सत्ता बचाने के लिए आखिरी लड़ाई कर रहे हैं नेतन्याहू? बड़ा खुलासा

मिडिल ईस्ट में गिरते , आसमान में उड़ती और हर दिन बढ़ती की गिनती। क्या सिर्फ यह एक l है या एक ऐसी राजनीति जो पूरे क्षेत्र को लगातार में धकेल रही है। इजराइल के प्रधानमंत्री बनयामिन नेतनया पर अब उनके ही देश में आरोप लगने लगे हैं कि वह सुरक्षा नहीं बल्कि अपनी सत्ता बचाने के लिए की राजनीति कर रहे हैं। लेकिन सवाल है कि क्या सच में नितन्याहू की राजनीति पर टिकी हुई है और अगर ऐसा है तो इसकी शुरुआत कहां से हुई?

948 में इजराइल के निर्माण के लगभग एक साल बाद 21 अक्टूबर 1949 को तेलवी में एक इतिहासकार बन नेतन्या के घर बन्यामिन नेतन्याहू का जन्म हुआ। यह वो दौर था जो यहूदियों के लिए बेहद कठिन था। सेकंड वर्ल्ड वॉर के दौरान दुनिया भर में खासकर यूरोप में यहूदियों पर भयानक अत्याचार हुए थे। जिसके बाद उनके लिए एक अलग देश इजराइल का गठन हुआ। जाहिर है नेतन्या के बचपन की यादों में संघर्ष की तस्वीरें भी जमा होंगी।

हालांकि वह जल्द ही इजराइल से अमेरिका चले गए जहां उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। इसके बाद नेतन्या इजरायली सेना के विशेष दस्ते सैयरत मतकल में शामिल हो गए। इजराइल की तरफ से कई सैन्य अभियानों में भाग लिया। नेतन्या अपने जीवन में आगे बढ़ते रहे और साथ-साथ फिलिस्तीन और इजराइल का संघर्ष भी बढ़ता गया।

तभी 1976 में नितनया के बड़े भाई जोनाथन ने नित नेतन्याहू एक विश्व प्रसिद्ध सैन्य अभियान इंटे के दौरान मारे गए। देश के लिए शहीद हुए जोनाथन एक राष्ट्रीय हीरो बन चुके थे। उसी के आसपास नेतन्या ने सेना की नौकरी छोड़ दी और राजनीति में दिलचस्पी लेने लगे। वो 1984 में यूनाइटेड नेशंस में इजराइल के राजदूत बने।

जहां उनके बोलने की शैली को काफी पसंद किया गया। एक वक्ता के रूप में वह इजराइल में बेहद प्रसिद्ध हो गए। 1988 तक यूएन में रहने के बाद अब नेतन्या की नजर देश की राजनीति पर थी। 1990 के दशक में नेतन्या पूरी तरह से राजनीति में उतर गए। भाई की शहादत और चरम राष्ट्रवाद से लिपटी उनके भाषण उन्हें लोकप्रिय बनाने लगे। लेकिन 90 के दशक में इजराइल की राजनीति एक नई करवट ले रही थी।

साल था 1993 और तारीख थी 13 सितंबर की। पूरी दुनिया की नजर अमेरिका के वाइट हाउस के लॉन में टिकी हुई थी। जहां तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन, इजराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री जियाक रॉबिन और फिलिस्तीन के प्रमुख नेता यासर अराफात बैठकर ऐतिहासिक ओस्लो शांति समझौते पर हस्ताक्षर कर रहे थे। ओस्लो समझौते के तहत जो प्रमुख चीजें सामने आई वो यह थी। इजराइल और पीएलओ ने एक दूसरे को आधिकारिक रूप से स्वीकार कर लिया था।

