पाकिस्तान को डिस्काउंट वाला तेल?पुतिन का ऐसा खेल, दुनिया हैरान !

मिडिल ईस्ट में लगी आग अब पूरी दुनिया की जेब जला रही है। ईरान और इजराइल अमेरिका के टकराव के बीच होमच की घेराबंदी ने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी है। पेट्रोल डीजल के दाम एक झटके में 20% बढ़ गए हैं। लेकिन इस जलती आग के बीच रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन ने एक ऐसा दांव चला है जिसने वाशिंगटन से लेकर दिल्ली तक खलबली मचा दी है।

पाकिस्तान इस वक्त दाने-दाने को मोहताज है और तेल की कीमतों ने आग लगा दी है। ऐसे में रूसी राजदूत अल्बर्ट्स खरेब ने इस्लामाबाद में बड़ा धमाका किया। रूस ने पाकिस्तान को बिना रुकावट और डिस्काउंट वाले दामों पर तेल देने का ऑफर दिया है। रूस ने साफ कहा है कि अगर शबाज सरकार आधिकारिक तौर पर गुहार लगाती है तो मॉस्को पाकिस्तान की खाली टंकियां भरने को तैयार है।

एक तरफ पाकिस्तान को डिस्काउंट का लालच दिया जा रहा है तो वहीं दूसरी तरफ भारत के लिए रूस का रुख बदल गया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत के लिए अब डिस्काउंट का दौर खत्म हो चुका है। रूसी उर्लस क्रूड अब $ प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। जहां पहले भारत को $3 की छूट मिलती थी, वहीं अब उसे ब्रांड क्रूड के मुकाबले 4 से $5 ज्यादा चुकाने पड़ रहे हैं।

मिडिल ईस्ट की यह जंग पुतिन के लिए किसी जैकपॉट से कम नहीं है। तेल की बढ़ती कीमतों की वजह से रूस हर दिन $150 मिलियन यानी करीब 1250 करोड़ की एक्स्ट्रा कमाई कर रहा है। और जानते हैं यह पैसा कहां जा रहा है। आपको बता दें पुतिन इस एक्स्ट्रा कमाई का इस्तेमाल यूक्रेन के खिलाफ युद्ध को और भी घातक बनाने के लिए कर रहे हैं। रूस का पाकिस्तान को यह ऑफर सीधे तौर पर अमेरिका को एक बड़ा झटका है।

क्या शहबाज शरीफ रूस का हाथ थाम कर अपनी आवाम को महंगाई से बचा पाएंगे या फिर यह रूस का एक नया कूटनीतिक जाल है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर दीजिए। डोनाल्ड ट्रंप ने सोचा था इजराइल के साथ ईरान पर हमला करके पूरी दुनिया में उनका डंका बजेगा। लेकिन हकीकत उल्टी निकली। इजराइल के साथ खड़े होकर शुरू किया गया यह संघर्ष अब अमेरिका के लिए राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक तीनों तरफ से सिरदर्द बन चुका है।

हालात ऐसे हैं कि यह युद्ध बाहर से ज्यादा अब अमेरिका के अंदर ट्रंप की मुश्किलें बढ़ा रहा है। आइए समझते हैं 10 बड़े संकेत जो बताते हैं कि कैसे यह अमेरिका के गले की फांस बन गया। सबसे पहला संकेत है जनता का भरोसा कमजोर। जी हां, अमेरिका में बड़ी संख्या में लोग इस युद्ध को गैर जरूरी मान रहे हैं। लोगों को साफ वजह नहीं दिख रही इसलिए समर्थन लगातार घट रहा है।

लोगों का कहना है कि इजराइल के में अमेरिका आखिर क्यों कूदा? इस युद्ध से अमेरिका को कोई फायदा नहीं हो रहा है बजाय नुकसान के। इसी वजह से लोग अब डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ नारेबाजी कर रहे हैं और अपना विरोध दर्ज कर रहे हैं। वहीं दूसरा बड़ा संकेत है सत्ता के अंदर दरार। इस युद्ध को लेकर सरकार के अंदर ही मतभेद खुलकर सामने आ रहे हैं।

