किशोर कुमार के गानों पर रोक लगाने का क्यों किया एलान?

और भारतीय सिनेमा ने जिस आदमी को पागल सनकी अजीब जैसे नाम दिए असल में वही आदमी था जिसकी आवाज पर पूरा हिंदुस्तान रोया हंसा और इश्क में डूब गया जी हां दोस्तों उसका का नाम था किशोर कुमार। रोते हुए हैं सब हंसता हुआ जो सवाल उठता है आखिर क्यों लोग इस मशहूर कामयाब गायक को एक पल में जीनियस और दूसरे पल में सनकी कहने लगते थे। दोनों ने देखा मुड़-मुड़ के। वाह वाह वाह। क्यों यह गायक जो कि खुद एक अभिनेता भी था। चाहता था कि उसकी फिल्में बुरी तरह से फ्लॉप हो जाए। कभी कुछ कहती है, कभी कुछ कहती है जरा नजर को संभालना। क्यों किशोर कुमार ने अपने ही दीवानों के लिए अपनी एक अलग प्रोडक्शन कंपनी बना ली और फिर किस्मत का खेल देखिए। जिन फिल्मों को वो खुद डुबो देना चाहते थे। वो फिल्में सुपर डुपर हिट हो गई।

जी हां दोस्तों यकीन करना मुश्किल है। लेकिन जब भारतीय सिनेमा की एक महान गायिका को उनके साथ गाना गाने में कुछ देरी हो गई तो इस सनकी गायक ने खुद ही गायिका की आवाज भी निकाल ली और वो गाना इतिहास बन गया। रेडियो से लेकर दिलों तक हर जगह वही आवाज गूंजने लगी। नाच मेरी जानाता बात मेरी मान और इसके मामले में भी किशोर कुमार कभी किसी से डरते नहीं थे जो अभिनेत्री दिल को भा गई बिना लाग लपेट सीधे शादी का प्रस्ताव ना झिझक ना संकोच गले में दार बन जा मेरे गले का हार झूले प्रेम हिंडोले और यही वजह थी कि इस एक आदमी की जिंदगी में एक नहीं दो नहीं बल्कि चार-चार शादियां लिखी थी।

कहते हैं एक बेहद खूबसूरत अभिनेत्री से शादी करने के लिए उन्होंने अपना धर्म तक बदल लिया। जी हां, हद तो तब हो गई जब उन्होंने अपनी तुलना एक कुत्ते से कर ली। और जब एक बड़ा प्रोड्यूसर उनके घर आया, तो उन्होंने कुत्तों की तरीके ही उन्हें दांत से काट लिया। तेरी दुनिया जो देखेगी खूब जलेगी। एक रोज हमारी भी दाल गलेगी। वो गायक जो खुद बंगाली था लेकिन उन्होंने अपने ही घर में किसी भी बंगाली शख्स को घुसने की इजाजत नहीं दे रखी थी। क्या एक इंसान इतना पेचीदा भी हो सकता है? वैसे यह बात वही समझ सकता है जिसने किशोर कुमार को बेहद करीब से देखा हो। भोले संगीत का पहला सुर होता है जी हां दोस्तों वही किशोर कुमार जो अपने जीवन के आखिरी दिनों में एक सपना देख रहे थे और अपने उस सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने भारत के सबसे महंगे आर्किटेक्ट को मुंह मांगी कीमत देने की पेशकश भी कर दी थी। आखिर क्या था वो सपना? क्या थी.

दिल से गाने वाले इस इंसान की आखिरी ख्वाहिश? वैसे दोस्तों, यह कहानी किसी आम आदमी की नहीं, यह कहानी एक ऐसे फनकार की है जिसे दुनिया ने हंसते हुए गलत समझ लिया। तो आइए दोस्तों, उस पागल की जिंदगी के वो राज खोलते हैं जो आज तक किसी किताब, किसी इंटरव्यू या किसी यू ट्यूब वीडियो में पूरी तरह नहीं कहे गए। क्योंकि यह कहानी है गायकी के द्रोणाचार्य कहे जाने वाले किशोर कुमार जी की।

दोस्तों किशोर कुमार को लोग सनकी कहते थे। कई लोग तो उन्हें पागल भी कहते थे। पर आखिर क्या है सच्चाई? वो पागल थे या वह अपने आप में मनमौजी थे? दुनिया कहती है मुझको पागल। मैं कहता दुनिया को पागल। जी हां दोस्तों, एक ऐसा इंसान जो बाहर से सबको हंसाता था। पर अंदर अपनी ही धुन में डूबा रहता था। एक ऐसी धुन जिसे दुनिया समझ नहीं पाई और जिसने किशोर कुमार को बाकियों से अलग बना दिया। अरे मैं अपने बाग कमाली, मोरी उमरिया वाली बाली। 4 अगस्त 1929 मध्य प्रदेश का खांडवा जंक्शन एक छोटा सा शहर जहां से भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी आवाजों में से एक ने पहली बार सांस ली। एक सफर है सुहाना। यहां कल क्या होगी। पिता कुंजीलाल गांगुली अपने समय के मशहूर अधिवक्ता थे। और मां गौरी देवी जिनकी गोद में शरारत भी थी और संस्कार भी। जी हां दोस्तों चार भाई बहनों में किशोर कुमार सबसे छोटे थे।

