और फिर पूरी मानवता चुका रही है। स्पेन स्पेन ने ईरान युद्ध में शामिल अमेरिकी विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर दिया। डिफेंस मिनिस्टर मार्गिटा रोब्स ने कहा कि अमेरिकी सेना और बलों को यह बात शुरू से ही पूरी तरह स्पष्ट कर दी गई थी। दरअसल ईरान युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद ही स्पेशनिस्ट प्रधानमंत्री पैड्रो सांचेच ने इसकी कड़ी निंदा की थी। साथ ही कहा था कि अमेरिका युद्ध में संयुक्त रूप से इस्तेमाल होने वाले स्पेनिश सैन्य अड्डों का इस्तेमाल नहीं कर सकता। ब्रिटेन ब्रिटेन ने कहा कि वह अमेरिका को अपने सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल सिर्फ डिफेंसिव स्ट्राइक के लिए करने देगा।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने कहा कि उनका देश इराक युद्ध जैसी गलती दोहराना नहीं चाहता और वह ईरान पर हुए शुरुआती हमलों में शामिल नहीं था। हालांकि ब्रिटेन के आरएफ फेयरफोर्ड एयरबेस से अमेरिकी बी52 बमबर विमान उड़ान भी बढ़ते देखे गए। फ्रांस और जर्मनी जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने कहा कि बिना युद्ध खत्म किए कोई कदम उठाना सही नहीं होगा। वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति एमनुएल मैक्रो ने कहा कि अभी सबसे जरूरी काम तनाव कम करना और अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन करना है। उन्होंने यह भी कहा कि यूरोप के देश इस युग में शामिल नहीं होना चाहते।

सात देशों जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, नीदरलैंड, जापान और कनाडा ने संयुक्त बयान में कहा कि वह समुद्री रास्तों की सुरक्षा के लिए उचित प्रयासों में शामिल हो सकते हैं। लेकिन उन्होंने यह भी साफ कर दिया है कि इसके लिए पहले युद्ध का खत्म होना बहुत जरूरी है। खाली देश। खाली देश जैसे कि सऊदी अरब और यूएई जिन्होंने युद्ध में सीधे शामिल होने से बचना ही सहमत और सही समझा। लेकिन वह अपने यहां अमेरिकी ठिकानों का इस्तेमाल करने दे रहे हैं। क़तर और ओमान ने भी चेतावनी दी है कि इस युद्ध के गंभीर परिणाम होंगे।

लेकिन फिर भी सीधे तौर पर अमेरिका के मिलिट्री ऑपरेशन का हिस्सा बनने से कतरा रहे हैं। अमेरिका को इन देशों ने सीधे-सीधे ना सिर्फ धोखा दिया बल्कि जंग में उतरने से साफ तौर पर इंकार भी किया है। लेकिन कई देश हैं जो कहीं ना कहीं अमेरिका के सपोर्ट में खड़े हैं। लेकिन कुछ देश यानी कि नाटो देश जो इस का सीधे-सीधे विरोध कर रहे हैं। ईरान के साथ चल रही ने ना सिर्फ मिडिल ईस्ट बल्कि वैश्विक राजनीति को भी हिला कर रख दिया। 1 महीने से ज्यादा समय बीत जाने के बाद भी हालात काबू में आते नहीं दिख रहे। इसी बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का हालिया बयान कई बड़े संकेत देता है।

खासकर उनकी नाराजगी, दबाव और बदलती रणनीति को लेकर। ट्रंप का सहयोगी देशों के प्रति सख्त रुख यह दर्शाता है कि जंग उनकी उम्मीदों के मुताबिक आगे नहीं बढ़ पा रही है। ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा है कि जो देश अब तक इस में अमेरिका के साथ नहीं खड़े हुए हैं, उन्हें अपनी सुरक्षा जरूरतों की जिम्मेदारी अब खुद उठानी होगी। यह बयान सिर्फ एक चेतावनी नहीं बल्कि वैश्विक ताकत संतुलन में बदलाव का संकेत भी है।

सबसे दिलचस्प बात तो यह रही कि ट्रंप ने सीधे तौर पर ब्रिटेन और फ्रांस जैसे करीबी सहयोगियों पर निशाना साधा। ब्रिटेन पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि जंग में हिस्से ना लेने का खामियाजा अब उसे जेट फ्यूल की कमी के रूप में भुगतना पड़ रहा है। वहीं फ्रांस पर आरोप लगाया कि उसने अमेरिकी सैन्य विमानों को अपने हवाई क्षेत्र से गुजरने की अनुमति नहीं दी। इन आरोपों से साफ है कि अमेरिका अपने पारंपरिक सहयोगियों से भी असंतुष्ट है। ट्रंप की दो चूक सलाहें। अमेरिका से तेल खरीदो या खुद स्टेज ऑफ हरमूस जाकर कंट्रोल हासिल करो। दरअसल उनकी अमेरिका फर्स्ट नीति का ही विस्तार है कि यह बयान बताता है कि अब अमेरिका हर परिस्थिति में अपने सहयोगियों की ढाल बनने के मूड में नहीं है।

हालांकि इस पूरी स्थिति का दूसरा पहलू उतना ही महत्वपूर्ण है। ट्रंप का यह भी कहना है कि ईरान लगभग तबाह हो चुका है और मुश्किल काम पूरा हो गया। एक तरह से खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश भी हो सकती है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जंग अब तक निर्णायक मोड़ पर नहीं पहुंची। भारी जनहानि, तेल आपूर्ति में संकट और बढ़ता वैश्विक तनाव इस बात का संकेत है कि स्थिति अभी भी बेहद जटिल बनी हुई है। यानी कि अनकंट्रोल है।

व विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ता जा रहा है। जंग लंबी खींचने से ना केवल आर्थिक असर पड़ रहा है बल्कि उनकी राजनीतिक छवि भी दांव पर लग गई है। ऐसे में सहयोगियों पर दबाव बनाना एक रणनीतिक कदम हो सकता है ताकि जिम्मेदारी को साझा किया जा सके। कुल मिलाकर ट्रंप का यह तीखा रुख इस बात की ओर इशारा करता है कि अमेरिका अब अकेले इस जंग का बोझ उठाने के लिए तैयार नहीं है। साथ ही साथ यह भी साफ है कि इस संघर्ष ने उनकी शुरुआती उम्मीदों पर पानी फेर दिया है।

अब देखना यही होगा कि क्या सहयोगी देश आगे बढ़कर जिम्मेदारी लेते हैं या फिर यह जंग और भी ज्यादा जटिल मोड़ लेती है। मध्य पूर्व में जारी तनाव के बीच अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के सबसे बड़े मंच संयुक्त राष्ट्र से एक ऐसी खबर आई है जिसने दुनिया भर के रक्षा विशेषज्ञों और राजनेताओं को चौंका दिया है।

संयुक्त राष्ट्र में पेट्रिएटिक विजन के मुख्य प्रतिनिधि मोहम्मद सफा ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर अपना इस्तीफा साझा करते हुए सफ़ा ने संयुक्त राष्ट्र की कार्यप्रणाली पर जो आरोप लगाए हैं, वे न केवल गंभीर हैं, बल्कि भविष्य के लिए एक डरावनी तस्वीर पेश करते हैं।

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