की आहट के बीच क्या प्रधानमंत्री मोदी को इजराइल जाने से बचना चाहिए था? ईरान से भले हमारे रिश्ते उतने मधुर कभी ना रहे हो पर उनके हेड ऑफ स्टेट जो शिया समुदाय के सर्वोच्च धार्मिक नेता भी हैं अयातुल्लाह अली खामनई उनकी पर मोदी सरकार की खामोशी क्या कहती है? कांग्रेस ने कुछ बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं।
भारत ईरान से दूर हो गया है या फिर इजराइल अमेरिका के इतने करीब हो चुका है कि अब पीछे मुड़ना गवारा नहीं। बताएंगे उद्धव ठाकरे और शरद पवार में से राज्यसभा कौन जा रहा है। सस्पेंस खत्म हो गया। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के एक फोन ने कहानी का द एंड कर दिया है।
पूरी कहानी आपको बताएंगे राजधानी में। । एक ऐसे समय में जब ईरान पर अमेरिका इजराइल के हमले की आशंका थी। जिनेवा में बातचीत हो रही थी। हर दूसरा शख्स जानता था कि इसके असफल होने पर अमेरिका ईरान पर हमला कर देगा।
गाजा में इजराइली नरसंहार को लेकर नितन्याहू और इजराइल की दुनिया भर में आलोचना हो ही रही थी। नितन्याहू के माथे से वार क्रिमिनल का चसपा हटा भी नहीं था। वेस्ट बैंक जिस पर इजराइल का अवैध कब्जा माना जाता है। वहां नितन्या अपनी दखल बढ़ा रहे थे।
प्रधानमंत्री मोदी ना सिर्फ इजराइल गए बल्कि वहां की संसद से दुनिया भर को संबोधित किया। वह भी इस लाइन पर कि भारत इजराइल के साथ मजबूती से खड़ा है। पर कहानी हुई इसके बाद प्रधानमंत्री इजराइल से रवाना हुए। शुक्रवार 27 फरवरी को भारत पहुंचे।
उनके साथ गए भारतीय पत्रकारों की टीम अभी इजराइल से निकली भी नहीं थी कि इजराइल ने 28 फरवरी शनिवार की सुबह ईरान पर अचानक से हमला कर दिया। हमले को लेकर दुनिया भर से प्रतिक्रिया आई। कुछ समर्थन में तो कुछ खिलाफ भी। पर भारत ने चुप्पी बरती।
भारत ने अब तक ईरान पर अमेरिका और इजराइल के हमले की निंदा नहीं की है। पर यह असल बात नहीं है। बात यह है कि आयातुल्ला अली खामिनई ईरान के सर्वोच्च नेता जिनकी जान इजराइल अमेरिका ने ले ली भारत सरकार ने उसकी भी निंदा को उचित नहीं समझा।
निंदा तो दूर संवेदना और श्रद्धांजलि तक भी नहीं अब तक दी गई है। ट्रंप ने खामई की को सही ठहराते हुए उन्हें दुनिया का सबसे बुरा शख्स बताया। भारत भी ऐसा ही मानता है क्या? जो भारत हमास तक को संगठन नहीं मानता वो खामनई की हत्या पर चुप क्यों? भारत का विपक्ष खासकर कांग्रेस इस पर हमलावर है। पार्टी का आरोप है कि मोदी सरकार ने भारत के विदेश नीति की तिलांजलि दे दी है और हम अपने भरोसेमंद साथी के बुरे वक्त में उससे मुंह मोड़ रहे हैं। कांग्रेस अपने इस आरोप के समर्थन में करीब तीन दशक पुरानी एक घटना याद दिलाती है।
