48 घंटे बिना फेफड़ों के कैसे जिंदा रहा शख्स ?

इंसान की जिंदगी से जुड़ा एक रूल है। रूल ऑफ थ्री माने इंसान बिना कुछ खाए 3 हफ्ते तक जिंदा रह सकता है। 3 दिन बिना पानी पिए रह सकता है। लेकिन बिना ऑक्सीजन 3 मिनट से ज्यादा जिंदा नहीं रह सकता। हम जिस हवा में सांस लेते हैं उससे ऑक्सीजन खींचने का काम करते हैं हमारे फेफड़े। यानी फेफड़े ना हो तो कोई कहां जिंदा रह सकता है।

मगर डॉक्टरों की एक टीम ने इस नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया है। एक शख्स को एक दो नहीं बल्कि 48 घंटे बिना फेफड़ों के जिंदा रखा गया। अमेरिका के शिकागो में नॉर्थ वेस्टर्न यूनिवर्सिटी फेनबर्ग स्कूल ऑफमेडिसिन के इस मेडिकल मार्वल की कहानी रिसर्च जनरल मेड में छपी है। करीब 3 साल पहले 33 साल के इस शख्स को इन्फ्लुएंजा वायरस की वजह से एक्यूट रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम हो गया था। इसकी वजह से उनके फेफड़े ऑक्सीजन नहीं ले पा रहे थे। इसके ऊपर से उन्हें एक और बैक्टीरियल इंफेक्शन हो गया। यह इतना फैल गया कि अब उनके फेफड़े ही नहीं दिल और भी फेल होने लगी।

उन्हें डबल लंग ट्रांसप्लांट की जरूरत थी। मगर उनकी हालत इतनी बिगड़ती जा रही थी कि ऐसा करना खतरे से खाली नहीं था। ट्रांसप्लांट की कोशिश उल्टी पड़ सकती थी।आमतौर पर लंग ट्रांसप्लांट के लिए मरीज को एक एक्सटर्नल डिवाइस के साथ कनेक्ट किया जाता है ताकि शरीर में ऑक्सीजन पहुंचती रहे। लेकिन यह डिवाइस खून का फ्लो नहीं मेंटेन रखती। इसलिए ब्लड क्लॉट और हार्ट अटैक का खतरा बना रहता है। वक्त निकलता जा रहा था और मरीज की हालत नाजुक बनी हुई थी। फेफड़े ना सिर्फ खराब हो चुके थे बल्कि इंफेक्शन भी यहां से फैल रहा था। ऐसे में नॉर्थ वेस्टर्न स्कूल ऑफ मेडिसिन के डॉक्टर अंकित भरत और उनकी टीम ने एक बड़ा फैसला किया। उन्होंने खराब हो चुके फेफड़ों को निकाल दिया और उसकी जगह तैयारकिया एक आर्टिफिशियल लंग सिस्टम।

दिल के दाई ओर से खून लेकर एक पंप में भेजा गया जहां उसमें ऑक्सीजन मिल गई। इसी तरह खून से कार्बन डाइऑक्साइड को बाहर निकाला गया और साफ खून को शरीर में पहुंचाया गया। यानी वही काम जो फेफड़े करते हैं इससे दिल के ऊपर से किसी तरह के शौक का खतरा टल गया। अब शरीर में सिर्फ ऑक्सीजन नहीं बल्कि खून के फ्लो को मेंटेन किया जा सका।

48 घंटों तक मरीज को इस सिस्टम के सहारे रखा गया। एक-एक पल क्रिटिकल था। लेकिन टीम ने चैन की सांस तब ली जब मरीज धीरे-धीरे बेहतर होने लगा। इनफेक्टेड फेफड़े हट चुकेथे। 48 घंटों के अंदर ब्लड प्रेशर कंट्रोल हो गया। किडनी और दिल भी सही से काम करने लगे। जब उसका शरीर ट्रांसप्लांट के लिए तैयार हो गया तब डॉक्टरों ने डबल लंग ट्रांसप्लांट किया। इसका कोई नेगेटिव रिएक्शन भी नहीं देखा गया। अब इस सक्सेसफुल प्रोसीजर को 3 साल हो चुके हैं। अब मरीज की हालत में काफी सुधार है।

आमतौर पर किसी को नए फेफड़े मिल सकते हैं या नहीं। यह इस बात से तय होता है कि ऑपरेशन सक्सेसफुल होगा या नहीं। मरीज के बाकी अंग कैसी हालत में हैं। शरीर कहीं नए फेफड़ों को रिजेक्ट तो नहीं कर देगा। डॉक्टर भरतऔर उनकी टीम ने जो तरीका इजाद किया है वो ऐसे लोगों के लिए उम्मीद लेकर आया है जिन्हें ट्रांसप्लांट तो चाहिए लेकिन उनका शरीर पहले ही क्रिटिकल हालत में जा चुका होता है।

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