फिलिस्तीनियों को सीमित गवर्नमेंट देने का निर्णय हुआ था और फिलिस्तीनी अथॉरिटी भी बना दी गई थी। योजना थी कि आने वाले कुछ वर्षों में एक स्वतंत्र फिलिस्तीनी राज्य बनने की दिशा में आगे बढ़ा जाएगा। दुनिया को लगा कि लंबे समय से चला आ रहा इजराइल और फिलिस्तीन का मुद्दा अब खत्म हो जाएगा। इजियाक रॉबिन यासर अराफात और शिमोन पेरिस को 1994 में शांति का नोबेल पुरस्कार भी मिला। लेकिन इसके उलट इजराइल और फिलिस्तीनी में कई लोग ऐसे थे जो इस शांति समझौते के खिलाफ थे। जिनमें एक थे बेंजामिन ने नतन्या।

उन्हें समझौते की कई शर्तों पर आपत्ति थी। हालांकि जियाक रॉबिन समझौते को अमली जामा पहनाने के लिए अटल थे। हालांकि इसी बीच 4 नवंबर 1995 को एक शांति रैली के बाद एक कट्टरपंथी यहूदी ईगल अमीेर ने मारकर रॉबिन की कर दी। इसी के साथ इजराइल की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई। 1996 के आम चुनाव आ चुके थे। रॉबिन की हत्या के बाद रॉबिन के डिप्टी प्राइम मिनिस्टर सिमोन पेरिस को चुनौती देने नतन याहू आए। हल्की मार्जिन के साथ नेतन्या चुनाव जीत चुके थे और नए प्रधानमंत्री बने। मार्जिन छोटी थी लेकिन नेतन्या की राजनीति में एंट्री हो चुकी थी।

गजा, लेबनान और ईरान के खिलाफ उनका कड़ा रुख बरकरार था। अब आते हैं 2023 में। नेतन्या इजराइल के प्रधानमंत्री थे। एक साल पहले ही चुनावों में उन्होंने गठबंधन की सरकार बनाई थी। हालांकि इस दौरान उनकी लोकप्रियता थोड़ी कम हो गई थी। भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे थे और न्यायपालिका में सुधार की नीति के विरोध में प्रदर्शन भी हो रहे थे। तभी 7 अक्टूबर 2023 को हमास का एक हमला होता है।

इस हमले के बाद नेतयाहू गजा पर हमला कर देते हैं। यह लड़ाई लेबनान और 12 दिन के लिए ईरान से भी हुई। माना जाता है कि आज के ईरान युद्ध की पृष्ठभूमि उसी समय बन गई थी। 2023 से लेकर 2026 तक इजराइल जंग में लगातार उलझा हुआ है। गजा से लेकर ईरान तक बेहिसब मौतें हो चुकी हैं। हाल ही में नित नेतन याहू ने कहा था कि वह ईरान पर 40 साल से हमला करना चाह रहे थे। अब सवाल यह भी है कि बगैर अमेरिका के सहयोग से यह हमला संभव नहीं था।

तो क्या ट्रंप ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति हैं जिन्हें नेतन याहू ने युद्ध के लिए मना लिया? क्योंकि हाल ही में एक पत्रकार ने जब वाइट हाउस की प्रेस सेक्रेटरी कैरोलिन लेविट से पूछा कि क्या कोई सबूत है कि ईरान अमेरिका पर हमला करने वाला था तो लेविट ने जवाब दिया राष्ट्रपति को ऐसा एहसास हुआ था। ही बिकॉज़ ही वास गोइंग टू स्ट्राइक यूनाइटेड स्टेट्स इनसेट्स इन द रीजन अगेन आई एडजस्ट दिस इन द लास्ट ब्रीफिंग दिस वाज़ अ फीलिंग द प्रेसिडेंट हैड बेस्ड ऑन फैक्ट सिर्फ एक एहसास के चलते क्या ट्रंप ने ईरान पर हमला किया यह भी थोड़ा संदेहास्पद लगता है।

इजराइल के एक सांसद अमान उदेह ने भी आरोप लगाया है कि नेतनिन याहू सरकार की नीति ऐसी कि हमेशा किसी ना किसी देश को दुश्मन दिखाया जाता है। कभी हमास कभी लेबनान और कभी ईरान। इसके बाद भविष्य में किसी और देश को दुश्मन बताया जा सकता है। उदय का मानना है कि डर की राजनीति का उपयोग नहीं होना चाहिए। इसी के साथ सवाल उठने लगे हैं कि क्या

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