शोभना समर्थ और मोतीलाल की प्रेमकहनी कन्यादान किया और अंतिम संस्कार भी।

क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि जिस अभिनेत्री को पूरा देश साक्षात देवी सीता मानकर पूजता हो जिसके पैरों में गिरकर लोग आशीर्वाद लेते हो वो असल जिंदगी में एक ऐसे आदमी के साथ बिना शादी किए रहने लगी जो अपनी शराब जुए और रंगीन मिजाजी के लिए पूरे बॉम्बे शहर में बदनाम हो और वह आज के दौर में नहीं बल्कि आज से 80 साल पहले जब महिलाओं का घर की चार दीवारी से बाहर निकलना भी एक गुनाह माना जाता था। हम बात कर रहे हैं बॉलीवुड के मशहूर अभिनेत्री काजोल की नानी शोभना समट और भारत के पहले नेचुरल एक्टर मोतीलाल की।

एक ऐसा पागल आशिक जिसने चार बच्चों की मां को प्रपोज करने के लिए आसमान से हेलीकॉप्टर के जरिए उनके घर पर लव लेटर बांधकर पत्थर बरसाए थे। एक ऐसा रिश्ता जिसने उस दौर के रूढ़िवादी समाज की धज्जियां उड़ा दी थी। आज भी बॉलीवुड के गलियारों में यह अफवाहएं डबी जुबान में गूंजती हैं कि अभिनेत्री तनुजा असल में अपने पिता कुमार सेन समर्थ की नहीं बल्कि इसी आशिक मोतीलाल की बेटी है। मैं बेकार हूं भिखारी नहीं। मेरा यह मतलब नहीं था। तुम्हें खाना ही खाना है ना। चलो मेरे साथ शान में लोट में। इस कहानी की शुरुआत होती है शोभना समर्थ से। शोभना का असली नाम सरोज शिलोत्री था। उनका जन्म एक बेहद अमीर और पढ़े-लिखे परिवार में हुआ था। उनकी खूबसूरती ऐसी थी कि जो भी उन्हें देखता बस देखता रह जाता। बहुत कम उम्र में उनकी शादी मशहूर फिल्म निर्देशक कुमार सेन समर्थ से हो गई थी।

शादी के बाद ही कुमार सेन ने अपनी खूबसूरत पत्नी को फिल्मों में काम करने के लिए प्रेरित किया और सरोज का नाम बदलकर शोभना समर्थ रख दिया। साल 1935 में आई फिल्म निगाहें नफरत से शोभना ने अपनी फिल्मी सफर की शुरुआत की। लेकिन उनके करियर में सबसे बड़ा मोड़ आया। साल 1942 में आई फिल्म भरत मिलाप और उसके अगले साल 1943 की फिल्म रामराज से। रामराज्य में उन्होंने माता सीता का किरदार इतनी शिद्दत और पवित्रता के साथ निभाया था कि लोग सच में उन्हें देवी सीता मानकर उनके पैर छूने लगे थे। उनके कोस्टार प्रेम अदीत भगवान राम बने थे। इन दोनों की जोड़ी इतनी मशहूर हुई कि उस जमाने के कैलेंडरों पर राम और सीता के रूप में इन्हीं दोनों की तस्वीरें छपने लगी थी। देखो देखो रामराज में अजमारी है। आपको जानकर हैरानी होगी कि रामराज इकलौती ऐसी फिल्म थी, जिसे महात्मा गांधी ने अपने पूरे जीवन में देखा था। शोभना समर्थ रातोंरात पूरे भारत में एक आदर्श और पवित्र भारतीय नारी का प्रतीक बन गई थी। शोभना और कुमार सेन के चार बच्चे हुए। जिनमें दो बेटियां नूतन और तनुजा आगे चलकर हिंदी सिनेमा की बहुत बड़ी सुपरस्टार बनी और इन्हीं तनुजा की बेटी है। आज के दौर की मशहूर अभिनेत्री काजोल। सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था। लेकिन कुछ सालों बाद कुमार सेन समर्थ अपनी फिल्म मेकिंग की पढ़ाई और काम के सिलसिले में अक्सर जर्मनी में रहने लगे थे। दूरियों की वजह से दोनों के विचारों में टकराव होने लगा। लेकिन शोभना और कुमार सेन ने इस रिश्ते को बहुत ही गरिमा के साथ खत्म करने का फैसला किया। दोनों ने आपसी सहमति से एक दूसरे से अलग होने का रास्ता चुना। कोई लड़ाई नहीं हुई ना ही कोई कीचड़ उछाला गया। मैं खिड़की के नीचे पहरा देता हूं राजभर। नहीं वो मेरे बच्चे को ले जा रहे हैं। पकड़ो पकड़ो मुझे मां लोगों को मार। शोभना समर्थ अब एक सिंगल मदर थी। जिनके कंधों पर चार बच्चों की जिम्मेदारी थी। उस दौर में एक अकेली औरत का इस तरह स्वाभिमान के साथ समाज में खड़े रहना कोई मामूली बात नहीं थी। अब इस कहानी में एक तूफान की तरह एंट्री होती है मोतीलाल की। मोतीलाल राजवंश का जन्म शिमला में हुआ था। वो बंबई आए थे नेवी में भर्ती होने के लिए। लेकिन किस्मत उन्हें फिल्म स्टूडियो ले गई। मोतीलाल को हिंदी सिनेमा का पहला ऐसा अभिनेता माना जाता है जिसने एक्टिंग के नाम पर होने वाली नौटंकी और लाउड डायलॉग बाजी को खत्म कर दिया और यथार्थवादी यानी रियलिस्टिक एक्टिंग की नींव रखी।

