मासीबा कहे जाने वाली अन्य कैटिगरी के महिलाओ के लिए क्यों नही सुरक्षा के कानून?

प्राचीन भारतीय ग्रंथों में थर्ड जेंडर या को हमेशा समाज का अभिन्न अंग माना गया। उन्हें सम्मान दिया गया। रामायण के पात्रों से लेकर महाभारत की कथाओं तक और मोहिनी जैसे देवताओं के स्वरूपों ने साबित किया कि जेंडर किसी एक खांचे में फिट नहीं हो सकता। मगर आधुनिक भारत में यह सम्मान एक लंबी लड़ाई बन गया है।

संवैधानिक अधिकारों से सालों तक वंचित रहने के बाद साल 2009 में पहली बार सरकारी फॉर्म्स में अदर या थर्ड जेंडर के रूप में उम्मीद की एक किरण जगी। साल 2014 में नालसा जजमेंट ने उन्हें मौलिक अधिकार दिलाए और 2019 में ट्रांसजेंडर पर्संस एक्ट लाया गया। लेकिन क्या हकीकत में यह देश इन लोगो के लिए समान हो सका है? यह सवाल तब और गहराता है जब हम भारत के क्रिमिनल लॉ को देखते हैं। ब्रिटिश कालीन कानून यानी को हटाकर भारतीय न्याय संहिता यानी बीएएस 2023 लाया गया।

इसके जरिए कानून को आधुनिक और विक्टिम फेवरिंग बनाने का दावा किया गया। 1 जुलाई 2024 से यह नया कानून लागू भी हो गया। लेकिन क्या यह कानून भी न्याय को जेंडर न्यूट्रल बना सका? असल में में शोषण जैसे अपराधों के कानूनों में अलग जेंडर महिलाओं का जिक्र तक नहीं है।

हमारा जस्टिस सिस्टम एक तरह से यह मानता ही नहीं कि इन औरतों के साथ भी शोषण या अपराध होते हैं। नेशनल रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े भी इन के खिलाफ कम दर्ज होने वाले अपराधों पर गहरी चिंता जताते हैं। यही वजह है कि हाल ही में 8 अक्टूबर 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया।

एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया जिसमें इन महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हो रहे अपराधों को आपराधिक श्रेणी में लाने की बात कही गई। कोर्ट ने साफ कहा कि कानून में बदलाव संसद को ही लाना होगा।

तो ऐसे में क्या सरकार अब ट्रांस अधिकारों के नाम पर सिर्फ पन्नों की धूल खा रहे वादों से आगे बढ़कर समान कानून बनाएगी? इस वीडियो में हमने इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की है। तारीख 8 अक्टूबर 2025 दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार को एक नोटिस जारी किया। यह नोटिस था उस पीआईएल पर जिसमें यह कहा गया कि महिलाएं और बच्चों के खिलाफ हो रहे शोषण के मामले दर्ज हो। क्योंकि अभी तक इस देश में जितने भी लॉज़ हैं उनमें से किसी में भी महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हो रहे को अपराधों को अपराध की श्रेणी में रखा ही नहीं गया है। जैसा हमने आपको शुरुआत में ही बताया था कि भारतीय दंड संहिता यानी की जगह सरकार भारतीय न्याय संहिता बीएएनएस 2023 को लाई। 1 जुलाई 2024 से इसे लागू किया गया। जब यह एक्ट एक बिल हुआ करता था तब इसके पक्ष में सरकार ने कई दलीलें दी।

कहा गया कि इसे भारत के क्रिमिनल लॉ सिस्टम को आधुनिक बनाने, मॉडर्न बनाने और ब्रिटिश जमाने के पुराने कानून को हटाने के लिए लाया गया है। कहा गया कि बीएएनएस में क्राइम्स को झेलने वाले लोग यानी विक्टिम्स को फेवर करने वाले कानून होंगे जिसमें केस सिद्ध करने का बर्डन पीड़ितों पर नहीं आरोपी पर होगा। और तो और यह भी कहा गया कि बीएनएस के केस जल्द से जल्द निपटाए जाएंगे और न्याय करने में देरी नहीं होगी। यह तो हो गई कहने वाली बातें।

लेकिन असल में क्या हुआ? असल में भारतीय न्याय संिता में जहां रेप के कानूनों का जिक्र है, वहां कहीं भी ट्रांस महिलाओं का जिक्र नहीं है। मतलब हमारा क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम यह मानता ही नहीं कि औरतों के साथ भी शोषण केसेस होते हैं। साल 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार भारत में कुल 487803 लोग ऐसे थे जिन्होंने अपना जेंडर अन्य यानी अदर चुना। जिसमें आमतौर पर शामिल होते हैं।

यह भारतीय जनगणना में ट्रांसजेंडर आबादी का पहला आधिकारिक रिकॉर्ड था। करंट एस्टीमेट्स बताते हैं कि वास्तविक संख्या काफी अधिक हो सकती है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और रिपोर्ट्स का मानना यह है कि वास्तविक संख्या 2011 के आंकड़े से छ से सात गुना अधिक हो सकती है। वहीं कुछ रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि भारत में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों की संख्या लगभग 48 लाख तक हो सकती है।

