जब हम बॉलीवुड स्टार्स को स्क्रीन पर देखते हैं तो अक्सर लगता है कि ये लोग शुरू से ही खास रहे होंगे। हमें लगता है कि इनके पास हमेशा से मौके रहे होंगे। पहचान रही होगी या किसी ना किसी तरह फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ाव रहा होगा। लेकिन सच ये है कि बॉलीवुड के कई बड़े नाम ऐसे हैं
जिन्होंने एक्टिंग शुरू करने से पहले बिल्कुल आम जिंदगी जी है। इन कलाकारों ने फिल्मों में आने से पहले नौकरी की, स्ट्रगल किया, किराया देने की चिंता की, ऑडिशन के लिए लाइन में खड़े हुए और कई बार रिजेक्शन भी झेला। तो चलिए आज हम बात करते हैं ऐसे सात बॉलीवुड एक्टर्स की जिन्होंने एक्टिंग से पहले आम नौकरी की और अपने दम पर इंडस्ट्री में जगह बनाई।
नवाजुद्दीन सिद्दीकी का सफर बॉलीवुड की सबसे इंस्पायर करने वाली यात्राओं में से एक माना जाता है। वह उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के पास बुढ़ाना गांव से आते हैं और उनका फिल्मों से कोई बैकग्राउंड नहीं था। पढ़ाई के बाद उन्होंने वड़ोदरा की एक पेट्रोकेमिकल कंपनी में केमिस्ट की नौकरी की। लेकिन उनका मन हमेशा एक्टिंग की तरफ था। एक थिएटर प्ले देखने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी और दिल्ली आकर थिएटर शुरू कर दिया। यहां खर्च चलाने के लिए उन्हें चौकीदार की नौकरी तक करनी पड़ी और इसी दौरान उन्होंने नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा से एक्टिंग सीखी।
मुंबई आने के बाद भी कई साल तक उन्हें सिर्फ छोटे-छोटे रोल मिले। जैसे सरफरोश, मुन्ना भाई, एमबीबीएस और दूसरी फिल्मों में वह कुछ सेकंड के लिए ही दिखाई देते थे। उन्हें लंबे समय तक संघर्ष करना पड़ा। एक समय ऐसा भी आया जब किराया देने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे। उन्होंने खाना बनाकर और छोटे-मोटे काम करके खर्च चलाया लेकिन हार नहीं मानी। धीरे-धीरे गैंग्स ऑफ वासीपुर, कहानी, बजरंगी भाईजान और सीक्रेट गेम्स जैसे कामों ने उनकी पहचान बदल दी। उनका सफर यह दिखाता है कि छोटी नौकरी से शुरू होकर भी बड़ा सपना पूरा किया जा सकता है। बोमन ईरानी का सफर इसीलिए बहुत खास माना जाता है क्योंकि उन्होंने उस उम्र में फिल्मों में पहचान बनाई जब ज्यादातर लोग अपना करियर तय मान लेते हैं। फिल्मों में आने से पहले उन्होंने मुंबई के ताज होटल में वेटर और रूम सर्विस स्टाफ के तौर पर काम किया था।
बाद में जब उनकी मां की तबीयत खराब रहने लगी तो उन्होंने होटल की नौकरी छोड़कर अपने परिवार की वेफर की दुकान संभाली और करीब 14 साल तक वही काम किया। इसी दौरान उन्होंने फोटोग्राफी भी शुरू की और धीरे-धीरे खेलों के बड़े इवेंट्स की फोटो खींचने लगे। इस समय तक एक्टिंग उनके जीवन का हिस्सा नहीं थी। लेकिन लोगों को ध्यान से देखना और समझना यही आदत बाद में उनकी एक्टिंग में बहुत काम आई। इसके बाद वो थिएटर से जुड़े और धीरे-धीरे एडवरटाइजमेंट में काम करने लगे। उन्होंने करीब 100 से ज्यादा एडवरटाइजमेंट किए जिससे कैमरे के सामने उनका आत्मविश्वास बढ़ा। फिर 40 की उम्र के बाद उन्हें फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस मिली और यहीं से उनका सफर बदल गया।
