पंडित परिवार पर था श्राप? पहले बहन ने गवाई जान, फिर दूसरी बहन को मिला धोखा और अब बड़ी बहन की..

हां, दुनिया में कुछ घर ऐसे होते हैं जो ऊपर से तो रईस और कला की रोशनी में चमकते हैं, लेकिन उनके दरवाजों के अंदर सिर्फ दुख, आंसू और बर्बादी का अंधेरा भरा है। एक ऐसा ही परिवार है यह पंडित परिवार। इस घराने की तीन बेटियां सुलक्षणा, विजेता और संध्या।

तीनों की जिंदगी ने एक के बाद एक ऐसे भयानक मोड़ लिए कि लगता है उस परिवार को किस्मत ने श्राप दिया है। किसी को जिंदगी भर का एक तरफ़ा इंतजार मिला। किसी का करियर सियासत ने निकल लिया और किसी को तो सबसे खूनी अंत देखना पड़ा। आप उस दर्द की कल्पना कीजिए जो एक लड़की अपनी जिंदगी के आखिरी दिन तक सहती है।

सुलक्षणा पंडित उन्होंने सारी जिंदगी एक ही आदमी से मोहब्बत की थी संजीव कुमार से। वो इंतजार करती रही कि वह पलट कर देखेंगे शादी करेंगे। लेकिन वो हेमा मालिनी के पीछे दीवाने थे। जब हेमा ने इंकार किया तो संजीव ने कसम खा ली कि शादी नहीं करेंगे। सुलक्षणा ने भी उसी कसम का साथ दिया। सारी जिंदगी अकेली रही।

पर इस इंतजार का हिसाब तो नियति ने 6 नवंबर पर लिखा था। 6 नवंबर 1985 को संजीव कुमार इस दुनिया से गए और 40 साल बाद आने वाले 6 नवंबर 2025 उसी तारीख पर सुलक्षणा पंडित भी अपनी आखिरी सांस लेने वाली थी। एक ऐसी मोहब्बत जिसका अंत तो हुआ ही नहीं पर जिसे मौत ने भी एक ही तारीख पर समेट लिया।

यह इत्तेफाक नहीं यह तो त्रासदी की मोहर है। यह जो पंडित परिवार है, यह कोई साधारण परिवार नहीं था। यह संगीत के मेवाती घराने से जुड़े थे। बड़े-बड़े दिग्गज पंडित जसराज, पंडित मीनाराम यह सब इनके ही खानदान में थे।

इनके पिता पंडित प्रताप नारायण भी इसी घराने से थे और संगीत की शिक्षा उन्होंने ही बच्चों को दी। रईसी में जन्म हुआ था। सात भाई-बहन थे। मनधीर, सुलक्षणा, माया, संध्या, विजेता, जतिन और ललित। इतना बड़ा परिवार, इतनी बड़ी विरासत थी। लेकिन उस घर पर मुसीबतें एक साथ आई। सबसे पहले तो पिताजी ने दूसरी शादी कर ली। वहीं से इस घर पर मुसीबतों का डेरा लग गया।

परिवार में कलह शुरू हुई। फिर अचानक पिताजी का साया सिर से उठ गया। पिताजी के गुजरते ही सारे रिश्तेदार मुंह फेर कर निकल गए। आप सोचिए जिस घर में संगीत की रईसी थी, वह अचानक दाने-दाने को मोहताज हो गया। तब घर की बड़ी बेटी सुलक्षणा ने हिम्मत दिखाई।

वो बच्ची ही थी। लेकिन उसने जिम्मेदारी उठाई। स्टेज शूज करती। लता मंगेशकर के कहानी गाती। छोटी सी उम्र में ही उसने अपने पूरे परिवार को उस गरीबी के राक्षस से बचाया। उनके बड़े भाई मंदीर पंडित जिन्हें विश्वराज पंडित भी कहते हैं। उन्होंने भी हाथ बढ़ाया। मंदीर ने भाई जतिन के साथ मिलकर एक म्यूजिक जोड़ी बनाई थी। जतिन मंदीर।

उन्होंने किशोर कुमार और मोहम्मद रफी जैसे दिग्गजों के लिए भी काम किया। पर वह जोड़ी चल नहीं पाई। यह इस परिवार के लिए संगीत संघर्ष की शुरुआत थी। सुलक्षणा की किस्मत आगे बढ़ी। 1975 में उन्हें फिल्मों में हीरोइन बनने का मौका मिला। वो टॉप एक्ट्रेस बन गई।