ऐसा इसलिए है क्योंकि 2011 की जनगणना में कई ट्रांसजेंडर ने सामाजिक कलंक यानी स्टिग्मा के डर से अपनी पहचान उजागर नहीं की होगी या उन्हें अन्य की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया होगा। नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन ने 204 में एक रिपोर्ट पब्लिश की जिसमें एनसीआरबी यानी नेशनल रिकॉर्ड ब्यूरो के 2020 के डाटा के बारे में लिखा गया और कहा गया 2020 में की रिपोर्ट में सिर्फ 236 लोगों को अपराध का शिकार बताया गया। 2022 की रिपोर्ट में नौ लोगों की के मामले को दर्ज किया गया। लेकिन एक भी केस दर्ज नहीं हुआ। लोगों की सुरक्षा के लिए जो ट्रांसजेंडर प्रोटेक्शन एक्ट बना है उसका इस्तेमाल भी बहुत कम होता है और यह सब गहरे चिंता का विषय है। फिर आया साल 2014 जब सुप्रीम कोर्ट ने एक लैंडमार्क जजमेंट दिया। वो जजमेंट था नेशनल लीगल सर्विज अथॉरिटी वर्सेस यूनियन ऑफ इंडिया यानी नालसा। इसमें सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने साफ-साफ कहा कि स्टेट इस देश के ट्रांसजेंडर को रिप्राइज़ नहीं करेगा।

उसे रिकॉग्नाइज़ करेगा। उन्हें वह सारे फंडामेंटल राइट्स यानी मौलिक अधिकार मिलेंगे जो देश के बाकी नागरिकों को अब तक मिलते आए हैं। किसी भी आधार पर ट्रांसजेंडरर्स के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। ना कानून में ना कानून के सामने ना कानून के परोक्ष में ना कानून के पीछे। यही नहीं साल 2019 में राइट्स बिल भी पास हुआ और l पर्संस प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट बन गया। इस एक्ट में कुछ दावे किए गए। दावे यह कि देश में ट्रांस लोगों के खिलाफ हो रहे अपराधों के लिए अलग से कानून बनेंगे। उनके लिए वेलफेयर स्कीम्स बनाई जाएंगी। किसी भी तरह के भेदभाव से उन्हें बचाया जाएगा। लेकिन असल में हुआ क्या? वेलफेयर स्कीम्स की बात तो रहने ही देते हैं। ट्रांसजेंडरर्स के खिलाफ हो रहे तमाम तरीके के अपराधों को आज तक स्वीकारा नहीं गया। स्वीकारा भी गया तो केवल मर्डर जैसे अपराधों को। इसमें यह भी देखने वाली बात है कि इस देश में जितने संख्या की है उसके हिसाब से उनके खिलाफ हो रहे क्राइम्स की संख्या बहुत कम गिनाई जाती है। रिपोर्ट्स बताती है कि उनके साथ होने वाले रजिस्टर ही नहीं किए जाते और जैसे अपराधों को रजिस्टर करने के लिए तो कोई कानून ही नहीं है। एक बार को ट्रांस मर्दों की बात छोड़ देते हैं। क्योंकि मर्दों के खिलाफ हो रहे रेप को तो वैसे भी इस देश के कानून ने स्वीकारा नहीं है।

लेकिन फ्रांस महिलाओं और बच्चों के खिलाफ हो रहे यौन अपराधों को अब तक क्यों लॉज़ में जगह नहीं मिली है यह सोचने वाली बात है और इसी पर सोचा एक शख्स ने नाम डॉक्टर चंद्रेश जैन उन्होंने ही इस मामले को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका यानी पीआईएल लगाई जिसमें उन्होंने कहा कि महिलाओं और बच्चों को भी भारतीय न्याय संहिता यानी में विक्टिम पीड़ित माना जाए। इसी पीआईएल पर 8 अक्टूबर 2025 को दिल्ली हाई कोर्ट में सुनवाई चल रही थी। सुनवाई कर रहे थे दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस तुषार राव। दलील सुनने के बाद उन्होंने कहा कि महिलाओं और बच्चों को बीएनएस में शामिल करने के लिए पूरे लेजिस्लेचर में यानी पार्लियामेंट से पास हुए नियमों में बदलाव लाना होगा और यह काम जुडिशरी का नहीं बल्कि खुद पार्लियामेंट का है। क्योंकि कोर्ट सिर्फ बने हुए कानून को लागू करवा सकते हैं।

उसी के तहत फैसला दे सकते हैं लेकिन वो नया कानून खुद नहीं बना सकते और इसके लिए पार्लियामेंट को ही सोचना होगा। कोर्ट ने यह कहते हुए केंद्र सरकार को एक नोटिस भी जारी किया। साथ ही कहा कि सरकार को ट्रांस महिलाओं और बच्चों के खिलाफ घटने वाले अपराधों के लिए जल्द से जल्द कुछ करना होगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने सरकार को एक तरह से निर्देश दिया कि जितनी जल्दी हो सके इस पर काम किया जाना चाहिए और कानून लाना चाहिए।

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