नरवणे ने खुद बता दी किताब की हकीकत ?

सच कौन बोल रहा है? किताब लिखने वाला, छापने वाला या उसे लहराने वाला? जनरल नरवाड़े ने किताब लिख दी। प्री बुकिंग का लिंक भी आ गया था। अब आ रहे हैं भांति-भांति के दावों के साथ स्क्रीनशॉट्स। पुरानी जानकारियों के अब कैसे-कैसे मतलब निकाले जा रहे हैं।

दिल्ली पुलिस के एक्शन की तैयारी में है। पेंग्विन यानी कि जो पब्लिशर हैं वो बता रहे हैं कि किताब छपने के चार चरण कौन से हैं और एक्सपर्ट बता रहे हैं कि रक्षा मंत्रालय के किताबों के इंटेंस रिव्यू की प्रक्रिया क्या है। इस सबके बीच चल रही हैं चार थ्यरीज़ जो किताब को राहुल गांधी के पास पहुंचा रही हैं। विस्तार से सारी बारीकियां समझेंगे। लोकसभा स्पीकर के खिलाफ लाए अविश्वास प्रस्ताव के नोटिस की बात भी करेंगे।

Ji कौन सा साइन कम मिला और कौन सा साल गलत जिक्र बंगाल बाबरी विवाद का भी करेंगे। नमस्ते अपन है कुलदीप और आप देखना शुरू कर चुके हैं द लेलन टॉप शो ब्रॉट टू यू बाय आईl सेंस डीएसपी एंड गोल्डी मसाले। पूर्व आर्मी चीफ जनरल मनोज मुकुंद नरवण की अप्रकाशित किताब फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी पर विवाद गहराता जा रहा है। साथ ही मिस्ट्री भी किताब छपी भी थी या नहीं? क्या डिफेंस मिनिस्ट्री से छापने की मंजूरी मिली थी या नहीं? क्या पब्लिशर पेंग्विन रैंडम हाउस से कोई गलती हुई या फिर मंजूरी देने के बाद सरकार ने पलटी मारी।

सवाल इसलिए भी गहरा रहे हैं क्योंकि आज यानी 10 फरवरी को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जनरल और पब्लिशर को आमने-सामने खड़ा कर दिया। पहले सवाल पूछा कि सच कौन बोल रहा है? फिर जवाब भी दिया कि मैं तो जनरल पर ही भरोसा करूंगा। हियर इज अ ट्वीट फ्रॉम मिस्टर नरवाने। ये देख लीजिए प्लीज। कैन यू रीड सर प्लीज। मनोज नरवाने जी। इट्स अ ट्वीट दैट सेस हेलो फ्रेंड्स माय बुक इज अवेलेबल नाउ जस्ट फॉलो द लिंक हैप्पी रीडिंग जय हिंद | दिस इज अ ट्वीट दैट मिस्टर नारायण नरवाने हैज़ मेड यू कैन लुक इंटू द ट्वीट | सो द पॉइंट आई एम मेकिंग इज आइदर मिस्टर नरवाने इज़ लाइंग | एंड आई बिलीव द आर्मी चीफ ओके आई डोंट थिंक ही विल लाई ऑर पेंग्विन इज़ लाइंग समबडी नीड़ टू बोथ कैन नॉट बी टेलिंग द ट्रुथ।

आप जानते ही हैं कि अभी तक के बजट सेशन में जनरल की किताब का मुद्दा लोकसभा में छाया रहा है। नौबत यहां तक आ गई कि विपक्ष की ओर से स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया जा चुका है। यह आरोप लगाते हुए कि स्पीकर पक्षपात कर रहे हैं। राहुल गांधी को बोलने नहीं दे रहे। राहुल गांधी इस अप्रकाशित किताब की हार्ड बाउंड कॉपी संसद परिसर में लहरा चुके हैं। इसी अप्रकाशित किताब के पीडीएफ सोशल मीडिया और WhatsApp ग्रुप्स में तैर रहे हैं। हम आपको बता ही चुके हैं कि कैसे राहुल गांधी ने लोकसभा में इस अप्रकाशित किताब के कुछ अंश पढ़ने की कोशिश की थी। लेकिन नियमों का हवाला देकर के उन्हें ऐसा नहीं करने दिया गया। संसद के बाहर उन्होंने आरोप लगाए कि जनरल ने ऐसी बातें लिखी हैं जो मौजूदा सरकार को फैसले लेने में कमजोर साबित करती हैं।