सबसे बड़े भाई अशोक कुमार। उससे छोटे भाई अनूप कुमार। तीसरी इनकी बहन थी सती देवी और सबसे छोटे और सबसे शरारती किशोर कुमार। जब किशोर छोटे ही थे तभी बड़े भाई अशोक कुमार फिल्मों के चमकते सितारे बन चुके थे। घर का माहौल फिल्मी था। किशोर कुमार और अनूप कुमार ने साथ ही पढ़ाई की। दोनों में फर्क सिर्फ इतना था कि अनूप अभिनय के सपने देख रहे थे। वहीं किशोर सिर्फ गायकी के सपने संजो रहे थे। बचपन से ही शरारती थोड़े अलबेले और पूरी तरह अपनी धुन के पक्के। यह विद्यार्थी गरीब है। गरीब है। छ महीने से फीस नहीं दे सका। कॉलेज के ही दिनों से किशोर कुमार वॉइस मॉड्यूलेशन के उस्ताद बन चुके थे। उनका दिल बस एक आवाज में अटकता था। के एल सगल जब भी कॉलेज में कोई प्रोग्राम होता किशोर सैगल साहब के गीत गाते और देखते ही देखते पूरा कॉलेज जान गया था।

यह लड़का कुछ तो अलग है। जहां बड़े भाई फिल्मों में काम करते थे तो पूरा परिवार अक्सर उनसे मिलने जाता। एक बार अशोक कुमार की फिल्म का मुहूर्त था और अपने भाई की फिल्म की मुहूर्त में किशोर कुमार भी पहुंचे और वहां पर उस फिल्म के डायरेक्टर ने किशोर कुमार के साथ बड़ा ही भद्दा मजाक किया। वह छोटा सा बच्चा उस समय कुछ नहीं बोला। बस मुस्कुरा दिया। उस बात को दिल के किसी कोने में चुपचाप रख लिया और एक वो दिन भी आया जब इस मजाक का किशोर कुमार ने उसी अंदाज में बदला लिया। समय बीतता गया। किशोर कुमार बड़े हो गए थे और एक दिन मुंबई पहुंचे अपने भाई अशोक कुमार के पास। किशोर कुमार गाने में तो अच्छे थे ही इसीलिए उन्हें बॉम्बे टाकीज के स्टूडियो में कोरस सिंगर के रूप में काम मिल गया। आई बड़ी है छमम छमम दूंगा भुला ये सरगम। बड़े भाई चाहते थे कि किशोर अभिनेता बने। लेकिन किशोर के दिल में बस एक ही ख्वाब था। गायकी 1948 में देवानंद की फिल्म जिद्दी बन रही थी। किशोर कुमार को एक गाने का मौका मिल गया और यहीं से किस्मत ने पहली बार दस्तक भी दे दी थी। सभी को यह आवाज खूब पसंद आई। साहिल की तमन्ना कौन करे पर बड़े भाई अशोक कुमार तो इन्हें अभिनेता बनाना चाहते थे।

1951 में इन्हें आंदोलन फिल्म में उन्होंने काम दिलाया और आंदोलन फिल्म में किशोर कुमार का रोल सभी को खूब पसंद आया। इन्हें एक के बाद एक फिल्में भी मिली और उन्होंने फिर लगातार 22 फिल्मों में काम किया। लेकिन इनकी 22 फिल्मों में 16 फिल्में फ्लॉप रहीं। चील चील चिल्ला के गजरे सुनाए झूम-झूम कौवा भी ढोलक बजाए। और किशोर कुमार का मन भी अभिनय से उखड़ने लगा। अभी वक्त ने पलटी मारी। दो-चार फिल्में और रिलीज हुई और ये दो-चार फिल्में सुपरहिट हो गई। जैसे कि नौकरी बाप रे बाप जैसी फिल्में। चोरी चोरी चोरी काहे हमें पुकारे तू तो बसी हो गोरी मन में हमारे और फिर अशोक कुमार ने 1955 से लेकर 1966 तक कई सुपरहिट फिल्में दी और भारतीय सिनेमा को अपने क्रिकेट का ऑलराउंडर मिल गया था जो कि अभिनय भी कर सकता था। लोगों को रुला भी सकता था, हंसा भी सकता था। साथ में गायकी का कमाल भी कर सकता था। में मंगाए गए साथ घोड़े गधे सब बुलाए गए तो इस कड़ी में उनकी भाई भाई चलती का नाम गाड़ी नया अंदाज गंगा की लहरें प्यार किए जा और पड़ोसन जैसी कई सुपरहिट फिल्में आई पर समय के साथ एक दौर ऐसा आया जब अभिनेता किशोर कुमार फीके पड़ने लगे ।

