क्या इंसान का गायब होना अब मुमकिन है? क्या ‘मिस्टर इंडिया’ की तकनीक हकीकत बनने वाली है?

आज हम बात कर रहे हैं दुनिया की सबसे बड़ी खोज की। उस खोज की जो दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली है और दुनिया को बदल सकती है। क्योंकि एक ऐसी खोज है जिसके बारे में आपने कल्पना की होगी और फिल्मों में भी उस कल्पना को साकार होते देखा होगा। जब इंसान देखते ही देखते गायब हो जाता है तो वैज्ञानिकों ने अब ऐसी खोज कर ली है जिससे इंसान के सामने सारी बाधाएं मिट सकती हैं और वह दीवार हो या पहाड़ सबके पार आसानी से जा सकेगा क्योंकि यह फिजिक्स के क्षेत्र में बेमिसाल छलांग है जिसका काफी दूरगामी असर पड़ने वाला है। असल में आपको बता दें कि रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेस ने इस साल 2025 में भौतिक विज्ञान के लिए अमेरिका के जॉन क्लार्क मिशेल डेबोरेट और जॉन मार्टिनिस को नोबेल प्राइज के लिए चुना है।

इन वैज्ञानिकों ने जो खोज की है उसके मुताबिक क्वांटम का प्रभाव सिर्फ छोटे लेवल पर ही नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर भी काम कर सकता है। चलिए सबसे पहले आपको बताते हैं उस खोज के बारे में जो इन्होंने की हैअब सच होगा मिस्टर इंडिया बनने का ख्वाब। अब अदृश्य होने का पूरा हो सकेगा सपना। विज्ञान का आविष्कार जल्द होगा बड़ा चमत्कार। साइंस की खोज दुनिया की होने वाली है मौज। दो दशक से ज्यादा समय पहले भारत में एक फिल्म आई थी मिस्टर इंडिया। इस फिल्म में मिस्टर इंडिया के किरदार में अनिल कपूर थे। वो एक घड़ी पहनते थे। जिसके बाद वह गायब हो जाते थे। यानी अदृश्य।

वो दीवारों से गुजर कर कहीं भी पहुंच सकते थे। सिर्फ यही नहीं वो इस चमत्कार का उपयोग कर दुश्मनों को सबक भी सिखाया था। फिल्म में सभी इस विज्ञान के चमत्कार को देख दंग थे। यहां तक कि फिल्म के खलनायक भी। लेकिन सिर्फ उन्हें लाल रंग की रोशनी में देखा जा सकता था। आज यही चमत्कार सच होने जा रहा है। अमेरिका के जिन वैज्ञानिकों को जिस खोज के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। इनकी थ्योरी है क्वांटम मैकेनिक्स टनलिंग इस प्रक्रिया में क्वांटम कण एक तरह से अदृश्य या अपने पारंपरिक स्वरूप से अलग हो जाते हैं क्योंकि वे बैरियर को भेदते हुए निकल जाते हैं .

लेकिन बिना उसे नुकसान पहुंचाए बजाय उसे ऊपर से पार करने के। यानी कहने का मतलब यह है कि आज जिस थ्योरी को रॉयल स्वीडिश एकेडमी ने मान्यता दी है, जिस कोच को आज दुनिया सलाम कर रही है, आज से कई साल पहले भारतीय फिल्मकारों ने भी ऐसा ही सोचा था। इस पर फिल्म भी बनाई थी। वो क्वांटम टंगलिंग आने वाले वक्त में इंसानों के जीवन पर जरूर प्रभाव डालेगा। वैसे क्वांटम की दुनिया विचित्र है और पारंपरिक और क्लासिकल विज्ञान से बिल्कुल अलग। परमाणु के अत्यंत छोटे कण जो आपस में एक दूसरे से जुड़े होते हैं। भले ही बहुत दूरी तक एक साथ नहीं रह पाते हो लेकिन यह कण बड़े से बड़े अवरोधों को आसानी से पार कर जाते हैं।

जैसे कोई बैरियर मौजूद ही नहीं है बिना उस बाधा को नुकसान पहुंचाए। क्वांटम टनलिंग भी एक ऐसी ही घटना है जहां एक उप परमाणविक कण या परमाणु फिजिकल बैरियर के विपरीत दिशा में मौजूद हो सकता है। जहां कण के लिए घुसपैठ करना सामान्य रूप से असंभव है।

