क्या यह वही गोविंदा है जिसने कभी अमिताभ बच्चन और रजनीकांत जैसे महानायकों को भी स्क्रीन पर साइडलाइन कर दिया था। क्या यह वही सुपरस्टार है जिसके एक इशारे पर कभी पूरा बॉलीवुड नाचता था या फिर यह वो मजबूर कलाकार है जो आज संघर्ष कर रहा है?
आखिर ऐसा क्या हुआ कि बॉक्स ऑफिस का हीरो नंबर वन आज गांव देहात के छोटे से स्कूल फंक्शन में नाचने पर मजबूर हो गया। दोस्तों, क्या यह सिर्फ वक्त की मार है या फिर अपने ही पैरों पर मारी गई कुल्हाड़ी का नतीजा। आज के इस वीडियो में हम गोविंदा की जिंदगी की उस फाइल को खोलेंगे जिस पर बॉलीवुड ने धूल जमा दी है और सच जानकर आपके पैरों तले जमीन खिसक जाएगी। हाल ही में सोशल मीडिया पर एक वीडियो जंगल की आग की तरह वायरल हुआ है। जिसने हर उस इंसान का दिल तोड़ दिया जो 90 के दशक के सिनेमा से प्यार करता है।
वीडियो में दिख रहे हैं 90 के दशक के बेताज बादशाह गोविंदा जो उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ और ठाणे जैसे इलाकों के एक मामूली स्कूल के एनुअल डे में परफॉर्म कर रहे हैं। वहां बस एक छोटा सा स्टेज है। बारिश का मौसम है और उस गीले मंच पर अपनी पुरानी धुनों पर थिरकता हुआ हमारा राजा बाबू। जब लोगों ने गोविंदा को मैं तो रस्ते से जा रहा था और आंगन में बाबा जैसे गानों पर एक स्थानीय विधायक के सामने और स्कूल के बच्चों के बीच नाचते देखा तो इंटरनेट पर एक अजीब सा सन्नाटा छा गया। यह वीडियो सिर्फ एक डांस परफॉर्मेंस नहीं था बल्कि यह बॉलीवुड की उस क्रूर और कड़वी सच्चाई का जीता जागता सबूत था कि कैसे वक्त का पहिया राजा को भी अर्श से फर्श पर लापटकता है।
फैंस हैरान थे और आलोचक परेशान। कमेंट सेक्शन में बाढ़ आ गई कि जिस आदमी ने कभी सिंगल स्क्रीन सिनेमाज में टिकट खिड़कियों के शीशे तुड़वा दिए थे, आज उसकी मार्केट वैल्यू क्या इतनी गिर गई है? क्या उन्हें अब फिल्मों में काम मिलना पूरी तरह बंद हो गया है जो उन्हें ऐसे छोटे-मोटे इवेंट्स में अपनी उपस्थिति दर्ज करानी पड़ रही है? दोस्तों, यह गिरावट रातों-रात नहीं आई है और ना ही यह महज एक इत्तेफाक है। इसके पीछे सालों की गलतियां, हद से ज्यादा घमंड, अजीब और गरीब अंधविश्वास और कुछ ऐसे विनाशकारी फैसले हैं जिन्होंने गोविंदा के करियर को दीमक की तरह चाट लिया। आज के मल्टीप्लेक्स और OटीT के जमाने में शायद नई पीढ़ी को इस बात का अंदाजा भी नहीं होगा कि 90 के दशक में स्टारडम का असली मतलब क्या होता था। वो दौर पीवीआर और आईमैक्स का नहीं था। वो दौर था सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों का जहां एसी की ठंडक से ज्यादा दर्शकों की सीटियों और तालियों की गर्मी होती थी। और उस दौर में अगर स्क्रीन पर गोविंदा का चेहरा दिख जाए तो पब्लिक पागल हो जाती थी।
उस समय शाहरुख, सलमान और आमिर अपना मुकाम बना रहे थे। लेकिन मास ऑडियंस यानी आम जनता की नब्ज़ पर सिर्फ एक ही आदमी का हाथ था और वह थे हमारे विरार के छोकरे गोविंदा। उनकी फिल्में देखने के लिए लोग कहानी नहीं पूछते थे। उन्हें बस इतना पता होना काफी था कि पोस्टर पर गोविंदा है। गोविंदा का होना ही इस बात की गारंटी थी कि अगले 3 घंटे पैसा वसूल होने वाले हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग ऐसी थी जिसे किसी एक्टिंग स्कूल में नहीं सिखाया जा सकता। वो डायलॉग बोलते नहीं थे बल्कि उनके मुंह से शब्द मक्खन की तरह फिसलते थे। उनका डांस इतना नेचुरल था कि लगता ही नहीं था कि वह कोई स्टेप कर रहे हैं। ऐसा लगता था जैसे संगीत बजते ही उनका शरीर अपने आप थिरकने लगता है।