गायिका के रूप में भी उन्हें फिल्मफेयर अवार्ड मिला। उनके कंधों पर पूरे परिवार का बोझ था। उन्होंने अपने भाइयों और बहनों को आगे बढ़ने में अपनी जवानी खपा दी। यहां तक कि 1983 में जब उनका करियर ढलान पर था, तो उन्होंने अपने भाई बहनों के साथ मिलकर प्रोड्यूसर बनने की कोशिश भी की। यह साफ था कि सुलक्षणा अपने दम पर इस पूरे खानदान को खींच रही थी। वो थी ही इतनी नाजुक कि जब 80 के दशक के बाद फिल्म इंडस्ट्री का चेहरा बदला, तो उन्हें धोखा मिला।

बड़े भाई मंदीर की निधन हुई, तो सुलक्षणा को गहरा सदमा लगा। लेकिन उन्हें यह नहीं पता था कि उनके इस परिवार के साथ सबसे बड़ा खेल तो उनकी छोटी बहन विजेता के साथ होना बाकी था।

विजेता पंडित तीनों बहनों में सबसे छोटी उसे पहली बार प्यार का एहसास हुआ जब वह महज 14 साल की थी और वह भी किससे? राजेंद्र कुमार के बेटे कुमार गौरव से। राजेंद्र कुमार का आलीशान बंगला था। जिसके नीचे डिंपल नाम का एक थिएटर था। उसी थिएटर में सुलक्षणा की फिल्म गर्म खून की स्क्रीनिंग हो रही थी और राजेंद्र कुमार ने 13 साल के विजेता को देखा।

उन्होंने तुरंत सुलक्षणा से कहा यह मेरी फिल्म के हीरोइन बनेगी। विजेता ने शुरू में स्क्रीन टेस्ट देने से मना कर दिया था। जिस पर राजेंद्र कुमार ने राज कपूर को फोन लगाया था और राज कपूर ने कहा नहीं देना है तो मत दे। एक्टिंग का कोर्स करवा दो।

तब राजेंद्र कुमार ने उन्हें सबसे फेमस एक्टिंग टीचर रोशन तनेजा के स्कूल भेज दिया। जहां कुमार गौरव भी थे। 3 महीने का कोर्स खत्म हुआ और लव स्टोरी की शूटिंग शुरू हुई। कश्मीर की बर्फीली वादियों में उन्होंने सिर्फ एक्टिंग नहीं की। उन्हें सच में प्यार हो गया। विजेता ने बाद में कहा भी था कि उस वक्त वो मात्र 14 साल की थी, और पहली बार किसी लड़के ने उन्हें गले लगाया था। भले ही वह फिल्म का सीन था पर यह सब उनके लिए नया था।

राजेंद्र कुमार ने जब देखा कि हीरो हीरोइन सच में एक दूसरे से प्यार करने लगे हैं तो उनके चेहरे पर शिकन आ गई। उनका तो एक ही सपना था कि बेटा सुपरस्टार बने। उन्होंने कुमार गौरव को अपने पास बुलाया और कहा देखो बेटा तुम्हें बहुत आगे बढ़ना है। अगर तुम इस लड़की से प्यार करने लगोगे तो तुम्हारा करियर यहीं रुक जाएगा।

लेकिन 18 साल के कुमार गौरव ने जवाब दिया, मैं विजेता से प्यार करता हूं। मुझे करियर की चिंता नहीं है। तभी राजेंद्र कुमार ने कहा था, तुम मेरे प्रिंस हो। मैं तुम्हारे लिए प्रिंसेस लाऊंगा। पैसे वाली खानदानी लड़की से तुम्हारी शादी करवाऊंगा। विजेता ने बगल के कमरे से यह सब बात सुनी थी। यहीं से विजेता ने राजेंद्र कुमार का बदलने वाला रूप देखा। राजेंद्र कुमार ने आनन-फानन में राज कपूर की बेटी रीमा से कुमार गौरव की सगाई करा दी।

सगाई के समारोह में सुलक्षणा के साथ विजेता भी शामिल थी। रीमा ने कुमार गौरव को बड़ी सी डायमंड रिंग पहनाई। तभी कुमार गौरव विजेता के पास आए और कहा, “यह रिंग निकालकर मैं समंदर में फेंक दूंगा।” ऐसी बात सुनकर विजेता वहां से भाग गई। रीना रॉय नाम के हीरोइन ने यह सब नाटक देख लिया और सुलक्षणा के पास आकर कहा कि इन दोनों का बहुत खतरनाक अफेयर चल रहा है। विजेता ने इस रिश्ते को तोड़ने की पूरी कोशिश की। बार-बार कुमार गौरव को अपने पिता के खिलाफ ना जाने को कहा पर वह नहीं माने। पर नियति ने सबसे गहरा घाव दिया।

