मां की कोख और फिल्म का सेट… 39 बार इस अभिनेत्री की जान ली गई।

भारतीय हिंदी सिनेमा के गुजरे सुनहरे दौर की एक ऐसी अभिनेत्री की जो अपनी नायाब खूबसूरती और दिलकश आवाज के दम पर हिंदी सिनेमा के इतिहास में हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गई। अजीब दास्ता है ये कहां शुरू हिंदी सिनेमा के इतिहास की वो यादगार अमर अदाकारा जिसके लिए बना हिंदी सिनेमा का सर्वश्रेष्ठ अवार्ड इन्हीं लोगों ने इन्हीं लोगों ने ले ला एक ऐसी महान अभिनेत्री जिसने हिंदी सिनेमा में अपने अभिनय और खूबसूरती के दम पर फिल्म निर्माता और अभिनेताओं के बीच लगाई वो आग की ज्वाला कि बड़े-बड़े अभिनेता और फिल्म निर्माता लड़ने लगे थे इनको अपनी-अपनी फिल्मों में लेने को लेकर। दोस्तों जिस अभिनेत्री की एक झलक पाने के लिए लोग लगाते थे पिक्चर हॉल और उनके घर के आगे एक लंबी लाइन उस अभिनेत्री के साथ ऐसा क्या हुआ था कि बचपन में ही इनके सगे पिता ने किया इनके ऊपर वो जुल्म कि इनको मारने के इरादे से छोड़ आए आए थे.

अनाथ आश्रम की सीढ़ियों पर और कैसे उसी अनाथ आश्रम में इस नवजात बच्ची को खा गई सैकड़ों चींटियां। दोस्तों और क्या आप यह जानते हैं कि इस अभिनेत्री के पिता ने इनका पूरा बचपन और जवानी अपने पैरों तले रौंदते हुए इनको बना दिया था अपने लालच और पैसे कमाने की दर्द भरी मशीन। इससे तो अच्छा होता कि तू मुझे दहर देके मार डाल। बाबा बाबा मर गया क्या बाबा। और कैसे बचपन और नाबालिक उम्र में मिले अपनों के दुख और धोखों ने बना दिया इस अदाकारा को हिंदी सिनेमा की आज तक की सबसे बड़ी लाचार ट्रेजडी क्वीन। अगर आपको अभी विश्वास नहीं आता तो लीजिए। मैं अपने साथ की इस अभिनेत्री को सबकी निगाहों से छुपकर घर से चोरी छिपे भागकर करना पड़ा था निकाह। मैं हवन कुंड की आग में पुराने सारे रिश्ते नाते जलाकर आ गई हूं। अब अब आप ही मेरे भगवान हैं। और कैसे आगे चलकर इसे निकाह में इस अभिनेत्री को झेलना पड़ा , और तलाक का वो बेरहम सच और दर्द जिसकी वजह से यह अदाकारा डूब गई।

बेबसी लाचारी की उस दुनिया में जहां से आज तक लौट कर नहीं आ पाई है यह बदनसीब बेऔलाद मां। दोस्तों हिंदुस्तान के हिंदी सिनेमा में अभिनय की नई किताब और इतिहास बनाने वाली इस खूबसूरत अभिनेत्री का क्यों होता रहा कई सालों तक शारीरिक शोषण और इसी शोषण के दर्द को भुलाने के लिए यह अभिनेत्री लेने लगी नींद की गोलियां और पीने लगी बेहिसब शराब और कैसे आगे चलकर कर यही शराब बन गई इस अदाकारा की जिंदगी का कड़वा सच। इधर लाओ गिलास पंगी पंगी। दोस्तों और क्या आप यह भी जानते हैं कि इस अभिनेत्री के अभिनय का पूरी दुनिया में वो जलवा था कि इस अभिनेत्री को असल जिंदगी में उठाकर ले गए थे और कैसे उसे खूंखार प्रेमी डाकू के हाथ पर लिख दिया गया था इस अभिनेत्री ने उसी के चाकू से गोद अपना नाम। तुम्हें मेरी जान की कसम है परवेज अपना फैसला बदल दूं। जिंदगी भर पिता और पति के लिए दुख दर्द झेलने वाली इस अभिनेत्री की कैसे एक फिल्म के सेट पर लिखी असल जिंदगी की मौत की कहानी और क्यों मरने के बाद सिनेमाघरों में चलाई गई थी इस अभिनेत्री की फिल्म जब मैं मर जाऊं तो खूब सजाना मुझे सुना खूब सजाना और मांग मांग मांग सिंदूर से भर देना रे। बताएंगे आपको और भी बहुत कुछ इस बेऔलाद और बदकिस्मत अभिनेत्री की दर्दनाक जिंदगी के बारे में वो सच जिसे सुनकर आप सभी की आंखें हो जाएंगी नम। तो पूरा सच जानने के लिए आप बने रहिए हमारे साथ इस वीडियो के अंत तक। आज तक भगवान के सहारे ही तो जीती रही हूं। इंसानों ने तो सदा ठुकराया ही।

बचपन से लेकर मरते दम तक दुख, दर्द की किताब बनी इस अदाकारा को, जहां पूरी दुनिया ने कहा, “ट्रैजेडी क्वीन।” तो किसी ने इनको जाना मीना मंजू या फिर शायराना नाज़ के नाम से। लेकिन जिंदगी और इतिहास के पन्नों में यह जानी गई हिंदी सिनेमा की नायाब खूबसूरत मीना कुमारी के नाम से। चलते चलते यूं ही कोई मिल गया था। यूं ही कौन थी मीना कुमारी? कहां से यह आई थी? क्या थे इनकी जिंदगी के राज और कड़वे सच यह सब मैं आपको बताऊंगी लेकिन उससे पहले जान लेते हैं मीना कुमारी के शुरुआती जीवन परिवार और पढ़ाई लिखाई के बारे में मीना कुमारी का जन्म 1 अगस्त साल 1933 को मुंबई में हुआ था। इनका असली नाम था महजबीन बानो। इनके पिता का नाम था अली बख्श। तो इनकी मां का नाम इकबाल बानो। मीना कुमारी की दो बहनें भी थी। एक बहन इनसे बड़ी थी जिसका नाम था खुर्शीद और दूसरी इनसे छोटी थी जिनका नाम था मधु। इनके पिता अली बख्श पाकिस्तान के एक छोटे से गांव बहेड़ा के रहने वाले थे। बचपन से ही संगीत का शौक था अली बख्श को। बड़े होते-होते हारमोनियम बजाने के साथ-साथ गांव के गीतों को भी वो कंपोज करने लगे और इस वजह से आसपास के लोग अली बख्श को मास्टर जी कहकर बुलाने लगे। अली बख्श का निकाह बेहद कम उम्र में ही हो गया था। अली बख्श अपने संगीत के सफर को आगे बढ़ाना चाहते थे। लेकिन गांव में रहकर यह सब भला कहां मुमकिन था।

इसीलिए साल 1924 में अली बख्श अपनी पत्नी और तीनों बच्चों को छोड़कर दिल्ली आ गए। अली बख्श दिल्ली तो आ गए थे। लेकिन गुजर बसर के लिए ज्यादा पैसे नहीं थे। काफी कोशिश और मेहनत के बाद उनको थिएटर में नौकरी मिल गई और यह नौकरी थी हारमोनियम बजाने की। नौकरी मिलते ही अली बख्श का इरादा पक्का हो गया मुंबई में ही रहने का। उन्हीं दिनों उसी थिएटर कंपनी में अली बख्श की मुलाकात हुई कामिनी नाम की एक डांसर से। कामिनी का असली नाम था प्रभावती। प्रभावती और अली बख्श उसी वक्त एक दूसरे के प्रति आकर्षित हो रहे थे और फिर इन दोनों ने शादी कर ली। प्रभावती इस शादी के बाद बनी इकबाल बानो और इनके जो बच्ची हुई उनका नाम था मीना कुमारी। जब मीना कुमारी पैदा हुई थी तो उनके पिता अली बख्श इस बच्ची से बिल्कुल भी खुश नहीं थे। क्योंकि इससे पहले एक लड़की खुर्शीद नाम से पैदा हो चुकी थी।

वह दूसरे बच्चे के रूप में एक लड़का चाहते थे। लेकिन लड़की होने की वजह से बहुत बुरा लगा था अली बख्श को। उस वक्त अली बख्श की आर्थिक स्थिति भी बिल्कुल ठीक नहीं थी। डॉक्टर की फीस देने तक के पैसे नहीं थे अली बख्श के पास। गुस्से में अली बख्श ने अपनी नवजात बच्ची को अनाथ आश्रम की सीढ़ियों पर छोड़ दिया। बताया जाता है कि जिस वक्त अली बख्श अपनी नवजात बच्ची को इस तरह से मौत के मुंह में धकेल रहे थे उस वक्त बरसात बहुत जोरों पर थी। अली बख्श ने बच्ची को वहां रखा तो उस बच्ची के कोमल बदन से सैकड़ों चींटियां चिपट गई और जब उन चींटियों ने बच्ची के बदन को काटना शुरू किया तो वो बच्ची दर्द के साथ रोने लगी। बच्चे के रोने की आवाज अली बख्श के कानों में पहुंची तो वो उसे सहन नहीं कर पाए और वह अपनी गलती का एहसास करते हुए उस बच्ची को वापस गोद में उठाते हुए घर वापस ले आए। इसके बाद इस नन्ही सी बच्ची का नाम रखा गया बहजबी और घर में प्यार से बुलाया जाने लगा मुन्ना। अपने भैया की मैं हूं दुलारी। अपने भैया के महजबी से बड़ी उनकी बहन खुर्शीद अपने पिता अली बख्श के अच्छे ताल्लुकात की वजह से उन दिनों फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम करने लगी थी। तो वहीं अली बख्श को भी दो फिल्मों में संगीत देने का सुनहरा मौका मिला और इनकी पहली फिल्म थी ईद का चांद और दूसरी थी शाही लुटेरे। लेकिन यह सब कुछ घर चलाने के लिए पर्याप्त साबित नहीं हो रहा था।

इसीलिए अली बख्श ने बड़ी बेटी खुर्शीद की तरह महजिन को भी फिल्मों में काम कराने का मन बना लिया और वो नन्ही सी महजबीन को लेकर एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो चक्कर लगाने लगे। हां हां मैं इसे करके दिखाते जाऊंगा। ये मां क्यों वहां क्या करेगी? उन्हीं दिनों प्रकाश स्टूडियो के डायरेक्टर और प्रोड्यूसर विजय भट्ट एक फिल्म बना रहे थे लेदर फेस। जब अली बख्श ने महजबीन को विजय भट्ट से मिलवाया तो वह नन्ही सी मेहजबीन को देखकर काफी प्रभावित हो गए और अपनी फिल्म लेदर फेस के लिए उनको ले लिया और नन्ही सी मेहजबी को एक फिल्म में काम करने के लिए फीस के तौर पर मिले ₹25 और इस फिल्म से ही मेहजबी का नाम भी बदल गया और अब ये बन गई फिल्मों की बेबी मीना आए बेबी मीना का काम सबको अच्छा भी लगा और इस फिल्म के बाद कई और फिल्में बाल कलाकार के रूप में नजर आने लगी बेबी मीना। बेबी मीना अभिनय के साथ-साथ गाना भी बहुत अच्छा गाती थी। और पहली बार बेबी मीना ने साल 1941 में बहन फिल्म में एक गीत भी गाया। अपने भैया की मैं हूं दुलारी अपने भैया की मैं हूं। बेबी मीना को हिंदी फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम मिलता चला गया और इस सब से मीना के पिता अली बख्श अब खुश रहा करते थे। लेकिन इस काम में बेबी मीना का बचपन कहीं खो सा रहा था। वो इन सब से खुश नहीं थी। वो तो बस अपने पिता के कहने पर यह सब कर रही थी।

बेबी मीना और बच्चों की तरह खेलना कूदना चाहती थी। लेकिन नन्हे से कंधों पर जिम्मेदारी का बोझ था और इस सब में उनका बचपन पूरी तरह से छीन रहा था। बेबी मीना को पढ़ने लिखने का बड़ा शौक था। इनका दाखिला भी हुआ स्कूल में लेकिन फिल्मों की शूटिंग को पूरा करने के चक्कर में बेबी मीना स्कूल जा ही नहीं पाई। बेबी मीना अपनी स्कूल की किताबों को लेकर फिल्मों के सेट पर जाया करती और जैसे ही उनको समय मिलता तो वह उनको पढ़ना शुरू कर देती। असली सुंदरता पवित्र आत्मा में होती है। जिन लोगों के विचार और चरित्र सुंदर होते हैं वो अमर होते हैं। बेबी मीना जब महज 6 साल की थी तब उनकी मुलाकात हुई थी कमाल अमरोही से। कमाल अमरोही उस वक्त सोहराब मोदी के लिए काम किया करते थे। उन दिनों फिल्म जेलर के लिए एक छोटी सी लड़की की जरूरत थी। कमाल अमरोही को अली बख्श और बेबी मीना से मिलने का जिम्मा सौंपा गया। जब अमरोही अली बख्श के घर गए तो वहां उनकी मुलाकात हुई बेबी मीना से।

उस वक्त कमाल अमरोही ने यह सोचा भी नहीं होगा कि 6 साल की यह छोटी सी बच्ची आगे चलकर उनकी हमसफर बनेगी। वहीं उन्हीं दिनों पिता अली बख्श ने बेबी मीना को अशोक कुमार से भी मिलवाया था। तब बेबी मीना को देखकर दादा मुनि ने कहा था कि जब आप बड़ी हो जाएंगी तो हमारी हीरोइन जरूर बनना। किसे पता था कि आगे चलकर अशोक कुमार की यह बात सच हो जाएगी। बहरहाल समय गुजरा और बेबी मीना बाल भूमिका निभातेनिभाते आगे चलकर बनी मीना कुमारी। जिस फिल्म से बेबी मीना मीना कुमारी बनी थी। उस फिल्म का नाम था बच्चों का खेल। यह फिल्म साल 1946 में आई थी। उसी साल मीना कुमारी की दुनिया एक सराय पिया घर आजा बिछड़े बालम जैसी ऐसी कई फिल्में मीना कुमारी की शुरुआती फिल्में रही।

अब धीरे-धीरे मीना कुमारी के परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार होने लगा। बड़ी बेटी खुर्शीद और मीना कुमारी के बाद अब छोटी बेटी मधु भी फिल्मों में बाल भूमिका निभाने लगी और इस तरह अब अली बख्श की तीनों बेटियां हिंदी सिनेमा का हिस्सा बन गई थी। पैसा ठीक कमाने के बाद अली बख्श अब मीतावाला चोल को छोड़कर चैपलर रोड के एक अच्छे से घर में शिफ्ट हो गए। अली बख्श ने अपने बच्चों के दिमाग में सिर्फ और सिर्फ काम ही डाल कर रखा था। उनको अपनी बेटियों का खेलना कूदना बिल्कुल पसंद नहीं था। और अगर कोई उनकी बात नहीं मानता था तो उसको अली बख्श के हाथों मार भी खानी पड़ती थी। और इस मार ने ही मीना के मन में यह बात अच्छे से बैठा दी थी कि वह सिर्फ काम करने के लिए बनी है।