लेकिन किशोर कुमार तो हुनर की टोकरी में बहुत कुछ लेकर आए थे जहां उनका अभिनय ठहरा वहीं प्लेबैक सिंगिंग ने उन्हें आसमान पर पहुंचा दिया। रास्ता देखे ऐ दिल ऐसा। पहले कभी जब वो गाना गाते थे तो या तो वह अभिनेता देवानंद साहब के लिए गाते और या अपनी फिल्मों में ही गाने गा लिया करते थे। लेकिन अब उनके गाने सुपरहिट हो रहे थे। दर्शकों को यह आवाज भा रही थी। प्रोड्यूसर और डायरेक्टर हर हीरो में अब किशोर कुमार की आवाज को ही लेना चाह रहे थे। जाता हूं किसी की धुन में धड़कते दिल के तराने और एक समय वो आया जब राजेश खन्ना अमिताभ बच्चन धर्मेंद्र जितेंद्र या अनिल कपूर ही हो लगभग सभी सुपरस्टार को कामयाबी दिलाने में किशोर कुमार की आवाज शामिल रही। सच्चा और चेहरा झूठा दिल तो देखो चेहरा ना देखो। किशोर कुमार की आवाज अपने आप में नायाब थी या नहीं इस बहस पर पड़ना बेईमानी है। वैसे दोस्तों हमारा मकसद किसी को बड़ा या छोटा ठहराना नहीं। हर गायक की आवाज अपने आप में सरस्वती का रूप है। लेकिन कुछ आवाजें सुर नहीं गाती। वो एहसास गाती और किशोर दा वो गाते नहीं थे। वह जिंदगी को आवाज दे देते थे। तो जरा याद कीजिए 1955 की फिल्म मुनीम देवांद साहब पर फिल्माया गया यह गीत जीवन के सफर में राही इस गाने का सैड वर्जन लता मंगेशकर जी ने गाया जीवन के सफर में राही मिलते हैं बिछड़ जाने को और हैप्पीएस्ट वर्जन किशोर कुमार ने गाया जी हां दोस्तों गाने को सुनकर ज्यादातर लोगों के जेहन में किशोर दा की आवाज ही गूंजती है जीवन के सफर पर मेरा ही मिलते हैं बिछड़ जाने को। अब 1957 की फिल्म आशा को ही देख लीजिए। ईना मीना दी का गाना किसे नहीं याद यह गाना किशोर दा और आशा भोसले दोनों की आवाज में गाया गया।

आशा भोसले जी का वर्जन कहीं से कमजोर नहीं था। लेकिन यह सच है। इस गीत को इतिहास ने किशोर दा की आवाज में ही हमेशा याद रखा। ढगा ढोला ढका राम पम अब आपके मन में यह सवाल जरूर उठ रहा होगा क्या किशोर दा की आवाज सिर्फ हैप्पी गानों के लिए ही बनी थी तो चलिए 1965 की फिल्म हम उस्ताद है पर चलते हैं। गाना था अजनबी तुम जाने अनजाने से लगते हो। हैप्पी वर्जन लता मंगेशकर की आवाज में गाया गया। अजनबी तुम जाने पहचाने से लगते हो। और जब इस गीत को किशोर दा ने अपने सैड वर्जन में गाया तो यह गीत मानो अमर हो गया था। नबी तुम जाने पहचाने से लगते हो। दोस्तों इसी तरह 1969 की फिल्म प्यार का मौसम। दो महान आवाजें आमने-सामने थीं। मोहम्मद रफी और किशोर कुमार। जी हां, गाना था तुम बिन जाऊं कहां? रोमांटिक वर्जन मोहम्मद रफी साहब की आवाज में। तुम बिन जाऊं कहां? तुम बिन जाऊं कहां? और दूसरा गहरी पीड़ा में डूबी हुई आवाज में किशोर दा ने गाया। तुम बिन जाऊं कहां के दुनिया में आ। दोस्तों 1971 की फिल्म सर्बीली और गाना था खिलते हैं गुल यहां लता जी के सैड वर्जन में और किशोर दा के रोमांटिक वर्जन में यहां खिलके कहना गलत नहीं होगा किशोर दा की आवाज में यह गीत कई गुना ज्यादा असदार दिखा है गुल यहां खिल के बिखरने इसी साल एक फिल्म आई यादों की बारात।