किसी को कानों कान खबर नहीं हुई कि कुमार गौरव ने रीमा से सगाई तोड़ दी है और अब वह सुनील दत्त की बेटी नम्रता दत्त से शादी करने जा रहे हैं और इस तरह विजेता को अपने जीवन का यह दूसरा बड़ा सदमा लगा। असली खेल तो राजेंद्र कुमार ने खेला। लव स्टोरी जबरदस्त हिट हुई। लेकिन राजेंद्र कुमार ने एक-एक करके विजेता को उन सभी फिल्मों से निकलवा दिया। वह फिल्मकारों को फोन करके कहते अगर मेरा बेटा तुम्हारी फिल्म में रहेगा तो विजेता नहीं रहेगी।

राजेंद्र कुमार इतने बड़े हंसती थे कि छोटे फिल्मकार उनसे डरते थे। तेरी कसम स्टार, रोमांस, लवर्स, हम हैं लाजवाब, ऑलराउंडर, इन सभी फिल्मों से विजेता को निकलवा दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि लव स्टोरी के 4 साल बाद भी विजेता की कोई फिल्म रिलीज नहीं हुई। विजेता का करियर तो तबाह हुआ ही। राजेंद्र कुमार जो बड़े ही कंजूस माने जाते थे। उन्होंने अपने बेटे को बचाने के इस सनक में खुद का करियर बर्बाद कर लिया। कुमार गौरव की दर्जन भर फिल्में फ्लॉप होती गई। आखिर में राजेंद्र कुमार ने अपने करियर की सारी कमाई दांव पर लगाकर 1993 में एक बहुत बड़ी फिल्म बनाई जिसका नाम था फूल। उन्होंने मीडिया में कहा कि उनके बेटे की फिल्म विजेता के बिना भी सुपरहिट होगी। लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया।

फूल उस साल की सबसे बड़ी फ्लॉप साबित हुई। विजेता कहती हैं कि लव स्टोरी से कमाए गए सारे पैसे फूल के फ्लॉप होने पर डूब गए। उसके बाद राजेंद्र कुमार ने कोई फिल्म नहीं बनाई। कहीं ना कहीं विजेता के दिल का दर्द राजेंद्र कुमार और उनके बेटे कुमार गौरव के करियर को ले डूबा।

विजेता को सिंगर बनना था। पर उनकी किस्मत यहां भी रूठी थी। उनके छोटे भाई जतिन ललित जो अब बड़े नाम बन चुके थे। उन्होंने दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे और कुछ-कुछ होता है। जैसी फिल्मों के साथ चार बार साल का सबसे ज्यादा बिकने वाला एल्बम दिया। उन्होंने 12 फिल्म फेयर नॉमिनेशन भी पाया। लेकिन जीत कभी नहीं मिली। इतनी बड़ी कामयाबी के बावजूद विजेता के साथ संगीत में भी अन्याय हुआ। जो जीता वही सिकंदर के गाने के लिए उनकी आवाज में रिकॉर्डिंग होने के बावजूद कल्याण जी ने बीच में आकर साधना सरगम को भिजवा दिया।

यह विजेता के करियर का वह समय था जब उन्हें गायक के रूप में पहचान मिल सकती थी। पर उनकी किस्मत ने धोखा दिया। राजू बन गया जेंटलमैन के सारे गाने विजेता ने गाए। लेकिन बाद में किसी और ने डबिंग करके उनकी आवाज को हटा दिया। जतिन ललित ने आति किया खंडाला और जादू सा छाने लगा जैसे गाने विजेता से गवाए पर अलका याग्निक और बाकी सिंगर्स ने आकर उन्हें डब कर दिया।

जादू सा छाने लगा गाने के लिए तो ललित ने खुद फिल्मकार प्रकाश झा से गुजारिश की थी। पर प्रोड्यूसर अजय देवकर ने वह गाना अलका याग्निक को दे दिया। इस पूरे अंधकार में खुशी की एक रौनक आई। आदेश श्रीवास्तव। आदेश जी जो पहले आर डी बर्मन और राजेश रोशन जैसे दिग्गजों के लिए सिर्फ भ्रमर का काम करते थे। उन्होंने अपनी मेहनत से अपना नाम बनाया। उनकी मुलाकात विजेता से 1990 में हुई। आतीश उस वक्त विजेता को खुश रखने की बहुत कोशिश करते थे क्योंकि वह कुमार गौरव की यादों से जूझ रही थी। आखिरकार उनकी शादी हुई। शादी के बाद आदेश का करियर उछल पड़ा। उन्होंने शावा शावा सोना सोना जैसे गाने दिए।