जब ईरान ने कश्मीर के मुद्दे पर ना सिर्फ पश्चिम बल्कि इस्लामिक मुल्कों के विरोध के बावजूद हमारा समर्थन किया था। आयतुल्लाह खामन की इजराइल और अमेरिका के हाथों हत्या 24 घंटे गुजर गए हिंदुस्तान की सरकार प्रधानमंत्री विदेश मंत्री एक शब्द इजराइल और अमेरिका की निंदा में आपने नहीं सुना इनके मुंह से। भारत हमेशा एक मोरल लीडरशिप देता था विश्व को। भारत की तरफ पूरा विश्व हमेशा देखता आया नैतिक नेतृत्व के लिए। वह मोरल लीडरशिप, वह मोरल कंपस अब हमारा खत्म हो गया। कुछ दो दिन पहले नरेंद्र मोदी जी इजराइल की यात्रा पर थे। किसी को नहीं समझ में आया क्यों गए।
लौटने के 48 घंटे के भीतर हिंदुस्तान के पुराने दोस्त ईरान पर नरेंद्र मोदी जी के नए दोस्त इजराइल ने हमला बोल दिया। नरेंद्र मोदी चुप रहे। कुछ नहीं बोले। माहे रमजान में आयतुल्लाह खमनई की शहादत इतिहास में दर्ज हो गई। सवाल देखिए मुसलमान हिंदू ईसाई का नहीं है। सवाल ये है कि हमारी 80 साल की फॉरेन पॉलिसी की जो लेगेसी है अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि नरेंद्र मोदी उसको कमजोर कर दिया। हम हमेशा न्यूट्रल थे इन मामलात में और न्यूट्रल बिल्कुल थे। सबको मालूम था।
आप इजराइल को विजिट करके और आपके विजिट के खत्म होने के बाद फौरन हमला हो गया। तो यह यह सवाल यह देखिए भारत की भारत की जो 80 साल की फॉरेन पॉलिसी लेगेसी थी उसका क्या होगा? पर सिक्के का एक दूसरा पहलू भी है। मोदी सरकार भले कह ना रही हो पर उसकी चुप्पी के इशारे उसी तरफ है। भारत को लेकर खामने के स्टैंड ब्लैक एंड वाइट नहीं है।
कुछ ग्रे एरिया भी हैं। 2017 से 2024 के बीच उन्होंने चार बार भारत के आंतरिक मामलों पर बयान दिया। जिसके चलते विदेश मंत्रालय ने हर बार ईरानी राजदूतों को तलब किया। 2017 में खामे ने भारत में कश्मीरियों के हालात को दबा कुचला बताया था और इसके लिए दुनिया भर के मुसलमानों को एकजुट होने को कहा था। इसे पाकिस्तान के स्टैंड से मिलता-जुलता देखा गया। इसके बाद आता है साल 2019 मामला कश्मीर का ही था। 5 अगस्त को भारत ने धारा 370 को हटा दिया।
इस पर भी खामन का बयान आया। वह चाहते तो इसे भारत का आंतरिक मामला बता सकते थे। पर कहा कि कश्मीर के मामले में भारत को ऐसी पॉलिसी अपनानी चाहिए जो सही हो। फिर आया 2020। दिल्ली दंगों के दौरान उन्होंने#शटग इंडिया मुस्लिम्स इन डेंजर है का इस्तेमाल करते हुए ट्वीट किया कि चरमपंथी हिंदुओं द्वारा मुसलमानों का नरसंहार किया जा रहा है। यह बात भी मोदी सरकार को पसंद नहीं आई थी।
इसी तरह ईरान की संसद ने नागरिकता संशोधन अधिनियम यानी सीएए को मुस्लिम विरोधी करार दिया था। सितंबर 2024 में खामई ने एक पोस्ट किया था जिसमें भारत की तुलना गजा और म्यांमार से की जिसे विदेश मंत्रालय ने खारिज किया था। तो क्या भारत सरकार भले खुलकर ना कह रही हो पर खामने की की निंदा ना करते हुए उसके दिमाग में यही सब बातें हैं या फिर भारत इजराइल अमेरिका के साथ अपने रिश्तों को इतना आगे बढ़ा चुका है कि वह अब पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता। अब जरा कुछ बातें राज्यसभा चुनाव को लेकर भी कर ली जाए जिसके लिए नामांकन की आखिरी तारीख 5 मार्च यानी होली से ठीक एक दिन बाद। बीते कुछ दिनों से शरद पवार अस्पताल