फिल्म का टाइटल सॉन्ग दो वर्जन में गाया गया। यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे। एक लता जी की आवाज में और दूसरा वर्जन मोहम्मद रफी और किशोर दा की आवाज में। दिल के द्वारे दिल के द्वारे। साल 1971 में फिल्म आई हरे रामा हरे कृष्णा। और गाना आज भी सभी को याद है। फूलों का तारों का सबका कहना है। लता जी और किशोर दा दोनों की आवाज में गाना चला। तारों का सबका कहना है। लेकिन लोकप्रियता ने किशोर दा के वर्जन को सबसे आगे खड़ा कर दिया। हजारों में मेरी बहना है। वैसे दोस्तों ऐसे एक नहीं कई गीत हैं। जहां पर एक से ज्यादा वर्जन बने। पर हर बार किशोर दा ही दिल जीत लिया। मेरे सामने वाली खिड़की में एक चांद का टुकड़ा। आवाज के ऐसे जादूगर को अगर कोई कह दे कि यह आवाज कभी कर्कस थी, कभी बेसुरी थी, तो शायद ही हम आज यकीन कर पाएं। जी हां दोस्तों, एक ऐसा समय था जब किशोर कुमार की आवाज बेहद बेसुरी थी। किशोर कुमार तैयार है। हालात तो ऐसे हो गए थे कि परिवार वाले कहने लगे थे कि इस बच्चे को टीवी तो नहीं। हालांकि ऐसा कुछ भी नहीं। उस दौर में इस आवाज को सुनकर शायद ही कोई कहता कि यह आवाज एक दिन लाखों करोड़ों लोगों का अपने गानों से दिल बहलाएगी। मेरे मन को किया तूने क्या इशारा? लेकिन फिर एक दिन एक ऐसी घटना घटी कि सब कुछ बदल गया। जैसा कि आपको वीडियो में पहले भी बताया गया कि किशोर कुमार हद से ज्यादा शैतान थे। साल था 1934 और किशोर कुमार की उम्र थी महज 5 साल। घर के गार्डन में किशोर खेल रहे थे और वहीं पर पड़ा हसिया उनके पैर पर लग गया। वह चोट इतनी गंभीर थी कि उन्हें टांके लगाने पड़े। दोस्तों, यह वह दौर था जब दर्द की पक्की दवाइयां नहीं थी और ना ही एंटीबायोटिक हुआ करती थी। नतीजा यह हुआ कि किशोर कुमार घंटों रोया करते। 17-17 घंटे दिन के सिर्फ चीखा करते।

इस रोने से दर्द कम नहीं हुआ। मगर उनकी आवाज खुल गई थी। धीरे-धीरे जख्म भर गए। मगर आज आवाज बिल्कुल बदल गई थी। ना ही उनकी आवाज में कर्कशपन था और ना ही बेसुरापन। घर के सभी लोग उनकी आवाज की तारीफ करने लगे। इसका नतीजा यह हुआ वह घर में अपने मां से या बाबूजी से जो भी चीज मांगना होता तो वह हमेशा गाकर ही मांगते। सपनों की रानी कब आएगी तू? आई रुक मस्तानी कब आएगी। पर किशोर कुमार की शैतानियां अब भी खत्म नहीं हुई थी। हां, उनका तरीका बदल गया था। अब वह जानवरों और चिड़ियों की आवाजें निकालते। जिसकी देखो उसकी मिमिक्री करने की कोशिश करते। कुएं में कूद के मर जाना यार तुम शादी मत करना। ऐसे में एक दिन उन्होंने के एल साइगल साहब का गाना रेडियो पर सुना और उनकी आवाज के दीवाने हो गए। जब भी समय मिलता वो सिर्फ साहगल साहब की आवाज ही निकाला करते। शायद इसी तरह किशोर कुमार संगीत की दुनिया के एकलव्य बन गए और बगैर अपने गुरु को साक्षात देखे उन्होंने संगीत में महारत हासिल कर ली। कहते हैं किशोर कुमार ने कभी भी किसी से संगीत की विद्या नहीं हासिल की। पर गायकी ऐसी कि बड़े से बड़ा संगीतकार उनके आगे टिक ही नहीं पाता था। नम नम नम नम नम नम नम नम नम नम। अगर किशोर कुमार साहब की गायकी की बात करेंगे तो शायद यह वीडियो कभी पूरा ही नहीं हो पाएगा। इसलिए आज हम इस वीडियो में उन किस्सों की बात करेंगे जिसे सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। करके दिखाऊंगा कि लोग तेज सिंह को भूल जाएंगे। जरा सोचिए आज के दौर में लोग अपनी फिल्म को हिट कराने के लिए हर दरवाजा खटखटाते हैं।

उसी दौर में एक ऐसा शख्स था जो अपनी फिल्म को जानबूझकर फ्लॉप करवाने में मेहनत कर रहा था। आप सबको किशोर कुमार का नमस्कार। जी हां दोस्तों एक वक्त ऐसा था जब किशोर कुमार के सितारे आसमान के बीच में चमक रहे थे। शोहरत थी, पैसा था और साथ में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट। कहते हैं इनकम टैक्स डिपार्टमेंट उनके पीछे ऐसा पड़ा था जैसे साए के साथ धूप चिपक जाती है। इनकम टैक्स वालों में क्यों फंसा रहे हो मुझे? अरे इनकम टैक्स वाले आपको कहां से फंसाएंगे? आपने तो खुद इनकम टैक्स वालों को फंसाया हुआ है। उसी दौरान उनके एक दोस्त ने उन्हें मशवरा दिया। किशोरदा आप एक ऐसी फिल्म बनाइए जो सुपर डुपर फ्लॉप हो जाए। फिर उस फिल्म का घाटा इनकम टैक्स के सामने दिखाइए। खुद ब खुद आपका पीछा इनकम टैक्स वाले छोड़ देंगे। चलते जाना है। आप सोचिए कोई और होता तो हंसकर टाल देता। लेकिन यह किशोर कुमार थे।