मसलन 2020 के गलवान संघर्ष के दौरान जब चीनी टैंक भारतीय पोजीशंस की ओर बढ़ते चले आ रहे थे तब जनरल नरवाड़े ने पॉलिटिकल लीडरशिप से आदेश मांगे। काफी देर बाद रक्षा मंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री ने जो उचित समझो वह करने की के लिए कहा है। यही आरोप विपक्ष सदन के अंदर और बाहर लगातार दोहरा रहा है। राहुल गांधी समेत विपक्ष का आरोप है कि इस मुद्दे पर मोदी सरकार पीछे हट गई।

चीन को कैसे जवाब देना है? इतनी बड़ी जिम्मेदारी जनरल के कंधों पर डाल दी गई। जिसके बारे में जनरल ने खुद लिखा, आई वाज़ हैंडेड अ हॉट पोटैटो। मेरे हाथ में एक गर्म आलू दे दिया गया था। एक अंग्रेजी का मुहावरा है। यानी एक मुश्किल परिस्थिति में मुझे डाल दिया गया था। कल यानी 9 फरवरी को इस मामले में कुछ बड़े अपडेट्स आए। शाम को दिल्ली पुलिस की ओर से बयान आया। लिखा गया कि हमने एफआईआर दर्ज कर ली है। जांच की जा रही है कि अनप्लिश्ड किताब की सॉफ्ट कॉपीज कैसे लीक हुई और कैसे सोशल मीडिया पर यह तैर रही हैं। इसके तुरंत बाद पब्लिशर का पोस्ट आया। लिखा कि हम साफ बताना चाहते हैं कि किताब पब्लिकेशन के लिए गई ही नहीं। ना तो प्रिंट और ना ही डिजिटल। किसी भी फॉर्म में कुछ भी पब्लिश नहीं किया गया है। ना ही डिस्ट्रीब्यूट किया गया है और ना ही बेचा गया है। अवैध तरीके से किए जा रहे डिस्ट्रीब्यूशन पर हम कानूनी एक्शन लेंगे। पेंग्विन के इस पोस्ट के बाद सत्ता पक्ष ने राहुल गांधी को निशाने पर ले लिया। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे का पोस्ट आया। लिखा किताब छापने वाले ने कह दिया है कि उसने अब तक कोई किताब छापी ही नहीं। राहुल गांधी जी आपकी मक्कारी सामने आ गई है। इसी संदर्भ में जब राहुल गांधी से मीडिया ने सवाल पूछे तब उनका वह जवाब आया जो हम आपको सुना चुके हैं। यहां एक चीज और हुई राहुल गांधी ने एक पुराना ट्वीट मीडिया को दिखाया 15 दिसंबर 2023 का ट्वीट जो जनरल नरवाड़े ने किया है और लिखा है कि हेलो फ्रेंड्स मेरी किताब अब उपलब्ध है। लिंक फॉलो कीजिए। जय हिंद। दरअसल इस ट्वीट में जनरल ने पेंग्विन के ही ट्वीट को कोट किया है। पेंग्विन के इस ट्वीट में किताब के प्रीआर्डर की डिटेल्स दी गई हैं। मानो किताब छपने ही वाली है। पाठक उसे पहले से ही ऑर्डर कर सकते हैं। यानी इस पुराने ट्वीट ने मामला और उलझा दिया। एक तरफ पब्लिशर ताजा बयान में कह रहा है कि किताब कभी प्रकाशित नहीं हुई। ना प्रिंट में ना डिजिटल लेकिन पुराने ट्वीट में प्रीआर्डर की बातें हैं।