स्कूल, हंसीज़ाक जैसे पल उनकी जिंदगी का हिस्सा नहीं थे और इसी कठोर व्यवहार के चलते मासूम सा बचपन काम के तले कहीं दब चुका था। भोला बचपन दुखी जवानी पिता के इस दर्द से थक हारकर मीना अपनी मां के पास जाकर खूब रोया करती और अपनी मां के आंचल में आकर अपना दर्द बयां करके सो जाया करती। मुझे अपनी गोद में छुपा लो। मुझे अपने दामन में पनाह दो मां मुझे अपने दामन में पनाह। जिस दिन बेटी को मां के दामन में पनाह ना मिली वो दिन कयामत का दिन होगा। मीना कुमारी की मां इकबाल बानो उनकी ताकत थी। लेकिन शायद अब मीना कुमारी की किस्मत में मां का प्यार नहीं लिखा था। इकबाल बानो को फेफड़ों का कैंसर था और 25 मार्च साल 1947 को इकबाल बानो इस दुनिया को अलविदा कह गई। मीना कुमारी के लिए मां का यूं एकदम से अकेले छोड़कर जाना किसी गहरे दर्दनाक सदमे से कम नहीं था। लेकिन भगवान की मर्जी के आगे भला मीना कुमारी भी क्या कर सकती थी।

समय गुजरा और अब मीना कुमारी को पौराणिक फिल्मों के ऑफर्स भी आने लगे। मीना ने वीर घटोत्कच, श्री गणेश महिमा, लक्ष्मी नारायण, हनुमान, पाताल, विजय जैसी फिल्मों में बहुत खूबसूरती के साथ किरदार निभाए। आओ सखी मंगल गाव के शुभ दिन आय रे। एक तरफ पौराणिक फिल्म तो वहीं मल्टीस्टारर और मुख्य भूमिकाओं वाली फिल्मों में मीना कुमारी काम कर रही थी। लेकिन यह सारी की सारी फिल्में मीना कुमारी को सही पहचान अभी तक नहीं दिला पा रही थी। ओ मोहन मुरली वाले राखो लाल मीना कुमारी अब बालिक हो चली थी और अब मीना कुमारी ने एक सेकंड हैंड कार भी खरीद ली थी। मीना को जब भी समय मिलता तो वह मुंबई की सड़कों पर उस कार को लेकर निकल जाती। कहा जाता है कि मीना कुमारी की कार जब सड़कों पर होती थी तो हवा से बातें करती थी। मीना कुमारी को पढ़ने का बेहद शौक था और आगे इसी शौक ने इनको इश्क से भी रूबरू कराया था। एक दिन एक इंग्लिश मैगजीन को मीना पढ़ रही थी और उस इंग्लिश मैगजीीन में कमाल अमरोही के बारे में कुछ छपा था। उस वक्त कमाल अमरोही की एक फिल्म बहुत बड़ी हिट साबित हुई थी। फिल्म का नाम था महल। आएगा आएगा आने वाला। चारों तरफ कमाल अमरोही की ही चर्चा थी। फिल्म निर्माता के साथ-साथ कमाल अमरोही एक लेखक और कवि भी थे। मीना ने कमाल अमरोही के बारे में सुन तो रखा था लेकिन उस मैगजीन में कमाल अमरोही को देखकर उनको कमाल अमरोही में अपने सपनों का राजकुमार नजर आने लगा।

उन दिनों मीना कुमारी अपनी एक फिल्म तमाशा की शूटिंग कर रही थी और इस फिल्म के सेट पर एक दिन पहुंच गए कमाल अमरोही और उनके सेक्रेटरी बाकर। फिल्म के सेट पर अशोक कुमार ने बातों ही बातों में मिलवा दिया मीना कुमारी को कमाल अमरोही से। लेकिन कमाल अमरोही ने मीना कुमारी पर कोई खास ध्यान नहीं दिया और वापस लौट गए। रास्ते में उनके सेक्रेटरी बाकर ने कहा कि सर हमको इस हीरोइन को ध्यान में रखना चाहिए। ये हमारी फिल्म की हीरोइन बन सकती है। उन्हीं दिनों कमाल अमरोही एक फिल्म के बारे में सोच रहे थे। वह फिल्म थी अनारकली। इस फिल्म के लिए कमल कपूर और मधुबाला को साइन किया जा चुका था। मगर उस वक्त मधुबाला दिलीप कुमार के प्यार में डूबी थी। इसीलिए वो सिर्फ उनके साथ ही काम करना चाहती थी। लिहाजा मधुबाला ने एकदम से इस फिल्म के लिए मना कर दिया।

मधुबाला के इंकार से फिल्म के प्रोड्यूसर्स नाराज हो गए। तो ऐसे में कमाल अमरोही ने प्रोड्यूसरों से वादा कर दिया कि वह कल सुबह एक नई हीरोइन को साथ लेकर स्टूडियो में हाजिर हो जाएंगे। कमाल अमरोही को बाकर की वो बात याद आई मीना कुमारी को लेकर और कमाल अमरोही ने बिल्कुल भी देर ना करते हुए मीना कुमारी के पिता से मुलाकात की और बातचीत के बाद मीना कुमारी को साइन कर लिया। अली बख्श भी बेहद खुश थे कि उनकी बेटी इतने बड़े प्रोजेक्ट की फिल्म का हिस्सा बनने जा रही थी। इधर मीना कुमारी भी बहुत खुश थी यह सोचकर कि वो पहली बार अपने सपनों के राजकुमार के साथ यानी कमाल अमरोही के साथ काम करने जा रही है। सपनों की दुनिया में सो रही थी मैं। सो रही थी मैं। इस फिल्म के लिए अगले दिन मीना कुमारी 13 मार्च साल 1951 को पहुंच गई फिल्म स्टूडियो जहां फिल्म की फीस के तौर पर मीना कुमारी को मिले ₹15,000 कमाल अमरोही भी हीरोइन मिलने से काफी खुश थे। इसके बाद कमाल अमरोही फिल्म के लिए सही लोकेशन देखने के लिए दिल्ली रवाना हो गए।

लेकिन शायद अभी मीना कुमारी की किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। मीना कुमारी को अचानक से टाइफाइड हो गया और मीना कुमारी लगभग तीन हफ्तों तक बहुत परेशानियों से जूझने लगी। कुछ समय बाद वो ठीक हुई अब लेकिन वो काफी कमजोर हो गई थी। उनका चेहरा काफी मुरझा गया था। तो ऐसे में मीना के डॉक्टर ने पिता अली बख्श को कहा कि अगर आप मीना को कहीं हिल स्टेशन पर ले जाएं तो इनकी सेहत में जल्दी सुधार हो जाएगा। अली बख्श परिवार के साथ महाबलेश्वर के लिए निकल गए। जहां कुछ दिन बिताने के बाद जब वो वापस लौट रहे थे तो पुणे के पास मीना कुमारी की कार का बहुत बड़ा एक्सीडेंट हो गया। इस हादसे में मीना कुमारी को बहुत सारी चोटें आई। उनके हाथ में गहरे जख्म हो गए थे।

इनके पिता अली बख्श की कई हड्डियां टूट गई थी और उनकी बहन मधु को मामूली सी चोट आई थी। पुणे के एक अस्पताल में पूरा परिवार भर्ती रहा। कमाल अमरोही को भी इस हादसे की खबर मिली। इस हादसे ने मीना कुमारी को दिमागी तौर पर भी काफी नुकसान पहुंचाया था। मीना कुमारी को लगने लगा था कि उनकी यह चोट न जाने अब कब ठीक होगी। वो मन में यह सोचने लगी कि क्या मैं पहले की तरह फिल्मों में काम कर पाऊंगी लेकिन ऐसे दुख में मीना कुमारी के चेहरे पर मुस्कान तब आई जब उनसे मिलने अस्पताल में उनके सपनों के राजकुमार यानी कमाल अमरोही पहुंच गए और ये इन दोनों के प्यार की पहली शुरुआत थी। इस प्यार में दोनों की रजामंदी नजर आ रही थी। मीरा कुमारी को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि कमाल अमरोही उनसे उम्र में कई साल बड़े हैं और साथ ही शादीशुदा भी हैं और तीन-तीन बच्चों के पिता हैं। सपने में जन आ गए। रात में मीना कुमारी तो बस अब पूरी तरह से उनके प्यार में डूब चुकी थी। उधर कमाल अमरोही भी मीना के प्यार में थे और वो हर हफ्ते बॉम्बे से पू सिर्फ मीना कुमारी से मिलने चले जाया करते थे। अब मीना कुमारी अपनी जिंदगी के सुनहरे दौर को जी रही थी। जैसा वो सोच रही थी वैसा ही हो रहा था। कोई बता दे दिल है जहां क्यों होता है दर्द वहां मीना कुमारी कमाल अमरोही को चंदन कहकर पुकारती थी तो वहीं कमाल अमरोही मीना को मंजू कह कर पुकारते थे और इस तरह से चंदन और मंजू की प्रेम की यह दास्तान शुरू हो गई। तीर चला के ये तो ना पूछो दिल है कहां और दर्द कहां अस्पताल का दौर 4 महीनों तक चलता रहा और इन दोनों के मिलने का सिलसिला भी। फिर कुछ समय बाद मीना की फिल्मों की शूटिंग शुरू हुई। लेकिन ये दोनों फिल्म के सेट पर आपस में ज्यादा बातें नहीं कर पाते थे। लेकिन जब मीना कुमारी और कमाल अमरोही अपने-अपने घर चले जाते थे तो यह दोनों रात-रात भर फोन पर बातें किया करते थे। मैं देखूं दिन में भी सपने ये कैसी उलझन कमाल अमरोही अपनी फिल्म अनारकली बना रहे थे मीना कुमारी के रूप में लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण ये फिल्म बीच में ही बंद हो गई क्योंकि फिल्म निर्माता माखनलाल जी का पैसा उस वक्त शेयर मार्केट में डूब गया था जिसकी वजह से फिल्म बंद हो गई।

फिल्म बंद तो जरूर हुई लेकिन दोनों की मोहब्बत नहीं। कमाल अमरोही अब अपने इस रिश्ते को एक नाम देना चाहते थे। लेकिन उनको कुछ समझ नहीं आ रहा था। तो ऐसे में उनके सेक्रेटरी बाकर ने कहा कि आपको मीना कुमारी से अब निकाह कर लेना चाहिए। कमाल अमरोही ने भी बाकर को मीना कुमारी के पास भेजा उनकी रजामंदी के लिए। मीना कुमारी ने तो इस रिश्ते के लिए हां कर दी लेकिन उन्होंने साथ ही यह भी कहा कि उनके पिता अली बख्श कभी भी इस रिश्ते के लिए राजी नहीं होंगे। तो इस बात पर पलट कर बाकर ने कहा कि वो कुछ ऐसा करेंगे कि अली बख्श को कमाल अमरोही को अपना जमाई मानना ही पड़ेगा। बस तुम तैयार रहना। आप लोग मेरी बातों को जरा समझने की कोशिश तो कीजिए। मीना कुमारी के उस एक्सीडेंट में उनके उल्टे हाथ की सबसे छोटी उंगली हमेशा के लिए टेढ़ी हो गई थी। लेकिन मीना कुमारी ता उम्र मरते दम तक उस उंगली को कैमरे के सामने आने से बड़ी सफाई से बचा लिया करती थी। अली बख्श मीना कुमारी को फिजियोथेरेपिस्ट के पास इलाज के लिए लेकर जाया करते और ठीक 2 घंटों के बाद उनको वापस लेने भी खुद आया करते थे और उस वक्त मीना के साथ उनकी छोटी बहन मधु रहती थी।

14 फरवरी साल 1952 वैलेंटाइंस डे का वो दिन था। मीरा कुमारी और उनकी बहन जब फिजियोथेरेपिस्ट के पास अस्पताल पहुंची तो वहां पहले से ही एक कार उनका इंतजार कर रही थी। अली बख्श जैसे ही वहां से गए तो मीना कुमारी आंख बचाते हुए उस कार में बैठ गई और वो कार धीरे से जाकर रुकी एक काजी के पास और फिर काजी ने मधु और बाकर के सामने मीना और कमाल अमरोही का निकाह पढ़वाया। 14 वर्ष छोटी 20 साल की मीना कुमारी से 34 बरस के कमाल अमरोही की चोरी छिपे शादी हो गई। अस्सलाम वालेकुम। वालेकुम अस्सलाम। फरमाइए। मैं इनसे निकाह करने आया हूं। हजरात जरा इस निकाह में शरीक हो जाइए। निकाह होने के बाद तुरंत दोनों बहनें अस्पताल लौट आई। जहां से अली बख्श उनको घर ले आए। कैसी शादी थी?

ना किसी ने मंगल मनाया ना बारात आई ना शहनाई बजी। अली बख्श को तो कानों कान खबर भी नहीं थी कि मीना कुमारी उनकी दुलारी का निकाह हो गया है। मधु और मीना कुमारी ने अपने पिता को इस निकाह के बारे में ना बताने की ठानी क्योंकि उस वक्त मीना कुमारी ही उस घर में कमाई का सबसे बड़ा साधन थी और वह ऐसे में अभी अपने पिता और बहन को छोड़कर जाना नहीं चाहती थी। वह चाहती थी कि जब मैं ₹3 लाख जमा कर लूंगी तब इस बात को उजागर करूंगी। इधर मीना कुमारी का फिल्मी सफर चल रहा था। उनकी तमाशा फिल्म की शूटिंग लगभग पूरी हो चुकी थी। तो वहीं मीना कुमारी को फुटपाथ और बैजू बावरा जैसी फिल्में भी मिल चुकी थी। 1952 में जब तमाशा फिल्म रिलीज हुई तो यह बहुत बड़ी फ्लॉप फिल्म साबित हुई और इस असफलता का सबसे ज्यादा असर मीना कुमारी पर पड़ा।

लोगों ने मीना कुमारी को उस वक्त एक सुस्त अभिनेत्री के टाइटल से नवाज दिया। मीना कुमारी परेशान थी लेकिन वो अपने चंदन यानी कमाल अमरोही से बात करके अपना दुख हल्का कर लेती। मीना कुमारी अपनी शादी के बारे में सबको अपने तरीके से बताना चाहती थी। लेकिन जैसा वो सोच रही थी वैसा शायद होने नहीं वाला था। उनकी शादी के बाद सबको पहले ही पता चल गई और इसके पीछे था मीना कुमारी का रसोईया। क्योंकि इनके रसोइए ने एक दिन मीना कुमारी और कमाल अमरोही की सारी बातें सुन ली थी। और फिर उसने सारी बात अली बख्श को बता दी।

कमल बाबू ने पहाड़ी वाले मंदिर में भगवान के सामने गायत्री को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार कर लिया। क्या? अली बख्श यह सुनकर बेहद गुस्से में आ गए। उनको यकीन नहीं हो रहा था कि मीना कुमारी यानी उनका खून उनको ऐसे धोखा दे सकता है। क्यों? मुझे देखकर डर लग रहा है और उस वक्त ये डर कहां चला गया था? जब रात के अंधेरे में छिप कर शादी कर ली थी। आपको ये बात मालूम है? मुझे सब कुछ मालूम है। मीना कुमारी से कई सवाल हुए सख्ती के साथ।

लेकिन मीना सिर्फ और सिर्फ रोती रही। पलपल रोती रही। मुझे माफ़ कर दीजिए अब्बाजू। मुझसे भूल गई। उसका खामियाजा मैं जिंदगी भुगतंगी। अपनी बेटी को माफ़ कर दीजिए। अली बख्श को यह यकीन था कि कमाल अमरोही जो कि पहले से शादीशुदा हैं, तीन बच्चों के पिता हैं। वो मीना कुमारी को किसी दिन छोड़कर चले जाएंगे। इसीलिए अली बख्श ने अपनी बेटी के ऊपर कमाल अमरोही से तलाक लेने का दबाव डालना शुरू किया। मुझे सब कुछ मालूम है। और मैं यह भी जानता हूं कि इस रात की दुनिया को अभी खबर नहीं और ना कभी होगी। तुम्हें कमल को भूल जाना होगा। लेकिन कमाल अमरोही को जब यह बात पता चली तो उन्होंने मीना को शांत रहने के लिए कहा। वैसे भी उस वक्त मीना कुमारी के पास बहुत काम था। इसीलिए अली बख्श ने भी इस बात को नजरअंदाज करना शुरू किया क्योंकि अगर मीना परेशान रहेंगी तो ठीक से फिल्मों में काम नहीं कर पाएंगी। परेशान मीना कुमारी हर तरफ से फंसी थी। तो ऐसे वक्त में मीना कुमारी का सामना हो गया मौत से। बैजो बाबरा फिल्म की शूटिंग चल रही थी और एक गीत था। तू गंगा की मौज में जमुना का धारा तू गंगा की।

इस फिल्म के गीत के दौरान मीना कुमारी को नाव चलानी थी। मीना नाव चला रही थी कि ऐसे में अचानक से बहुत तेज लहर आ गई। मीना कुमारी नाव का संतुलन संभाल ना सकी और वह डूब गई। मीना डूब रही थी। उनको लगा कि वो आज नहीं बच पाएंगी। लेकिन फिल्म यूनिट के लोगों की समझदारी के चलते अंतिम पल पर मीना को बचा लिया गया। इस हादसे के बाद अली बख्श को उस साधु की भविष्यवाणी भी याद आ गई जिसने कहा था कि मीना को पानी और आग से दूर रखा जाए क्योंकि इन दोनों से मीना की मौत हो सकती है जिसके बाद मीना का खास ख्याल रखा गया और इनको आग और पानी से दूर रखा जाने लगा था। मीना की परेशानियां खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। अब मीना कुमारी और कमाल अमरोही के निकाह की खबर कमाल अमरोही के घर भी जा पहुंची जिसका नतीजा यह हुआ कि अमरोही के घर में भी गृह क्लेश बढ़ने लगे। पहली बेगम बच्चों के साथ घर जाने का दबाव बनाने लगी। इस दबाव के बाद अमरोही ने मीना को एक खत लिखा और कहा कि हम दोनों को हमारे निकाह के बारे में एक बार फिर सोच लेना चाहिए। जब यह खत मीना कुमारी को मिला तो वह यह सब पढ़कर सहम गई और बदले में एक और खत लिख दिया और कहा कि मुझे लगता है कि आप मुझे समझते नहीं है .

