प्रेसिडेंट ट्रंप ने ईरान को दी है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस खोलो वरना नर्क जैसा हाल बना देंगे। 7 अप्रैल यानी मंगलवार पावर प्लांट और ब्रिज डे होगा। सबको एक साथ निपटाएंगे। जिस पोस्ट में उन्होंने यह दी है, वह इतना आम पोस्ट नहीं था। दी तो दी। ट्रंप ने भी दी है।
वैसे अंग्रेजी में का असर कम ही महसूस होता है जब तक देसी लहजे में ना बोला जाए। लेकिन तो है और ट्रंप इस जंग से इतने फ्रस्ट्रेट हो गए हैं कि देकर देने लगे हैं। पावर प्लांट और ब्रिज डे से मतलब साफ समझ आ रहा है कि अमेरिका अब यह खुलकर कह रहा है कि वो ईरान में सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर को टारगेट करेगा। अगली पोस्ट में ट्रंप ने हमले की तारीख और समय भी बताया। मंगलवार 8:00 बजे ईस्टर्न टाइम।
इस पर ईरान की तरफ से भी रिएक्शन आ गया है। ईरानी संसद स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबाफ ने कहा कि इनका यह लापरवाही भरा जो कदम है अमेरिका के हर परिवार को जीते जी नर्क में धकेल रहा है। पूरा का पूरा क्षेत्र सिर्फ इसलिए राख होने वाला है क्योंकि ट्रंप नेतन्या के इशारों पर चलने की जिद पर अड़े हैं। इस मुगालते में मत रहिएगा। आपको वॉर क्राइम से कुछ हासिल होने वाला नहीं है।
इकलौता असली रास्ता यही है कि ईरानी जनता के अधिकारों का सम्मान किया जाए और इस खतरनाक खेल को यहीं खत्म किया जाए। ईरान के विदेश मंत्रालय के स्पोक पर्सन इस्माइल बघाई ने कहा कि ईरान के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला होगा तो हमारी सेना भी अमेरिका के इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला करेगी। हम ऐसा चाहते तो नहीं हैं लेकिन यह सेल्फ डिफेंस के लिए करना ही होगा। और मुझे लगता है कि अमकी लोग यह समझ रहे होंगे हमारी लड़ाई उनके साथ नहीं है। यह लड़ाई उनके शासन के खिलाफ है जो नरसंहार करने पर तुली हुई है।
ईरान को धमकी देने के बाद ट्रंप ने 5 अप्रैल को अपने पसंदीदा न्यूज़ को भी इंटरव्यू दिया है। वो बोले ईरान के साथ कल तक डील होने की पूरी-पूरी संभावना है। वो बातचीत के लिए आगे हैं। वो मतलब ईरान। ट्रंप ने आगे कहा कि अगर ईरान समझौता करने में नाकाम रहा तो पूरे देश में पुल और पावर प्लांट एक-एक करके तबाह किए जाएंगे। अगर ईरान डील नहीं करता है तो मैं सब कुछ उड़ा दूंगा और उनके तेल पर कब्जा कर लूंगा।
ईरान पर हमले की वजह थी यूरेनियम एनरचमेंट। इजराइल और अमेरिका को डर था कि कहीं ईरान ना बना ले। पर अब ट्रंप के स्टेटमेंट में तेल का जिक्र हो रहा है। वो कह रहे हैं कि ईरान नहीं माना तो हम उनका तेल कब्जा लेंगे।
अब दूसरे महीने में है। जिस मकसद से ईरान पर हमला हुआ था वो पूरा या हुआ या नहीं वो तो अब ट्रंप ही जाने पर ट्रंप यह कैसे खत्म करेंगे यह साफ नहीं हो पा रहा है। फिलहाल कर रहे हैं, दे रहे हैं। उधर ईरान स्टेट ऑफ हॉर्मोस में गुजरने वाले वेसल्स पर टोल टैक्स लगा रहा है और अमेरिका में पेट्रोल की कीमत $4 पर गैर पहुंच गई है। और अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शंस भी हैं। केवल 8 महीने बाकी है। यानी ट्रंप को यह सब जल्दी-जल्दी खत्म करना होगा। अमेरिकी पॉलिसी एनालिसिस्ट करीम सदजादपुर ने प्रेसिडेंट ट्रंप की स्ट्रेटजी को लेकर कुछ बातें रखी हैं इस बीच। माने ट्रंप कहां चूक रहे हैं?