इस पर कंफ्यूजन बढ़ा। प्रीआर्डर अनपब्लिश्ड किताबों का भी हो सकता है। कंफ्यूजन बढ़ा इस पर तो 10 फरवरी को पेंग्विन की ओर से एक नया बयान आया जिसमें बुक पब्लिशिंग की चार स्टेज के बारे में विस्तार से बताया गया। मसलन किताब की घोषणा जब अनाउंसमेंट होता है प्रकाशक की ओर से बताया गया कि एक किताब आने वाली है। किताब की प्रीआर्डरिंग ये किताब प्रकाशित करने की एक जानी मानी प्रैक्टिस है। इसका मतलब यह नहीं है कि किताब पब्लिश हो चुकी है। किताब की शेड्यूलिंग। शेड्यूलिंग का मतलब यह है कि एक किताब को प्रकाशित करने की तैयारी की जा रही है और प्रकाशित किताब पब्लिश्ड बुक एक किताब केवल तभी प्रकाशित मानी जाती है जब यह खरीद के लिए उपलब्ध हो। हालांकि इस सफाई के बाद भी सबसे बड़ा सवाल बचा हुआ है कि इस अप्रकाशित किताब की हार्ड बाउंड कॉपी राहुल गांधी के पास कैसे पहुंची? जो अब तक सोशल मीडिया पर WhatsApp पर तैर रही थी वो पांडुलिपि थी। इंडिया टुडे की रिपोर्ट बताती है कि जब पब्लिशर की तरफ से प्रीआर्डर का ऐलान किया गया तब कई बुक स्टोर्स पर इसकी हार्ड कॉपी पहुंचाई जा चुकी थी। लेकिन रक्षा मंत्रालय की ओर से मंजूरी रोक लेने के बाद पेज फंस गया। इन किताबों को बुक स्टोर से वापस लाना पड़ा। इस संदर्भ में 18 दिसंबर 2023 की तारीख अहम हो जाती है जब न्यूज़ एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया ने अप्रकाशित किताब के कुछ अंश कुछ हिस्से छापे थे। इनमें जो उचित समझो वो करो वाला अंश तो था ही साथ ही अग्निवीर स्कीम को लेकर के भी कुछ बातें कही गई थी। ये पीटीआई ने लिखा था जो सरकारी समाचार एजेंसी है वो लिखती है कि जनरल नरण के मुताबिक आर्मी की तरफ से प्रस्ताव दिया गया था कि अग्निवीर के तहत भर्ती होने वाले 75% युवाओं को परमानेंट किया जाए। जबकि सरकार ने सिर्फ 25% का ही प्रावधान किया। बाद में इसको बढ़ा दिया गया। सेना और सरकार के बीच अग्निवीरों की सैलरी पर भी बात फंसी। सरकार ₹00 प्रति महीना पर अड़ी थी जिसे आर्मी ने ₹00 प्रति महीना करवाया। नया सेंसडेंट डीएसपी नर्स को प्रोटेक्ट करें और इनामल को रिपेयर। फील द रिलीफ विद सेंसडेंट डीएसपी। एक और बात कि केंद्र सरकार ने अग्निवीर स्कीम को इस तरह पेश किया कि जैसे मूल सुझाव सेना की ओर से आया। जबकि जनरल नरवण के मुताबिक जो पीटीआई में एक्सप्स उसके हिस्से छपे थे उसके मुताबिक यह पूरी तरह से पॉलिटिकल लीडरशिप का फैसला था। चौंकाने वाली बात यह और थी कि अग्निवीर स्कीम में आर्मी के साथ बाकी दोनों सेनाओं को भी शामिल कर लिया गया। 18 दिसंबर 2023 को यह अंश किसी विस्फोट की तरह सामने आए। जिस तरह से मोदी सरकार अभी इस मुद्दे पर घेरी जा रही है। ठीक उसी तरह उस दौर में भी घेरी गई। अलग-अलग मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि इस दौरान किताब के जनवरी 2024 में प्रकाशित होने की बात कही जा रही थी। हालांकि जनवरी में जानकारी आई कि रक्षा मंत्रालय ने उसका इंटेंस रिव्यू शुरू कर दिया है। आगे बढ़ने से पहले इस रिव्यु प्रक्रिया और नियमों के बारे में भी जान लेते हैं। 1954 के आर्मी रूल्स कहते हैं कि सेना में कार्यरत लोग अपनी सर्विस से जुड़ी किसी भी जानकारी को किसी भी तरीके से ना तो प्रकाशित कर कर सकते हैं और ना ही किसी और को जानकारी दे सकते हैं। लेकिन क्या यह नियम किसी रिटायर्ड अधिकारी या जवान पर लागू होते हैं? नहीं।