जरा याद कीजिए उन फिल्मों को जिन्होंने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। कुली नंबर एक, राजा बाबू, साजन चले ससुराल, दूल्हे राजा, हीरो नंबर एक। यह सिर्फ फिल्मों के नाम नहीं है। यह वो मील के पत्थर हैं जिन्होंने गोविंदा को उस ऊंचाई पर बैठा दिया था जहां पहुंचना दूसरों के लिए सपना था। उस वक्त फिल्म की स्क्रिप्ट कैसी भी हो, कहानी में दम हो या ना हो। अगर फ्रेम में गोविंदा हैं तो फिल्म हिट है। वो अपनी सादगी और शरारत से कमजोर से कमजोर सीन में भी जान फूंक देते थे। इंडस्ट्री में कहा जाता था कि गोविंदा के सामने अच्छे-अच्छे एक्टर्स पानी मांगने लगते हैं। इस बात का सबसे बड़ा सबूत 1998 में मिला था। जब फिल्म बड़े मियां छोटे मियां रिलीज हुई। इस फिल्म में गोविंदा के सामने कोई और नहीं बल्कि सदी के महानायक अमिताभ बच्चन थे। अमिताभ बच्चन की वापसी हो रही थी और पूरी दुनिया की नजर उन पर थी।
लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई तो थिएटर से बाहर निकलने वाले हर शख्स की जुबान पर सिर्फ एक ही नाम था गोविंदा। उस साल दिवाली पर बॉक्स ऑफिस पर बहुत बड़ा क्लैश हुआ था। एक तरफ थी शाहरुख खान और काजोल की कुछ-कुछ होता है और दूसरी तरफ थी बड़े मियां, छोटे मियां। आपको जानकर हैरानी होगी कि ओपनिंग डे पर गोविंदा की फिल्म ने शाहरुख की फिल्म से ज्यादा कमाई की थी। यह वो दौर था जब गोविंदा का स्टारडम खान तड़ी और बच्चन साहब सब पर भारी पड़ रहा था। लेकिन फिर सवाल वही आता है कि जिस इंसान के पास इतना टैलेंट, इतनी फैन फॉलोइंग और इतनी सफलता थी, उसका सूरज इतनी जल्दी कैसे ढल गया? आखिर इतना बड़ा मुकाम हासिल करने वाला एक्टर जिसे बीबीसी ने एक ऑनलाइन पोल में दुनिया के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में से एक माना था, आज बॉलीवुड के नक्शे से लगभग गायब क्यों है? हम उस दौर की बात कर रहे हैं जब प्रोड्यूसर्स गोविंदा के घर के बाहर लाइन लगाकर खड़े रहते थे और उनके पास डेट्स नहीं होती थी। लेकिन आज हालात ऐसे हैं कि उनकी खुद की प्रोड्यूस की हुई फिल्में आ गया हीरो और रंगीला राजा बॉक्स ऑफिस पर रिलीज तो होती हैं लेकिन दर्शकों को पता तक नहीं चलता। रंगीला राजा जैसी फिल्म का लाइफटाइम कलेक्शन इतना कम था कि यह विश्वास करना मुश्किल हो जाता है कि यह उसी गोविंदा की फिल्म है जिसने कुली नंबर एक और राजा बाबू जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्में दी थी। जहां उनके साथ ही के एक्टर सलमान खान, शाहरुख खान और अक्षय कुमार आज भी एक 100 से 500 करोड़ के क्लब में बैठे हैं और लीड हीरो का रोल कर रहे हैं। वहीं गोविंदा को बड़े पर्दे पर एक ढंग का रोल भी नसीब नहीं हो रहा है। यह सवाल इसीलिए भी गहरा है क्योंकि टैलेंट कभी बूढ़ा नहीं