वो कैमरे के सामने ऐसे बात करते थे जैसे असल जिंदगी में बात कर रहे हो। मोतीलाल की महानता का अंदाजा अब इस बात से लगा सकते हैं कि 1996 में बॉलीवुड के दिग्गजों पर छपी एक किताब द 100 लुमिनियरीज ऑफ हिंदी सिनेमा में खुद सदी के महानायक अमिताभ बच्चन ने उनके लिए प्रस्तावना लिखी थी। अमिताभ बच्चन ने लिखा था कि इस महान और बहुत ही स्वाभाविक अभिनेता की तारीफ में बहुत कम लिखा गया है। वह अपने समय से बहुत आगे थे। अगर वह आज जिंदा होते तो अपने बहुमुखी प्रतिभा के दम पर हम में से कई लोगों से बहुत बेहतर काम कर रहे होते। इतना ही नहीं आज के दौर के बेहतरीन अभिनेता मनोज वाजपेई ने भी एक इंटरव्यू में बताया था कि उनके पिता की तरफ से उन्हें मिला सबसे बड़ा कॉम्प्लीमेंट वही था जब उनके पिता ने मनोज की एक्टिंग की तुलना मोतीलाल से की थी। जनता एक्सप्रेस के बारे में तो आपने सुना होगा।

वो मेरा ही आईडिया था। आपका आईडिया? ऑफकोर्स। मोतीलाल का रहन-नस-सहन किसी महाराजा या हॉलीवुड सुपरस्टार से कम नहीं था। वो अपनी बिंदास और रंगीन जिंदगी के लिए जाने जाते थे। तेज रफ्तार में महंगी कारें चलाना, रेस के बेहतरीन घोड़े पालना और शूटिंग पर जाने के लिए अपना खुद का प्राइवेट हवाई जहाज उड़ाना उनका शौक था। वह एक लाइसेंस धारी पायलट थे। उनके कपड़े विदेश से सिलकर आते थे। राज कपूर और नादिरा उनके बहुत करीबी दोस्त थे। जुए और का उन्हें भारी शौक था। विमल रॉय की फिल्म देवदास में उनका निभाया हुआ चुन्नी बाबू का किरदार और फिल्म जागते रहो में एक शराबी के रूप में उन पर फिल्माया गया गाना जिंदगी ख्वाब है।

आज भी एक्टिंग स्कूलों में पढ़ाया जाता है। एक तरफ शोभना समर्थ थी जो पर्दे की शांत और गंभीर सीता थी और दूसरी तरफ मोतीलाल थे जो अपनी रंगीन मिजाजी और रईसी के लिए मशहूर थे। इन दोनों की पहली मुलाकात सागर मूवी टोन प्रोडक्शन हाउस के सेट पर हुई थी। धीरे-धीरे यह मुलाकात दोस्ती में बदल गई। मोतीलाल को शोभना से बेइंतहा मोहब्बत हो गई। उन्होंने शोभना के सामने अपने प्यार का इजहार किया। लेकिन उस वक्त शोभना एक टूटे हुए रिश्ते से गुजर रही थी और चार बच्चों की मां थी। उन्होंने इस रिश्ते में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। मोतीलाल की जििद और उनके प्यार के इजहार से बचने के लिए शोभना समर्थ मुंबई छोड़कर खंडाला शिफ्ट हो गई।