इसके बाद थ्री इडियट्स जैसे किरदार ने उन्हें हर घर तक पहुंचा दिया। उनका सफर यह दिखाता है कि अगर मेहनत और तैयारी लगातार चलती रहे तो सही मौका चाहे देर से मिले लेकिन जिंदगी बदल सकता है। जॉनी वॉकर का नाम हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार कॉमेडी एक्टर्स में लिया जाता है। लेकिन उनका शुरुआती जीवन बिल्कुल आसान नहीं था। उनका असली नाम बदरुद्दीन जमालुद्दीन काजी था और वह एक बड़े परिवार से आते थे। जहां कम उम्र में ही उन्हें घर की जिम्मेदारी उठानी पड़ी। परिवार की हालत ठीक नहीं थी इसीलिए उन्हें स्कूल भी जल्दी छोड़ना पड़ा और अलग-अलग छोटे-मोटे काम करने पड़े। कभी उन्होंने सड़क पर सामान बेचा, कभी फल सब्जी बेचे और बाद में मुंबई की बस में कंडक्टर की नौकरी करने लगे। यही नौकरी उनके जीवन का सबसे अहम मोड़ साबित हुई। बस में काम करते समय उनका मजाकिया अंदाज इतना अलग था कि वह पैसेंजर्स को टिकट देते-देते भी हंसा देते थे।
उसी दौरान एक्टर बलराज साहनी की नजर उन पर पड़ी और उन्होंने उन्हें गुरुदत्त से मिलवाया। गुरुदत्त को उनका अंदाज इतना पसंद आया कि उन्होंने उन्हें फिल्मों में मौका दिया और उनका नाम बदलकर जॉनी वॉकर रख दिया। दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों में वह अक्सर शराबी के किरदार निभाते थे। लेकिन असल जिंदगी में उन्होंने कभी शराब को हाथी नहीं लगाया। बाद में सीआईडी प्यासा मिस्टर एंड मिसेज 55 जैसी फिल्मों ने उन्हें हिंदी सिनेमा का सबसे लोकप्रिय कॉमेडी चेहरा बना दिया। रजनीकांत का सफर सच में फिल्मों की कहानी जैसा लगता है। आज वह दुनिया के सबसे बड़े सुपरस्टार्स में गिने जाते हैं। लेकिन उनका शुरुआती जीवन बहुत साधारण था।
उनका असली नाम शिवाजीराव गायकवाड़ है और वह बेंगलुरु के एक आम परिवार से आते हैं। घर की हालत बहुत मजबूत नहीं थी। इसीलिए पढ़ाई के बाद उन्हें जल्दी काम करना पड़ा। उन्होंने कभी ऑफिस बॉय का काम किया तो कभी कुली का कारपेंटर और यहां तक कि कई बार मजदूरी भी की। बाद में उन्हें बेंगलुरु की बस सर्विस में कंडक्टर की नौकरी मिल गई। जॉनी वाकर की तरह उस समय उनका अंदाज भी अलग था। वह टिकट देने का काम भी स्टाइल में करते थे और लोग उन्हें देखने के लिए उनकी बस का इंतजार करते थे। बस कंडक्टर की नौकरी करते हुए भी उनका मन एक्टिंग में ही लगता था। वह थिएटर करते थे और उनके एक दोस्त राज बहादुर ने उन्हें फिल्म इंस्टट्यूट में एडमिशन लेने के लिए बहुत हिम्मत दी। वही दोस्त कुछ समय तक उनकी आर्थिक मदद भी करते रहे। बाद में मशहूर डायरेक्टर के बालाचंद्र की नजर उन पर पड़ी और उन्हें फिल्म अपूर्व रागंगल में छोटा सा रोल मिला। वहीं से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ और धीरे-धीरे वह साउथ सिनेमा के सबसे बड़े स्टार बन गए। मनोज वाजपेयी का स्ट्रगल सिर्फ रिजेक्शन तक सीमित नहीं था बल्कि उनका पूरा शुरुआती सफर छोटे-छोटे काम करते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए गुजरा। बिहार में बचपन के दौरान वह छुट्टियों में अपने पिता के साथ खेतों में काम भी करते थे। दिल्ली आने के बाद उन्होंने थिएटर शुरू किया। लेकिन उस समय उनके पास कोई पक्की कमाई नहीं थी। जब उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में लगातार तीन बार रिजेक्शन मिला तब उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने बैरी जॉन के एक्टिंग ग्रुप के साथ काम करना शुरू किया और वहीं उनकी मेहनत देखकर उन्हें टीचिंग असिस्टेंट बना लिया गया।