होता। अमिताभ बच्चन ने अपनी दूसरी पारी में मोहब्बतें और बागबान से खुद को साबित किया। अनिल कपूर आज भी हर बड़ी फिल्म का हिस्सा हैं। यहां तक कि सनी देओल ने भी गदर दो से इतिहास रच दिया और अब बॉर्डर दो भी उसी रास्ते पर है। तो फिर गोविंदा ही क्यों पीछे रह गए? क्या इंडस्ट्री ने उनसे मुंह मोड़ लिया या फिर उन्होंने खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। आज जब हम उन्हें किसी छोटे शहर के इवेंट में या रियलिटी शोज़ में सिर्फ एक मेहमान के तौर पर देखते हैं, तो यह बात साफ हो जाती है कि कहीं ना कहीं कुछ बहुत बड़ी गड़बड़ हुई है। यह सिर्फ किस्मत का खेल नहीं है बल्कि इसके पीछे कई ठोस कारण हैं। उनके बर्ताव से लेकर उनके फैसलों तक। और अब हम उस सबसे बड़े कारण की तरफ बढ़ेंगे जिसने डायरेक्टर्स और प्रोड्यूसर्स को गोविंदा से दूर भागने पर मजबूर कर दिया। वह कारण जिसे इंडस्ट्री में अनप्रोफेशनलिज्म का नाम दिया गया। गोविंदा के करियर के ढलान की सबसे बड़ी वजह अगर कोई थी तो वह थी उनकी समय के प्रति लापरवाही। बॉलीवुड में एक कहावत मशहूर हो गई थी कि जब गोविंदा को 9:00 बजे की शिफ्ट के लिए बुलाया जाता है तो वह शाम के 4:00 बजे सेट पर पहुंचते हैं। 90 के दशक में जब उनकी फिल्में लगातार हिट हो रही थी तब तक तो प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स ने उनके नखरे उठाए। वे सेट पर घंटों इंतजार करते क्रू बैठा रहता और लाखों का नुकसान होता। लेकिन चूंकि फिल्म हिट हो जाती थी इसलिए सब चुप रहते थे। मशहूर ऐड गुरु प्रहलाद कक्कड़ ने एक बार बताया था कि गोविंदा में यह अद्भुत क्षमता थी कि वह 24 घंटे देरी से आने के बावजूद ऐसे व्यवहार करते थे जैसे वह बिल्कुल समय पर आए हो। जब उनसे पूछा जाता कि आप कल आने वाले थे और आज आए हैं तो उनका जवाब होता था, “अरे एक दिन में क्या फर्क पड़ता है? यह रवैया उस दौर में शायद स्वैग लगता हो, लेकिन जैसे-जैसे इंडस्ट्री कॉर्पोरेट होती गई, और समय की कीमत बढ़ने लगी, गोविंदा का यह लेट लतीफ वाला अंदाज उनके लिए जहर बन गया।
विदेशी लोकेशनेशंस पर शूटिंग के दौरान तो हालात और भी बुरे हो जाते थे। पूरी यूनिट लंदन या स्विट्जरलैंड में होटल में बैठी रहती थी और हीरो साहब गायब रहते थे। कई बार तो ऐसा हुआ कि वह बिना शूटिंग पूरा किए ही सेट छोड़कर चले गए। दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार ने अपने शुरुआती दौर में ही गोविंदा को सलाह दी थी कि एक साथ बहुत सारी फिल्में साइन मत करो। वरना तुम बीमार पड़ जाओगे और काम संभाल नहीं पाओगे। गोविंदा ने उस वक्त एक साथ 75 फिल्में साइन कर ली थी। लेकिन बाद में उन्हें कई प्रोजेक्ट्स छोड़ने पड़े और कईयों में वो अपनी डेट्स मैनेज नहीं कर पाए। धीरे-धीरे डायरेक्टर्स ने उनसे किनारा करना शुरू कर दिया। जो डायरेक्टर्स कभी उनके घर के चक्कर काटते थे, अब वो उनका फोन उठाने से भी कतराने लगे। इसका सबसे ताजा और दर्दनाक उदाहरण जगगा जासूस फिल्म के दौरान देखने को मिला। अनुराग बसू जैसे बड़े डायरेक्टर ने गोविंदा के साथ शूटिंग तो की लेकिन बाद में फिल्म से उनका पूरा रोल ही काट दिया गया। गोविंदा ने ट्विटर पर अपनी भड़ास भी निकाली कि उन्होंने कपूर परिवार के सम्मान में वो फिल्म की थी। बीमार होने के बावजूद शूट किया था। लेकिन फिर भी उन्हें बिना बताए फिल्म से हटा दिया गया।