लेकिन मीना ने कमाल अमरोही के इस आखिरी खत का कोई जवाब नहीं दिया। अब मीना और कमाल अमरोही की फोन पर भी बातचीत बंद हो गई। पूरी तरह से जिंदगी चार दीवारी में कैद हो गई थी। रहेगा मिलन ये हमारा तुम्हारा कहां रहा वो मिलन? अब मीना कुमारी की जिंदगी में बस एक ही चीज रह गई थी और वो था सिर्फ काम और काम और वो अपने इस काम को बिना शिकायत के बखूबी करते जा रही थी। दिल अपना और प्रीत पराए किसने है बैजू बावरा फिल्म के दौरान मीना कुमारी के साथ एक और वाक्या हुआ। फिल्म के हीरो भारत भूषण मीना कुमारी की सुंदरता और अभिनय में इतना खो गए कि उन्होंने मीना कुमारी को शादी के लिए प्रपोज कर दिया था। हम सब समझते हैं। ये दिल की है। सॉरी मुझसे दूर ना रहो वरना मैं बावरा हो जाऊंगा। क्योंकि बाहरी दुनिया को तो मीना की चोरी छिपी हुई शादी के बारे में पता नहीं था। इसलिए मीना कुमारी ने बड़ी ही सहजता से भारत भूषण जी को इंकार कर दिया। नहीं हम आपसे किनारा करने। 5 अक्टूबर साल 1952 को फिल्म बैजू बावरा रिलीज हुई और यह फिल्म ऐसी हिट फिल्म साबित हुई कि यह फिल्म लगभग 100 हफ्तों तक सिनेमाघरों पर चलती रही। मोहम्मद रफी साहब की आवाज और नौशाद साहब के संगीत ने लोगों को दीवाना कर दिया। गुरु ज्ञान कहां से मीना कुमारी और भारत भूषण का अभिनय लोगों के सर चढ़कर बोल रहा था।

यह फिल्म मीना कुमारी के जीवन में मील का पत्थर साबित हुई थी। बचपन की मोहब्बत को दिल से हर तरफ मीना कुमारी के ही चर्चे थे। उनकी खूबसूरती की हर तरफ बात हो रही थी। दुनिया भर से मिल रही तारीफों से मीना कुमारी भी बहुत खुश थी क्योंकि इससे पहले तमाशा फिल्म के फ्लॉप होने के पीछे की वजह मीना कुमारी को ही माना जा रहा था जबकि इस बात में बिल्कुल भी सच्चाई नहीं थी लेकिन इस फिल्म की कामयाबी के बाद सब कुछ बदल गया। मीना कुमारी एक स्टार अभिनेत्री बन गई। बधाइयों की लाइनें लग गई। लोग मीना कुमारी की एक झलक पाने के लिए उनके घर के आगे सुबह शाम खड़े रहने लगे और लंबी-लंबी लाइनें लगाने लगे। लेकिन इन सभी मुबारकबाद में एक मुबारकबाद ऐसी भी थी जिसने मीना कुमारी को खुश कर दिया और वो थी उनके चंदन यानी कमाल अमरोही की बधाई। बातचीत हुई तो कमाल अमरोही ने मीना से कहा कि मुझे अफसोस है कि हमारी अनारकली फिल्म नहीं बन सकी लेकिन मैं अब तुमको सोच कर ही एक फिल्म की कहानी लिख रहा हूं और बहुत जल्दी ही हम उस पर काम भी करेंगे। उन दिनों मीना का दैनिक जीवन काफी व्यस्त हो गया था। उनके पिता अली बख्श ने फिल्म प्रोड्यूसर से बात करके नौ लखाहार दाना पानी बैंक मैनेजर इल्जाम और अमर जैसी कई और फिल्मों के लिए साइन करवा लिया था। फिर आई इन दोनों की शादी की पहली सालगिरह यानी 14 फरवरी मीना कुमारी ने कमाल अमरोही को फोन किया और कहा कि मैंने आपके तलाक वाले खत को फाड़ दिया है और मैं अपनी आगे की जिंदगी आपके साथ ही जीना चाहती हूं। दूसरी तरफ अली बख्श मन ही मन इस बात से काफी खुश थे कि मीना कुमारी अपनी सफलता और काम के बीच इतनी व्यस्त हो चुकी है कि वो कमाल अमरोही को भूल गई है और अब धीरे-धीरे अली बख्श ने मीना कुमारी का दैनिक शेड्यूल और भी टाइट कर दिया।

कुछ समय बाद कमाल अमरोही ने मीना कुमारी से कहा कि मेरी नई फिल्म की कहानी और बाकी के सभी काम पूरे हो गए हैं और हमारी फिल्म का नाम है दायरा और इस फिल्म की हीरोइन तुम हो। बहुत जल्दी हमको काम शुरू करना है। मीना कुमारी ने झट से हां कर दी। लेकिन मीना ने जब अपने पिता अली बख्श को यह बात बताई तो वह सुनकर आग बबूला हो गए। उन्होंने कहा कि मैंने तुम्हारी डेट्स तो महबूब खान से बड़े डायरेक्टर के लिए बुक कर रखी है। वो अपनी फिल्म अमर बना रहे हैं और उस फिल्म में दिलीप कुमार जैसे बड़े अभिनेता हैं। तुम कैसे उस फिल्म के लिए भला मना कर सकती हो? तुमको अमर फिल्म में काम करना ही होगा और अगर तुम मेरे फैसले के खिलाफ कमाल अमरोही की फिल्म करोगी, तो तुम्हारे लिए इस घर के सभी दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। पिता के ऐसे अल्फाजों ने मीना कुमारी को डरा दिया और वो अमर फिल्म की शूटिंग करने के लिए राजी हो गई लेकिन अंदर से दुखी मीना कुमारी का मन तो दायरा फिल्म की तरफ झुक रहा था। हम आंसुओं को पीकर बैठे थे मुस्कुराने।