इससे उनकी थोड़ी कमाई होने लगी और वह थिएटर से जुड़े रह पाए। दिलचस्प बात यह है कि चौथी बार जब उन्होंने एनएसडी में कोशिश की तो उन्हें स्टूडेंट की जगह वहां पढ़ाने का मौका ऑफर किया गया जो अपने आप में बहुत बड़ी बात मानी जाती है। फिल्मों में आने से पहले वो 90ज के दशक के टीवी सीरियल जैसे शिकस्त, कलाकार और इम्तिहान में छोटे-छोटे रोल करते थे ताकि उनका खर्च चल सके। मुंबई आने के बाद शुरुआती दिनों में वह सिर्फ ₹500 लेकर पहुंचे थे और पांच दोस्तों के साथ एक छोटे से कमरे में रहते थे। बैंडेड क्वीन में छोटा रोल मिलने के बाद भी उन्हें लंबे समय तक काम नहीं मिला। लेकिन उन्होंने कोशिश नहीं छोड़ी। आखिरकार सत्य फिल्म ने उनकी जिंदगी बदल दी और लोगों ने पहली बार उन्हें एक दमदार एक्टर के रूप में पहचानना शुरू किया। पंकज त्रिपाठी का सफर बहुत ही सादा लेकिन बेहद इंस्पिरेशनल है। उनका बचपन बिहार के गोपालगंज जिले के एक छोटे से गांव बेलसंड में बीता। वह किसान परिवार से आते हैं। बचपन में वह अपने पिता के साथ खेतों में काम करते थे और गांव के त्यौहारों में होने वाले नाटक में हिस्सा लेते थे। वहीं से उन्हें एक्टिंग का शौक लग गया। आगे की पढ़ाई के लिए वह पटना चले गए। लेकिन उस समय एक्टिंग करना आसान फैसला नहीं था। थिएटर करते हुए घर चलाने के लिए उन्होंने पटना के होटल मौर्या में रात की शिफ्ट में किचन स्टाफ के तौर पर काम शुरू किया। वह रात भर काम करते थे और दिन में थिएटर करते थे। यही समय था जब उन्होंने ठान लिया कि उन्हें एक्टिंग ही करनी है। बाद में उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में एडमिशन मिल गया और वहीं से उनका रास्ता थोड़ा साफ होने लगा। 2004 में मुंबई आने के बाद भी करीब 7 से आठ साल तक उन्हें छोटे-छोटे रोल ही मिले। कई बार उनके रोल इतने छोटे होते थे कि लोग नोटिस भी नहीं कर पाते थे। उस समय उनके घर का खर्च उनकी पत्नी चलाती थी जो स्कूल में टीचर थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आखिरकार गैंग्स ऑफ वासीपुर में सुल्तान का रोल उनके करियर का बड़ा मोड़ बना।
इसके बाद मसान, न्यूटन, स्त्री और मिर्जापुर जैसी फिल्में और वेब सीरीज ने उन्हें घर-घर तक पहुंचा दिया। ओमपुरी का बचपन बेहद मुश्किल हालात में गुजरा था। वह हरियाणा के अंबाला के एक गरीब परिवार से आते थे। जब वो छोटे थे, तभी उनके पिता पर चोरी का आरोप लगा और उन्हें जेल जाना पड़ा। इसके बाद परिवार की हालत और खराब हो गई, और उन्हें बहुत छोटी उम्र से ही काम करना पड़ा। सिर्फ 6 साल की उम्र में वो चाय की दुकान पर गिलास धोने का काम करते थे। कुछ समय बाद उन्होंने ढाबे में काम किया। रेलवे ट्रैक के पास से कोयला इकट्ठा किया और अखबार बांटकर भी घर की मदद की। बड़े होने के बाद भी उनका स्ट्रगल जारी रहा। पढ़ाई करते समय उन्होंने लैब असिस्टेंट की नौकरी की। फिर लाइब्रेरी में काम किया और बाद में सरकारी दफ्तर में क्लर्क की नौकरी भी की। उस समय सरकारी नौकरी बहुत सुरक्षित मानी जाती थी। लेकिन उन्होंने इसे छोड़कर एक्टिंग सीखने का फैसला लिया और नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में दाखिला लिया। आगे चलकर उन्होंने एफटीआईआई से भी ट्रेनिंग ली और कुछ समय वहां एक्टिंग सिखाने का काम भी किया। धीरे-धीरे आक्रोश अर्धसत्य जाने भी दो यारों और बाद में कई इंटरनेशनल फिल्मों तक उनका सफर पहुंचा।
खास बात यह रही कि वो सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं रहे बल्कि हॉलीवुड फिल्मों में भी काम किया।
उनका सफर यह दिखाता है कि बहुत साधारण शुरुआत से भी अगर इंसान लगातार मेहनत करता रहे तो वह दुनिया भर में पहचान बना सकता है। इन सातों कलाकारों की कहानियों में एक बात साफ दिखाई देती है कि सफलता अचानक नहीं मिलती। इसके पीछे सालों की मेहनत, संघर्ष और धैर्य होता है। किसी ने चौकीदारी की, किसी ने बस में टिकट काटे, किसी ने होटल में काम किया। तो किसी ने लाइब्रेरी में। इनका सफर हमें याद दिलाता है कि सपने बड़े होने चाहिए।