यह घटना इस बात का सबूत थी कि अब इंडस्ट्री में उनकी वो हैसियत नहीं रही थी कि कोई उनके लिए फिल्म की एडिटिंग बदल दे। अनप्रोफेशनलिज्म ने जहां काम छीना, वहीं अहंकार और गलतफहमियों ने उन रिश्तों को खत्म कर दिया जो गोविंदा की ताकत थे। बॉलीवुड में डेविड धवन और गोविंदा की जोड़ी को अमर अकबर एंथनी जैसा दर्जा हासिल था। इन दोनों ने मिलकर 17 ब्लॉकबस्टर फिल्में दी थी। लोग कहते थे कि डेविड के दिमाग और गोविंदा के डांस का कोई तोड़ नहीं है। लेकिन फिर एक दिन यह दोस्ती भी टूट गई और वजह थी वक्त के साथ बदलने से इंकार करना। गोविंदा की पत्नी सुनीता आहूजा ने एक इंटरव्यू में खुलासा किया था कि डेविड धवन चाहते थे कि गोविंदा अब लीड हीरो का मोह छोड़ें और अमिताभ बच्चन या अक्षय कुमार की तरह सपोर्टिंग या सेकंड लीड रोल्स करना शुरू करें। डेविड का मानना था कि उम्र के साथ ढलना समझदारी है। लेकिन गोविंदा को यह बात नागवार गुजरी।
उन्हें लगा कि जिस डायरेक्टर को उन्होंने हिट कराया, आज वही उन्हें साइड हीरो बनाना चाहता है। उनका ईगो बीच में आ गया और उन्होंने डेविड धवन से बात करना बंद कर दिया। यही हाल सलमान खान के साथ भी हुआ। जब गोविंदा का करियर डूब रहा था तो सलमान ने पार्टनर फिल्म के जरिए उन्हें एक शानदार कमबैक का मौका दिया था। फिल्म सुपरहिट रही और लगा कि भगीरथ और प्यारेलाल की यह जोड़ी लंबी चलेगी। लेकिन फिर पेंच फंसा गोविंदा की बेटी टीना आहूजा के लॉन्च को लेकर। इंडस्ट्री में यह चर्चा आम थी कि गोविंदा चाहते थे कि सलमान उनकी बेटी टीना को अपनी फिल्म दबंग से लॉन्च करें। लेकिन सलमान ने शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी सोनाक्षी सिन्हा को चुन लिया। खबरों के मुताबिक इस बात से गोविंदा इतने नाराज हुए कि उन्होंने सलमान से दूरी बना ली। उन्होंने पब्लिकली यह भी कह दिया कि किसी से इतनी उम्मीद नहीं रखनी चाहिए कि वो बोझ बन जाए। सोचिए जिस इंडस्ट्री में नेटवर्किंग ही सब कुछ है वहां गोविंदा ने डेविड धवन और सलमान खान जैसे पावर हाउस लोगों से अपने रिश्ते खराब कर लिए। दोस्ती और रिश्तों के टूटने के बाद गोविंदा के पतन में जिस चीज ने आग में घी का काम किया वो था उनका खुद को लेकर एक अजीबो गरीब डिल्यूजन।
एक समय ऐसा आया जब गोविंदा को लगने लगा था कि वह पूरी इंडस्ट्री से बड़े हैं। उनका यह मानना था कि मैं इंडस्ट्री के पास नहीं गया। इंडस्ट्री मेरे पास आई थी। इसी गॉड कॉम्प्लेक्स के चलते उन्होंने पब्लिकली कुछ ऐसे दावे किए कि लोग सिर पकड़ने पर मजबूर हो गए। सबसे बड़ा धमाका तब हुआ जब एक इंटरव्यू में गोविंदा ने पूरी गंभीरता से यह दावा कर दिया कि हॉलीवुड के सबसे बड़े डायरेक्टर जेम्स कैमरून ने उन्हें दुनिया की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म अवतार ऑफर की थी। जी हां, आपने सही सुना। गोविंदा का कहना था कि कैमरून चाहते थे कि वह उस फिल्म में लीड रोल करें। उन्होंने फिल्म को सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया क्योंकि उन्हें 410 दिनों तक शूटिंग करनी थी और अपने पूरे शरीर पर नीला पेंट लगवाना था जो उन्हें पसंद नहीं था। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी दावा किया कि फिल्म का टाइटल अवतार भी उन्होंने ही जेम्स कैमरून को सुझाया था। जब यह बयान वायरल हुआ तो इंटरनेट पर मीम्स की बाढ़ आ गई। लोगों को समझ नहीं आया कि वह इस पर हंसें या रोएं।