चार दिन तो उन्होंने अमर फिल्म की शूटिंग की। लेकिन अंत में उनका सब्र टूट गया और वो सीधे महबूब खान के पास गई और उस फिल्म में काम करने से इंकार कर दिया और वहां से सीधे कमाल अमरोही की फिल्म दायरा को करने पहुंच गई। अमर फिल्म छोड़ने के बाद फिर उस फिल्म की हीरोइन बनी मधुबाला। मीना कुमारी ने दायरा फिल्म की शूटिंग तो शुरू कर दी थी लेकिन कहीं ना कहीं उनको अपने पिता का डर भी सता रहा था। लेकिन मीना कुमारी अपनी मोहब्बत के आगे मजबूर थी। मीना कुमारी जब काम करके घर वापस लौटी तो उनको अपने घर के दरवाजे बंद मिले। जब मीना ने दरवाजा खटखटाया तब भी दरवाजा नहीं खुला। पिता को आवाज भी लगाई। लेकिन अली बख्श तो अपने मन में कुछ और ही ठान चुके थे। छोटी बहन ने भी पिता को मनाने की कोशिश की। लेकिन वह भी नाकामयाब रही। और अब गुस्से में तिलमिलाए अली बख्श ने अपना फरमान भी सुना दिया और कहा कि तुमने मेरा कहा नहीं माना। तुम अपने मन की कर रही हो। इसलिए अब इस घर के दरवाजे तुम्हारे लिए हमेशा के लिए बंद हो गए हैं। निकालनी चाहती तो मुझे मार डालिए। मीना कुमारी पिता के इस कड़वाहट और गुस्से के आगे काफी समय तक रोती रही और दर्द के साथ माफी मांगती रही। लेकिन कठोर दिल अली बख्श को रहम तक ना आया। आधी रात का वक्त था। ऐसे में मीना कुमारी जाएं तो आखिर जाएं कहां? उस समय रोते-रोते मीना कुमारी का आंचल आंसुओं से भर गया था। आखिरकार मीना रोते-रोते बेपनाह दर्द लेकर अपनी कार में बैठ गई और सीधे बॉम्बे टॉकीज़ के लिए रवाना हो गई। क्योंकि उस वक्त कमाल अमरोही वहां अपनी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। वहां पहुंचने से पहले ही मीना ने कमाल अमरोही को सब बता दिया फोन करके। कमाल अमरोही मीना के आने से काफी खुश हुए और उनको अपने घर ले आए। इसके बाद तो अब कमाल अमरोही और मीना की शादी की खबरें अखबारों की सुर्खियां थी। कोई इस बात पर यकीन ही नहीं कर पाया कि इस शादी को लगभग 2 साल तक छिपा कर रखा गया। अब अली बख्श ने अपनी बेटी से सारे रिश्ते खत्म कर लिए थे। वो अब मीना की फिल्मों के सभी कामों से भी दूर हो गए थे। अली बख्श का गुस्सा शांत नहीं हुआ और उन्होंने मीना कुमारी के सभी कपड़े और साजो सज्जा का सामान सब कुछ मधु के हाथ मीना के पास पहुंचा दिया। अब पिता के घर में बेटी की कोई जगह नहीं रह गई थी। इसके बाद अब कमाल अमरोही और बाकर ने मीना कुमारी की जिंदगी में अली बख्श की जिम्मेदारी ले ली। यानी कि अब मीना कुमारी की शूटिंग, फिल्मों का चयन और उनकी डेट्स का काम सब कुछ कमाल अमरोही और पाकर रखने लगे और देखते ही देखते मीना ने सभी फिल्म की शूटिंग पूरी कर ली और ये फिल्में थी फुटपाथ, परिणीता, दायरा, दाना पानी और नौलखा हार। कमाल अमरोही के साथ मीना की जिंदगी में खुशियां तो आ गई थी लेकिन उनका काम नहीं हुआ था। मीना कुमारी कमाल अमरोही को बहुत चाहती थी। इसीलिए तो उन्होंने कभी भी अपने पैसों तक का कोई हिसाब नहीं रखा था। क्योंकि पहले पिता अली बख्श रखते थे हिसाब और अब पति कमाल अमरोही रखते हैं। मीना कुमारी हमेशा कहती कि उनको हिसाब रखकर क्या करना है उनको? तो बस काम और काम करना है। मीना कुमारी दिन प्रतिदिन लोकप्रिय होती जा रही थी। फिल्मों के साथ-साथ मीना बड़े से बड़े ब्रांड के एडवरटाइजिंग में भी नजर आने लगी और उन दिनों लक साबुन के ऐड में आना बड़े सम्मान की बात मानी जाती थी। मीना कुमारी भी उस ऐड की ब्रांड एंबेसडर बन गई और उस वक्त मीना कुमारी अशोक कुमार के साथ एक इंटरनेशनल ऐड भी कर रही थी और ऐसा करने वाली वो पहली अभिनेत्री थी। यू मस्ट बी मीना कुमारी। यस आई हैव कम टू मी टू शोक बाबू हेलो मीना सो यू हैव कम यस वी आर शूटिंग टुमारो एंड हियर इज द डायलॉग अब आया साल 1954 और तारीख 21 मार्च जब पहला फिल्म फेयर अवार्ड का फंक्शन था और पहले इस फिल्म फेयर अवार्ड में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीता मीना कुमारी ने और यह अवार्ड मिला था मीना कुमारी को फिल्म बैजू बाबरा के लिए और इसी के साथ मीना कुमारी बॉलीवुड की वो पहली अभिनेत्री बनी जिन्हें यह अवार्ड दिया गया था। इसके बाद साल 1954 में आई फिल्म आजाद की शूटिंग चल रही थी। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान मीना की जिंदगी में तीन वाक्य हुए। जिसमें दो डरा देने वाले तो एक खुश कर देने वाला था। आजाद फिल्म की शूटिंग के दौरान दिलीप कुमार और मीना कुमारी को रोपवे में एक ट्रॉली में बैठना था। लेकिन बात यह थी कि उस ट्रॉली में दो ही लोगों के बैठने की जगह होती थी। लेकिन उस ट्रॉली पर एक कैमरा भी सेट कर दिया गया था और पहले के कैमरे काफी भारी भरकम हुआ करते थे। कुछ दूर जाने पर ट्रॉली का बैलेंस डगमगाने लगा और संतुलन इतना ज्यादा खराब हुआ कि मीना कुमारी यह सबसे ज्यादा सहम गई और डर गई और ऐसे में बड़ी हिम्मत के साथ दिलीप कुमार जी ने मीना कुमारी को और खुद को संभाला क्योंकि नीचे तकरीबन 200 मीटर गहरी खाई थी और यह सब डरा देने के लिए काफी था और अब दूसरे हादसे की बात करें तो मीना कुमारी की फिल्म की शूटिंग चल रही थी चंबल की घाटियों की तरफ। शूटिंग के वक्त कमाल अमरोही भी मीना के ही साथ थे। शूटिंग पूरी होने के बाद कमाल अमरोही ने मीना कुमारी से कहा आओ कहीं घूमने चलते हैं और वह खुद की कार में मीना कुमारी को बैठाकर निकल गए चंबल की खतरनाक घाटियों में घूमने के लिए और दुर्भाग्यपूर्ण इस वक्त गाड़ी का पेट्रोल खत्म हो गया। और वहां उस वक्त चंबल की घाटियों में एक डाकू का बड़ा ही बोलबाला था जिसका नाम था डाकू अमृतलाल। वहां के आसपास के लोग तो अमृतलाल के ख्वाब से वाकिफ थे। लेकिन मीना कुमारी और कमाल अमरोही इस बात से बिल्कुल अनजान थे। जैसे ही कार रुकी तो कुछ डाकुओं ने उनकी गाड़ी को चारों तरफ से घेर लिया और डाकुओं ने मीरा कुमारी और कमाल अमरोही को कार से बाहर आने के लिए कहा। और जब यह दोनों कार से बाहर निकले तो खूंखार डाकू अमृतलाल ने मीना कुमारी को पहचान लिया क्योंकि अमृतलाल खुद मीना कुमारी का बहुत बड़ा फैन था। खूंखार डाकू ने बड़ी ही शालीनता के साथ मीना कुमारी से वहां आने की वजह पूछी और जब मीना कुमारी ने अपनी बात रखी और बताया कि उनकी कार का पेट्रोल खत्म हो गया है। फिर इस बात पर डाकू अमृतलाल ने कहा यहां 20 कि.मी. तक कोई पेट्रोल पंप नहीं है और सुबह होने तक मैं आपकी कार के लिए पेट्रोल का इंतजाम कर दूंगा। अभी तो आपको फिलहाल मेरे साथ मेरे अड्डे पर चलना होगा। उस वक्त मीना कुमारी और कमाल अमरोही के पास उस डाकू की बात मानने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। अड्डे पर ले जाने के बाद डाकू अमृतलाल ने मीना कुमारी की बहुत ज्यादा इज्जत और खातिरदारी की और उनके खाने का अच्छा खासा इंतजाम किया और उसके बाद डाकू अमृतलाल ने मीना कुमारी की तरफ अपना हाथ बढ़ा दिया और एक चाकू देते हुए कहा कि इस हाथ पर आप अपना नाम लिख दीजिए। मीना डाकू की इस बात से सहम गई। लेकिन डाकू अमृतलाल अपनी ज़िद पर अड़ा रहा। मीना कुमारी कुछ भी नहीं सोच पाई और रोते-रोते उसके हाथ पर अपना नाम चाकू से लिख दिया। लेकिन खून निकलते देख मीना कुमारी ने अपना दुपट्टा फाड़ा और अमृतलाल के साथ बांध दिया। जिसके बाद अमृतलाल ने मीना को अपनी बहन मान लिया। अगली सुबह मीना कुमारी की गाड़ी में पेट्रोल भर दिया गया। अब मीना जी जैसे ही जाने लगी तो उस डाकू ने बहुत सारा सोना चांदी पैसे मीना कुमारी को दे दिए लेकिन तब मीना कुमारी ने सिर्फ शगुन का एक नोट रखकर सब कुछ वापस कर दिया और उसके बाद यह वापस शूटिंग पर लौट आए और जब यह बात वहां सभी को पता चली तो सब बहुत हैरान रह गए। फिर आया साल 1955 और अब लगातार दूसरी बार मीना कुमारी ने जीता बेस्ट एक्ट्रेस फिल्मफेयर अवार्ड और फिल्म थी परिणीता जिसमें अशोक कुमार के साथ बेहतरीन अभिनय किया मीना कुमारी ने। दूसरा फिल्मफेयर अवार्ड मीना कुमारी की जिंदगी में बेहद खूबसूरत पल था। इस अवार्ड फंक्शन में मीना कुमारी के साथ कमाल अमरोही भी गए थे। अवार्ड लेने जब मीना स्टेज पर गई तो वह अपना पर्स वहीं कुर्सी पर भूल गई। कमाल रोही ने देख तो लिया था लेकिन उस पर्स को उठाने की जरा सी भी जहमत नहीं उठाई। खुशी के पल में मीना कुमारी भी उस पर्स को भूल चुकी थी। अगले दिन मीना कुमारी के चाहने वालों ने मीना कुमारी के पास उस पर्स को पहुंचा दिया। तब मीना कुमारी ने कमाल अमरोही से कहा कि आप तो मेरे पास बैठे थे। आपने यह पर्स नहीं देखा। तब कमाल अमरोही ने कहा हां मैंने तुम्हारा पर्स देखा था लेकिन आज अगर मैं तुम्हारा पर्स उठाता तो कल तुम्हारे जूते भी उठाने पड़ते। मीना कुमारी को कमाल अमरोही की ऐसी बात सुनकर बड़ा धक्का लगा। लेकिन मीना कुमारी ने इस बात पर कुछ ज्यादा गौर नहीं किया क्योंकि प्यार में डूबी हुई मीना कुमारी को बहुत सी बातों का एहसास होकर भी नहीं होता था। अब इन दोनों के रिश्तों में भी हल्की सी खींचतान आने लगी थी। जिसकी वजह मीना कुमारी का बेहद व्यस्त शेड्यूल बताया जाने लगा। फिर एक दिन कमाल अमरोही ने मीना कुमारी से कह दिया कि तुमको अपनी जिंदगी में कुछ शर्तों को लागू करना होगा। पहली शर्त कि तुम घर आने के बाद सिर्फ मजहबी रहोगी। मीना कुमारी नहीं यानी कि वो एक आम महिला की तरह घर की जिम्मेदारी उठाएंगी। दूसरी बात यह थी कि आप हर शाम 6:30 बजे तक घर वापस आ जाएंगे और सिर्फ अपनी ही कार में बैठोगी और तीसरी शर्त यह कि आपके मेकअप रूम में मेकअप मैन के अलावा कोई और शख्स नहीं होगा समझने के लिए मीना कुमारी को दो शर्तें तो सही लगी पर मेकअप रूम में किसी के आने की मनाही और सिर्फ अपनी ही कार में बैठना वो भी ड्राइवर के साथ जो उनको शूटिंग पर लेकर भी जाएगा और घर वापस लेकर लेकर भी आएगा। यह किसी और बात की ओर संकेत था। यह कौन सी पाबंदी लगाई जा रही थी मीना कुमारी पर? और मीना कुमारी को क्या अपने आप को सही साबित करने के लिए इन शर्तों को मानना पड़ता? लेकिन मीना कुमारी ने कमाल अमरोही की सारी की सारी शर्तों को मान लिया और कुछ भी नहीं कहा। और यह सारी शर्तें कमाल अमरोही ने लिखित तौर पर मीना कुमारी से साइन करा ली थी। लेकिन मुझे तो इन कदमों में बैठना था। इन चरणों को पूछना था। फिर आया साल 1955 और मीना की फिल्म आजाद रिलीज हुई। फिल्म सुपरडुपर हिट रही और यह फिल्म उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। राधा की लाज भरी अंखियों के डोरे। मीना कुमारी का मुकाम और कद दिन पर दिन बढ़ता ही जा रहा था। इसके बाद फिर आया साल 1956 मीना कुमारी की जिंदगी का गोल्डन ईयर। इस साल मीना कुमारी की एक के बाद एक सुपर डुपर हिट फिल्मों का तांता लग गया। मेनम साहब फिल्म में पहली बार मीना शम्मी कपूर के साथ सिनेमा पर्दे पर नजर आई। इस फिल्म में मीना आधुनिक रंगरूप वेशभूषा में नजर आई, जिसको लोगों ने खूब पसंद किया और फिल्म बॉक्स ऑफिस पर लाजवाब रही। जब से मिली है निगाहें चमकी है मोहब्बत की राह। इसके बाद मीना की अगली फिल्म पुनर्विवाह के ऊपर बनी थी। नाम था एक ही रास्ता। झूम पवन देखो चले गए नशे में। अशोक कुमार सुनील दत्त इस फिल्म में इनके साथ थे। यह फिल्म भी लाजवाब रही और 25 हफ्तों तक सिनेमाघरों की शान रही और फिल्म को मिला जुबली हिट का सम्मान। आखिर तेरे जने बदनाम करके छोड़ा। इसके बाद मीना कुमारी की अगली फिल्म थी बंधन जिसमें यह प्रदीप कुमार के साथ नजर आई थी। इस फिल्म को राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में सर्टिफिकेट ऑफ मैरिट मिला और इसी साल इनकी गायक अशोक कुमार के साथ रिलीज हुई नया अंदाज फिल्म। यह फिल्म एक म्यूजिकल हिट फिल्म साबित हुई थी। इसके बाद मीना कुमारी की साल 1954 में एक और फिल्म आई हलाकू। यह फिल्म अपने आप में ऐतिहासिक फिल्म थी। इसमें मीना ने मीनू मुमताज और प्राण जी के साथ काम किया था। यह फिल्म भी सुपरडुपर हिट रही। इस फिल्म ने भी सिल्वर जुबली का खिताब जीता था। तो फिर जिंदगी बर्बाद करने का जिम्मेदार भी बादशाह है। हम तुम्हारी बर्बाद जिंदगी को आबाद कर देंगे। तुम अपनी अदाओं से हमारी मेहरबानी खरीद सकती हो। यह बताइए कि मुझे यहां क्यों बुलाया है? इतनी सारी हिट फिल्मों ने मीना कुमारी का एक अलग ही मुकाम तैयार कर दिया। हर कोई उनका दीवाना हो गया। लोग मीना कुमारी को देखते तो सोचते थे कि कितनी खूबसूरत है मीना कुमारी। दर्शकों की चहीती थी मीना। सबको लगता था कि मीना की किस्मत कितनी अच्छी है कि उनकी दौलत, शोहरत, उन्हें सब कुछ हासिल है। लेकिन दूसरी तरफ तो मीना कुमारी कहां खुश थी। उन पर तो अब कई तरह की पाबंदियां थी। कई शर्तें थी और इन शर्तों को वह दुखी मन से निभा रही थी जो कि कमाल अमरोही ने उन पर लगाई थी। मीना कुमारी इसीलिए भी नाख थी क्योंकि उनको यह एहसास हो रहा था या फिर कराया जा रहा था कि उनकी जिंदगी से अब प्यार कम होता जा रहा है। मेरा साथ छुटा मत लूटे। मीना कुमारी की पारिवारिक जिंदगी की बात करें तो हर औरत की तमन्ना होती है कि वह मां बने। ऐसी ही इच्छा मीना कुमारी की भी थी। मीना कुमारी अपनी जिंदगी में गर्भवती भी हुई। लेकिन शायद जिंदगी को यह मंजूर नहीं था। मीना को मां बनने का सुख प्राप्त नहीं हुआ। दुर्भाग्यपूर्ण उनका गर्भपात हो गया। बाबा बच्चा पैदा होते ही मर गया। हां। मीना कुमारी की किस्मत तो देखिए कि जहां लोगों ने कहा कमाल अमरोही नहीं चाहते थे कि वो अपने इस कामयाबी और सफलता के दौर में मां बनकर अपने फिल्मी सफर को दांव पर लगाए। लेकिन वहीं कमाल अमरोही ने तो खुद सारे इल्जाम मीना कुमारी के ऊपर ही डाल दिए कि वो खुद मां बनकर अपने करियर को दांव पर नहीं लगाना चाहती हैं। किसकी बात सच थी और किसकी नहीं यह किसी को नहीं पता। तू अगर जीता जागता मेरी गोद में आ जाता तो मेरे सारे दुख मिट जाते। लेकिन मीना कुमारी को अपने इस दुख के समय ऐसी ही बातों का सामना करना पड़ रहा था। सच्चाई शायद कहीं खो सी गई थी। लेकिन यह बात तो सच थी कि मीना कुमारी दो बार गर्भवती हुई और दोनों ही बार उनको गर्भपात के दर्द से गुजरना पड़ा था। और यह उनकी बदनसीब किस्मत कहिए या फिर पिछले जन्मों के कर्मों की सजा कि मीना कुमारी अपनी जिंदगी में मरते दम तक कभी भी मां नहीं बन सकी। कितना अच्छा बच्चा था। पैदा होते ही मां के बाप पर पर्दा डालकर चला गया। मीना कुमारी और राजकुमार के किरदार से सजी एक और फिल्म आई शारदा। इस फिल्म में किरदार निभाना काफी मुश्किल था। लिहाजा उस वक्त की सभी हीरोइनों ने मना कर दिया था। तब मीना कुमारी इस रोल को करने के लिए उन्होंने हां कर दी। मुझे क्यों ऐसी सजा मिल रही है? चरणजीत की ये दशा है और मैं उसके पास भी नहीं जा सकती। उसकी सेवा का अधिकार मुझसे क्यों छीन लिया? प्रभु क्यों छीन लिया? एक दिन फिल्म की शूटिंग खत्म होने के बाद मीना कुमारी राज कपूर के साथ एक पार्टी में चली गई और घर वापस आने पर उन्होंने इस पार्टी की बात अपने पति कमाल अमरोही को नहीं बताई लेकिन पार्टी में कमाल अमरोही के परिचित लोगों ने जब उनको मीना की मौजूदगी के बारे में बताया तो इस बात से कमाल काफी नाराज हुए। हालांकि इंडस्ट्री में बहुत सारे लोग इन दोनों के रिश्ते में आग भी लगाया करते थे। लेकिन मीना कुमारी पाक दिल थी इसीलिए वो इतना ध्यान नहीं देती थी। साल 1957 जब शारदा फिल्म रिलीज हुई और इस फिल्म के लिए बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने मीना कुमारी को बेस्ट एक्ट्रेस के सम्मान से नवाजा। ये फिल्म उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म बनी। जवाब क्यों नहीं देती? मैं जा नहीं सकती। क्यों? क्यों नहीं जा सकती जानता? क्यों नहीं जा सकती? बताओ क्या बात है? क्यों नहीं जा सकती शाह? बोलो तो सही। शाहजहां मीना कुमारी की प्रसिद्धि सातवें आसमान पर थी। उनका फिल्म में होना ही सफलता की गारंटी माना जाता था। जनगण मंगल दायक राम रघुपति राघवरा। कमाल अमरोही अपनी ड्रीम फिल्म पाकीजा बनाने की तैयारी में थे। लेकिन मीना कुमारी का जरूरत से ज्यादा व्यस्त होना परेशानी खड़ी कर रहा था। लेकिन फिर भी मीना कुमारी उस वक्त में से टाइम निकालकर पाकीजा फिल्म की शूटिंग कर रही थी। यह फिल्म उस वक्त ब्लैक एंड वाइट में शूट हो रही थी। तो वहीं दूसरी तरफ फिल्म की तरह ही मीना कुमारी की जिंदगी से भी रंग गायब हो रहे थे। साल 1958 मीना कुमारी की एक फिल्म आई दिलीप कुमार के साथ यहूदी। यह मेरा दीवानापन है या मोहब्बत इस फिल्म ने उस दौर में कामयाबी की सफलता के झंडे गाड़ दिए। आते जाते पहलू में आया कोई आते जाते पहलू में। तो वहीं साल 1959 में मीना कुमारी की एक बड़ी हिट फिल्म रिलीज हुई। फिल्म का नाम था चिराग कहां रोशनी कहां। चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक चल मेरे घोड़े टिक टिक टिक रुकने का तू नाम ना लेना इस फिल्म में इनके हीरो थे जुबली स्टार राजेंद्र कुमार तेरे मन की उलझने सुलझाना चाहता और जब साल आया 1960 तो यह साल तो मीना कुमारी को ट्रेजडी क्वीन बना गया। इस साल मीना की दो फिल्में आई जिनकी वजह से ट्रेजडी क्वीन वो बनी थी। पहली फिल्म थी कमाल अमरोही की दिल अपना प्रीत पराई फिल्म यादगार बनी लोगों का खूब प्यार मिला। अंदाज मेरा मस्ताना मांगे दिल का नजराना जरा सोच के आंख मिला और इस फिल्म के बाद दिलीप कुमार और मीना कुमारी की फिल्म कोहिनूर आई। बदनसीबी की आग में हमारा सब कुछ जख्म की अंधियां हमारी मोहब्बत की राख अपनी झोली में समेट कर ले गई। हर रात का अंधेरा सवेरे की रोशनी में बदलता है चंद्र के। इन दोनों के गहन चरित्रों ने दोनों को ही ट्रेजडी क्वीन तो ट्रेजडी किंग की उपाधि दिला दी थी। फिल्म निर्माता और एक्टर गुरुदत्त जी एक फिल्म साहेब बीवी और गुलाम बनाने की सोच रहे थे। और इस फिल्म में छोटी बहू के किरदार के लिए उनके दिमाग में एक ही नाम था मीना कुमारी। लेकिन मीना कुमारी के पास तो डेट्स ही नहीं थी। लिहाजा कई और अभिनेत्रियों के ऑडिशंस हुए लेकिन कोई भी इस रोल के लिए फिट नहीं बैठा और फिर फैसला लिया गया कि जब मीना कुमारी के पास डेट्स होंगी तभी इस फिल्म को बनाया जाएगा और इसके लिए गुरुदत्त जी जैसे बड़े निर्माता को एक साल तक उनका इंतजार करना पड़ा। इस फिल्म में मीना कुमारी का किरदार और फिल्मों से हटकर था। इस फिल्म के किरदार को मीना कुमारी ने एक चुनौती के रूप में लिया क्योंकि इस फिल्म में उनको एक शराबी औरत का किरदार निभाना था जो अपने साथ-साथ जान से जान टकराती हुई नजर आती है। जितना नशा होगा उतनी ही सुंदर नजर आओगी। इस फिल्म में निभाए जाने वाले किरदार बेहद ही मुश्किल थे और पहली बार मीना कुमारी ने इस किरदार को निभाने के लिए कमाल अमरोही से मदद मांगी। उन्होंने पूछा कि शराबी का किरदार कैसे निभाया जाए? मैंने कभी ऐसा किरदार नहीं किया है। लेकिन कमाल अमरोही ने तो मीना कुमारी की कोई भी मदद नहीं की। कमाल अमरोही का ऐसा बर्ताव इन दोनों के प्यार के रिश्ते को खोखला बना रहा था। नी ही पड़ेगी। वो चाहते हैं कि मैं शराब पियूं। जरूर पियूंगी। पर मीना कुमारी किसी से कुछ नहीं कहती। बस अपने चेहरे पर एक झूठी हंसी का पर्दा डाल लेती थी और अपना काम करती रहती थी। यहां यह बात भी गौरतलब है कि मीना कुमारी ने कभी भी फिल्मी पर्दे पर रोने के लिए ग्लिसरीन का इस्तेमाल नहीं किया। वो जब भी फिल्मों में रोती थी तो वो उनके असली आंसू होते थे क्योंकि वो किरदार में डूब कर दिल से रोया करती थी। हिंदू घर के एक बार का किस्सा यह है कि साहिब बीवी और गुलाम फिल्म में जब यह छोटी बहू के किरदार में रोने का सीन कर रही थी तो तब सीन तो एकदम ओके हो गया था। डायरेक्टर ने कट भी कह दिया था। लेकिन मीना कुमारी लगातार रोती रहीं। छोटी बहू का दर्द तो खत्म हो गया था। पर मीना कुमारी का नहीं। उस दिन मीना कुमारी अपने मेकअप रूम में जाकर घंटों तक रोती रहीं। आंसू खत्म हुए लेकिन शायद मीना कुमारी का दर्द नहीं। मीना कुमारी और कमाल अमरोही के बीच झगड़ों की वजह तो बहुत सारी थी लेकिन एक वजह थी मीना कुमारी का हमेशा ठंडी रोटी खाना। यह उस वक्त की बात है जब मीना छोटी थी। तब उनकी मां काम पर जाया करती थी। इसके चलते वह सभी बच्चों के लिए जल्दी ही रोटियां बनाकर चली जाती थी। मीना कुमारी फिल्म की शूटिंग से वापस घर लौटती तो वो मां के द्वारा रखी गई ठंडी रोटियों को ही खा लेती थी। बचपन की वो ठंडी रोटी खाने की मजबूरी अब मीना कुमारी की आदत बन चुकी थी। लेकिन इस बात पर कमाल अमरोही मीना कुमारी पर बहुत गुस्सा करते। वो हमेशा मीना कुमारी से कहते कि जब घर में अच्छा खाना मौजूद है तो तुम बासी रोटियां क्यों खाती हो? लेकिन कमाल अमरोही शायद यह भूल गए थे कि मीना कुमारी अपनी मां को कभी भूल नहीं पाई थी और उन बासी रोटियों में वो अपनी मां और उनके प्यार को याद किया करती थी। आग लगे संसार को अंधा जिसका साल 1962 में एक फिल्म रिलीज हुई थी जिसका नाम था मैं चुप रहूंगी कोई बता दे दिल है जहां क्यों होता है दर्द वहां इस फिल्म में मुख्य भूमिका में सुनील दत्त और मीना कुमारी थे इस फिल्म की शूटिंग जब मद्रास में चल रही थी तब नरगिस जी भी अपने बच्चों को लेकर मद्रास सुनील दत्त के पास आई हुई थी। फिल्म के सेट पर नरगिस और मीना कुमारी की बहुत अच्छी दोस्ती हो गई। एक दिन नरगिस जी और सुनील दत्त जी बाहर खाना खाने जा रहे थे। मीना कुमारी से भी कहा गया चलने के लिए लेकिन मीना नहीं गई। ऐसे में नरगिस जो अपने बच्चों को आया के पास छोड़कर चले गए। लेकिन मीना कुमारी वहीं थी इसीलिए वह उनके बच्चों के पास गई और उनका पूरा ख्याल रखने में लग गई। और जब नरगिस वापस आई तो देखा कि बच्चे मीना कुमारी के साथ खुश थे। यह सब देखकर नरगिस जी ने कहा कि जब तुम बच्चों का ख्याल इतने अच्छे से रख लेती हो तो तुम खुद क्यों बच्चे नहीं करती हो? इस बात पर मीना कुमारी रोने लगी और कोई जवाब नहीं दिया। मीना के आंसू शायद इस बात का सबूत थे कि वह चाहती थी कि वह मां बने। लेकिन ऐसी कोई बात नहीं थी कि वह अपने करियर के लिए मां नहीं बनना चाहती थी। यह उन पर सरासर गलत इल्जाम लगाए गए थे। दुनिया करे सवाल तो हम इसके बाद जब नरगिस बच्चों को लेकर अपने रूम में आ गई तो कुछ देर बाद मीना कुमारी के कमरे से चिल्लाने और झगड़े की आवाजें सुनाई देने लगी और अगले फिल्म के सेट पर पता चला कि आज मीना कुमारी शूटिंग के लिए नहीं आएंगी। उनकी तबीयत खराब है। जब नरगिस जी उनका हाल पूछने वहां गई तो उन्होंने देखा कि मीना कुमारी की आंखें जरूरत से ज्यादा सूझी हुई थी। ऐसा लग रहा था मानो वो रात भर सिर्फ रोती रही। नरगिस जी से मीना कुमारी की यह हालत देखी ना गई और वह गुस्से में बात करने बाकर के पास चली गई। उन्होंने बाकर से कहा कि क्या तुम सभी मीना कुमारी को मार देना चाहते हो? इसने तो तुम्हारे लिए इतना सब कुछ किया है। तब बाकर ने पलट कर जवाब दिया कि जब सही समय आएगा तो हम मीना कुमारी को आराम भी दे देंगे। लेकिन शायद मीना कुमारी की किस्मत में तो अभी आराम आया ही नहीं। मुझे ओ वाले वापस बुला ले। और वक्त के साथ-साथ मीना कुमारी की जिंदगी में आंसुओं का इजाफा होता गया। और अब बात इतनी बढ़ी कि यह बात सिर्फ डांट फटकार तक सीमित नहीं रही। जब मीना कुमारी ने कमाल अमरोही से गुस्से में कुछ कड़वे सवाल पूछ लिए तो गुस्साए कमाल अमरोही ने अपनी मंजू यानी मीना कुमारी के गाल पर जोरदार थप्पड़ रख दिए। भगवान मेरी जैसी लड़कियों को जन्म ही क्यों देता है? और अगर गलती तुझे जन्म दे भी देता है तो शादी से पहले उन्हें मार के नहीं डालता। विनोद मेहता की लिखी गई मीना कुमारी की बायोग्राफी में इस बात का जिक्र भी किया गया है। मीना कुमारी अपनी शादी में शारीरिक शोषण का भी शिकार हुई थी। काम का दबाव और मन की अशांति का अब मीना कुमारी की सेहत पर भी बुरा प्रभाव पड़ रहा था। मीना कुमारी काफी समय से नींद की गोलियां ले रही थी। लेकिन नींद तो शायद मीना कुमारी की किस्मत में ही नहीं थी। नींद की दवाइयां भी डॉक्टर ज्यादा नहीं दे सकते थे। इसलिए डॉक्टर्स ने दवाइयों की जगह शराब का एक पैग रोजाना पीने के लिए कह दिया। पर वो शराब का एक पैक मीना कुमारी के जीवन में तबाही मचा देगा, यह उस डॉक्टर ने कभी नहीं सोचा था। शराब अब दवाई का काम ना करके मीना कुमारी की जिंदगी के दर्द को भुलाने का साधन बन चुकी थी। अब मीना कुमारी ज्यादा शराब पीने लगी थी। घर में शराब पीने को लेकर उन पर सख्ती की गई। लेकिन मीना कुमारी भला कहां रुकने वाली थी? बॉटल्स में शराब रखने लगी और वह कई बार फिल्म के सेट पर चोरी छिपे शराब पी लिया करती थी और जब भी कोई मीना कुमारी को शराब पीने से रोकता तो वह बस एक ही जवाब देती कि मैं बहुत थक गई हूं इसीलिए इसको पी रही हूं। हां हां पंगी। देखो मेरा क्या बिगाड़ता है तू। साल 1962 से लेकर 1963 के बीच लगभग 16 फिल्में साइन की थी मीना कुमारी ने। मीना कुमारी कहती थी कि हर सुबह मैं जब भी फिल्म की शूटिंग के लिए निकलती हूं तो मुझ में मायूसी और थकावट पूरे तरीके से भर जाती है। मैं अपने काम से हमेशा कहती हूं कि बस आज आखिरी दिन शाम को जाकर अपना बैग पैक करूंगी और एक लंबी छुट्टी पर चली जाऊंगी। काम का बोझ और पति से मीना कुमारी का अलगाव दोनों ही उनके लिए नासूर बनते जा रहे थे। कमाल अमरोही और मीना कुमारी के रिश्ते में अभी तक सिर्फ लड़ाई झगड़ा हो रहे थे। लेकिन अब इस रिश्ते में अहंकार भी आने लगा। कमाल अमरोही को लगता था कि अब मीना कुमारी बहुत तेजी के साथ ऊपर बढ़ती जा रही हैं और मैं नीचे की तरफ और यही बात कमाल अमरोही को अंदर ही अंदर गुस्से और चिड़चिड़ाहट से भर देती थी। तो क्या चाहते हैं आप मुझसे? और यह बात साबित हुई एक फिल्म के प्रीमियर के दौरान। इस प्रीमियर के दौरान महाराष्ट्र के राज्यपाल से मीना कुमारी का परिचय कराया गया। राज्यपाल जी से कहा गया कि यह हैं मीना कुमारी जो कि बहुत ही प्रसिद्ध अभिनेत्री हैं और यह हैं इनके पति कमाल अमरोही। यह बात सुनकर कमाल अमरोही बहुत ज्यादा गुस्से में आ गए और उसी वक्त कमाल अमरोही ने कह दिया कि मैं हूं कमाल अमरोही और यह है मेरी पत्नी मीना कुमारी। और इतना कहकर कमाल अमरोही वहां से प्रीमियर को छोड़कर चले गए। और उस दिन मीना कुमारी अकेले वहां रह गई। साहेब बीवी और गुलाम फिल्म सुपरहिट रही मीना कुमारी के किरदार यानी छोटी बहू को दुनिया ने खूब पसंद किया। वो सब क्या दे सके तुम मुझे? मुझे मुझे मुझे मां कह कर पुकारने वाली। इसके बाद साल 1963 के फिल्म फेयर अवार्ड में मीना कुमारी ने ऐसा रिकॉर्ड बनाया दुनिया के सामने जो आज तक हिंदी सिनेमा में कोई दूसरी अभिनेत्री नहीं तोड़ पाई है। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के तीनों नॉमिनेशन सिर्फ और सिर्फ मीना कुमारी के नाम थे। तीन फिल्में थी मीना कुमारी की आरती। मैं चुप रहूंगी साहिब बीवी और गुलाम। तीनों ही फिल्मों की हीरोइन मीना कुमारी और तीनों ही फिल्में नॉमिनेशन में और इस अवार्ड फंक्शन में मीना कुमारी को मिला साहिब बीवी और गुलाम फिल्म के लिए तीसरा फिल्म फेयर अवार्ड। क्या कहना चाहते हो? गाना क्या कहना चाहते हो? शराब मैं भी पीता हूं। मगर तुम्हारी तरह नशे में पागल नहीं हो जाता। तुमने मुझे पागल कहा? इस फिल्म को इतना पसंद किया गया कि बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में भारतीय एंट्री के रूप में इसे चुना गया और मीना कुमारी को एक प्रतिनिधि के रूप में और फिर तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री सत्यनारायण सिंह ने कमाल अमरोही और मीना कुमारी के लिए बर्लिन जाने के लिए हवाई टिकटों का इंतजाम किया था। लेकिन कमाल अमरोही ने तो मीना कुमारी के साथ जाने से ही इंकार कर दिया। उन्होंने कहा, इस फिल्म में मेरा कोई योगदान नहीं है। ना ही मैं निर्देशक हूं और ना ही इस फिल्म का लेखक। सिर्फ मीना कुमारी के पति का टैग लगाकर मैं ऐसे नहीं जा सकता। मीना चाहे तो बाकर या अपनी छोटी बहन मधु के साथ वहां जा सकती हैं। इसके बाद तो फिर वही हुआ जो कमाल अमरोही चाहते थे। मीना कुमारी भी बर्लिन नहीं गई। तो क्या मैं अपनी जान देकर इस गुस्से को खत्म करूं? कैसी बातें करती हो? तुम जो कुछ भी हो मेरी जिंदगी का सहारा। मीना कुमारी को अच्छी कार बहुत ज्यादा पसंद आती थी। उनके पास Mercedes कार भी थी तो भी। इम्पाला कार खरीदने वाली मीना कुमारी उस दौर की पहली अभिनेत्री थी। करियर के पीक पॉइंट पर सबसे ज्यादा फीस लेने वाली अभिनेत्री भी थी मीना कुमारी। मस्त नजर तूने ये क्या किया? लिया यह काल सा मीना कुमारी ने जब अपनी Mercedes कार खरीदी थी तब कमाल अमरोही ने उनकी कार में बैठने से भी इंकार कर दिया था। उन्होंने कहा था कि तुम अपनी कार में स्टूडियो जा सकती हो। अगर तुम्हें मेरे साथ कहीं चलना है तो फिर मेरी ही कार में बैठना होगा। लेकिन अब मीना कुमारी को ऐसे जवाबों की आदत सी हो गई थी। उन्हें अंदर ही अंदर दुख तो बहुत होता था लेकिन वह किसी के सामने जाहिर नहीं कर पाती थी और बस अंदर ही अंदर घुटती रहती थी। मीना की तड़प और दुख अब शब्दों के जरिए कागज पर उतरने लगे। लिखने का शौक तो मीना कुमारी को अपने बचपन से ही था। लेकिन अब शब्दों में उनका दर्द साफ-साफ झलकने लगा था। कोई मेरा दर्द ना जाने किसे जाऊं समझाने। एक फिल्म के दौरान मीना कुमारी की मुलाकात जानेमाने गीतकार और फिल्म निर्देशक गुलजार साहब से हो गई। गुलजार साहब उस वक्त शायर हुआ करते थे। मीना कुमारी उनसे मिलकर बहुत खुश हुई। वो अपनी शायरी की बातें अक्सर गुलजार साहब के सामने किया करती और खुद की लिखी हुई कई नज़्में गुलजार साहब को सुनाया करती और गुलजार साहब उनकी बहुत ज्यादा तारीफ किया करते। मीना कुमारी और कमाल अमरोही के बीच धीरे-धीरे आपसी अनबन की लकीरें अब खींचती जा रही थी। अपने रिश्ते को बचाने के लिए मीना कुमारी बस चुप रहती थी। खाकर कहती हूं कि मैं चुप रहूंगी। जिंदगी भर चुप रहो। समय गुजरा और 5 मार्च 1964 की बात है। पिंजरे के पंछी फिल्म का मुहूर्त था। वहां कमाल अमरोही के सेक्रेटरी बाकर पूरी व्यवस्था देखने पहुंचे। वो मीना कुमारी के मेकअप रूम में गए और वहां मेकअप आर्टिस्ट को बोल दिया कि मीना के मेकअप रूम का ध्यान रखिएगा। कोई भी मर्द अंदर नहीं आना चाहिए और जैसे ही मीना कुमारी मेकअप रूम में वापस आई, तो मेकअप आर्टिस्ट ने बाकर का दिया हुआ फरमान मीना कुमारी को सुना दिया। मीना कुमारी को यह सब कुछ सुनकर बहुत ही गुस्सा आया और अब मीना कुमारी के सब्र का बांध टूट गया। पहले ही वो इतनी शर्तों से समझौता करके काम कर रही थी। लेकिन ये तो अब हद ही हो गई थी। आखिर ये फरमान किस इंसान के लिए था और क्यों था? मीना कुमारी गुस्से में थी और उन्होंने गुलजार साहब को अपने मेकअप रूम में बुलवा लिया। लेकिन बाकर के फरमान से अनजान गुलजार साहब भी मीना कुमारी के पास जाने के लिए निकल गए। बाकर ने गुलजार साहब को जाते हुए देख लिया और फिर बाकर ने गुलजार साहब से धक्कामुक्की कर दी और यह सब कुछ देखकर मीना गुस्से से फट गई और मीना कुमारी ने चिल्लाते हुए बाकर से कह दिया, क्या चल रहा है यह सब मेरे रूम में? इतनी पाबंदी किस बात की है? क्या मैं एक वेश्या हूं? यह बात सुनकर बाकर ने अपना आपा खो दिया और बिना सोचे समझे मीना कुमारी के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया। इस थप्पड़ के साथ मीना कुमारी के सब्र ने उनका साथ छोड़ दिया। मीना कुमारी रोते-रोते उस मेकअप रूम से बाहर चली गई और बाकर से बोल कर गई। अमरोही साहब को कह दीजिएगा कि मैं आज के बाद घर कभी नहीं आऊंगी। तुमसे नहीं है बल्कि मुझे जरूर किया है। जिंदगी के जिन लम्हात को मैं भूल चुकी थी उन्हें घसीट कर मेरे मुंह पे दे मारा है। मीना कुमारी के यह शब्द सुनकर बाकर बहुत ज्यादा घबरा गए और सीधे कमाल अमरोही को जाकर सब कुछ बता दिया। कमाल अमरोही ने बाकर पर बिल्कुल भी गुस्सा नहीं किया और कह दिया कि आप चिंता मत कीजिए मैं सब संभाल लूंगा। गुस्से में बेबसी और बेइज्जती के दर्द को सहते हुए मीना कुमारी अपनी बहन मधु के घर चली गई थी और अब मधु कॉमेडियन और एक्टर महमूद की धर्मपत्नी बन चुकी थी। अपनी बहन के घर जाने से पहले मीना कुमारी पहुंची थी पुलिस स्टेशन और वहां जाकर उन्होंने अपनी सुरक्षा की मांग की थी। शाम होने पर जब मीना कुमारी घर वापस नहीं आई तो कमाल अमरोही को भी घबराहट सी होने लगी। वह बाकर के साथ मीना को शहर में ढूंढने निकले और वह ढूंढतेढूंढते मधु के घर भी पहुंचे और वहां उन्हें बाहर पुलिस खड़ी हुई नजर आई तो वह समझ गए कि मीना कुमारी यहीं पर हैं। वो अंदर जाकर मीना से बात करना चाहते थे। लेकिन मीना कुमारी ने तो अपने आप को अंदर से बंद कर रखा था और वह लगातार जोर-जोर से रोती ही जा रही थी। जब मीना कुमारी को बताया गया कि अमरोही साहब बात करना चाहते हैं तो मीना ने साफ-साफ उनसे बात करने के लिए इंकार कर दिया। दरवाजा भी खूब खटखटाया गया लेकिन दरवाजा नहीं खुला। आज मीना कुमारी पूरी तरीके से बिखर चुकी थी और अब अमरोही ने मीना कुमारी को फिर से एक फरमान सुना डाला। अगर आज तुम मेरे साथ नहीं चली तो मैं वापस तुम्हें लेने कभी नहीं आऊंगा। और यह कहते हुए वो वहां से चले गए। अमरोही ने आज भी वही किया था जो वो पहले से करते चले आ रहे थे। फिर से अपने रिश्तों को शर्तों में रख दिया। अगर मेरी बेटी ने जिंदगी का खींचा उछाल थी तो मुझसे शादी क्यों थी? मैंने तो तुमसे अपनी ऊंची हुई मांग सिंदूर भरने की भीख नहीं मांगी थी। काश अमरोही मीना कुमारी की बेइज्जती का एक पल के लिए भी एहसास कर लेते। इतने सख्त ना होते तो बात बन सकती थी। अमरोही साहब रोती-बिलखती मीना कुमारी को वहीं उसी हालत में छोड़ गए। हां हां अलेधा हूं। अलेदा ना होती तो मेरे नसीब में ये दुख क्यों? आज तक किसी दूसरी औरत ने इतना बड़ा बलिदान दिया है भला। और उस दिन के बाद वापस अपनी पत्नी को लेने कभी नहीं आए। आज एक बार फिर से मीना कुमारी बेघर हो गई थी। जिस इंसान के लिए मीना ने सब कुछ छोड़ा, अपनी जिंदगी दांव पर लगाई, आज वही जिंदगी अकेले तन्हा दुख और दर्द की चार दीवारी में कैद होकर रह गई। मेरे जैसी अभागल लड़की को तो कब का मर जाना चाहिए था। मीना कुमारी कुछ दिन तो अपनी बहन के घर पर ही रहीं। इसके बाद महमूद साहब ने उनको अपने दूसरे घर में शिफ्ट कर दिया। जहां महमूद के कई और रिश्तेदार भी रहते थे। मीना कुमारी जी के लिए ऊपर घर में एक हवादार कमरे की व्यवस्था कर दी गई। मीना कुमारी 5 महीने तक वहां रही। लेकिन कुछ ही दिनों में उनको लगने लगा था कि वह किसी पिंजरे के अंदर बंद हो चुकी हैं। महमूद साहब के रिश्तेदार जरूरत से ज्यादा मीना की जिंदगी में दखल देने लगे। मीना कुमारी से कोई भी मिलने आता तो पहले वो रिश्तेदार उनसे कई सवाल जवाब करते। मीना कुमारी इन सभी बातों से अब बहुत ज्यादा परेशान हो गई थी। वह बहुत जल्दी से जल्दी इस मकान से निकल जाना चाहती थी। ऐसे में उनका असिस्टेंट किशोर शर्मा ने जूहू में मीना कुमारी के लिए एक घर देखा जिसका नाम था जानकी कुटीर। मीना कुमारी वहां रहने भी आ गई लेकिन कुछ ही दिनों में उनके साथ रहने आ गए तकरीबन दो दर्जन रिश्तेदार। मीना कुमारी के साथ अक्सर उनके रिश्तेदार पिछले घर में भी रहा करते थे। मीना कुमारी यह जानती थी कि यह सब रिश्तेदार मेरा फायदा उठाने आते हैं। लेकिन वह किसी को भी मना नहीं करती थी। हमेशा शांति के साथ खामोश रहा करती थी। क्योंकि काम का ठेका तो जीवन भर के लिए मीना कुमारी ने ही ले रखा था और इससे वो भला पीछे कैसे हटती? जिधर देखिए ना। पहले की ही तरह मीना कुमारी फिर से काम करती चली गई। लेकिन अब जब घर वापस लौटती थी तो एक सुनापन अकेलापन उनको चारों तरफ से घेर लेता था और ये अकेलापन अंदर ही अंदर मीना कुमारी को खोखला कर रहा था। क्यों? क्यों मुझे हमेशा झूठ ही झूठ मिलता रहा? क्या मैं किसी सच के काबिल नहीं थी? मीना कुमारी के अकेलेपन को कोई नहीं समझ पा रहा था और अपने इसी अकेलेपन को दूर करने के लिए उन्होंने अपना साथी चुना शराब। मीना कुमारी अब पहले के मुकाबले दिन प्रतिदिन ज्यादा शराब पीने लगी। मीना की परवाह किसी को भी नहीं थी। हमेशा की तरह हमेशा की तरह रिश्तेदार सिर्फ उनका फायदा उठाने के लिए उनके साथ रहा करते थे। उनको तो सिर्फ मीना कुमारी के पैसे और घर से मतलब था। मीना कुमारी के रिश्तेदार इतने ज्यादा लालची और मतलबी थे कि मीना कुमारी जब फिल्म की शूटिंग से घर वापस आती तो उनके लिए घर पर खाना तक नसीब नहीं होता था और इस बात का खुलासा अबरार अलवी ने अपनी किताब में भी किया है। जिस औरत के भाग फूटे हो वही समझ सके शायद फिल्मी जगत का उस वक्त का चमकता सितारा जिसके एक इशारे पर बहुत सारी सुख सुविधाएं उनके कदमों में आ सकती थी। आज वो एक रोटी खाने के लिए सोच रही थी कि क्या खाएं और कहां से लाएं। लेकिन मीना कुमारी की यह महानता थी कि वह किसी से कुछ भी शिकायत नहीं करती थी। तो मेरे नसीब में यह दुख क्यों? मीना कुमारी की आगे की फिल्मों की बात करें तो साल 1964 में मीना कुमारी की सांझ और सवेरा फिल्म रिलीज हुई जिसमें गुरुदत्त साहब ने उनके साथ काम किया और यह फिल्म गुरुदत्त साहब की आखिरी फिल्म थी क्योंकि इस फिल्म के बाद ही गुरुदत्त साहब ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। अशोक कुमार के साथ बेनज़र और चित्रलेखा जैसी कुछ अच्छी फिल्में आई। चित्रलेखा तरस खा मुझ पर। मैंने बरसों की तपस्या को तुम्हारे लिए बेच दिया है निष्ठुर। गुरुदेव आपकी हालत देखकर तरस आता है। फिर मीना कुमारी के साथ नजर आया एक नया लड़का जो आगे चलकर हिंदी सिनेमा के ही मैन बने धर्मेंद्र। हमसफर मेरे हमसफर पंख तुम पर फिल्म मैं भी लड़की हूं में मीना कुमारी के साथ धर्मेंद्र नजर आए। उस वक़्त मीना कुमारी बहुत बड़ी सुपरस्टार थीं और धर्मेंद्र एक नए लड़के थे। भगवान ने पहले ही बहुत खूबसूरत शक्ल दी है। उस पर चेहरे पे राखमली नौकरानी की तरह मेहमानों में आती हूं तुम्हें शर्म नहीं आई? क्या ये जताना चाहती थी कि घर का सारा बोझ तुम्हारे कंधों पर है। देखिए देखिए बिगड़िए नहीं। आपने एकदम आकर इतने सारे मेहमानों का खाना बनाने के लिए कह दिया तो घबराहट में मेरे हाथ पैर फूल गए। धर्मेंद्र भी मीना कुमारी के बहुत बड़े फैन थे। एक तरीके से वो मीना कुमारी को पूजा करते थे। मीना कुमारी के साथ काम करना धर्मेंद्र के लिए मानो एक सपने जैसा था। इसलिए जब फिल्म की शूटिंग शुरू हुई तो धर्मेंद्र बहुत ज्यादा घबराए हुए थे। लेकिन धर्मेंद्र की इस परेशानी को मीना कुमारी ने तुरंत समझ लिया और उनको समझाया और उनकी घबराहट को दूर किया। मीना कुमारी के इस तरीके के व्यवहार से धर्मेंद्र बहुत ज्यादा प्रभावित हो गए। दामन छूटेगा कभी लेकिन मीना कुमारी बाहर से जितनी मजबूत अभिनेत्री दिखाई देती थी अंदर से वो उतनी ही ज्यादा कमजोर थी। धर्मेंद्र से बातें करके उन्हें बड़ा अच्छा लगने लगा। मीना कुमारी को किसी के साथ की जरूरत थी जिसके कंधे पर सर रखकर वो अपने गमों का बोझ हल्का कर सके और धर्मेंद्र से बात करके वो अपने आप को अकेला महसूस नहीं करती थी। जो नहीं कहना चाहिए वो कह रहा हूं। मैं कसम खाता हूं। सारी जिंदगी तुम्हारे बताए हुए रास्ते पर चलकर तुम्हारी सेवा में गुजार दूंगा। मुझे अपना लो मुझे अपना अनुशान। धर्मेंद्र का साथ तो मिला मीना कुमारी को लेकिन मीना कुमारी ने इसके बाद भी अपनी शराब पीने की आदत को बिल्कुल कम नहीं किया क्योंकि उनके गम की असली साथी तो शराब ही थी। बाहों में मेरे गमशना तुम उधर मीना के रिश्तेदारों का स्वार्थीपन धीरे-धीरे और ज्यादा बढ़ता चला गया। मीना कुमारी के पैसों को किस तरीके से लूटा जाए। उनके रिश्तेदार बस इसी बात पर ध्यान दिया करते। मीना कुमारी यह सब जानती थी। लेकिन फिर भी वो शांत और चुपचाप रहीं। न जाने कहां से इतनी सहनशक्ति लेकर आई थी मीना कुमारी। इतना दर्द भरा सच जिसको सुनते हुए हमको खुद भी इतनी तकलीफ हो रही है। सुन ले पुकार आई आज तेरे द्वार लेके धर्मेंद्र और मीना अब अच्छे दोस्त बन चुके थे और फिल्मों में काम भी लगातार चल रहा था। धर्मेंद्र मीना कुमारी की परवाह करते थे। उनकी चिंता किया करते थे। तो वहीं मीना जी को धर्मेंद्र के रूप में एक अच्छा दोस्त मिल चुका था। लेकिन यह बात शायद और लोगों को रास नहीं आ रही थी। कुछ समय बाद मीना कुमारी और धर्मेंद्र की प्रेम कहानी उन दिनों के अखबारों और पत्रिकाओं में बड़ी ही मिर्च मसाला के साथ छपने लगी। जबकि बात तो यही सच थी कि मीना कुमारी के दिल की जो उस वक्त दशा थी, उसको धर्मेंद्र ने ही समझा था और उनको दुख से बाहर निकालने के लिए धर्मेंद्र ने उनका साथ दिया था। मैंने प्रभु आज तक कुछ नहीं मांगा। मैंने मीना धर्मेंद्र के साथ को खोना नहीं चाहती थी क्योंकि मीना अभी तक अपनी जिंदगी के हर मोड़ पर कुछ ना कुछ खोती ही आ रही थी। इश्क और दोस्ती में कुछ फासले होते हैं पर इन फासलों को मीडिया वाले कभी नहीं समझते और उसे एक गॉसिप बना देते हैं लेकिन इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी मीना कुमारी ने कभी भी किसी भी मीडिया कर्मी से कोई भी शिकायत नहीं की लेकिन मीना कुमारी को उनकी इन बातों से बहुत ज्यादा तकलीफ होती थी और ये सारी बातें उनके दिल पर गहरी चोट किया करती थी बचा ले सहारा दाता इस दुखिया का इस दिन भर काम की थकान और अंदर से मन परेशान। मीना कुमारी ने जिस तरह से शराब को अपने गले लगाया था। अब धीरे-धीरे वही शराब मीना कुमारी को ही पीने लगी थी। मीना कुमारी एक गहरी खाई की तरफ गिरते हुए चली जा रही थी। मीना कुमारी की नींद का कोई समय नहीं था और ना ही उनके खाने-पीने का। बस वह चलती ही जा रही थी बिना रुके बिना थके अब तक छुपा है वो ऐसे समय बहुत तेजी के साथ आगे बढ़ रहा था साल 1965 आया और मीना कुमारी की कई फिल्में रिलीज हुई और उनमें सबसे अहम फिल्म रही काजल मेरे भैया मेरे चंदा मेरे अनमोल रतन इस फिल्म में मीना कुमारी के साथ थे राजकुमार और धर्मेंद्र। तुमने मुझे आज तक इस जीवन में कभी कुछ नहीं दिया। एक माधवी दी। अब उसके जीवन की भेंट भी मांग रहे हो। और यही वो फिल्म थी जिसने मीना कुमारी को चौथा फिल्म फेयर अवार्ड दिलाया बेस्ट अभिनेत्री का। शर्मा के ना यूं ही खो देना रंगीन। इस फिल्म के बाद मीना कुमारी की एक और फिल्म आई थी भीगी रात। जो कह सका ये फिल्म उस साल की एक बहुत बड़ी हिट फिल्म साबित हुई थी। इसके बाद फूल और पत्थर साल 1966 में आई और इस फिल्म में फिर से धर्मेंद्र उनके साथ थे। यह फिल्म मीना कुमारी की गोल्डन जुबली फिल्म साबित हुई और इसी फिल्म ने धर्मेंद्र को एक स्टारडम दिया था। तुमने मुझे सहारा दिया। मुझ पर दया की और आज आज सबके सामने मैंने तुम पर हाथ उठा दिया। मैं इन हाथों को तोड़ दूंगी। मैं इन हाथों को तोड़ दूंगी, तोड़ दूंगी, तोड़ दूंगी, तोड़ दूंगी। और इसी साल मीना कुमारी की एक और फिल्म रिलीज हुई। बहू बेगम हम इंतजार करेंगे हम इंतजार इस फिल्म के एक सीन में मीना कुमारी के पिता नाराज होकर उनको घर से निकाल देते हैं। मीना कुमारी ने इस सीन को पूरी तरीके से समझ लिया और जब यह सीन शूट होने लगा तो मीना कुमारी ने एक ही शॉट में इतना बड़ा सीन दे दिया। खास बात यह थी कि सीन जैसा मीना कुमारी को समझाया गया था वैसा नहीं था। इस सीन में मीना कुमारी खुद ही खो गई थी और उन्हें उस समय का मंजर याद आ गया था जब वो रियल लाइफ में अपने पिता यानी अली बख्श से माफी मांग रही थी और उन्होंने मीना कुमारी को घर से बाहर निकाल दिया था। मुझे माफ कर दीजिए अब्बा इस बात ने मीना कुमारी को यह भी एहसास करा दिया था कि इतने सालों के बाद भी मीना कुमारी के जख्म पूरी तरीके से हरे थे। मीना कुमारी की ये फिल्म बेहतरीन फिल्म साबित हुई। मीना कुमारी की जिंदगी का दर्द और अकेलापन उनको धीरे-धीरे खाए जा रहा था। लेकिन मीना कुमारी ने कभी भी काम बंद नहीं किया। ये मुझे किन पापों की सजा मिल रही है मां। मेरे दुखों का अंत हो जाएगा। मीना कुमारी का फिल्मी सितारा हमेशा से बुलंद था और उनकी चमक कभी भी कम नहीं हुई। लेकिन लगातार शराब पीने की वजह से उनके चेहरे के साथ-साथ उनकी सेहत की चमक भी अब फीकी पड़ने लगी थी। तबीयत तो मीना कुमारी की खराब ही चल रही थी लेकिन वो परवाह नहीं करती थी और लगातार बस काम किए जा रही थी। एक दिन जब मीना कुमारी की तबीयत ज्यादा खराब हुई तो डॉक्टर के पास उनको जाना पड़ा जांच पड़ताल के लिए। जांच पड़ताल हुई तो मीना कुमारी को पता चला कि उनको लिवर सिरोसिस की बीमारी हो गई है। डॉक्टर ने बीमारी की नज़ाकत को समझते हुए लंदन जाने के लिए कह दिया। साल 1968 जून के महीने में वह अपनी बहन मधु और अपने असिस्टेंट किशोर के साथ लंदन रवाना हो गई और इसके बाद जून से लेकर सितंबर तक मीना कुमारी का लंदन में इलाज होता रहा और उसके बाद वो वापस मुंबई लौट आई। डॉक्टर ने अब उनको आराम करने की सलाह दी और काम करने के लिए बिल्कुल मना कर दिया। लेकिन मीना कुमारी लंदन से आने के बाद ठीक 5 दिनों के बाद अपने काम पर फिर से वापस लौट गई। फिर से शूटिंग शुरू हो गई। हालांकि कुछ टाइम के लिए मीना कुमारी स्टूडियो में नहीं जाती थी। फिल्म की शूटिंग उनके घर पर ही होती थी। फिल्म का नाम था अभिलाषा और इस फिल्म के निर्माता ने मीना कुमारी को एक बहुत महंगा बंगला फीस के तौर पर गिफ्ट किया था। मीना कुमारी और कमाल अमरोही के अलगाव के चलते अमरोही साहब की ड्रीम प्रोजेक्ट फिल्म पाकीजा बीच में ही रुक चुकी थी। एक दिन सुनील दत्त और नरगिस ने पाकीजा फिल्म की कुछ फोटोस देखे और अमरोही से कह दिया कि यह फिल्म एक इतिहास रच देने वाली फिल्म है। इसको बीच में अधूरा बिल्कुल मत छोड़िएगा। इसे पूरा जरूर कीजिएगा। दोस्तों यह बात तो हम सब जानते हैं कि यह फिल्म अमरोही का सबसे बड़ा सपना थी जिसे वह हर हाल में पूरा करना चाहते थे। इसके बाद कमाल अमरोही ने 25 अगस्त साल 1968 को मीरा कुमारी को एक खत लिखा और उन्होंने खत में लिखा कि तुम अगर इस शर्त पर पाकीज़ा फिल्म करोगी कि मैं तुम्हें तलाक दे दूं तो मुझे यह मंजूर है।