बड़े अधिकारी फैसलों से असहमत दिख रहे हैं जो नेतृत्व पर बड़ा सवाल खड़े करते हैं। वहीं तीसरा बड़ा संदेश है अपने ही लोग विरोध में। डोनाल्ड ट्रंप के कट्टर समर्थक और अमेरिका फर्स्ट कैंप के लोग भी अब इस को गलत ठहरा रहे हैं। यह सबसे बड़ा डोनाल्ड ट्रंप को राजनीतिक झटका माना जा रहा है। वहीं चौथा बड़ा पॉइंट है महंगाई और खर्च का दबाव। का असर सीधा आम लोगों की जेब पर पड़ा है। ईंधन महंगा हुआ है। खर्च बढ़ता हुआ है और सरकार पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता जा रहा है। वहीं पांचवा पॉइंट है लंबा खींचता । इस को अमेरिका ने एक छोटा सा ऑपरेशन समझा था।

वह अब लंबी लड़ाई बन चुका है। इससे अमेरिकी सैन्य ताकत की छवि पर असर पड़ा है। साथ में संसाधनों पर भी इसका प्रभाव पड़ रहा है। तेल संकट और ग्लोबल असर। हॉरमोन जैसे अहम रास्तों पर तनाव से दुनिया की तेल सप्लाई प्रभावित हो रही है। जिसका असर कई देशों पर पड़ रहा है और ईरान ने अपना दबदबा कायम करके पूरी दुनिया को दिखा दिया कि अगर अमेरिका हम पर हमला करेगा इजराइल के साथ मिलकर तो हम भी मुंहतोड़ जवाब देंगे।

नाटो में दरार नाटो के कई देशों ने खुलकर साथ नहीं देने का ऐलान कर दिया है। अमेरिका इस लड़ाई में अब काफी हद तक अकेला दिखाई दे रहा है। व रूस पर नरमी की मजबूरी। व डोनाल्ड ट्रंप ने रूस को लेकर अपना रुख भी बदला है या कहें मजबूरी में बदलना पड़ा है।

तेल और रणनीति दोनों कारणों से ट्रंप को बैलेंस करना पड़ रहा है। क्योंकि स्टेट ऑफ हॉर्मोस बंद करने की वजह से अब कई ऐसे देश हैं जो रूस से तेल आयात कर रहे हैं। जबकि डोनाल्ड ट्रंप ने रूस पर कई सेंक्शन लगा रखे हैं। लेकिन बढ़ते तनाव के बीच उन्होंने इस शंक्शन को हटाने की बात मंजूर कर ली है। मजबूरी में ही सही और यह जिससे अमेरिका की छवि धूमिल हो रही है।

मिडिल ईस्ट में बढ़ता पलटवार ईरान ने सीधे टकराव के बजाय अलग-अलग जगहों पर हमले तेज कर दिए हैं। मिडिल ईस्ट के सभी खाड़ी देशों पर बने अमेरिकी सैन्यवेश ठिकानों को चुन-च कर तबाह करने की बात कही है और ऐसा कर भी रहे हैं जिससे अमेरिका को आर्थिक रूप से झटका लग रहा है क्योंकि जिस तरीके से ईरान अपने ड्रोन हमले कर रहा है वह बेहद सस्ता है। लेकिन इसे रोकने के लिए अमेरिका की डिफेंस सिस्टम जो लगाई गई है वह बेहद खर्चीली है। यानी कि उसकी लागत बहुत ज्यादा है। यानी एक दिन में अरबों का नुकसान अमेरिका को झेलना पड़ रहा है। व ईरान को झुकाने में नाकामी। डोनाल्ड ट्रंप को लगा था कि अली खामने की मौत के बाद ईरान मातम मनाएगा और पलटवार नहीं करेगा। लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। ईरान अकेला मिडिल ईस्ट में आठ देशों से एक साथ लड़ रहा है। अमेरिकी सैन्य बेस ठिकानों को चुन-चकर निशाना बना रहा है और डंकी की चोट पर कह रहा है कि तुमने शुरू की खत्म कब करना है हम तय करेंगे।

यानी कि यह युद्ध अब ट्रंप के लिए नो विन सिचुएशन बनता जा रहा है। ना जीत आसान ना पीछे हटना। अगर हालात ऐसे ही रहे तो इसका असर सिर्फ तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि अमेरिका की वैश्विक साख नाटो की एकता और खुद डोनाल्ड चंप के राजनीतिक भविष्य पर भी इसका गहरा असर पड़ने के आसार हैं।

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