उन्हें यह आईडिया दिल से पसंद आया। ऐसा लगा जैसे कोई नई शरारत मिल गई हो। उन्होंने तुरंत इस पर काम शुरू कर दिया। पर उस दौर में किशोर कुमार तो एक ब्रांड थे। वो जहां भी जुड़ जाते हिट तो होना ही था। उन्हें पता था कि अगर हिंदी फिल्म बनाऊंगा तो यह फिल्म तो सिर्फ उनके नाम से ही चल जाएगी। इसीलिए उन्होंने फिल्म बनाई बंगाली भाषा में। फिल्म का नाम था लुकोचुरी। इरादा साफ था। फिल्म फ्लॉप होनी चाहिए। पूरा प्लान इसी हिसाब से बनाया गया। लेकिन कहते हैं ना किस्मत जब मजाक करती है तो सीधे दिल पर ही करती है। जो फिल्म सिर्फ फ्लॉप होने के लिए बनाई गई थी। वह फिल्म उस दौर की सबसे बड़ी हिट फिल्म बन गई। गोरी पारो माया बोलो बिहार किशोर कुमार ने इस फिल्म में वो सब कुछ किया जो शायद कोई फिल्म मेकर ना करता। उन्होंने अपनी पहली पत्नी रूपा गांगुली से भी गाना गवाया और यह गाना भी हिट हुआ। फिल्म भी हिट हो गई। किशोर कुमार जी का प्लॉप फिल्म का सपना चकनाचूर हो गया। फिर उन्होंने सोचा अबकी बार तो मैं फिल्म को फ्लॉप करवा के ही मानूंगा।

उन्होंने एक बार फिर फिल्म बनाई। इस बार उन्होंने अपने सारे भाइयों को ले लिया। फिल्म हिंदी फिल्म का नाम था चलती का नाम गाड़ी और आपको बताने की जरूरत नहीं। यह फिल्म कल्ट क्लासिक फिल्म बनी। 12 आना मारेगा भैया। इस बार भी उनकी फ्लॉप फिल्म का प्लान पूरी तरीके से फ्लॉप हो गया। वो शख्स इनकम टैक्स से छुटकारा पाना चाहता था। वो और ज्यादा इनकम टैक्स के जाल में फंसता चला गया। किशोर कुमार और इनकम टैक्स डिपार्टमेंट। यह झड़प कोई एकद साल की नहीं थी। यह पीछा उनकी जिंदगी के आखिरी पांव तक साथ चलता रहा। जैसे शोहरत उनकी परछाई थी, वैसे ही इनकम टैक्स उनकी तकदीर का साया बन चुका था। लेकिन किशोर दा सिर्फ झेलने वालों में से नहीं थे। वह जवाब देने वालों में से थे। अपने ही अंदाज में उनके इसी विनोदी लेकिन तीखे स्वभाव का एक दिन शिकार बने मशहूर फिल्मकार बलदेव राज चोपड़ा यानी कि बी आर चोपड़ा। किशोर कुमार के बड़े भाई अशोक कुमार और बी आर चोपड़ा बरसों पुराने दोस्त थे। लेकिन जब पारिवारिक रिश्ते के नाते किशोर कुमार काम मांगने के लिए बी आर चोपड़ा के पास पहुंचे तो सामने से शर्तें रख दी गई। वैसे किशोर कुमार का वो दौर था जब उनका बुरा वक्त चल रहा था। तुमसे कुछ और जो मांगू तो गुनहगार हूं मैं। छोटी सी नौकरी का तलबगार हूं मैं। किशोर कुमार उस समय कुछ नहीं बोले। बस इतना बोले आज मेरा बुरा वक्त है इसीलिए आप शर्त रख रहे हैं। याद रखिए जब मेरा वक्त आएगा तो शर्तें मैं रखूंगा। प्यार बांटते चलो हे प्यार बांटते चलो। जैसा कि आपको कहानी में पता ही लगा कि किशोर कुमार का भी वक्त बदला। लोग डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, बड़े-बड़े म्यूजिक डायरेक्टर उनके जब पीछे भागने लगे।