इस फिल्म को बनाने के लिए बहुत सारे लोगों की जिंदगी जुड़ी हुई है। इसलिए इस फिल्म को पूरा करने के लिए तुम मेरी मदद करो। तुम्हारा चंदन उर्फ़ कमाल। इसके बाद लगभग 5 महीने बाद मीना कुमारी ने उस खत का जवाब दिया। पाकीजा फिल्म मेरे दिल के करीब है। मैं हमेशा से इस फिल्म को करना चाहती थी। मैं यह फिल्म जरूर करूंगी और इस फिल्म के लिए मैं आपसे बस एक सिक्का लूंगी। 16 मार्च 1969 को मीना कुमारी फिल्म पाकीजा के सेट पर पहुंची तो कमाल अमरोही ने उनका जोरदार स्वागत किया लेकिन अब परेशानी यह हुई कि अब मीना कुमारी पहले की तरह नहीं लगती थी। बीमारी की वजह से उनका पेट फूल गया था और मीना काफी कमजोर भी महसूस करती थी और उनका शरीर फिल्म की शूटिंग करने की इजाजत नहीं दे रहा था। पर दिल का क्या करें? वह तो मन में फिल्म करने की ठान चुकी थी क्योंकि वह इस फिल्म से कमाल अमरोही यानी कि अपने चंदन की ड्रीम फिल्म को पूरा करना चाहती थी। जब पाकीजा फिल्म कई सालों पहले बनाने की शुरुआत हुई थी तब इस फिल्म के हीरो अशोक कुमार थे। लेकिन अब फिल्म कई सालों बाद दोबारा से शुरू हो रही थी। तो अब चेहरे पर उम्र का असर दिख रहा था। इसलिए कमाल अमरोही के जहन में धर्मेंद्र का ख्याल आया। लेकिन मीना कुमारी और धर्मेंद्र के प्रेम के चर्चों ने यह ख्याल भी बदल दिया। फिर काफी सोच विचार के बाद कमाल अमरोही ने राजकुमार को साइन किया। राजकुमार भी मीना कुमारी के बहुत बड़े फैन थे। वो खुद इतने बड़े स्टार थे। लेकिन वो खुद मीना कुमारी के सामने खड़े होकर अपने डायलॉग्स भूल जाया करते थे। जब इस फिल्म का एक गाना मौसम है आशिकाना शूट हो रहा था। तब मीना का पेट फूला हुआ था। पेट छुपाने के लिए कुर्ते के नीचे सलवार की जगह उनको एक मर्दाना लंगी पहनाई गई थी और बाद में जब यह फिल्म रिलीज हुई तो यह मजबूरी में पहनाई गई ड्रेस उस दौर का फैशन ट्रेंड बन गई थी। जाओ मैं बना दूं पलकों का कामयाब। अब धीरे-धीरे मीना कुमारी ने अपनी खराब हालत के चलते फिल्मों में लीड रोल करने बंद कर दिए थे। डॉक्टर्स ने उनको काम करने के लिए बिल्कुल सख्त मना किया था। लेकिन इस बात को तो वह बिल्कुल नजरअंदाज कर चुकी थी, भूल चुकी थी और धीरे-धीरे उनकी हालत अब और भी ज्यादा खराब होती चली गई। मीना कुमारी के हाल इतने खराब हो गए थे कि मीना कुमारी फिल्म का एक शॉट देती तो उनके पास एक स्पॉट बॉय उनके लिए एक कुर्सी लेकर खड़ा रहता था। जैसे ही वो शूट पूरा होता मीना कुमारी तुरंत उस पर बैठ जाती क्योंकि अब मीना कुमारी से ज्यादा देर खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। मीना कुमारी की तबीयत दिन प्रतिदिन और ज्यादा खराब हो गई। लेकिन इस खराब हालत में भी जैसे तैसे मीना कुमारी ने अपना काम बंद नहीं किया और कमाल अमरोही की फिल्म पाकीजा को पूरा करने में जी जान लगा दिया। जहां इस फिल्म के लिए कहा जाता था कि कमाल अमरोही ने मीना कुमारी का बहुत ख्याल रखा था। वहीं उनके इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया। मीना कुमारी की बहन खुर्शीद बानो ने। खुर्शीद बानो ने कहा था कि मीना कुमारी को कमाल अमरोही से खुद को लेकर कोई उम्मीद नहीं थी। उम्मीद होती भी कैसे? पाकीजा फिल्म की शूटिंग के वक्त कमाल अमरोही ने मीना के साथ जैसा व्यवहार किया उसके बाद वो कैसे कमाल अमरोही के लिए कुछ महसूस कर सकती थी। कमाल अमरोही मीना कुमारी की तबीयत के बारे में जानते थे। लेकिन उन्होंने मीना की तबीयत की कोई परवाह नहीं की और अपने एक शॉट को परफेक्ट करने के लिए बीमारी की हालत में भी मीना कुमारी को पहाड़ी से 26 बार नीचे दौड़ाया था। यह सब उनकी बहन ने बताया। खुर्शीद ने आगे बताया कि मीना की दवाई खाने और रहने की कोई भी व्यवस्था कमाल अमरोही ने नहीं की थी। उन दोनों के बीच सिर्फ काम का रिश्ता था। मीना पाकीजा फिल्म सिर्फ कमाल के लिए पूरा करना चाहती थी और कमाल इस फिल्म के जरिए अपने सपने को। उनकी बहन और बताती हैं कि इस फिल्म के सेट पर ऐसा लग रहा था कि जैसे कमाल अमरोही ने मीना कुमारी की जान लेने की पूरी नियत बना ली थी। यह सच में सुनने में बहुत ही डरावना है। लेकिन उस वक्त एक-एक इंसान इस सच से वाकिफ था। मीना कुमारी ने उसी वक्त एक फिल्म और की थी गोमती के किनारे और जब यह फिल्म बन रही थी तो उस वक्त फिल्म डायरेक्टर के पास पैसे खत्म हो गए थे तो उस वक्त मीना कुमारी ने बिना स्वार्थ उनको पैसे देकर उनकी मदद की थी। मीना कुमारी कभी भी किसी का भी दिल नहीं दुखाती थी। जो उनसे प्यार करता था वो अपना सब कुछ उस इंसान पर कुर्बान कर देती थी। और जब गोमती के किनारे फिल्म के डायरेक्टर सावन कुमार परेशानी में आए तो मीना कुमारी ने अपना एक बंगला बेचकर जो कि अभिलाषा फिल्म के लिए उनको फिल्म के निर्माता ने फीस के तौर पर भेंट किया था। वो बंगला मीना कुमारी ने सावन कुमार के लिए बेच दिया था। सावन कुमार बताते हैं कि इस फिल्म के वक्त मीना कुमारी की तबीयत बहुत ज्यादा खराब थी। वो शॉट देने के लिए जैसे ही खड़ी होती थी तो लगता था कि मीना कुमारी कहीं गिर ना जाएं। इसीलिए सावन कुमार पल-पल उनका बहुत ज्यादा ख्याल रखते थे। मीना कुमारी हमेशा हंसते हुए सावन कुमार को बस यही कहती थी कि तुम्हारी फिल्म पूरी होने से पहले मैं मरूंगी नहीं। मीना कुमारी ने जैसे तैसे इस फिल्म की शूटिंग भी पूरी कर ली और इस फिल्म में मीना कुमारी के साथ मुमताज ने भी काम किया था। मीना कुमारी ने फीस के तौर पर मुमताज को एक बंगला भी दिया था। आज तो मेरी हंसी उड़ाए। 4 फरवरी सन 1972 मराठा मंदिर में पाकीजा फिल्म का प्रीमियर रखा गया। मीना कुमारी सफेद लिबाज में उस प्रीमियर पर पहुंची। यह मीना कुमारी के अंदर का एक विश्वास ही था कि इतनी ज्यादा तबीयत खराब होने के बावजूद वो फिल्मों की शूटिंग को पूरा कर पाएं। इन सभी फिल्मों की शूटिंग पूरी होने के बाद अब मीना कुमारी बिस्तर पर आ गई थी। लगातार काम करना उनके लिए जानलेवा साबित हो गया था। जब एक बार कोई शख्स मीना कुमारी से मिलने आया तो वह बोली कि मुझे अपनी जिंदगी और फिल्मों से कभी आराम ही नहीं मिला तो इस बीमारी से कैसे आराम मिल सकता है। मार्च सन 1972 मीना कुमारी की तबीयत बेहद खराब हो चली थी और मीना पूरी तरह से बिस्तर पर लाचार थी। हालत बहुत ज्यादा गंभीर और दर्दनाक हो चली थी। उनका पेट पानी से बहुत ज्यादा फूल गया था। जब भी थोड़ा सा हिलती तो उनके होठों से दर्द की एक हल्की सी चीख निकल पड़ती थी। बहुत ज्यादा कमजोर हो चली थी मीना कुमारी। मीना कुमारी के अब हाथपांव भी हिलडुल नहीं रहे थे। अब उनकी दोनों बहनें मधु और खुर्शीद उनके साथ रहने लगी। मीना कुमारी हर वक्त पीठ पर एक बड़े से तकिए को लगाकर लेटी रहती थी। मीना कुमारी ने अपनी बहन खुर्शीद से कहा कि शायद यह सही वक्त है। मेरे पास कोई अधूरा काम नहीं है। कमाल साहब के साथ-साथ बाकी सभी फिल्में पूरी हो गई हैं। अब कोई यह नहीं कहेगा कि मीना ने अपना काम पूरा नहीं किया और काम पूरा किए बिना ही चली गई। मैं आपके लिए और आपके बच्चों के लिए जितना भी कर सकी वह मैंने किया है। अब मैं मरने के लिए पूरे तरीके से तैयार हूं। यह बात सुनकर बहन खुर्शीद बिलख-बिलख कर रोने लगी और उन्होंने तुरंत डॉक्टर साहब को बुलाया। मीना कुमारी अब ऑक्सीजन पर थी और हालत ऐसी हो गई थी मीना कुमारी की कि वह दर्द से चीख रही थी। लेकिन दर्द है कि कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। दो दिन तक घर पर ही इलाज चला। लेकिन उसके बाद मीना को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया। मीना कुमारी अस्पताल नहीं जाना चाहती थी लेकिन जाने के अलावा कोई और चारा भी तो नहीं था। मीना कुमारी मालाबार के सेंट एलिजाबेथ हॉस्पिटल में वो भर्ती हुई। 28 मार्च 1972 को अस्पताल जाने से पहले ऐसी हालत में भी मीना को याद था कि इलाज के लिए पैसों का इंतजाम करना है। तो उन्होंने अपनी बहन खुर्शीद से पूछा कि घर पर पैसे हैं? तो खुर्शीद ने कहा कि घर में तो थोड़े से ही पैसे हैं। तो ऐसे में मीना ने बहन से कहा कि किसी भी हालत में कमाल अमरोही से कोई भी पैसे नहीं मांगे जाने चाहिए। क्योंकि ऐसा करना मेरे आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुंचाएगा। मैं पूरी जिंदगी सबके लिए करती रही हूं और अपनी मौत के वक्त मैं किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना चाहती। मीना कुमारी को याद आ कि फिल्म निर्माता प्रेम जी से कुछ पैसे लेने थे जो मीना के थे। जब उनसे बात की गई तो उन्होंने कहा कि मैं जल्द से जल्द पैसा भिजवा देता हूं। थोड़ी देर में पैसे भी आ गए और एक एंबुलेंस भी। मीना ने खुर्शीद से कहा, “मैं आखिरी बार अपने कमरे को देखना चाहती हूं।” उसको देखने के बाद उन्होंने अपने कमरे को बंद करने के लिए कह दिया और साथ में यह भी कि अब मैं शायद दोबारा वापस नहीं आऊंगी। और जब मैं वापस आऊं तो मुझे मेरी मां और बाबूजी के बगल में दफना दिया जाए। अस्पताल जाने से पहले मतलबी रिश्तेदारों की भीड़ घर पर लग गई। मीना उन सभी रिश्तेदारों से मिली और खुशी-खुशी आखिरी अलविदा कहा। जातेजाते मीना अपना घर गमगीन आंखों से निहार रही थी। उनको यकीन हो चला था कि अब मैं वापस नहीं आऊंगी। मीना जी सभी को अपनी सादगी भरी मुस्कान देते हुए एंबुलेंस में बैठ गई और शाम को फिर कमाल अमरोही भी अपने बेटे ताज अमरोही के साथ उनसे मिलने पहुंचे और उस दिन मीना कुमारी के पेट से डॉक्टर ने कई लीटर पानी बाहर निकाला था। मीना कुमारी की हालत थोड़ी सी सुधर रही थी। कहा जाता है कि कमाल अमरोही जिस दिन अस्पताल पहुंचे थे मीना से मिलने तो वह अपने साथ पैसे भी लेकर गए थे। लेकिन मीना ने उनसे पैसों का कोई भी जिक्र नहीं किया और इसीलिए वह पैसे वापस लेकर आ गए। अगली सुबह परिवार खुश था कि मीना की सेहत में सुधार हो रहा था। लेकिन शायद नियति को तो कुछ और ही मंजूर था। अचानक से कुछ देर बाद ही मीना जी की तबीयत ज्यादा खराब हो गई। दर्द से मीना कुमारी तड़पने लगी। खुर्शीद ने डॉक्टर को जोर-जोर से चिल्लाकर पुकारा। दवाइयां दी गई लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। रात भर मीना कुमारी दर्द से तड़पती रही, दर्द को झेलती रही और उसी हालत में आंख से आंसू भी निकलते रहे। दवाइयों ने भी आखिरकार असर करना बंद कर दिया था। 30 मार्च साल 1972 की सुबह डॉक्टर ने कहा अब केवल लोगों की दुआ ही इनको बचा सकती है। हम अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहे हैं। मीना के इलाज के लिए लंदन के उस डॉक्टर से भी संपर्क किया गया था जिसने मीना का लंदन में इलाज किया था। लेकिन उस डॉक्टर ने भी इलाज के नाम पर एक दवा का नाम बता दिया था और वह दवा उस वक्त सिर्फ यूरोप में मिला करती थी। तो ऐसे में फिल्म निर्माता ओपी रहलान ने उनकी मदद की। उन्होंने अपने एक दोस्त को लंदन फोन किया और दवाई लेकर तुरंत मुंबई बुला लिया। डॉक्टर ने ग्लूकोस ड्रिप शुरू की और पैर में एक सुई डाली गई। उधर उनकी बहनें और सभी चाहने वाले उनके लिए दुआ कर रहे थे। तो ऐसे में मीना कुमारी दर्द भरी चीख के साथ जाग गई। चीख सुनकर बहने अंदर भागी। मीना कुमारी के पास गई तो मीना कुमारी बोली कि मैं मरना नहीं चाहती मेरी बहन मैं मरना नहीं चाहती और जैसे खुर्शीद ने मीना को अपनी बाहों में लिया तो मीना ने अपना सर एक तरफ झटक लिया और इसी के साथ अब मीना कोमा में चली गई। रात भर बहनों का रो-रो कर बुरा हाल हो गया। कमाल अमरोही भी पूरी रात जागते रहे और मीना की यह हालत देख रोने लगे।