अमिताभ बच्चन से उनकी नजदीकी बढ़ी और उन्होंने एका जैसे अंतरराष्ट्रीय कलाकारों के साथ भी काम किया। दोनों भाई जतिन ललित भी सेटल थे। पति भी बड़ा नाम कमा रहा था। विजेता की जिंदगी में पहली बार रईस और सुकून लौटा था। उनके दो बेटे हुए अवितेश और अन्वेश। पर किस्मत को शायद यह खानदान सुख देखना पसंद नहीं था।

2010 में आदेश जी को बीमार डिटेक्ट हुआ। यह विजेता की जिंदगी का तीसरा बड़ा सदमा था। 5 साल में जो कुछ भी आदेश ने कमाया था, वह सब इलाज में लग गया। लाखों लाखों रुपए के इंजेक्शन लगे। यहां तक कि आदेश के बड़े भाई चित्रेश श्रीवास्तव की भी 2011 में कार दुर्घटना में निधन हो गई। विजेता पर जैसे एक के बाद एक चोटें पड़ रही थी। आदेश ने इलाज के लिए अपना सब कुछ बेचने को मजबूर होना पड़ा। आखिरकार 5 सितंबर 2015 को आदेश इस दुनिया से चले गए।

उनकी आखिरी फिल्म वेलकम बैक उनके 51वें जन्मदिन 4 सितंबर पर रिलीज हुई थी और अगले ही दिन वो कोमा से बाहर नहीं आ पाए। यह विडंबना इस परिवार की कहानी में हमेशा दर्द बनकर रहेगी। आखिरी समय में शाहरुख खान उनसे मिलने पहुंचे थे और आदेश ने उनसे कहा था मेरे बेटे अवितेश का करियर अब आपके हाथ में है। विजेता को आज भी इस बात का बहुत दुख होता है कि उनके भाइयों और पति ने शाहरुख खान का करियर बनाने में सहयोग दिया। लेकिन पति की निधन के बाद बॉलीवुड का कोई भी बड़ा सितारा उनके घर दुख जताने नहीं आया।

अब इस पंडित परिवार की कहानी का सबसे स्याह पन्ना पलटना बाकी है। सुलक्षणा ने प्यार खोया, विजेता ने करियर और पति खोया। पर वह बीच वाली बहन थी संध्या पंडित। उनकी कहानी सुनकर तो दिल पर आघात होता है। वो बच्ची जिसने बचपन में दूर के राही फिल्म में बाल कलाकार के रूप में काम किया था। दिसंबर 2012 में वो नवे मुंबई में एक एनआरआई कॉलोनी से लापता हो गई। परिवार सदमे में था। विजेता और भाई जतिन ललित दिनरा उनकी तलाश करते थे। लेकिन कुछ दिन बाद पुलिस को संध्या के घर के पास दलदली इलाके में खुदाई के दौरान के टुकड़े मिले। रिपोर्ट ने पुष्टि की कि यह संध्या पंडित ही है। ने उन्हें मारकर के टुकड़े किए और अलग-अलग जगह पर गाड़ दिए थे। इस जघन्य के पीछे कोई और नहीं उनका अपना बेटा रघुवीर सिंह था। यह मामला पैसा और प्रॉपर्टी से जुड़ा था। रघुवीर ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर अपनी ही मां की की थी। बाद में कोर्ट ने उन्हें ठोस सबूतों की कमी के कारण बरी कर दिया।

यह इतनी बड़ी थी कि विजेता पंडित ने अपनी बड़ी बहन सुलक्षणा से यह बात हमेशा से छिपा कर रखी। सुलक्षणा पहले से ही शारीरिक और मानसिक बीमारियों से जूझ रही थी। एक एक्सीडेंट में उनके हिप बोन टूट गई थी। विजेता जानती हैं कि अगर सुलक्षणा को यह बात पता चली कि उनकी बड़ी बहन को उनके ही बेटे ने जमीन में दिया है तो वह यह सदमा सहन नहीं कर पाएंगी। इसलिए आखिर तक विजेता अपनी बड़ी बहन को यह बताती रही कि संध्या जिंदा है और इंदौर में खुशी से जी रही हैं।

आज के वक्त विजेता पंडित अपने जीवन के आखिरी दिन कैसे बिताएंगी यह आने वाला कल ही बताएगा क्योंकि अब ना ही उनके पति जिंदा हैं और ना ही बहनें। बस दोनों बेटे अवितेश और अन्वेश ही उनकी एकमात्र उम्मीद है।

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