यह ऐसा है जैसे कोई आदमी चल रहा है और दोनों तरफ लंबी दूरी तक फैली 20 मीटर ऊंची दीवार है। लेकिन बिना लंबी सीढ़ी के वो दीवार को पार नहीं कर सकता है। क्वांटम टनलिंग के मामले में आदमी बिना किसी भौतिक परिणाम के आसानी से बाधा को पार कर सकता है। दूसरे रूप में आप समझ सकते हैं कि 10 आदमी दौड़ रहे हैं। लेकिन जो सबसे आगे निकलता है जरूर उसमें अन्य प्रतिभागियों से अलग क्षमता है। तभी वह रेस जीत पाता है। कुछ ऐसा ही होता है क्वांटम मैकेनिक स्टनलिंग में।

जब किसी भी माध्यम के जरिए कणों को किसी बैरियर के आगे प्रवाहित किया जाता है तो सभी कण बैरियर के पार नहीं जा पाते बल्कि कुछ खास कण ही बाधा को पार कर पाते हैं। यही कण आने वाले वक्त में इस बड़े बदलाव के जनक बनने वाले हैं। रिपोर्ट गुड न्यूज़ टुडे। तो द इनविज़िबल मैन या फिर फिल्म वाले मिस्टर इंडिया का कांसेप्ट अब जमीन पर उतर सकता है और यह संभव होने वाला है क्वांटम मैकेनिक्स टर्नलिंग के जरिए क्वांटम मैकेनिक्स टर्नलिंग की थ्योरी यह कहती है कि वातावरण में मौजूद हर कण एक समान नहीं होता कुछ कणों में खास विशेषता होती है जो किसी भी अवरोध को पार कर जाते हैं। इसमें मदद करते हैं अवरोध में मौजूद उनके सामान मौजूद परमाणविक कण। तो अब आपको रिपोर्ट दिखाते हैं जिसके जरिए अमेरिका के नोबेल पुरस्कार हासिल करने वाले वैज्ञानिकों की खोज को आप समझ सकेंगे।

आसानी से इंसान का दीवार के पार चले जाना। पल में किसी भी बाधा या स्ट्रक्चर को बिना किसी नुकसान पहुंचाए दूसरी पार पहुंच जाना। बॉलीवुड की फिल्में हो या कोई कार्टून इनमें यह आम बात बताकर सालों से दिखाई जाती रही हैं। लेकिन आज भी इस अवधारणा को कहीं से मान्यता नहीं मिली है। लेकिन जब से अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन क्लार्क, मिशेल डेबोरेट और जॉन मार्टिनीज को फिजिक्स यानी भौतिक विज्ञान का नोबेल प्राइज मिला है, लोगों की सोच बदलने लगी है।

अमेरिका के तीनों वैज्ञानिकों जॉन क्लार्क, मिशेल डेबोरेट और जॉन मार्टिनीज ने साल 1984-85 में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी में एक खास प्रयोग किया था। उन्होंने दो सुपरकंडक्टर से एक बिजली का सर्किट बनाया। दोनों सुपरकंडक्टरों के बीच में एक पतली परत थी। जो बिजली की प्रवाह को रोकती थी। फिर भी उन्होंने देखा कि सर्किट में मौजूद सभी चार्ज किए हुए कण एक साथ मिलकर ऐसा व्यवहार करते थे जैसे वे एक ही कण हो। यह कण उस पतली परत को पार कर दूसरी तरफ जा सकते थे। यानी बाधा को किसी प्रकार का नुकसान पहुंचाए बिना वो उससे ऐसे पार कर रहे हैं जैसे उनके लिए रास्ता बना हो।

अमेरिकी वैज्ञानिकों द्वारा किया गया प्रयोग क्वांटम टनलिंग का सबूत था। क्वांटम टलिंग दरअसल वो प्रक्रिया है जिसमें कोई कण किसी बाधा या बैरियर को कूदकर नहीं बल्कि उसके आर-पार होकर निकल जाता है। जबकि सामान्य फिजिक्स के हिसाब से यह असंभव होना चाहिए। अगर आम जिंदगी में हम देखें तो कोई गेंद दीवार से टकरा कर वापस आ जाती है। लेकिन क्वांटम की दुनिया में छोटे कण कभी-कभी दीवार को पार कर दूसरी तरफ चले जाते हैं। इसे ही क्वांटम टनलिंग कहते हैं। वैज्ञानिकों ने प्रयोग से यह कंट्रोल करना और समझना सीखा कि क्वांटम टनलिंग बड़े सिस्टम में कैसे काम करती है।