अगली सुबह डॉक्टर मीना के पेट से पानी बाहर निकाल रहे थे। इंजेक्शंस पे इंजेक्शंस दिए जा रहे थे। वहीं पास खड़ी अभिनेत्री बेगम पारा से यह सब देखा नहीं गया और वह बोल पड़ी कि अल्लाह के नाम मीना को बखश दो। उनको यह यातनाएं देना बंद कर दो। लेकिन शायद यह सब इलाज के लिए जरूरी था। लेकिन अब तो पानी की जगह मीना के शरीर से खून बाहर आने लगा। अस्पताल में मीना के चाहने वालों की भीड़ पल-पल बढ़ती जा रही थी। गुलजार, शायर बानो, नादिरा, दिलीप कुमार, धर्मेंद्र जैसे बहुत से लोग आए। खुर्शीद बानो ने मीना कुमारी को पवित्र जल भी पिलाया और सबके सामने दुआ करने लगी। 31 मार्च 1972 समय 3:24 पर मीना ने अपनी आंखें खोली। उन्होंने सबको देखा और अपनी बहन मधु की बाहों में इस दुनिया को हमेशा हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। जब मैं मर जाऊं तो खूब सजाना मुझे मांग सिंदूर से भर देना रे ताकि लोग कह सके सती लक्ष्मी जय मीना कुमारी ने अपने जाने का भी दिन चुना तो गुड फ्राइडे यानी माफी का दिन हमेशा की तरह बिना शिकायत बिना शिकवे के सबको माफ करके चली गई मीना कुमारी बर्थडे को पाने के लिए मैंने अपना सब खुश नछा कर दिया। एक चमकता सितारा इस जमीन को छोड़कर हजारों लाखों सितारों में जाकर मिल चुका था और अपने पीछे छोड़ गया एक ऐसी चमक जो आज तक वैसी की वैसी बरकरार है और हमेशा हिंदी सिनेमा और लोगों के बीच भी रहेगी। मीना कुमारी तो धरती को छोड़कर जन्नत पहुंच गई लेकिन उनके शरीर को अभी भी शांति नहीं मिली थी। उनकी बहन ने कहा कि मीना चाहती थी कि उनके शरीर को उनके घर ले जाकर बिस्तर पर उनके कमरे में लेटाया जाए और उसके बाद उनको अब्बा और अम्मी के पास दफन किया जाए। लेकिन डॉक्टर ने मीना कुमारी के शरीर को घर ले जाने के लिए मना कर दिया क्योंकि मीना के शरीर में पानी बहुत ज्यादा भर गया था और इनको घर ले जाएंगे तो यह शरीर फट सकता था। इनको तो सीधे आप कब्रिस्तान ले जाएं यही बेहतर होगा। तो वहीं ऐसे में कमाल अमरोही ने कहा कि मीना की ख्वाहिश थी उनके शरीर को कमाल अमरोही के दादा के बगल में अमरोहा में दफनाया जाए। तो ऐसे में मीना की बहनें कुछ भी नहीं बोल पाई क्योंकि कानूनी तौर पर वो अभी भी उनकी ही बेगम थीं। मीना कुमारी की आखिरी इच्छा को ध्यान में रखते हुए उनके पार्थिव शरीर को एक बार तो उनके फ्लैट पर ले जाने का तय हुआ। लेकिन बात अटक गई। अस्पताल के बिल पर बिना पेमेंट के मीना कुमारी के शरीर को देने से अस्पताल वालों ने मना कर दिया।