लेकिन मोतीलाल अभिनय के मामले में जितने शानदार थे, उतने ही जिद्दी असल जिंदगी में भी थे। जिस चीज पर वह अड़ जाते, उसे हासिल करके ही मानते थे। उन्होंने अपने प्यार को साबित करने के लिए एक ऐसा पागलपन किया जिसके आज के नौजवान सिर्फ कल्पना कर सकते हैं। मोतीलाल ने एक भारीभरकम खर्चा करके एक हेलीकॉप्टर किराए पर लिया क्योंकि वह खुद एक पायलट थे इसलिए उन्होंने उस हेलीकॉप्टर को उड़ाकर सीधा खंडाला का रुख किया और शोभना समर्थ के घर के छत के ऊपर चक्कर लगाने लगे। आसमान से हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट सुनकर जब शोभना ने खिड़की से बाहर देखा तब मोतीलाल ने आसमान से उनकी छत पर पत्थर बरसाने शुरू कर दिए। लेकिन वह आम पत्थर नहीं थे।

उन पत्थरों पर मोतीलाल के लिखे हुए प्रेम पत्र लिपटे हुए थे। ऐसा ही एक पत्थर शोभना के कमरे की खिड़की का शीशा तोड़ते हुए अंदर गिरा। उस टूटे हुए शीशे और उस खत में छिपी हुई आई लव यू ने शोभना के दिल के सारे दरवाजे खोल दिए। प्यार के इजहार का यह अजीबोगरीब तरीका कारगर साबित हुआ। मोतीलाल के इस दीवानेपन को देखकर शोभना बिल्कुल भावुक हो गई और उन्होंने इस प्रेम प्रस्ताव को हमेशा के लिए स्वीकार कर लिया। जिंदगी ख्वाब है। ख्वाब में झूठ क्या दिल को सताएं। दिल में रहे और दिल को सताएं। इसके बाद जो हुआ उसने पूरे समाज को हैरान कर दिया। शोभना और मोतीलाल ने दुनिया से अपने रिश्ते को कभी नहीं छिपाया। उन्होंने शादी नहीं की लेकिन समाज के सामने बेहद बेबाकी से अपने रिश्ते को कबूल किया और एक साथ रहने लगे। मोतीलाल शोभना के घर पर शिफ्ट भी हो गए। सबसे खूबसूरत बात यह थी कि मोतीलाल ने शोभना के बच्चों को बिल्कुल अपने बच्चों की तरह प्यार दिया। शोभना को भी मोतीलाल के भीतर एक बहुत ही जिम्मेदार इंसान और अपने पिता की छवि नजर आती थी।

घर के हर छोटे बड़े फैसलों में मोतीलाल शोभना का साथ देते थे। जब शोभना समर्थ ने अपनी बेटी नूतन को फिल्म हमारी बेटी से लॉन्च किया और बाद में तनुजा को फिल्म छबवेली से फिल्मों में उतारा तो इन दोनों फिल्मों के निर्माण में मोतीलाल ने पर्दे के पीछे से शोभना की पूरी मदद की। हमारी बेटी फिल्म में तो मोतीलाल ने नूतन के पिता का किरदार भी निभाया था। इन दोनों का रिश्ता इतना गहरा था कि नूतन और तनुजा मोतीलाल की बहुत इज्जत करती थी। एक रिपोर्ट्स के मुताबिक नूतन और तनुजा की शादी में कन्यादान की रस्म भी मोतीलाल ने ही निभाई थी। इंटरनेट और पुराने सिनेमा के जानकारों के बीच आज भी यह बात एक बहुत बड़ी चर्चा का विषय रहती है कि तनुजा असली में मोतीलाल की ही बेटी है और नूतन ही हाफ सिस्टर है। हालांकि इस बात की कभी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई। लेकिन उस दौर के फिल्मी गलियारों में यह अफवाह बहुत तेजी से तैरती थी। कुमार सेन समर्थ भी जब कभी भारत आते थे तो शुभना के घर आते थे और वहां मोतीलाल के साथ बैठकर चाय पीते थे। इन लोगों ने समाज को दिखा दिया था कि रिश्ते परिपक्वता और समझदारी से भी निभाए जा सकते हैं। यहां एक बात बहुत दिलचस्प है।