यह खोज क्वांटम कंप्यूटिंग और नई तकनीकों के लिए बहुत बड़ी बात है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेस ने कहा कि इन वैज्ञानिकों ने यह साबित किया कि क्वांटम इफेक्ट मानव स्तर पर भी दिखाई दे सकते हैं। यह खोज क्वांटम कंप्यूटिंग और नई तकनीकों के लिए बहुत बड़ी बात है। नोबेल कमेटी के अध्यक्ष ओले एरिक्सन ने कहा 100 साल से भी पुराने क्वांटम मैकेनिक साइंस में नई खोजें हमें हैरान करती हैं। यह ना सिर्फ दिलचस्प है बल्कि बहुत काम की भी है। हमारे कंप्यूटर, स्मार्टफोन और इंटरनेट जैसी सारी डिजिटल चीजें इसी विज्ञान पर टिकी हैं। बड़े-बड़े वैज्ञानिकों का मानना है कि अमेरिका तीनों वैज्ञानिकों की खोज से आने वाले वक्त में विज्ञान के मामले में दुनिया बदलने वाला है। ब्यूरो रिपोर्ट गुड न्यूज़ टुडे।

कुल मिलाकर क्वांटम मैकेनिक्स टर्नलिंग एक ऐसी खोज है जिससे दुनिया में बड़े बदलाव आ सकते हैं। इंसान की जिंदगी का कायाकल्प भी हो सकता है। यह एक ऐसी खोज है जिसके इस्तेमाल से मानव सभ्यता को तो लाभ मिलेगा ही। कंप्यूटर, सुपर कंडक्टर, ट्रांजिस्टर जैसे क्षेत्रों में क्रांति आ सकती है। इसके अलावा रक्षा क्षेत्र में इसके इस्तेमाल से युद्ध की दिशा बदल सकती है। तो क्वांटम मैकेनिक्स स्टलिंग से क्या-क्या हो सकता है और आखिर कैसे यह रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेस ने तीन अमेरिकी वैज्ञानिकों जॉन क्लार्क, मिशेल डेवोरेट और जॉन मार्टिनिस को फिजिक्स यानी भौतिक विज्ञान में क्वांटम मैकेनिक्स टनलिंग में खोज करने के लिए नोबेल प्राइज देने के लिए चुना है। आमतौर पर रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेस उन्हीं आविष्कार या खोज को मान्यता देती है जो समाज या मानव जीवन को समर्पित हो।

कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन क्लार्क ने जोसेफसन जंक्शन में टनलिंग की खोज की। ये यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मिशेल एच डेवोरेट ने सर्किट क्वांटम इलेक्ट्रोडायनेमिक्स विकसित की। तो कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के ही प्रोफेसर जॉन एम मार्टिनिस ने क्यूबेट्स में एनर्जी क्वांटाइजेशन का प्रयोग किया। कुल मिलाकर इन वैज्ञानिकों ने यह साबित किया कि यह क्वांटम प्रभाव वाले इलेक्ट्रॉनिक सर्किट में भी काम कर सकते हैं।

इससे सुपरकंडक्टिंग सर्किट में इलेक्ट्रॉन बिना ऊर्जा खर्च किए किसी भी बाधा को पार कर सकते हैं। जिससे सर्किट और भी तेज गति से काम करता है।

ऐसे में सवाल उठता है कि फिजिक्स में टर्नलिंग का जो थ्योरी इन वैज्ञानिकों ने दी है और साबित किया है कि वह भविष्य में मानव जीवन के लिए कैसे लाभदायक हो सकता है। तो आपको बता दें कि कंप्यूटर चिप्स में इस्तेमाल होने वाले ट्रांजिस्टर में इस तकनीक का इस्तेमाल कर उसे और भी कारगर बनाया जा सकता है।