तभी वर्षों बाद बी आर चोपड़ा खुद किशोर कुमार के पास अपनी फिल्म के लिए आए। शोरदा ने अपना वादा याद दिलाया। शर्त रखी। ठंडा जॉल में नहाने से गोलाठ चौरा बैठ गया। आपको धोती पहन कर आनी होगी। पैरों में मोजे और जूते जरूर हो। और हां मुझे साइन करने के लिए पान खाकर आइएगा। वह भी पान ऐसे खाइएगा कि लाल टपक रही हो। मुंह लाल-लाल नजर आए। दोस्तों यह सब बहुत आम बात थी। पर बी आर चोपड़ा ना पान खाते थे और ना कभी धोती पहनते थे। लेकिन शर्त तो शर्त ही थी। यही था किशोर दा का इंसाफ मीठा नहीं मगर याद रहने वाला। कुएं में कुएं में कूद के मर जाना। अब आपको एक और किस्सा बताते हैं। एक बार मशहूर निर्देशक ऋषिकेश मुखर्जी एक फिल्म के सिलसिले में किशोर दास से मिलने उनके घर पहुंचे। लेकिन गार्ड ने उन्हें अंदर जाने ही नहीं दिया। यह ऋषि दा के लिए बहुत बड़ी बेज्जती थी। वो नाराज हो गए। दोस्तों, यह वही ऋषिदा थे जिन्होंने गुड्डी, आनंद और नमक हराम जैसी बड़ी और अमर होने वाली फिल्में बनाई थी। मेरा सलाम। पर सुनिए तो दरअसल कहानी तो कुछ और ही थी। एक इवेंट में किशोर दा ने शो किया था। शो का मैनेजर बंगाली था और उस मैनेजर ने पूरे पैसे ना देकर उनके साथ धोखा किया। बस उसी दिन से किशोर दा ने अपने गार्ड को सख्त हिदायत दे दी थी। कोई भी बंगाली आदमी आए तो बगैर पूछे उसे गेट से ही भगा देना।

अंदर तक मत घुसने देना। अजीब भी डब्बा बनाना थी। खुद बंगाली होते हुए भी किशोर दा अपने घर में किसी बंगाली को कदम तक नहीं रखने देते थे। कमाता हूं बहुत कुछ पर कमाई डूब जाती है सताता। दोस्तों जब इस हंसीज़ाक की बात चल ही रही है तो आपको 1962 की फिल्म हाफ टिकट का एक किस्सा सुनाते हैं। इस फिल्म में किशोर दा ने मेल और फीमेल दोनों की आवाजों में गाना गाया था। वह भी महज एक टेक में। असल में इस गाने को लता मंगेशकर जी को गाना था। लेकिन किसी वजह से वह रिकॉर्डिंग के दिन आ नहीं पाई। तो किशोर दा ने डायरेक्टर से साफ कहा छोड़िए यह गाना मैं ही कर लेता हूं। डायरेक्टर बोले किशोर तुम्हें पता है ना यह मेल और फीमेल दोनों में गाया जाना है। किशोर दा बोले आप रिकॉर्डिंग स्टार्ट करिए। फिर देखिए आपको जादू दिखाता हूं। और किशोर दा ने मेल और फीमेल दोनों की आवाज में गाना गाया। भी लगी दिल पे बैठे कतरिया ओ सावरिया ओ गुजरिया आपको पता है जब किशोर दा कामयाबी के शिखर पर थे पैसों की कोई कमी नहीं थी और तब उनके दिल में एक अजीब ख्वाहिश ने जन्म लिया नीले नीले अंबर पर चांद जब आए प्यार बरसाए उन्होंने भारत के मशहूर आर्किटेक्ट को अपने घर बुलाया कहा आपको मेरे लिए एक ऐसा घर बनाना होगा जिसके हर कमरे में पानी भरा हो और मेरे पास एक नाव हो और उसी नाव में मैं बैठकर अपने डाइनिंग हॉल तक जाऊं।

जी हां दोस्तों एक वो सपना जो किशोर कुमार का कभी नहीं पूरा हो सका। तेरा वादा दोस्तों किशोर कुमार एक ऐसी आवाज जो हर हीरो की आवाज बन जाते। ऐसा लगता कि पर्दे पर किशोर कुमार नहीं बल्कि अभिनेता ही गा रहा हो। इतनी जादूगरी थी किशोर दा की आवाज में। कभी टूट गया, कभी तोड़ा गया, 100 बार मुझे। लेकिन पैसों के मामले में वह बेहद सख्त थे। एक बार शूटिंग पर वो आधा मेकअप करवा कर ही पहुंच गए। लोगों ने पूछा, “अरे किशोर दा यह क्या हाल बना रखा है?” है। किशोर दा का जवाब सभी को हिला कर रख देता है। किशोर दा ने कहा, अरे बांगू मुझे आधी पेमेंट मिली है इसलिए मैं आधा मेकअप करके आया हूं। दोस्तों आप ही बताइएगा कि यह किशोर दा का मनमोजीपन था या पागलपन। बंगाली ठोकरा करूं प्यार को नमस्कार। मदर की ठोकरी मुझे तुमसे प्यार। तो चलिए किशोर दास से जुड़े हुए कुछ विवादों पर भी बात कर लेते हैं। 1980 में अमिताभ बच्चन से उनके रिश्ते खूब बिगड़े। वजह थी अमिताभ बच्चन जी ने किशोर कुमार के प्रोडक्शन में बन रही फिल्म ममता की छांव में गेस्ट रोल करने से मना कर दिया। नाराज किशोर दा ने अमिताभ के लिए गाना बंद कर दिया। हालांकि बाद में तूफान फिल्म में एक गाना किशोर दा ने उनके लिए गाया। आया आया तूफान भगा भगा शैतान इसी तरह से उनका मिथुन चक्रवर्ती के साथ भी विवाद हुआ और यह विवाद काफी दर्दनाक रहा। किशोर दा की तीसरी पत्नी थी योगिता वाली और 2 सालों के भीतर ही वे किशोर दा को छोड़कर मिथुन से शादी कर लेती हैं और यह शायद किशोर कुमार की मिथुन के प्रति चिड़चिड़ाहट ही थी कि उन्होंने फिर मिथुन के लिए गाना ही बंद कर दिया। हम बेवफा हरगिज़ ना दोस्तों सबसे बड़ा विवाद था उनका संजय गांधी से।

