तो यहां पर अब सवाल उठ रहा है क्या ईरान, इजराइल, अमेरिका के बीच ट्रंप एक और टेरिफ का प्लान बना रहे हैं? हमने देखा कि जो भीषण चल रहा है। अब यहां पर दूसरी तरफ राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तमाम देशों पर नया टेरिफ फोड़ने की तैयारी में है। ट्रंप प्रशासन की तरफ से अब कौन से जो 16 व्यापारिक साझेदार देश हैं उनके खिलाफ अब एक बड़े प्लान की तैयारी चल रही है।
सर सवाल है कि आखिर ट्रंप हम देख रहे हैं एक तरफ हमले हो रहे हैं। मिडिल ईस्ट में इस वक्त हाहाकार मचा हुआ है। क्या यहां पर अब फिर से एक नया टेरिफ लगाने की तैयारी में है राष्ट्रपति ट्रंप? देखिए बात सुनने में आ रही है लेकिन जब तक लगाएंगे नहीं कहने की तो बातें हैं ठीक है कि ट्रंप क्या कर सकते हैं कि नए टेरिफ लगा सकते हैं और देखिए नए टेरिफ लगाने की वजह ये नहीं है कि भारत से या किसी और कंट्री से ट्रंप को नाराजगी है या अमेरिका को नाराजगी है। एक्चुअली क्या है? जिस प्रकार से यह वॉर लगातार बढ़ता जा रहा है, तो अमेरिका के काफ़ी ज़्यादा क्या हो रहे हैं? एक्सपेंसेस हो रहे हैं।
अगर देखिए, ग्राउंड ऑपरेशन करेंगे, तो उसमें लॉसेस ज्यादा होंगे और आप अगर आपका ऑपरेशंस करते हैं जिस प्रकार से भी चल रहा है कि हम एयर स्टक्स करेंगे, मिसाइल अटैक करेंगे। तो इन सब में एक अच्छा खासा अमाउंट लगता है इस पूरे पूरे वॉर को लड़ने में। उस अमाउंट को इकट्ठा करने का तरीका प्रेसिडेंट ये सोच रहे हैं कि अगर हम टेरिफ को इनक्रीस कर दें तो उससे क्या हो सकता है कि हमारे जो खर्चे हो रहे हैं एक्सपेंसेस जो हो रहे हैं उससे क्या हो जाएगी? हमको क्या होगी? राहत मिल जाएगी और हमारे पास अच्छा खासा फंड इकट्ठा हो जाएगा।
सर जो ये धारा धारा 3001 की बात हो रही है ये क्या है? वो भी हमारे दर्शकों को बताइएगा जरूर। एक्चुअली क्या था कि 1974 में अमेरिका के द्वारा ही एक्ट लाया गया था। इस एक्ट में ये था कि जितने भी कंट्रीज है जो साउथ एशियन कंट्रीज है इनको हम लोग क्या करेंगे काफी बड़ी रिबेट्स देंगे इस तरह की बात की गई थी लेकिन साथ ही क्या था कि जो हमारे साथ में कंपटीशन करते हैं हमारे कोलेंट है उन पर हम ज्यादा से ज्यादा टेररिफ लगाएंगे.