में हैं। आज सवेरे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने शरद पवार की बेटी और बारामती से सांसद सुप्रिया सुले को फोन मिलाया। खरगे ने पवार से बात की और उन्हें कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा जाने के लिए समर्थन का भरोसा दिया। फिर उन्होंने सुप्रिया से भी लंबी बातचीत की। कांग्रेस चाहती थी कि राज्यसभा और विधान परिषद की एक-एक सीट शिवसेना यूबीटी के साथ बंटवारा कर लिया जाए। इसीलिए बीच में यह बात भी उठी थी कि उद्धव ठाकरे को ही राज्यसभा महाविकास आघाड़ी की तरफ से भेज दिया जाए।
लेकिन सुप्रिया अपने पिता को राज्यसभा भेजने पर अड़ी रही और उद्धव ठाकरे ने भी दिल्ली के बदले महाराष्ट्र की राजनीति में बने रहने को बेहतर समझा। यह तय हुआ है कि एमएलसी के चुनाव को लेकर बाद में सहयोगी दलों के साथ बातचीत कर ली जाएगी। इस तरह से शरद पवार का नाम अब लगभग फाइनल है। कहा जा रहा है कि सोनिया गांधी के कहने पर खरगे ने शरद पवार को फोन किया था। पवार 85 साल के हो गए हैं। पर सुप्रिया ने साफ कह दिया था कि पार्टी और कार्यकर्ताओं की इच्छा है कि पवार साहब राज्यसभा जाएं। सुप्रिया का बयान था कि हमारे नेता जयंत पाटिल और शशिकांत शिंद उद्धव जी और कांग्रेस नेतृत्व से बात करेंगे। जरूरत पड़ी तो मैं खुद दिल्ली में कांग्रेस नेताओं से चर्चा करूंगी। मुझे पूरा भरोसा है कि हम सब एक राय बना लेंगे। बात कुछ यूं हुई कि राज्यसभा का कैंडिडेट तय करने के लिए महा विकास आघाड़ी ने बैठक बुलाई थी।
उसमें बड़ी अजीबोगरीब कहानी हुई। कांग्रेस और शिवसेना यूबीटी के लोग तो उस बैठक में पहुंचे पर शरद पवार के गुट की तरफ से कोई नेता नहीं आया। इससे एक मैसेज गया कि एनसीपी का विलय हो सकता है। तो यूबीटी और कांग्रेस का ही दावा राज्यसभा की सीट पर बनेगा। महाराष्ट्र से राज्यसभा की सात सीटें खाली हो रही हैं। 16 मार्च को चुनाव होने हैं।
महायुती गठबंधन यानी बीजेपी प्लस शिंदे गुट की शिवसेना प्लस अजीत पवार एनसीपी के पास इतने विधायक हैं कि वह छह सीटें आराम से जीत सकते हैं। यानी एक सीट महा विकास आघाड़ी के हिस्से आनी है और उसी पर बात अटकी थी। बात अटकने की वजह नंबर गेम था। यूबीटी के पास सबसे अधिक सीटें हैं। तो वह चाहती थी कि उनका कैंडिडेट राज्यसभा जाए। उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे का कहना था कि संख्या बल के हिसाब से यह सीट उनकी पार्टी की है।
उनके मन में कहीं ना कहीं प्रियंका चतुर्वेदी का नाम भी था जिनका कार्यकाल खत्म हो रहा है। 2020 में हमने अपनी एक सीट एनसीपी को दी थी। इस बार यह सीट हमें मिलनी चाहिए। यह बात कही आदित्य ठाकरे ने क्योंकि उद्धव ठाकरे का विधान परिषद का कार्यकाल मई 2026 में खत्म हो रहा है।
पार्टी का एक धड़ा चाहता था कि उद्धव ठाकरे खुद राज्यसभा चले जाएं। उधर कांग्रेस ने भले अब शरद पवार के नाम पर हामी भर दी है पर उनकी तरफ से बाला साहब थोराट की दावेदारी भी मानी जा रही थी।