उनका फोकस कहां है? ये सारी बातें उन्होंने कही हैं एक सोशल मीडिया पोस्ट में। उन्होंने क्या कहा है? अब यह पॉइंट्स बाय पॉइंट्स जान लेते हैं। पहला पॉइंट असली अमेरिका और ईरान के बीच नहीं बल्कि ट्रंप और उनकी सोच के बीच चल रही है। वो कभी पीछे हटने की सोचते तो कभी ईरान को बम से उड़ाकर पाषाण युग में भेजने की धमकी देते। वहीं दूसरी तरफ ईरान का रुख एकदम साफ है। वो इस सोच के साथ आगे बढ़ रहा है कि टक्कर लेना है। स्ट्रेटजी है कि अफरातफरी मचाना है और एंड गेम यह है कि किसी तरह सर्वाइव करना है।
ट्रंप ने ईरान को समझाने में चूक कर दी है। ईरान पर उनकी धमकियों का कोई असर नहीं पड़ा क्योंकि वहां की सत्ता का इतिहास ही यही रहा है कि चाहे पूरा देश और वहां के लोग तबाह हो जाएं पर इस्लामिक सत्ता अपनी कुर्सी और उसूलों से कॉम्प्रोमाइज नहीं करेगी। दूसरा पॉइंट इसके उलट ट्रंप की विदेश नीति का कोई ठोस आधार या नजरिया नहीं है। ईरान का शासन वर्ग खुद को सिद्धांतवादी प्रिंसिपलिस्ट कहता है।
वे ऐसा इसलिए कहते हैं क्योंकि वे अपनी क्रांति के उसूलों को लेकर पूरी तरह वफादार हैं। उनके लिए सबसे बड़ी बात है कि अमेरिका का विरोध करना है। इजराइल के अस्तित्व को सिरे से नकारना है। उनकी यह सोच गोंद की तरह है जो इस सत्ता से जोड़ती है। लेकिन यह एक तरह से जंजीर की तरह भी है जो ईरान को आगे बढ़ने से रोक रहा है। सीधी बात यह है कि जब तक ईरान अपनी पुरानी विचारधारा को नहीं छोड़ता देश कभी तरक्की नहीं कर पाएगा। लेकिन वहां की सरकार को लगता है कि अगर उन्होंने अपने उन सिद्धांतों को छोड़ा तो उनका अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा।
तीसरा पॉइंट ट्रंप इस पूरे विवाद को एक ग्रैंड बारगेन की तरह देख रहे हैं जैसे कोई बहुत बड़ी बिजनेस डील होने वाली हो। हो सकता है कि जंग रोकने के लिए कोई छोटा-मोटा समझौता हो भी जाए। लेकिन अमेरिका और इजराइल के प्रति ईरान की दुश्मनी कभी खत्म नहीं होगी। अयतुल्लाह खामिनई ने समझौता करने के बजाय शहादत का रास्ता चुना और उनका बेटा भी बिल्कुल यही करेगा। चौथा पॉइंट पिछले 47 सालों में ईरान ने सिर्फ दो बार बड़े समझौते किए। पहला 1988 में ईरान इराक खत्म करने का फैसला जिसमें 2 लाख ईरानी मारे गए थे। दूसरा था 2015 का ओबामा के साथ डील।
दोनों बार एक ही पैटर्न था। ईरान पर भारी आर्थिक दबाव लगाया गया था और उसे बाहर निकलने का एक साफ रास्ता भी दिखाया गया था और उसकी आईडियोलॉजी का भी पूरा-पूरा ध्यान रखा गया था। लेकिन ट्रंप ने दबाव तो बनाया पर बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दे पाए। पांचवा पॉइंट अमेरिका यह समझता है कि जो ईरान के हित में है वही सरकार के हित में है। यह समझना बड़ी गलती है। हकीकत में यह दोनों एक दूसरे के उलट हैं। आम ईरानियों को दुनिया से जुड़ने में फायदा है लेकिन वहां की सत्ता जो एक धार्मिक माफिया की तरह है वो अलग-थलग रहकर ही फलती फूलती है। अजब बात यह है कि ईरानी सरकार पर दबाव पड़े तो वह झुकती जरूर है लेकिन बाहरी दबाव और अकेलापन ही इस सरकार को और मजबूत बनाने में मदद भी करता है। छठवां पॉइंट, इराक और अफगानिस्तान से हमें एक सबक मिला है।
अमेरिका बाहर से बैठकर किसी देश की पॉलिटिक्स नहीं तय कर सकता। ईरान में सरकार के विरोधियों के कंपैरिजन में सपोर्टर्स कहीं ज्यादा है। लेकिन कोई भी बाहरी ताकत ईरानियों का फ्यूचर नहीं तय कर सकती। सातवां पॉइंट, इतिहास गवाह है कि ईरान अक्सर अपनी हद पार कर देता है। उसने अमेरिकी राजनयिकों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि भी खराब हुई। उसने इराक के साथ जंग को लंबा खींचा। उसने 7 अक्टूबर को हमास हमले की तारीफ भी की और उसके प्रोक्सी गुट इसी वजह से तबाह हुए।
आठवां पॉइंट अभी सबसे बड़ी प्रायोरिटी न्यूक्लियर प्रोग्राम नहीं है बल्कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस है। ईरान इसे अपनी प्राइवेट पनामा नहर की तरह इस्तेमाल करने की कोशिश कर रहा है। इसका फैसला डिप्लोमेसी से होना चाहिए क्योंकि यूरोप, एशिया और अरब देशों का हित इसी में है कि यह रास्ता जल्द से जल्द खुले। नौवां पॉइंट ट्रंप एक क्विक डील चाहते हैं। लेकिन ईरान की सरकार की आईडियोलॉजी ही ऐसी है कि वह झुक नहीं सकती। जब तक इस्लामिक शासन है, नतीजा वही पुराना रहेगा, कोल्ड वॉर होगा जो इस जंग से पहले भी था और बाद में भी रहेगा।
आखिरी और 10वां पॉइंट हो या क्रांति जजमेंट इस बात से होता है कि क्या हासिल हुआ ना कि इस बात से कि क्या तबाह किया गया। ट्रंप इस को तबाही के पैमाने से नाप रहे हैं। लेकिन इतिहास इसे इस आधार पर परखेगा कि ईरान, मिडिल ईस्ट और पूरी दुनिया पर इस जंग का क्या असर पड़ा। तो ऐसा एक्सपर्ट्स का कहना है। यह सारे पॉइंट्स एक्सपर्ट्स ने बताए हैं। एक अपडेट यह भी है आपके लिए कि प्रेसिडेंट ट्रंप आज 6 अप्रैल को मिलिट्री के साथ प्रेस ब्रीफिंग करने वाले हैं। अपडेट्स जो भी होंगे हम आप तक पहुंचाते रहेंगे।
फिलहाल दुनिया की नजरें 7 अप्रैल पर ट्यूसडे पर टिकी है कि ट्रंप आखिर क्या करेंगे? कितनी तबाही मचाएंगे।