हालांकि बाद में फिर हम देख कि 1986 के आसपास उसको लागू भी कर दिया गया था और काफी बड़ी मात्रा में भारत चीन जैसे देशों को उसमें छूट भी दी गई थी तो उसी एक्ट को और साथ ही क्या है कि जो 1974 का ये एक्ट है इसमें ये बात भी कही गई थी कि अगर किसी तरह का अमेरिका में क्राइसिस होता है यानी कि किसी तरह का डिस्टरबेंस क्रिएट होता है तो अमेरिका के प्रेसिडेंट को स्पेशल राइट्स मिलते हैं जिनके थ्रू वो क्या कर सकते हैं अपने देश की इकॉनमी को या व्यवस्था को रखने के लिए टेरिफ इस प्रकार के स्टेप ले सकते हैं। लेकिन यहां पर अगर हम पहले के टेरिफ की बात करें ट्रंप की तो फिर भारत झुकता हुआ नजर नहीं आया। तो इस बार अगर ये जो प्लान है यह दोबारा से जो अब बात सामने आई है धारा 3001 की अगर ये जो ट्रंप की प्लानिंग अगर सच में ये चल रही है तो भारत की क्या नीति रहने वाली है? देखिए मुझे ऐसा नहीं लगता कि डोनाल्ड ट्रंप जो है कि एकदम से बहुत भारी टेरिफ लगाने वाले हैं। बहुत बड़े मात्रा में और देखिए 40 देशों पे अगर आप एक साथ बात करते हैं खासतौर से भारत जैसा देश तो मुझे लगता है और देखिए जो हमारी अमेरिका के साथ में ट्रेड डील हुई है वो एक इंट्रिम डील है। वो फाइनल डील नहीं है। तो इंट्रिम डील है। यानी कि उसमें जल्द से जल्द अमेरिका चाहेगा कि वो कंप्लीट डील हो जाए और कंप्लीट डील अगर अमेरिका अपनी शर्तों पे करना चाहेगा तो ये तो इंपॉसिबल है।
लेकिन सिंपल सी बात है इंटरनेशनल पॉलिटिक्स का एक सिंपल सा नियम है गिव एंड टेक का तुम मुझे दो मैं तुम्हें दूंगा। तो उस थ्योरी के ऊपर आपका चला जाता है ना कि आप एक तरफ इंपोज करेंगे और दूसरे देश सब मारना शुरू कर देंगे। हां कुछ समय के लिए हो सकता है अमेरिका सब देशों से बात करे कि भैया मुझे भी फंड्स की रिक्वायरमेंट है वॉर चल रहा है तो थोड़ा सा दो तीन महीना में इस तरह की चीजें हो सकती है लेकिन इससे ज्यादा नहीं कि हर देश मानने को तैयार होगा खासतौर से भारत भी अमेरिका के नए टेरिफ को मानने को तैयार होगा। बिल्कुल सर अगर हम यहां ईरान युद्ध की बात करें तो हम देख रहे हैं कि मिडिल ईस्ट में इस वक्त हाहाकार मचा हुआ है।
लेकिन इसी बीच यूएन में जब हमने देखा कि भारत समेत जो है 135 देशों ने खाड़ी देशों पर जो ईरान के हमले की निंदा की विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जयसवाल की तरफ से कहा गया कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में जीसीसी गल्फ कॉपोरेशन काउंसिल के प्रस्ताव का भी समर्थन किया और इस प्रस्ताव के साथ अब तक 135 देश जुड़ चुके हैं। तो यहां पर जो मिडिल ईस्ट में हमले हो रहे हैं उसकी निंदा अब कई देश करते हुए नजर आ रहे हैं और भारत भी इसमें से एक है। तो क्या ईरान अब यहां पर अकेला पड़ता हुआ नजर आ रहा है? देखिए पहले तो बात क्या था कि ईरान की ये स्ट्रेटजी थी सोनम जी ये स्ट्रेटजी क्या थी कि हम क्या करेंगे? कई देशों पर अटैक करेंगे, हमले करेंगे। उसका परिणाम ये निकलेगा कि जब हम कई देशों पर हमले करेंगे तो उससे यह होगा कि अमेरिका जो है वो हमसे टॉक करने के लिए बाध्य होगा। मजबूर होगा। उसका हम लोग लाभ उठाएंगे और अमेरिका को हम कहीं ना कहीं वॉर में पीछे हटने को मजबूर कर देंगे। तो देखिए अब आप सोचिए ईरान के पास में क्या है? ईरान के पास दो चीजें हैं। एक तो उसकी ज्योग्राफिकल कंडीशन जो स्टेट में जिसको ब्लॉक कर रहा है बार-बार। तो ये उसको ए देती है और दूसरा उसको क्या दे रहा है कि वो बे क्या ना बेसुद्ध होकर मिसाइल मारना शुरू कर दे। इस देश के ऊपर, उस देश के ऊपर, उस देश के ऊपर। इससे क्या होगा कि अमेरिका के ऊपर दबाव बनेगा। मुझे लगता है कहीं ना कहीं ईरान इस वाली नीति में कामयाब होता हुए दिख रहा है कि लगातार क्या हो रहा है? प्रेशर बन रहा है।
अब जो आपने कहा जीसीसी ने आलोचना की है बिल्कुल सही बात है। आलोचना करनी बनती भी है कि ईरान ने जिस प्रकार से वॉर का दायरा जो दो या तीन देशों तक सीमित रह सकता था उसको अपने 40 देशों तक फैला दिया है। यानी कि एशिया खास वेस्ट एशिया की बात करूं। कोई भी देश अपने आप को सुरक्षित महसूस नहीं कर रहा है। हर किसी को लग रहा है कि कभी भी ईरान जो है ये ईरान की जो है वो हमारे ऊपर आके हिट कर सकती है।