आपातकालीन के दौरान जब संजय गांधी ने एक रैली में उन्हें गाने को कहा तो किशोर कुमार ने सीधे मना कर दिया। मैं आपकी किसी भी रैली में गाना नहीं गाऊंगा। नतीजा 4 मई 1976 आपातकाल के अंत तक दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो से उनके गानों पर पाबंदी लग गई। एक रास्ता है जिंदगी जो थम गए तो कुछ नहीं। अब जरा उनके रिश्तों की बात कर लेते हैं। किशोर दा ने चार शादियां की और हर शादी की अपनी एक अलग कहानी। उनकी पहली पत्नी थी रूपा गांगुली। बंगाली गायिका और एक अभिनेत्री। शादी से उन्हें एक बेटा हुआ जिसका नाम अमित कुमार। उनकी दूसरी पत्नी बनी मशहूर अदाकारा ब्यूटी क्वीन मधुबाला जी। मैं तुम्हें समझ नहीं पाया। तुम कभी नाराज हो जाती हो कभी खुश हो जाती हो। तुम बातें ही ऐसी करती। अब नहीं करूंगा। कान पकड़ता हूं। लेकिन कहते तो यह भी हैं कि मधुबाला का दिलीप कुमार साहब से अलगाव हो गया था। और मधुबाला बेहद दुखी रहने लगी थी। और किशोर दा को जब पता लगा कि मधुबाला के दिल में छेद है। वह ज्यादा दिनों तक अब जीवित नहीं रह पाएंगी। तो मधुबाला को सिर्फ खुशी देने के लिए उन्होंने मधुबाला से प्यार किया और शादी भी की। ₹5 12 आना ₹ 12 आना। मधुबाला को लंदन ले गए। उनका इलाज करवाया। पर मधुबाला ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह पाई। रहेंगे जन्म जन्म ताजुब की बात तो यह है कि मधुबाला को खुशी देने के लिए उन्होंने जब उनसे शादी की तो उन्होंने अपना धर्म तक बदल लिया क्योंकि मधुबाला एक मुस्लिम अदाकारा थी और किशोर दा ने मुस्लिम धर्म अपनाया अपना नाम रखा करीम अब्दुल बहरहाल परिवार ने यह रिश्ता स्वीकार नहीं किया और जैसा कि आपको पहले ही बताया पर किशोर कुमार ने इस रिश्ते को दिल से स्वीकार ना आया बजाना ना आया को अपना बनाना ना आया इनकी तीसरी शादी हुई योगिता बाली से 2 साल में यह रिश्ता टूट गया किशोर दा ने लीना चंद्रावरकर से शादी की यह इनकी आखिरी शादी थी

यह रिश्ता 8 साल चला दोस्तों किशोर दा हंसी का समंदर थे लेकिन उनके भीतर दर्द की गहराई कम नहीं थी सफर में गुजरने है वैसे लोग आमतौर पर अपने घर के बाहर बोर्ड लगाते हैं। कुत्ते से सावधान लेकिन किशोर दा ने अपने घर के बाहर बेहद अजीब सा बोर्ड लगवा रखा था जिसमें लिखा हुआ था किशोर कुमार से सावधान। अब यह चेतावनी थी या मजाक या सच्चाई यह समझने में लोगों को जिंदगी लग जाएगी। मैं जिंदा हूं पर जिंदगी से खफा हूं। क्योंकि किशोर कुमार एक गायक और महज एक अभिनेता ही नहीं थे। किशोर कुमार शायद एक पहेली थे जिसे कोई नहीं समझ पाया। सर मैं आदमी बुरा नहीं मेरी किस्मत बुरी है। एक बार प्रोड्यूसर डायरेक्टर एच एस रवेल उनके पैसे चुकाने के लिए उनके घर पहुंचे। पैसे दे दिए। बात पूरी हो गई। रवेल ने हाथ बढ़ाया सिर्फ हाथ मिलाने के लिए। लेकिन किशोर दा ने वो हाथ अपने मुंह में डाल लिया और काटने लगे। रवेल घबरा गए। सकपका गए। तभी किशोर दा बिल्कुल मासूमियत से बोले आपने घर के बाहर लगा हुआ साइन बोर्ड नहीं पढ़ा। किशोर दा की अजीब हरकतों से परेशान होकर एक डायरेक्टर इतना डर गया कि उन्होंने कोर्ट की शरण ले ली। उन्होंने बकायदा कोर्ट से एक एग्रीमेंट करवाया कि अगर शूटिंग के दौरान किशोर कुमार निर्देशक की बात नहीं मानेंगे तो उन पर केस कर दिया जाएगा। और अगले ही दिन किशोर दा सेट पर तो पहुंचे पर हैरानी की बात थी। जो डायरेक्टर कहता वो बिल्कुल वैसा ही करते।