इस नैनो तकनीक का इलेक्ट्रॉनिक्स के साथ विलय करने पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की क्षमताओं में बड़ा सुधार हो सकता है। इसके इस्तेमाल से ट्रांजिस्टर के आकार कम हो सकते हैं। नए प्रकार की मेमोरी चिप का विकास किया जा सकता है। जिसका घनत्व प्रति वर्ग एक टेराबाइट मेमोरी होगा और इससे मेमोरी चिप्स का घनत्व भी बढ़ेगा। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का डिस्प्ले स्क्रीन भी बेहतर हो सकता है। साथ ही बिजली की खपत के साथ-साथ स्क्रीन के वजन और मोटाई में भी कमी हो सकती है।

इसके अलावा इलेक्ट्रॉनिक सर्किट का साइज भी छोटा हो सकता है। इसके अलावा क्वांटम मैकेनिक्स टर्नलिंग का उपयोग धरती के नीचे खनन में भी किया जा सकता है। मसलन धरती के ऊपर से किरण का सप्लाई कर यह जाना जा सकता है कि धरती के अंदर के क्या हालात हैं? कौन सा खनिज है? पानी है या नहीं या फिर धरती के अंदर की संरचना कैसी है? लेकिन यहां पर यह बताना जरूरी है कि यह तो पहले भी होता रहा है।

लेकिन क्वांटम मैकेनिक्स स्टनलिन से यह प्रक्रिया और ज्यादा सटीक होगी और ज्यादा सूक्ष्मता के साथ इसका पता लगाया जा सकेगा। इसके अलावा एमआरआई में भी इस नई थ्योरी का उपयोग कर बेहतर परिणाम हासिल किया जा सकेगा। इसके अलावा भविष्य में सुपर सिक्यर्ड कोड यानी , हाई स्पीड कंप्यूटर यानी क्वांटम कंप्यूटर और सुपर एक्यूरेट सेंसर जैसी चीजें बनाना आसान हो सकता है। इसके अलावा रक्षा के क्षेत्र में भी यह तकनीकी की दिशा बदलने वाला बन सकता है। क्वांटम कंप्यूटिंग मौजूदा इंक्रिप्शन प्रणालियों को तोड़ने की क्षमता रखती है। जबकि टर्नलिंग और इंटेगमेंट का उपयोग कर ज्यादा सुरक्षित संचार नेटवर्क विकसित किया जा सकता है। क्वांटम टनलिंग कंपोजिट का उपयोग दबाव सेंसर के रूप में भी किया जा सकता है। जब इन सामग्रियों पर दबाव डाला जाता है तो धातु के कण करीब आते हैं और इलेक्ट्रॉन अवरोधक के माध्यम से टनल कर सकते हैं जिससे प्रतिरोध बदल जाता है।

इसका उपयोग संवेदनशील निगरानी उपकरणों के निर्माण के लिए किया जा सकता है। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और साइबर सुरक्षा में भी क्वांटम टनलिंग उपयोग किया जा सकता है। उच्च स्तरीय साइबर सुरक्षा खतरों से निपटने के लिए क्वांटम तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। इसके अलावा यह भी कहा जा रहा है कि क्वांटम टनलिंग का उपयोग करके ऐसा उपकरण बनाया जा सकता है जो पलक झपकते दुश्मन के जहाज, विमान, मिसाइल या ड्रोन सभी को पलक झपकते नष्ट कर सकता है।

यानी ऐसा उपकरण जो रे के जरिए युद्ध में बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। ब्यूरो रिपोर्ट गुड न्यूज़ टुडे और अब बात करते हैं साहित्य के नोबेल पुरस्कार की। हंगरी के प्रसिद्ध लेखक लॉस्लो क्रासनो हरकई को 2025 का साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला है। स्वीडिश एकेडमी ने उन्हें सम्मानित करते हुए कहा कि यह पुरस्कार उनके प्रभावशाली और विजनरी लेखन के लिए दिया गया है। ग्रासना औरकाई की लेखन शैली लंबी जटिल और दार्शनिक है जिसमें एक वाक्य कई पन्नों तक फैला होता है।

उनके शब्दों में अराजकता के भीतर व्यवस्था और गहरी सच्चाई छिपी होती है। [संगीत] कभी आपने कल्पना की होगी कि कोई उपन्यास लिखा गया होगा जो एक वाक्य में खत्म हो गया होगा। कभी आपने कल्पना की होगी कि कोई उपन्यास लिखा गया होगा और फुल स्टॉप कॉमा के बिना खत्म हो गया हो। कुछ इसी तरह उपन्यास लिखते हैं हंगरी के लेखक लास्लो क्रासना हॉर्काई जिन्हें 2025 के साहित्य के नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया है। 2025 नोबेल प्राइ ग्लोरियस ऑफ लिटरेचर क्लास कृष्णा हॉर्काई क्लास क्रसना हॉर्काई विश्व साहित्य में एक अनूठी आवाज है। उनकी रचनाओं में फ्रांस काफा की असंगति, थॉमस बरनार्ड की तीखी विडंबना और जोसेफ कोनार्ड की गहन मानव खोज का विशिष्ट शिल्प दिखाई देता है।