हालांकि रिटायर्ड अधिकारियों और जवानों पर 1923 का ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट लागू जरूर रहता है। इसके तहत वह ऐसी कोई भी जानकारी नहीं दे सकते जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा देश की संप्रभुता पर खतरा आए या किसी दोस्ताना मुल्क से संबंध बिगड़े। वहीं किसी इंटेलिजेंस या सिक्योरिटी एजेंसी में काम कर चुके लोगों पर सेंट्रल सिविल सर्विस पेंशन रूल्स 2021 लागू होते हैं। जिसके तहत अगर किसी रिटायर्ड कर्मचारी को संस्था से जुड़े किसी भी पहलू पर कुछ भी प्रकाशित करना है तो जरूरी मंजूरी लेनी होगी। ऐसा नहीं किया जाता तो फिर पेंशन रोकी जा सकती है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट कहती है कि आर्मी, नेवी और एयरफोर्स के रेगुलर अधिकारी इस कैटेगरी में नहीं आते। इसलिए रिटायरमेंट के बाद उन्हें ऐसी किसी मंजूरी की जरूरत नहीं होती। लेकिन रिटायर्ड अधिकारी और पब्लिशर खुद से पांडुलिपियां रक्षा मंत्रालय को भेजते हैं। इसके बारे में लेफ्टिनेंट जनरल केजे एस ढिल्लो जो रिटायर्ड हैं। उन्होंने इंडिया टुडे टीवी को विस्तार से बताया था। मसलन अगर आप सेना के संचालन से जुड़ी जानकारियों पर कुछ लिख रहे हैं तो पांडुलिपि रक्षा मंत्रालय के पास भेजनी ही पड़ती है। जिसके बाद तीन स्तर की स्क्रूटनी होती है। स्क्रूटनी के बाद या तो सीधी मंजूरी मिल जाती है या फिर संवेदनशील जानकारियों को हटाने को कहा जा सकता है या फिर मंजूरी नहीं भी दी जा सकती है। हालांकि जनरल नरमणि के मामले में साफ नहीं है कि करीब 2 साल से चल रही स्क्रूटनी का रिजल्ट क्या रहा। इस बीच उनकी एक ताजा प्रतिक्रिया आई है। उन्होंने पेंग्विन के 9 फरवरी के पोस्ट को ताजा पोस्ट को रीपोस्ट करते हुए लिखा कि अभी मेरी किताब का यही स्टेटस है। यानी यह अभी अप्रकाशित ही है। अब सबसे बड़े सवालों पर आते हैं कि कंफ्यूजन की स्थिति बनी कैसे? क्या बिना मंजूरी के कुछ किताबों की कुछ प्रतियां छप गई? नहीं छपी तो राहुल गांधी के पास हार्ड कॉपी कैसे पहुंची? इसमें कुल चार बड़ी थ्योरीज चल रही हैं। सत्य क्या है किसी को नहीं मालूम। चार थ्योरीज मेजरली चल रही हैं। पहली प्रकाशक ने मान लिया होगा कि मंजूरी तो मिल ही जाएगी। इस अप्रकाशित किताब का फॉरवर्ड पूर्व सेना प्रमुख जनरल वी के सिंह ने लिखा है जो बीजेपी सांसद भी थे। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने किताब के लिए ब्लर लिखा है और जिस तरह से खुद जनरल नरवण ने प्रीआर्डर वाला पोस्ट शेयर किया उससे पब्लिशर को किताब के लिए मंजूरी मिल जाने का कॉन्फिडेंस रहा होगा। दूसरी, शायद रक्षा मंत्रालय की ओर से शुरुआती मंजूरी मिली भी हो, लेकिन कुछ अंश छपने के बाद इंटेंस रिव्यू का फैसला लिया गया हो। हालांकि इस कथित मंजूरी का कोई भी लिखित रिकॉर्ड मौजूद नहीं है और अभी तक किसी ने कहा भी नहीं है कि मंजूरी मिल गई थी। और अब अपने ताजा बयानों में पब्लिशर और जनरल दोनों ने ही मंजूरी ना मिलने की बात भी साफ कर दी है। तीसरी थ्योरी अप्रकाशित किताब की डिजिटल कॉपी कहीं से लीक हुई जिसके बाद यह फैलती चली गई। चौथी जैसा कि इंडिया टुडे की रिपोर्ट भी बताती है कि कुछ किताबें बुक स्टोर्स पहुंच चुकी थी। हो सकता है कि इनमें से कुछ वापस ना आ पाई हो और उनमें से ही कोई प्रति राहुल गांधी के पास पहुंच गई हो।