यह आत्मविश्वास नहीं था। यह वास्तविकता से पूरी तरह कट जाना था। सिर्फ अवतार ही नहीं गोविंदा ने अपनी रिजेक्टेड फिल्मों की एक लंबी लिस्ट गिनानी शुरू कर दी। उन्होंने दावा किया कि सनी्नी देओल की ऑल टाइम ब्लॉकबस्टर दर एक प्रेम का था। पहले उन्हें ऑफर हुई थी लेकिन उन्होंने इसे इसलिए मना कर दिया क्योंकि उसमें बहुत गालियां थी और हिंदू मुस्लिम तनाव था। उन्होंने यह भी कहा कि संजय लीला भंसाली की देवदास में चुन्नी लाल का रोल जो जैकी श्रॉफ ने निभाया और ऑस्कर विनर स्लम डॉग मिलियनर में अनिल कपूर वाला रोल भी उन्हें मिला था। लेकिन गोविंदा की ज़िद थी कि वो हीरो के अलावा और कुछ नहीं करेंगे। जब दुनिया बदल रही थी और अमिताभ बच्चन जैसे महानायक मोहब्बतें में सपोर्टिंग रोल कर रहे थे। अनिल कपूर उम्र के हिसाब से किरदार चुन रहे थे। तब गोविंदा 90 के दशक के उसी हीरो नंबर वन वाले गुब्बारे में जी रहे थे। 2000 के दशक के बाद जैसे-जैसे उनकी फिल्में फ्लॉप होने लगी, उनका झुकाव पूजा पाठ और तंत्र मंत्र की तरफ बहुत ज्यादा बढ़ गया। लेकिन बात सिर्फ अंगूठियां पहनने या माथे पर तिलक लगाने तक सीमित नहीं थी। इंडस्ट्री के अंदरूनी सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स ने कुछ बेहद चंकाने वाले दावे किए। 2008 के आसपास जब उनकी फिल्म मनी है तो हनी है की शूटिंग चल रही थी। तब सेठ से ऐसी खबरें आई जिन्होंने सबको सन्न कर दिया। कहा जाता है कि गोविंदा ने फिल्म की सफलता के लिए सेट पर जानवरों की बलि देने जैसे टोटके अपनाए।
कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि सेठ पर मुर्गियों की बलि दी गई या मुर्गियों का इस्तेमाल किसी विशेष अनुष्ठान में किया गया। एक बार गोविंदा शूटिंग के बीच से गायब हो गए और बाद में पता चला कि वह गुड लक के लिए किसी बकरे की बलि से देने गए थे। अंधविश्वास की यह हद यहीं नहीं रुकी। मशहूर गायक जुबीन गर्ग ने एक बार सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि गोविंदा ने कामाख्या मंदिर में एक भैंस की बलि दी थी। सोचिए 21वीं सदी में एक सुपरस्टार पर ऐसे आरोप लग रहे थे। इसके अलावा उनका राहु काल को लेकर डर इतना ज्यादा था कि वो शूटिंग के समय को ग्रहों की चाल के हिसाब से बदलवा देते थे। कभी वो सीन शूट करने से मना कर देते क्योंकि वाइब्स ठीक नहीं आ रही थी तो कभी वह सेट पर किसी खास दिशा में बैठने से इंकार कर देते। प्रोड्यूसर्स जो करोड़ों रुपए लगाकर फिल्म बना रहे थे उनके लिए यह सब बर्दाश्त करना नामुमकिन होता जा रहा था।