एक सीन में उन्हें कार से बाहर निकलना था। लेकिन डायरेक्टर बाहर निकलो कहना भूल गया। किशोर दा कार के अंदर बैठे रहे। डायरेक्टर इंतजार करते रहे। पूरी यूनिट इंतजार करती रही क्योंकि किशोर दास से तो कहा गया था जो कहा जाए सिर्फ उतना ही करना है। समझाया आपको कार से थोड़ी दूर तक जाना है। फिर मैं कट बोलूंगा और सीन खत्म हो जाएगा। किशोर दा कार लेकर तो निकले मगर फिर उतरे ही नहीं क्योंकि डायरेक्टर साहब कट बोलना ही भूल गए थे। डायरेक्टर इंतजार करता रहा। शाम हो गई रात हो गई। अगले दिन पता चला कि किशोर दा कार चलातेचलाते अपने गांव खंडवा जंक्शन पहुंच गए हैं। थे जापान पहुंच गए चीन समझ गए ना याने प्यार वैसे लाइमलाइट मीडिया इंटरव्यू इन सब से किशोर कुमार सख्त नफरत करते थे। उन्हें भीड़ नहीं एकांत पसंद था। तेरा शहर छोड़ जाऊंगा। मैं तेरा लोग कम आए इसीलिए उन्होंने अपने लिविंग रूम में खोपड़ियां और हड्डियां सजवा दी थी। कमरे में लाल रंग की डरावनी लाइट लगा रखी थी। दोस्तों उससे भी मजे की बात तो यह है कि जो आदमी लोगों को डराने के लिए हड्डियां सजाए बैठा था वो खुद हॉरर फिल्में देखने से डरता था। सोचा साया साथ देगा निकला वो बेगाना बेगाना। किशोर दा में एक बचपना था। ऐसा बचपना जो छुपाया नहीं जाता। जो जैसा है वैसा ही दिखना चाहता है। वह बनावटी नहीं बन सके। और शायद यही वजह थी कि बनावटी दुनिया को वो हमेशा बनावटी ही लगे। मंजिल अपनी जगह है रास्ते। इंडस्ट्री की चकाचौंध में वो अकेले पड़ते चले गए। अकेलापन उन्हें डराता नहीं था बल्कि सुकून देता था। उनका मन बार-बार खंडवा लौट जाना चाहता था। अपनी मिट्टी में, अपने बचपन में, अपने आप में। 13 अक्टूबर 1987 शाम का वक्त था। किशोर दा ने अपने बड़े भाई अशोक कुमार यानी कि दादा मुनि को अपने घर बुलाया। एक सरप्राइज के लिए। उस दिन दादा मुनि का जन्मदिन था। लेकिन जिंदगी ने उस शाम अपना ही सरप्राइज़ दे दिया। अचानक किशोर दा की तबीयत बिगड़ी। दिल ने एक बार फिर दर्द की आवाज दी और उसी शाम वो आवाज हमेशा हमेशा के लिए खामोश हो गई। जिंदगी एक मेहमान है छोड़ संसार जाना पड़ेगा। शायद वह अपने बड़े भाई से कहना चाह रहे थे कि अब बहुत हो गया। अब सब कुछ छोड़कर अपने घर लौटना है।

लेकिन दादा मुनि का वह जन्मदिन एक ऐसी याद बन गया जिसमें खुशी से ज्यादा खामोशी थी। उसके बाद दादा मुनि ने कभी अपना जन्मदिन नहीं मनाया। नहीं मैं नहीं देख सकता तुझे रोते हुए। किशोर दा अपने काम के प्रति आखिरी सांस तक वफादार रहे। अच्छा काम किया और फिर चले गए बिना किसी शोर के। जैसे गाना खत्म होता है। पर उस गाने की गूंज हमेशा हमेशा के लिए रह गई। कई बार खबरें आई कि किशोर कुमार की बायोपिक बनेगी। कहा गया अनुराग बासू ने प्रस्ताव भी रखा। नाम जुड़े कभी रणवीर कपूर के तो कभी मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर खान का। लेकिन कहते हैं किशोर दा के बड़े बेटे अमित कुमार ने कभी इजाजत नहीं दी। और शायद किशोर दा की कहानी किसी चेहरे में कभी समा ही नहीं सकती। मेरे यह गीत याद रखना कभी अलविदा ना कहना। वैसे दोस्तों यह सवाल आपके लिए है। क्या किशोर कुमार की बायोपिक बननी चाहिए? और अगर बननी चाहिए तो तो उस बायोपिक में कौन सा अभिनेता उनकी उस मासूमियत, उस पागलपन, उस दर्द और उस सच्चाई को पर्दे पर उतार पाएगा। दोस्तों कमेंट बॉक्स में जरूर बताइएगा क्योंकि किशोर कुमार सिर्फ एक आवाज नहीं थे। वह एक एहसास थे और एहसास कभी मरते नहीं।

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