कुल जमात तस्वीर यही है कि यह विवाद अब सिर्फ एक किताब का नहीं रह गया है। नेशनल सिक्योरिटी, फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन और मिलिट्री मेमोयर्स के राजनीतिक इस्तेमाल, डिबेट इन्हीं तीन पहलुओं पर केंद्रित होती जा रही है। सच और झूठ का हिसाब शायद आने वाला वक्त करे या फिर हो सकता है कि ना भी करे। जो जैसा चल रहा है चलता रहे। जो भी अपडेट्स होंगे आप तक पहुंचाएंगे। अब सुर्खियों की बारी। गोल्डी छोले मसाले जहां जाए रिश्ते बनाए। होल्डिंग लाए हैं फ्रेश लॉक टेक्नोलॉजी जो रखे मसालों को हर समय फ्रेश। और अब खबर संसद से लोकसभा स्पीकर ओम बिरला को उनके पद से हटाने की विपक्ष कोशिश कर रहा है। इसी क्रम में विपक्ष ने ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया। टाइपो युक्त नोटिस जहां 2026 लिखना था वहां 2025 लिखा था। वह साल दूसरा था। यह साल दूसरा है।

राजनीति में भी उतरा। गलती हो गई तो नोटिस दोबारा सबमिट किया गया। लेकिन यहां भी विपक्ष एकजुट नहीं दिखा। नोटिस पर 118 सांसदों के हस्ताक्षर हैं। कांग्रेस के अलावा सपा और डीएमके के सांसदों के साइन है। लेकिन टीएमसी ने इससे खुद को अलग कर लिया। टीएमसी सांसदों ने साइन करने में संकोच दिखाया। सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि टीएमसी स्पीकर को थोड़ा और समय देने के पक्ष में है। एक साइन और नहीं था राहुल गांधी का जबकि सारी बहस और हंगामे के केंद्र में वही थे। सूत्रों के हवाले से बताया गया कि विपक्ष के नेता के लिए नोटिस पर साइन करना सही नहीं होगा। तर्क दिया गया कि यह फैसला संसदीय परंपराओं के सम्मान को ध्यान में रखते हुए लिया गया।

