ईरान पर हमले के लिए सऊदी ने उकसाया ?

अमेरिका ने ईरान पर जो हमला किया है, उसमें इजराइल उसका इकलौता साझेदार नहीं है। इस अलायंस में सऊदी अरब का भी नाम सामने आ रहा है। वाशिंगटन पोस्ट ने अपनी एक रिपोर्ट में दावा किया है कि इस हमले की जानकारी रखने वाले चार अधिकारियों ने इस बात की तस्दीक की है।

उन्होंने बताया कि सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पिछले 1 महीने के दौरान प्रेसिडेंट ट्रंप को कई बार फोन मिलाकर हमले की वकालत की थी। जबकि पब्लिकली वो हमेशा इस मसले का कूटनीतिक समाधान करने पर जोर देते रहे हैं।

इजराइल तो पहले से ही अमेरिका के साथ था। सऊदी अरब और इजराइल की कोशिशों ने प्रेसिडेंट ट्रंप को और अधिक पुश किया ताकि वह ईरान पर हमला करें। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि सऊदी अरब ने इस हमले के लिए तब जोर लगाया जब अमेरिका और ईरान के बीच न्यूक्लियर प्रोग्राम को लेकर बातचीत चल रही थी। उसी समय सऊदी अरब ने एक आधिकारिक स्टेटमेंट भी जारी किया था जो सऊदी क्राउन प्रिंस और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पिजकियान के बीच हुई एक फोन कॉल के बाद आया था।

इसमें क्राउन प्रिंस ने साफ तौर पर कहा था कि सऊदी अरब ईरान पर हमले के लिए अपनी जमीन या एयरस्पेस का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देगा। लेकिन उसके उलट रिपोर्ट में दावा कुछ और ही है। रिपोर्ट में यह कहा गया है कि अमेरिकी अधिकारियों से बातचीत में एमबीएस ने चेतावनी दी थी कि अगर अमेरिका ने अभी हमला नहीं किया तो ईरान भविष्य में और भी ज्यादा ताकतवर और खतरनाक हो जाएगा।

उन्होंने याद दिलाया कि अमेरिका ने 2003 के इराक के बाद पहली बार मिडिल ईस्ट में अपनी इतनी बड़ी सेना जमा की है और इस मौके का फायदा उठाकर हमला कर देना चाहिए। सऊदी क्राउन प्रिंस एमबीएस की इस बात का समर्थन उनके भाई सऊदी रक्षा मंत्री खालिद बिन सलमान ने भी किया था। रिपोर्ट में यह दावा है कि खालिद बिन सलमान ने जनवरी में वाशिंगटन में अमेरिकी अधिकारियों के साथ क्लोज डोर मीटिंग्स की थी।

तब उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर इस समय ईरान पर हमला नहीं किया गया तो भविष्य में इसके बहुत बुरे नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं। रिपोर्ट में आगे दावा किया गया है कि सऊदी अरब के लिए यह एक मुश्किल चुनाव था। एक तरफ वह ईरान को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं और उसके उसे खत्म करना चाहते हैं। लेकिन दूसरी तरफ उन्हें डर भी था कि अगर वे खुलकर सामने आए तो ईरान जवाबी हमले करेगा और सऊदी अरब के तेल के ठिकानों को निशाना बनाएगा।

जिससे नुकसान खुद सऊदी को ही झेलना पड़ सकता था। इसलिए खुलकर वो सामने नहीं आ रहा था। 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के हमले के बाद जब ईरान ने रिटेलिएशन शुरू किया तो सऊदी अरब पर भी हमले किए गए। दरअसल ईरान मिडिल ईस्ट के अलग-अलग देशों में अमेरिकी एयरबेस पर हमले कर रहा था। निशाना बना रहा था। सऊदी अरब ने इस बाबत स्टेटमेंट भी जारी कर निंदा की थी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय से उसने कड़े कदम उठाने की अपील भी की थी।

हालांकि वाशिंगटन पोस्ट ने जब इस बारे में और जानकारी के लिए सऊदी दूतावास से कांटेक्ट किया तो उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। अब एक सवाल यह है कि सऊदी और ईरान दोनों ही मुस्लिम कंट्रीज। तो दुश्मनी किस बात की? जवाब है पावर स्ट्रगल। दशकों से दोनों देशों के बीच पावर टसल चल रही है जिसका फायदा अमेरिका उठाता रहा है। कहानी शुरू होती है 1938 से। सऊदी अरब में तेल का भंडार मिला। जहां तेल वहां अंकल सैम 1945 में अमेरिका ने तेल को लेकर सऊदी से डील कर ली।