उनकी किताबें केवल हंगरी की नहीं बल्कि समूची मानवता की है। जिनमें पर्यावरणीय संकट, आध्यात्मिक खोज और जीवन की अस्थिरता की गूंज सुनाई देती है। क्रासना हॉर्काई की शैली भी अनोखी है। लंबे-लंबे वाक्य जो कभी-कभी प्रसंगों के मुताबिक पन्नों की परवाह नहीं करते। उनकी यह शैली पश्चिमी साहित्य की संक्षिप्तता के विपरीत है और भारतीय पाठकों को महाकाव्यात्मक कथाओं की परंपरा की याद दिलाती है। जिस नोबेल समिति ने उन्हें पुरस्कार के काबिल समझा उसके मुताबिक यह सम्मान हंगरी के 70 वर्षीय कथाकार के लिए है। जिनके शब्द ना केवल कहानियां बुनते हैं बल्कि आत्मा को झकझोड़ते हुए जीवन के अर्थ को तलाशते हैं। उनकी बाध्यकारी और दृष्टिपूर्ण रचनाएं कला की शक्ति को पुनः स्थापित करती हैं।

क्रास्ता हॉर्काई का साहित्य सिनेमा की तरह दृश्यात्मक है। उनके लंबे लहराते वक्त पाठक को ऐसी दुनिया में ले जाते हैं जहां समय ठहर जाता है और प्रत्येक शब्द एक जीवन चित्र बन जाता है। लास्लो क्रासना हॉर्काई की रचनाएं पूर्वी यूरोप की सामाजिक और राजनीतिक उथल-पुथल को वैश्विक संदर्भ में प्रस्तुत करती है। इनमें द मैलेंली ऑफ रेसिस्टेंस 1989 वॉर वि द न्यू गॉड्स 1999 और कोर स्क्रीन 2017 शामिल है। क्रसना हॉर्काई आधुनिक यूरोपीय साहित्य की उन दुर्लभ आवाजों में से एक है जिन्होंने निराशा और कयामत के बीच उम्मीद की भाषा गढ़ी। उनका लेखन अक्सर मानवता के अंत और नैतिक पतन की स्थितियों से जूझता है। लेकिन हर बार कला को एक पुनर्जन्म की तरह प्रस्तुत करता है। बैस्लो ने 1985 में अपने उपन्यास सैटन टेंगो से साहित्य जगत में सनसनी मचा दी थी। यह एक पोस्ट मॉडर्न क्लासिक मानी जाती है। जो दुनिया के अंत की प्रतीकात्मक कहानी कहती है। इस पर आधारित फिल्म 1994 में बनी।

7 घंटे लंबी ब्लैक एंड वाइट सिनेमा की एक कल्ट मास्टर पीस जिसे हंगरी के डायरेक्टर बेलातार ने निर्देशित किया था। लास्लो क्रसना हॉर्काई का जन्म 5 जनवरी 1954 को हंगरी के गौर में हुआ। वे उस युग में बड़े हुए जब साम्यवादी दमन और युद्ध की स्मृतियां हवा में तैर रही थी। साहित्य और सिनेमा के प्रति उनका झुकाव बचपन से ही दिखाई दिया। विशेषकर बैलातार की फिल्मों ने उनकी कल्पनाशक्ति को आकार दिया। पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद उन्होंने साहित्य को अपना लिया। उनकी पहली कृति सैटन टेंगो 1985 में आई जिसने विश्व साहित्य में हलचल मचा दी थी।

यह उपन्यास एक ग्रामीण समुदाय के पतन और अंधविश्वास की कथा है। ग्लासलो क्रसना हॉर्काई हंगरी के दूसरे लेखक हैं। जिन्हें साहित्य का नोबेल प्राइज मिला है। इसके अलावा उनके लेखन के लिए कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिल चुके हैं।

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