नोटिस को लोकसभा के सेक्रेटरी जनरल उत्पल कुमार सिंह को सौंप दिया गया। नोटिस की जांच की जाएगी और नियमों के अनुसार कारवाही को फिर आगे बढ़ाया जाएगा। नोटिस में जो भी मुद्दे उठाए गए हैं, विपक्ष के जो आरोप हैं, उनका लबोलुआ समझ लेते हैं। 2 फरवरी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी को अपना भाषण पूरा नहीं करने दिया गया। नोटिस में कहा गया कि यह अकेला मामला नहीं है। लोकसभा में विपक्ष के नेता को लगभग हमेशा बोलने नहीं दिया जाता। आठ विपक्षी सांसदों को पूरे बजट सत्र के लिए मनमाने तरीके से सस्पेंड कर दिया गया। नोटिस में लिखा गया कि सांसदों केवल लोकतांत्रिक अधिकार इस्तेमाल करने की सजा उनको दी जा रही है। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे को दो पूर्व प्रधानमंत्रींत्रियों, जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी पर आपत्तिजनक और व्यक्तिगत हमले करने की इजाजत दी गई। उन्हें एक बार भी रोका नहीं गया। सांसद के खिलाफ कोई कारवाई नहीं हुई जो बार-बार ऐसा करते हैं। कुछ कमेंट हटाए गए लेकिन पूरी तरह से रिकॉर्ड से नहीं निकाला गया। स्पीकर ओम बिरला ने कांग्रेस सांसदों पर झूठे आरोप लगाए जो अपमानजनक है। स्पीकर को सदन के कामकाज के नियमों का संरक्षक होना चाहिए। लेकिन उन्होंने खुद ऐसी बातें कही जो इस संवैधानिक पद के दुरुपयोग जैसी हैं। नोटिस को लेकर पक्ष विपक्ष की ओर से प्रतिक्रियाएं भी आई हैं। विपक्ष का कहना है कि स्पीकर का व्यवहार लोकतंत्र की परंपरा के तहत नहीं था। जबकि सत्ता पक्ष का कहना है कि विपक्ष शांतिपूर्ण तरीके से संसद चलने नहीं देना चाहता। इसलिए यह सब किया जा रहा है। खबर यह भी है कि अविश्वास प्रस्ताव पर फैसला होने तक ओम बिरला ने सदन ना जाने का फैसला किया है। बजट सत्र के हालिया सेशन का आखिरी सत्र 13 फरवरी को होना है। इसके बाद संसद की कार्यवाही 8 मार्च से शुरू होगी। अविश्वास प्रस्ताव पर 9 मार्च को चर्चा हो सकती है। अगली खबर बाबरी मस्जिद एक बार फिर से खबरों में है। पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद में विधायक हुमायूं कबीर ने बाबरी मस्जिद बनाने की घोषणा की थी। उसकी दोबारा एक रेप्लिका बनाने की। खबर तब भी बनी थी।

फिर आया था उन्हें टीएमसी से निकाले जाने का आदेश। लेकिन हुमायूं कबीर रुकने का नाम नहीं ले रहे। 11 फरवरी दोपहर 12:00 बजे पहली ईंट रखवाने की तैयारी में हैं। विरोध में उत्तर प्रदेश के लखनऊ में पोस्टर लग गए। लिखा था हुमायूं हम आएंगे बाबरी वहीं गिराएंगे। साथ ही उत्तर प्रदेश के कई जिलों से विश्व हिंदू परिषद के कई कार्यकर्ता मुर्शिदाबाद के लिए निकले।

लखनऊ से चले इन कार्यकर्ताओं को पुलिस ने रोक लिया। इससे नाराज कार्यकर्ताओं ने हाथ में भगवा झंडा, कुल्हाड़ी और फावड़ा लेकर करीब 2 घंटे तक प्रदर्शन किया। इस सब के बीच यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का भी बयान आया। बाराबंकी की एक सभा में बोले कयामत के दिन तक बाबरी ढांचे का दोबारा निर्माण नहीं होगा। कयामत का दिन तो कभी आना ही नहीं है और इसलिए बाबरी ढांचे का पुनर्निर्माण कभी होना ही नहीं है।

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