तब मीना कुमारी के एक डॉक्टर फैन ने उस पेमेंट को पूरा कर खुद ही भर दिया और बहुत सी जगह यह लिखा और पढ़ा गया था और सुना जाता है कि मीना कुमारी के पास इतने भी पैसे नहीं थे कि अस्पताल के बिल को वो अदा कर सकें। लेकिन बॉलीवुड नवेल इन सभी बातों को एक सिरे से पूरी तरीके से खारिज करता है। क्योंकि हॉस्पिटल जाने से पहले मीना कुमारी ने पैसों की पूरी व्यवस्था कर ली थी। लेकिन वो यह नहीं जानती थी कि इस इलाज में बहुत सारे पैसे खर्च होंगे। जिसके खून में ही खुददारी बहती हो वो कभी नहीं चाहेगी उसके इलाज का पैसा कोई और दे। जीते जी तो उन्होंने अपने पति कमाल अमरोही से एक भी पैसा नहीं लिया था। हालांकि यह बात भी सच है कि कमाल अमरोही ने उस फैन को सारे पैसे वापस लौटा दिए थे जो उसने मीना कुमारी के इलाज के लिए दिए थे। मीना कुमारी के पावन शरीर को अस्पताल से नीचे लाया गया। ओपी रहलान, राजेंद्र कुमार, कमाल अमरोही, अल्ताफ सभी मिलकर मीना कुमारी के शरीर को नीचे लेकर आए। सब जगह यह खबर आग की तरह फैल चुकी थी कि मीना कुमारी अब इस दुनिया में नहीं रही। मीना कुमारी के आखिरी दर्शन के लिए अभिनेत्री रेखा, राखी, जया भादुरी, फरीदा जलाल, बी आर चोपड़ा, अमिताभ बच्चन, यश चोपड़ा, धर्मेंद्र, राजकुमार जैसे बहुत से नामचीन लोग वहां पहुंचे। उनको आखिरी बार घर ले जाने के बाद मीना कुमारी की आखिरी अंतिम यात्रा रात 10:00 बजे कब्रिस्तान पहुंची।