फिर आया 1967 और 1969 की अरब इजराइल जंग। तो अमेरिका इजराइल के पाले में था। सऊदी ने तेल की सप्लाई रोक दी। गुस्सा आ गया। अमेरिका को इसका खामियाजा भुगतना पड़ा। जिसके बाद सऊदी को उसने वापस से मना लिया। दोनों की दोस्ती हो गई। उस समय ईरान में राजशाही शासन था। अमेरिका की पपेट सरकार कह लीजिए। लेकिन 1979 में इस्लामिक रिवोल्यूशन के बाद कहानी बदल गई। शिया धर्मुगुरु आयातुल्लाहल्लाह खुमैनी ईरान के सुप्रीम लीडर बन गए। राजशाही खत्म हो गई। ईरान अब इस्लामिक रिपब्लिक हो गया और उसने अमेरिका को सबसे बड़ा दुश्मन घोषित कर दिया। दुश्मन इसलिए क्योंकि कभी भी अमेरिका ने एक लोकतांत्रिक सरकार ईरान में बनने ही नहीं दी। 1953 में उसने ऑपरेशन एजेक्स भी चलाया था इसके लिए। अब आगे बढ़ते हैं। ईरान में करीब 90 से 95% आबादी जो है वो शिया समुदाय की है और अब शिया गवर्नमेंट भी थी ईरान में।

वहीं दूसरी तरफ सऊदी अरब में करीब 85 से 90% जो आबादी है वो सुन्नी समुदाय की है। दोनों में टसल चलने लगा कि मुस्लिम उमा कौन होगा? कोल्ड के दौरान जब यह टसल साफ देखने को मिल रहा था। अमेरिका और सऊदी अरब की दोस्ती और गहरी हुई। ईरान ने भी इराक, सीरिया, लेबनन और बाद में यमन में अपने प्रॉक्सी गुट फैलाए। जवाब में सऊदी अरब ने इन गुटों पर सीधे हमले कर दिए। फिर आया 2011 जब सीरिया में सिविल वॉर शुरू हुआ तब ईरान ने बशर अल असद का समर्थन किया था और सऊदी ने क्या किया कि उसने विद्रोही सुन्नी गुटों का समर्थन कर दिया।

फिर 2015 की घटना आपको याद दिला दें जब यमन में हूती विद्रोह भड़का था तब सऊदी ने यमन सरकार के समर्थन में गठबंधन बना करके हमला किया था। अमेरिका और यूरोप ने सऊदी अरब को हथियार भी दिए थे। जबकि दूसरी तरफ हुूतियों को ईरान से मिसाइलों और ड्रोन का समर्थन मिला। 2018 में जब ट्रंप आए उनकी सरकार आई तो उन्होंने ईरान न्यूक्लियर डील को रद्द कर दिया था।

उन्होंने बोला अब नए सिरे से बात होगी ईरान से। सऊदी अरब ने इस कदम का स्वागत किया था। सऊदी अरब का कहना था तब कि अगर ईरान बनाएगा तो हम भी बम बनाएंगे। 2021 में दोनों देशों ने बातचीत की शुरुआत तो की लेकिन पावर स्ट्रगल खत्म नहीं हुआ। दोनों देशों के बीच पावर स्ट्रगल तो है। तो यह तो कहानी हुई दोनों देशों के बीच टसल को लेकर।

अब ईरान एक बार फिर अनस्टेबल है। सुप्रीम लीडर खामिनई की हत्या के बाद अब ईरान में किसकी सरकार होगी? इस पर देश के सीनियर अधिकारी अली लारजानी ने 1 मार्च को अपडेट्स दिए हैं। उन्होंने कहा कि देश के संविधान के मुताबिक एक टेंपरेरी लीडरशिप काउंसिल बनाई जाएगी। यह काउंसिल फिलहाल देश की जिम्मेदारी संभालेगी। उन्होंने अमेरिका और इजराइल पर ईरान को तोड़ने का आरोप लगाया। चेतावनी दी कि ईरान के लोग अपने देश का बंटवारा कभी नहीं होने देंगे।

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