आज के दौर के डायरेक्टर्स जो लॉजिक और स्क्रिप्ट पर काम करते हैं। उन्हें ऐसे एक्टर के साथ काम करना रिस्की लगने लगा जो स्क्रिप्ट से ज्यादा पंडित जी की बातों पर भरोसा करता हो। धीरे-धीरे इन किस्सों ने गोविंदा की छवि को एक सनकी कलाकार की बना दिया। जिससे हर कोई दूर रहना ही बेहतर समझने लगा। जब बड़े डायरेक्टर्स ने काम देना बंद कर दिया तो गोविंदा ने खुद को रीॉन्च करने की ठानी। लेकिन नतीजा क्या हुआ? तबाही। उन्होंने आ गया हीरो फ्राइडे और रंगीला राजा जैसी फिल्में की। यह सिर्फ फ्लॉप नहीं थी। यह एक डिजास्टर थी। इन फिल्मों को देखकर ऐसा लगा जैसे गोविंदा अभी भी 1995 में जी रहे हैं। जबकि कैलेंडर 2019 का हो चुका था। असफलता को स्वीकार करना हर किसी के बस की बात नहीं होती और गोविंदा के साथ भी यही हुआ। जब उनकी फिल्में लगातार फ्लॉप होने लगी और इंडस्ट्री ने उनसे मुंह मोड़ लिया तो उन्होंने अपनी गलतियों का सेल्फ इंट्रोस्पेक्शन करने के बजाय विक्टिम कार्ड खेलना शुरू कर दिया। पिछले कुछ सालों में उन्होंने कई इंटरव्यूज में बार-बार यह बात दोहराई है कि बॉलीवुड में उनके खिलाफ एक बहुत बड़ी साजिश रची गई है। उनका मानना है कि इंडस्ट्री के कुछ बड़े और पावरफुल लोगों ने गुटबाजी करके उनका करियर खत्म करने की योजना बनाई। उन्होंने एक इंटरव्यू में यहां तक कह दिया था कि मैं अनपढ़ था और यह पढ़े लिखे लोग मुझे बाहर करना चाहते थे। इन्होंने मुझे बदनाम करने के लिए करोड़ों रुपए खर्च किए। लेकिन कड़वा सच तो यह है कि जब आप खुद सेट पर 24 घंटे देरी से आते हैं, डायरेक्टर्स की बात नहीं सुनते और स्क्रिप्ट में अपनी मनमर्जी चलाते हैं तो किसी को आपके खिलाफ साजिश रचने की जरूरत नहीं पड़ती। आपका अपना व्यवहार ही आपका सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है। तो दोस्तों, गोविंदा की यह अर्श से फर्श तक की कहानी हमें क्या सिखाती है? क्या वह सिर्फ किस्मत के मारे हैं? जवाब है बिल्कुल नहीं। गोविंदा के पास वह सब कुछ था जो एक सदी का महानायक बनने के लिए चाहिए होता है। कमाल का डांस, बेजोड़ कॉमिक टाइमिंग इमोशंस पर पकड़ और जनता का अंधा प्यार। टैलेंट के मामले में आज भी शायद ही कोई उनके आसपास भटक सके। लेकिन स्टारडम सिर्फ टैलेंट से नहीं टिकता। उसे बनाए रखने के लिए डिसिप्लिन एडप्टेबिलिटी और रिश्तों को निभाने की कला चाहिए होती है। अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, अनिल कपूर जैसे लोग आज भी इसलिए टिके हैं क्योंकि उन्होंने वक्त की नब्ज़ को पहचाना, अपने ईगो को काम के आड़े नहीं आने दिया और अपनी रेलेवेंस बनाए रखी। गोविंदा ने अपनी शर्तों पर काम करना चाहा लेकिन वो भूल गए कि सिनेमा किसी एक की शर्तों पर नहीं चलता। यह टीम वर्क है। वो वायरल वीडियो जिसमें वो छोटे से स्कूल के स्टेज पर नाच रहे हैं। वो हमें दुख देता है लेकिन साथ ही एक चेतावनी भी है।
यह वीडियो बताता है कि अगर आप समय की कदर नहीं करेंगे तो समय आपकी कदर करना छोड़ देगा। गोविंदा हिंदी सिनेमा के बेहतरीन एंटरटेनर्स में से एक थे और हमेशा रहेंगे। उनकी फिल्में हमें आज भी हंसाती हैं। लेकिन उनका करियर ग्राफ आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाता रहेगा कि हीरो नंबर वन बने रहने के लिए सिर्फ स्क्रीन पर हीरो होना काफी नहीं है। असल जिंदगी में भी प्रोफेशनल और विनम्र होना उतना ही जरूरी है।