तनुजा की शक्ल को आप गौर से देखोगे तो आपको उसमें मोतीलाल की ही छवि दिखेगी। इसी वजह से अक्सर तनुजा को खुद मोतीलाल की ही बेटी कहा जाता है। लेकिन इस पर तनुजा ने कभी खुलकर बात नहीं की। लेकिन हर महान प्रेम कहानी का एक दर्दनाक पहलू भी होता है और इस कहानी का अंत बहुत ही रुला देने वाला था। मोतीलाल अपनी जिंदगी में एक बहुत ही महान फिल्म बनाना चाहते थे। उनके दिल के बहुत करीब एक प्रोजेक्ट था जिसका नाम था छोटी-छोटी बातें। यह फिल्म उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सपना थी और उन्होंने इसका निर्देशन भी खुद ही किया था। मोतीलाल ने इस फिल्म को बनाने में अपनी जिंदगी भर की कमाई लगा दी। उनके आलीशान घर बिक गए, रेस के घोड़े बिक गए, महंगी गाड़ियां बिक गई। फिल्म बनाने में बहुत समय लगा और मोतीलाल पूरी तरह से कर्ज में डूब गए। जो इंसान कभी अपनी हवाई जहाज उड़ाता था, वह दाने-ता-दाने का मोहताज हो गया। फिल्म इंडस्ट्री की यह सबसे कड़वी सच्चाई है कि यहां उगते सूरज को सलाम किया जाता है। जब मोतीलाल का बुरा वक्त आया, तो उनके इर्द-गिर्द घूमने वाले सारे चापलूस दोस्त और प्रोड्यूसर उन्हें छोड़कर भाग गए। कोई उनकी मदद के लिए आगे नहीं आया। इस सदमे, कर्ज के बोझ और शराब की लत ने मोतीलाल को अंदर से तोड़ दिया। उन्हें लिवर सिरोसिस नाम की गंभीर बीमारी हो गई। लेकिन जब पूरी दुनिया ने मोतीलाल से मुंह मोड़ लिया, तब शोभना समर्थ एक चट्टान की तरह उनके साथ खड़ी थी। जिस शोभना को उन्होंने अपने अच्छे दिनों में हेलीकॉप्टर से प्यार का पैगाम भेजा था, उसी शोभना ने मोतीलाल के सबसे बुरे दिनों में उनका हाथ कद कर थामे रखा। मोतीलाल को मुंबई के बीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया गया। शोभना दिन रात उनके बिस्तर के पास बैठी रहती थी। उन्होंने मोतीलाल के इलाज का सारा खर्च उठाया और उनके कर्ज चुकाने में भी मदद की। 1965 में मोतीलाल ने अस्पताल के उसी बिस्तर पर शोभना का हाथ अपने हाथों में लिए हुए इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। जोर से दबाइए इसे। जिंदगी भी ऐसी है। जोर से पकड़ने जाइए तो हाथ से निकल जाती है। अरे यार एक ऐसा सुपरस्टार जिसने जिंदगी भर राजाओं की तरह राज किया वो अपनी मौत के वक्त पाई-पाई का मोहताज था।

लेकिन उनके पास अगर कोई सबसे बड़ी दौलत थी तो वह थी शोभना समर्थ की वफादारी और उनका सच्चा प्यार। उन दोनों का रिश्ता इतना गहरा था कि मोतीलाल की अस्थि को अग्नि खुद शोभना समर्थ ने दी थी। मोतीलाल के गुजरने के बाद उनकी फिल्म छोटी-छोटी बातें रिलीज हुई और उस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। लेकिन उसे देखने के लिए भारत का पहला नेचुरल एक्टर इस दुनिया में नहीं था। मोतीलाल के जाने के बाद शोभना समर्थ ने खुद को पूरी तरह से अपने बच्चों और नाती पोतों के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने फिर कभी किसी और को अपने जीवन में वह जगह नहीं दी। सिनेमा में उनके योगदान के लिए साल 1997 में शोभना जी को फिल्मफेयर के स्पेशल अवार्ड से सम्मानित किया गया और साल 2000 में उन्होंने भी इस दुनिया से विदाई ले ली। शोभना समर्थ और मोतीलाल की यह कहानी हमें सिखाती है कि प्यार सिर्फ सात फेरों या कागज पर लिखे गए दस्तखत का मोहताज नहीं होता। प्यार का मतलब होता है आदर, सम्मान और हर मुश्किल में एक दूसरे का साथ निभाना।

जिस तरह शोभना समर्थ ने दुनिया के तानों की परवाह किए बिना मोतीलाल का साथ आखिरी सांस तक निभाया वह आज के दौर के कई खोखले रिश्तों के लिए एक बहुत बड़ा सबक है।

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