अंतिम प्रार्थना के बाद फिर ट्रेजडी क्वीन मीना कुमारी को दफन कर दिया गया। जिंदगी भर दूसरों के लिए जीने वाली महान अभिनेत्री मीना कुमारी आज हमेशा हमेशा के लिए अपने काम से कभी ना खत्म होने वाली छुट्टी पर चली गई। मीना कुमारी की दोनों बहन मीना के गम से कभी बाहर ही नहीं आ पाई। मीना कुमारी जब पिता के घर थी तो वह उनके लिए अपने दर्द को छुपाकर उनके लिए कमाती रहीं। शादी के बाद जिंदगी की हर बदनामी और दर्द और अकेलेपन से लड़ते हुए पति कमाल अमरोही के लिए कमाती रही। लेकिन मीना कुमारी को कभी भी किसी भी रिश्ते में दो पल का सुकून और इज्जत नहीं मिली थी। मीना कुमारी आज भले ही जिंदा नहीं है लेकिन उन्होंने अपने लिए लोगों के दिलों में जो प्यार कमाया है वह हमेशा मीना को युगों युगों तक जीवित रखेगा। मीना कुमारी के चले जाने के बाद नौशाद साहब ने कहा था भारतीय सिनेमा महान अभिनेत्री का निर्माण तो कर सकता है लेकिन दूसरी मीना कुमारी कभी नहीं बना सकता। सबसे सुंदर अभिनेत्री मधुबाला को कहा जाता है। लेकिन मीना जैसी अद्भुत आवाज किसी के पास नहीं थी। मैंने जाना कि आगे सांवरिया मुझे मैंने जाना। मीना कुमारी को कई दूसरे एक्टर्स को सुपरस्टार बनाने का भी श्रेय जाता है। इसमें सुनील दत्त, धर्मेंद्र, राजेंद्र कुमार जैसे दिग्गज लोगों के नाम शामिल हैं। मीना कुमारी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि देने के लिए उस वक्त बैजू बावरा फिल्म वापस से सिनेमाघरों में चलाई गई थी। जिसे देखकर दर्शकों ने मीना को खूब याद किया और अपनी आंखें गमगीन की। तो वहीं पाकीजा फिल्म को दर्शकों ने इतना प्यार दिया कि वो एक क्लासिकल सुपरहिट फिल्म बन गई। फिर मेरी आवारा लाश अपने इस गुलाबी मकबरे में दफन हो जाने के लिए लौट आई।

जहां अलग-अलग तरीके से लोग मीना कुमारी को श्रद्धांजलि दे रहे थे, तो वहीं महान अभिनेत्री नरगिस ने एक लेख मीना कुमारी के नाम लिखा। उन्होंने लिखा मीना तुम्हें यह मौत मुबारक हो। इन लाइनों ने सभी को चौंका दिया था कि नरगिस ने आखिर ऐसा क्यों लिखा लेकिन इस बात का खुलासा तो हम पहले ही अपनी वीडियो में कर चुके हैं। नरगिस ने मीना कुमारी की याद में नेत्रहीन लोगों के लिए एक ट्रस्ट खोला था। 22 नवंबर 1972 को मीना कुमारी की आखिरी फिल्म भी रिलीज हुई गोमती के किनारे। इस फिल्म को दर्शकों ने खूब प्यार दिया और यह भी एक हिट फिल्म बन गई थी। जो मुझे इन गलियों में लाया जो भी था तो दोस्तों ये थी पूरी जिंदगी की कहानी मीना कुमारी की जिसको बताने के लिए हमारे पास शायद शब्द ही कम पड़ गए हैं। मीना कुमारी को अपनी जिंदगी में हमेशा सिर्फ दर्द ही मिला और दर्द से निजात ऐसे मिलेगी यह किसी ने नहीं सोचा था। हिंदी सिनेमा में चाहे कोई भी दौर आए लेकिन हर दौर हर युग में यह महान अभिनेत्री यूं इतिहास के पन्नों में चमकते सितारे की तरह रोशनी फैलाती रहेगी। कमाल अमरोही भले ही उनके पति थे लेकिन कहीं ना कहीं उनकी मौत और ऐसी हालत के जिम्मेदार भी थे। पति को पाने के लिए मैंने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। अपने यशोदा दुलार सब कुछ भर दिया मैंने। मीना कुमारी वो अभिनेत्री थी जिनको मां की कोख से लेकर जन्म लेने तक पिता की बेदर्दी मिली और शादी के बाद पति की बेरहमी मिली। लेकिन मीना कुमारी तो मीना कुमारी थी। बिना शोर और शिकायत की दुनिया से रुखसत हो गई।

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